राजस्थान का चौहान वंश:
उत्पत्ति, प्रमुख शाखाएँ, प्रतापी शासक एवं वीरगाथा
चौहान वंश (Chauhan rajvansh) राजस्थान के सबसे प्रभावशाली एवं शौर्यवान राजवंशों में से एक है। वासुदेव चौहान (551 ई.) द्वारा सांभर (शाकंभरी) से नींव रखने से लेकर सोमेश्वर चौहान, पृथ्वीराज चौहान तृतीय (अंतिम हिंदू सम्राट), हम्मीर देव चौहान (रणथंभोर) एवं कान्हड़देव सोनगरा (जालौर) के अमर बलिदानों का प्रामाणिक व परीक्षा-केंद्रित विस्तृत अध्ययन।
स्थापना वर्ष
551 ई.
मूल संस्थापक
वासुदेव
मूल स्थान: शाकंभरी (सांभर) | राजधानी: अहिच्छत्रपुर (नागौर)
चौहान राजवंश की प्रमुख शाखाएँ
सभी राजवंश देखेंचौहान वंश: संपूर्ण ऐतिहासिक विश्लेषण
उत्पत्ति के सिद्धांत, अजमेर, रणथंभोर, जालौर शाखाओं का इतिहास, युद्ध, स्थापत्य कला एवं RPSC/RAS हेतु महत्वपूर्ण तथ्य।
1. चौहान वंश की उत्पत्ति के सिद्धांत (Theories of Origin)
चौहानों की उत्पत्ति के संबंध में इतिहासकारों, शिलालेखों एवं साहित्यिक कृतियों में विभिन्न मत प्रचलित हैं। RAS एवं RPSC परीक्षाओं में इन सिद्धांतों से अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं:
1. अग्निकुंड का सिद्धांत (Agnikunda Theory)
महर्षि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किए गए यज्ञ के अग्निकुंड से 4 राजपूत जातियों (प्रतिहार, परमार, चालुक्य/सोलंकी एवं चौहान) की उत्पत्ति मानी गई है।
समर्थक: चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो), मुहणौत नैणसी, सूर्यमल्ल मीषण।
2. सूर्यवंशी सिद्धांत (Suryavanshi Theory)
चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना गया है।
समर्थक/स्रोत: पृथ्वीराज विजय (जयानक), हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरी), सुर्जन चरित्र (चंद्रशेखर), बेड़ला/श्रृंगीऋषि अभिलेख एवं डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा।
3. चंद्रवंशी सिद्धांत (Chandravanshi Theory)
चौहानों को चंद्रवंशी बताया गया है।
स्रोत: हांसी अभिलेख (1167 ई.), अचलेश्वर (आबू) मंदिर अभिलेख।
4. ब्राह्मण उत्पत्ति का सिद्धांत (Vatsa Gotra Brahmin)
चौहानों को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण बताया गया है।
स्रोत: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) – इसमें सांभर के चौहानों को "वत्सगोत्रीय ब्राह्मण" कहा गया है।
समर्थक: डॉ. डी.आर. भंडारकर, डॉ. गोपीनाथ शर्मा, दशरथ शर्मा।
5. विदेशी उत्पत्ति का सिद्धांत (Foreign Origin)
चौहानों को मध्य एशिया से आई विदेशी जातियों (शक, हूण, सीथियन) की संतान माना गया है।
समर्थक: कर्नल जेम्स टॉड, विलियम क्रुक, वी.ए. स्मिथ।
6. इंद्र के वंशज
सेवाड़ी शिलालेख (पाली) में चौहानों को 'इन्द्र के वंशज' कहा गया है।
📌 RPSC हॉट-फेवरेट: बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.) के अनुसार चौहानों का मूल पुरुष वासुदेव था, जिसने 551 ई. में शाकंभरी (सांभर) में चौहान राज्य स्थापित किया तथा सांभर झील का निर्माण करवाया।
2. साकंभरी एवं अजमेर के चौहान (Chauhans of Sambhar & Ajmer)
