लोड हो रहा है...
विश्व का सबसे दीर्घकालिक राजवंश – मेवाड़

मेवाड़ का गुहिल व सिसोदिया राजवंश:
गौरवशाली इतिहास, प्रतापी शासक एवं स्वाभिमान

गुहिल एवं सिसोदिया राजवंश (Guhil & Sisodia rajvansh) संसार का सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला राजवंश है। बप्पा रावल, महाराणा कुंभा (विजय स्तम्भ), राणा सांगा, पन्ना धाय का त्याग, चित्तौड़ के 3 साके, महाराणा प्रताप, महाराणा राजसिंह एवं हुरड़ा सम्मेलन का प्रामाणिक व परीक्षा-केंद्रित संपूर्ण अध्ययन।

100% प्