2.1 प्रारंभिक इतिहास एवं वासुदेव चौहान
चौहानों का मूल स्थान सपादलक्ष (सांभर क्षेत्र) माना जाता है। इनकी प्रारंभिक राजधानी अहिच्छत्रपुर (वर्तमान नागौर) थी।
- वासुदेव चौहान (551 ई.): चौहान वंश का आदिपुरुष / मूल पुरुष। बिजोलिया शिलालेख के अनुसार इन्होंने सांभर झील का निर्माण करवाया।
- दुर्लभराज प्रथम: गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज का सामंत था। इसके समय पहला मुस्लिम आक्रमण (महमूद गजनवी के पिता सुबुक्तगीन के समय) हुआ।
- गूबक प्रथम (Guvaka I): प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय का सामंत। सीकर में प्रसिद्ध हर्षनाथ मंदिर का निर्माण करवाया। हर्षनाथ चौहानों के कुलदेवता हैं।
- चंदनराज: इनकी रानी आत्मप्रभा (रुद्राणी) योग क्रिया में निपुण थी, जो पुष्कर में प्रतिदिन 1000 दीपक जलाकर शिव उपासना करती थी (RPSC परीक्षा में कई बार पूछा गया प्रश्न)।
- वाक्पतिराज प्रथम: इन्होंने 'महाराजा' की उपाधि धारण की एवं प्रतिहारों की अधीनता से मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ाया।
- विग्रहराज द्वितीय: इन्होंने चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को हराया और भड़ौच (गुजरात) में आशापुरा माता मंदिर का निर्माण करवाया (आशापुरा माता चौहानों की कुलदेवी हैं)।
2.2 अजयराज (1113 – 1133 ई.) – अजमेर के संस्थापक
अजयराज को अजमेर के चौहान वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
- अजमेर की स्थापना (1113 ई.): अजयराज ने 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) नगर बसाया और अपनी राजधानी सांभर से अजमेर स्थानांतरित की।
- अजयमेरु दुर्ग: बीठली पहाड़ी पर अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़) का निर्माण करवाया। (इसे गढ़ बीठली भी कहते हैं)।
- मुद्राएँ: इन्होंने चाँदी एवं तांबे के सिक्के चलाए जिन पर 'श्री अजयदेव' तथा उनकी रानी 'सोमलवती / सोमलदेवी' का नाम अंकित था।
2.3 अर्णोराज / आनाजी (1133 – 1155 ई.)
- आनासागर झील (अजमेर): तुर्कों के आक्रमण को विफल कर तुर्क सेना के रक्त से सनी भूमि को शुद्ध करने हेतु चन्द्र नदी के पानी को रोककर आनासागर झील (1137 ई.) का निर्माण करवाया।
मुगल स्थापत्य जुड़ाव (RPSC हेतु महत्वपूर्ण):
• मुगल सम्राट जहांगीर ने यहाँ 'दौलत बाग' (वर्तमान में सुभाष उद्यान) का निर्माण करवाया था।
• मुगल सम्राट शाहजहाँ ने यहाँ संगमरमर की 5 बारहदरी (Baradari) का निर्माण करवाया था। - वराह मंदिर (पुष्कर): पुष्कर में प्रसिद्ध वराह मंदिर का निर्माण करवाया (जिसकी मूर्ति को बाद में जहांगीर ने पानी में फिंकवा दिया था)।
- हत्या: अर्णोराज की हत्या उनके पुत्र जगद्देव ने की, इसलिए जगद्देव को चौहानों का पितृहंता कहा जाता है।
2.4 विग्रहराज चतुर्थ / बीसलदेव (1153 – 1163 ई.) – स्वर्ण काल
विग्रहराज चतुर्थ का काल सपादलक्ष/अजमेर के चौहानों का स्वर्ण काल (Golden Era) कहलाता है।
- उपाधियाँ: 'कवि बांधव' / 'कटिबंध' (विद्वानों का आश्रयदाता होने के कारण – जयानक द्वारा प्रदत्त)।
- हरकेली नाटक: स्वयं विग्रहराज चतुर्थ ने संस्कृत भाषा में प्रसिद्ध नाटक 'हरकेली' (Harikeli) की रचना की, जो भारवि के 'किरातार्जुनीयम्' पर आधारित है।
- संस्कृत पाठशाला: अजमेर में एक 'सरस्वती कंठाभरण' संस्कृत पाठशाला बनवाई, जिसे बाद में कुतुबुद्दीन ऐबक ने तोड़कर 'ढाई दिन का झोंपड़ा' मस्जिद में परिवर्तित कर दिया।
'ढाई दिन का झोंपड़ा' स्थापत्य विशेषताएँ (RPSC):
• वास्तुकार: इस इमारत का डिज़ाइनर/वास्तुकार अबू बक्र था।
• उर्स: यहाँ सूफी संत पंजाब शाह का 2½ (अढ़ाई) दिन का उर्स लगता है, जिस कारण इसे 'ढाई दिन का झोंपड़ा' कहा जाता है।
• कथन: इतिहासकार जॉन मार्शल ने इसे "ढाई दिन में बनी इमारत" कहा था। इसकी दीवारों पर आज भी 'हरकेली' नाटक की पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। - बीसलसर झील: टोंक जिले के टोडा रायसिंह में बीसलपुर बांध/बीसलसर झील एवं बीसलपुर शहर बसाया।
- दरबारी विद्वान:
1. सोमदेव: 'ललित विग्रहराज' ग्रंथ की रचना की।
2. नरपति नाल्ह: 'बीसलदेव रासो' (गोडवाड़ी बोली में लिखित) की रचना की। - दिल्ली पर अधिकार: इन्होंने दिल्ली के तोमर शासकों को पराजित कर दिल्ली को अपने साम्राज्य में मिलाया।
2.5 सोमेश्वर चौहान (1169 – 1177 ई.)
सोमेश्वर चौहान अर्णोराज के पुत्र एवं पृथ्वीराज चौहान तृतीय के पिता थे। इन्होंने गुजरात के चालुक्य शासक कुमारपाल की सहायता से शासन संभाला था।
- बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.): इन्हीं के शासनकाल में 1170 ई. (फाल्गुन सुदी तृतीया) में प्रसिद्ध बिजोलिया शिलालेख (भीलवाड़ा) उत्कीर्ण करवाया गया। इसके रचयिता गुणभद्र थे तथा इसे कायस्थ केशव द्वारा उकेरा गया था। यह राजस्थान इतिहास का अत्यंत प्रामाणिक स्रोत है।
- उपाधि: सोमेश्वर चौहान ने 'प्रतापलंकेश्वर' की उपाधि धारण की थी।
- मूर्तियाँ व स्थापत्य: इन्होंने अपने पिता अर्णोराज एवं स्वयं की घुड़सवार मूर्तियाँ बनवाई थीं तथा अजमेर में अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया था।
3. पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1177 – 1192 ई.) – भारत का अंतिम हिंदू सम्राट
पृथ्वीराज तृतीय (पिता: सोमेश्वर चौहान, माता: कर्पूरी देवी) मात्र 11 वर्ष की आयु में 1177 ई. में अजमेर के सिंहासन पर बैठे। प्रारंभिक समय में इनकी माता कर्पूरी देवी एवं मुख्यमंत्री कदमबास (कैमास/कम्बवास) तथा सेनापति भुवनमल्ल ने संरक्षिका व प्रशासक के रूप में कार्य किया।
🎖️ प्रमुख उपाधियाँ
- रायपिथोरा: युद्धभूमि में पीठ न दिखाने वाला। (इसी नाम पर दिल्ली में पिथौरागढ़ दुर्ग बनवाया)।
- दलपंगुल: 'विश्व विजेता' (World Conqueror)।
⚔️ प्रमुख सैन्य अभियान एवं युद्ध
- नागार्जुन का दमन (1178 ई.): अपने चचेरे भाई नागार्जुन के विद्रोह को गुड़पुर के युद्ध में कुचला।
- भडानकों का दमन (1182 ई.): भरतपुर-मथुरा-अलवर क्षेत्र की उपद्रवी भडानक जाति का पूर्ण खात्मा किया।
- महोबा का युद्ध / तुमुल का युद्ध (1182 ई.): चंदेल शासक परमर्दिदेव को हराया। इस युद्ध में चंदेलों के वीर सेनापति आल्हा एवं ऊदल वीरगति को प्राप्त हुए। (पंजुनराय को महोबा का अधिकारी बनाया)।
- आबू का युद्ध (1184 ई.): गुजरात के चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के सेनापति जगद्देव प्रतिहार से संधि की।
- कन्नौज से संघर्ष: कन्नौज के गहड़वाल शासक जयचंद गहड़वाल की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर गंधर्व विवाह किया।
🏹 तराइन के युद्ध (Battles of Tarain)
1. तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
स्थान: कुरुक्षेत्र (हरियाणा)। पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गोरी को बुरी तरह पराजित किया। दिल्ली के गवर्नर गोविंदराज तोमर के भाले के वार से गोरी घायल होकर भागा।
2. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)
गोरी ने कूटनीति व छद्म नीति से भोर के समय अचानक आक्रमण किया। पृथ्वीराज चौहान पराजित हुए। भारत में मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।
📚 दरबारी विद्वान एवं रत्न
- जयानक: 'पृथ्वीराज विजय' (संस्कृत महाकाव्य)
- चंदबरदाई (पृथ्वीभट्ट): 'पृथ्वीराज रासो' (हिंदी का प्रथम महाकाव्य)
- विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन, विश्वरूप, आशाधर
कला साहित्य विभाग: पृथ्वीराज चौहान तृतीय ने अजमेर में एक पृथक 'कला एवं साहित्य विभाग' की स्थापना की थी, जिसका प्रथम अध्यक्ष पद्मनाभ को बनाया गया था।
4. रणथंभोर के चौहान (Chauhans of Ranthambore)
स्थापना (1194 ई.): तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंदराज चौहान ने रणथंभोर में चौहान वंश की नींव रखी।
👑 हम्मीर देव चौहान (1282 – 1301 ई.) – हठ एवं शरणागत वत्सलता
हम्मीर देव रणथंभोर के सबसे प्रतापी शासक थे। इन्होंने अपने जीवन में कुल 17 युद्ध लड़े जिनमें से 16 युद्धों में विजय प्राप्त की। इन्होंने दिग्विजय नीति अपनाई तथा 'कोटियजन यज्ञ' करवाया (पुरोहित: विश्वरूप)।
रणथंभोर का साका (11 जुलाई 1301 ई.) – राजस्थान का प्रथम साका
आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी
कारण: खिलजी के विद्रोही सेनापति मोहम्मद शाह व केहब्रू को हम्मीर द्वारा शरण देना।
विश्वासघाती सेनापति: रणमल एवं रतिपाल (खिलजी से जा मिले)।
केसरिया: हम्मीर देव चौहान के नेतृत्व में।
जल जौहर: रानी रंगदेवी व पुत्री पद्मला (देवलदे) के नेतृत्व में (पद्मला तालाब में)।
दरबारी कवि: अमीर खुसरो ("आज कुफ्र का गढ़ इस्लाम का घर हो गया")।
"सिंह गमन सतपुरुष वचन, कदली फलत इक बार।
तिरिया तेल हम्मीर हठ, चढ़ै न दूजी बार॥"
- 32 खंभों की छतरी: हम्मीर ने अपने पिता जैत्रसिंह के 32 वर्षों के शासन की स्मृति में रणथंभोर दुर्ग में 32 खंभों की छतरी बनवाई, जिसे 'न्याय की छतरी' भी कहते हैं।
- हम्मीर पर रचे गए ग्रंथ: हम्मीर महाकाव्य (नयनचंद्र सूरी), हम्मीर रासो (जोधराज/सारंगधर), हम्मीर हठ (चंद्रशेखर), हम्मायण (भांडऊ व्यास)।
5. जालौर के चौहान (Songara Chauhans of Jalore)
संस्थापक (1181 ई.): नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान (कीतू) ने जालौर में सोनगरा चौहान वंश की स्थापना की। मुहणौत नैणसी ने कीर्तिपाल को 'कीतू एक महान राजा' की उपाधि दी।
👑 कान्हड़देव सोनगरा (1296 – 1311 ई.)
कान्हड़देव एवं उनके पुत्र वीरमदेव ने अलाउद्दीन खिलजी की विशाल सेना से अभूतपूर्व लोहा लिया।
🏰 सिवाना का साका (1308 ई.) – जालौर की कुंजी
- शासक: सातलदेव एवं सोम (कान्हड़देव के भतीजे)
- विश्वासघाती: भावला पंवार (मामदेव कुण्ड में गोमांस मिलाया)
- परिणाम: खिलजी का अधिकार; सिवाना का नया नाम 'खैराबाद' रखा एवं कमालुद्दीन गुर्ग को दुर्गपति बनाया।
🔥 जालौर का साका (1311 ई.)
- शासक: कान्हड़देव व कुंवर वीरमदेव
- विश्वासघाती: बीका दहिया (रास्ते का गुप्त भेद बताया)
- परिणाम: कान्हड़देव व वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए। जालौर का नया नाम 'जलालाबाद' रखा तथा 'तोपखाना मस्जिद' बनवाई।
प्रमुख साहित्यिक ग्रंथ: कवि पद्मनाभ द्वारा रचित 'कान्हड़दे प्रबंध' एवं 'वीरमदेव सोनगरा री बात' से इस युद्ध का विस्तृत विवरण मिलता है। (खिलजी की पुत्री फिरोजा व वीरमदेव के प्रेम प्रसंग का उल्लेख)।
6. चौहानों की अन्य प्रमुख शाखाएँ (Other Chauhan Branches)
हाड़ौती (बूँदी व कोटा)
- बूँदी की स्थापना: देवा हाड़ा (देवीसिंह) ने 1241 ई. में जेता मीणा को हराकर बूँदी राज्य की नींव रखी।
- राव सुरजन हाड़ा: 1569 ई. में रणथंभोर दुर्ग में अकबर की अधीनता स्वीकार की (मानसिंह के माध्यम से ऐतिहासिक संधि)।
- तारागढ़ दुर्ग (बूँदी): 1354 ई. में राव बरसिंह द्वारा निर्मित (अपनी रहस्यमयी बनावट हेतु 'तिलस्मी किला' प्रसिद्ध)।
- 84 खंभों की छतरी: बूँदी में राव अनिरुद्ध सिंह द्वारा अपने धाभाई देवा की स्मृति में निर्मित प्रसिद्ध स्थापत्य।
- कोटा पृथक राज्य: 1631 ई. में शाहजहाँ की स्वीकृति से माधोसिंह हाड़ा कोटा के स्वतंत्र शासक बने।
सिरोही (आबू) शाखा
- संस्थापक: लुम्भा चौहान (1311 ई.) – इन्होंने परमारों को हराकर चंद्रावती को राजधानी बनाया।
- सिरोही नगर: सहसमल देवड़ा ने 1425 ई. में सिरोही नगर बसाया।
- दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.): राव सुरताण देवड़ा ने अकबर की सेना (जगमाल) को पराजित किया।
नाडोल (पाली) शाखा
- संस्थापक: लक्ष्मण चौहान (960 ई.) – सांभर के वाक्पतिराज के पुत्र।
- महत्व: यह सांभर चौहानों से निकलने वाली प्रथम उपशाखा थी। नाडोल से ही जालौर के सोनगरा चौहानों का निकास हुआ।
7. प्रमुख साहित्यिक स्रोत एवं उनके रचयिता (Literary Sources)
| ग्रंथ का नाम | रचयिता | संबंधित शासक / विषय |
|---|---|---|
| पृथ्वीराज रासो | चंदबरदाई (पृथ्वीभट्ट) | पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जीवन चरित्र एवं तराइन युद्ध |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक (संस्कृत) | अजमेर के चौहानों की वंशावली एवं पृथ्वीराज तृतीय |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरी | हम्मीर देव चौहान एवं रणथंभोर का इतिहास |
| हम्मीर रासो | जोधराज / सारंगधर | हम्मीर देव का जीवन व चरित्र |
| हम्मीर हठ / सुर्जन चरित्र | चंद्रशेखर | हम्मीर देव का हठ एवं राव सुरजन हाड़ा का इतिहास |
| कान्हड़दे प्रबंध | कवि पद्मनाभ | कान्हड़देव सोनगरा एवं जालौर युद्ध (1311 ई.) |
| वीरमदेव सोनगरा री बात | कवि पद्मनाभ | वीरमदेव एवं फिरोजा का विवरण |
| हरकेली (संस्कृत नाटक) | विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) | शिव-अर्जुन संवाद (किरातार्जुनीयम् आधारित) |
| ललित विग्रहराज | सोमदेव | विग्रहराज चतुर्थ एवं राजकुमारी देवलदेवी |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह (गोडवाड़ी) | विग्रहराज चतुर्थ एवं राजमती का प्रेम प्रसंग |
8. चौहान शाखाओं की त्वरित तुलनात्मक तालिका (Branch Comparison)
| शाखा | स्थापना वर्ष | संस्थापक | राजधानी | प्रसिद्ध शासक / साका |
|---|---|---|---|---|
| सांभर / अजमेर | 551 ई. / 1113 ई. | वासुदेव / अजयराज | अहिच्छत्रपुर ➔ अजमेर | विग्रहराज IV, सोमेश्वर, पृथ्वीराज III |
| रणथंभोर | 1194 ई. | गोविंदराज चौहान | रणथंभोर दुर्ग | हम्मीर देव चौहान (1301 ई. साका) |
| जालौर (सोनगरा) | 1181 ई. | कीर्तिपाल (कीतू) | सुवर्णगिरि (जालौर) | कान्हड़देव सोनगरा (1311 ई. साका) |
| हाड़ौती (बूँदी) | 1241 ई. | देवा हाड़ा (देवीसिंह) | बूँदी | राव सुरजन हाड़ा, राव अनिरुद्ध |
| सिरोही (देवड़ा) | 1311 ई. | लुम्भा चौहान | चंद्रावती ➔ सिरोही | सहसमल, सुरताण देवड़ा |
| नाडोल | 960 ई. | लक्ष्मण चौहान | नाडोल (पाली) | अलहण चौहान |
9. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)
📌 अति-महत्वपूर्ण तथ्य
- चौहानों का आदिपुरुष: वासुदेव चौहान (551 ई.)
- बिजोलिया शिलालेख (1170 ई.): सोमेश्वर चौहान के काल में निर्मित। रचयिता – गुणभद्र। इसके अनुसार चौहान वत्सगोत्रीय ब्राह्मण थे।
- प्रतापलंकेश्वर: सोमेश्वर चौहान की प्रसिद्ध उपाधि।
- अजमेर का स्वर्ण काल: विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) का शासनकाल।
- ढाई दिन का झोंपड़ा: वास्तुकार अबू बक्र; यहाँ पंजाब शाह सूफी संत का 2½ दिन का उर्स लगता है।
- दौलत बाग व 5 बारहदरी: आनासागर झील पर क्रमशः जहांगीर व शाहजहाँ द्वारा निर्मित।
- राजस्थान का प्रथम साका/जल जौहर: 1301 ई. (रणथंभोर) – रानी रंगदेवी व देवलदे।
📝 RPSC में पूछे गए प्रश्न
- रुद्राणी (आत्मप्रभा): चंदनराज की रानी जो पुष्कर में 1000 दीपक जलाती थी।
- दलपंगुल व रायपिथोरा: पृथ्वीराज चौहान तृतीय की उपाधियाँ।
- आल्हा-ऊदल: महोबा के चंदेल सेनापति जो 1182 ई. में पृथ्वीराज III से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
- तारागढ़ दुर्ग (बूँदी): 1354 ई. में राव बरसिंह द्वारा निर्मित।
- 84 खंभों की छतरी: बूँदी में राव अनिरुद्ध सिंह द्वारा निर्मित।
- सिवाना का नाम 'खैराबाद' & जालौर का 'जलालाबाद': अलाउद्दीन खिलजी द्वारा क्रमशः 1308 ई. व 1311 ई. में रखे गए नाम।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
चौहान राजवंश से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
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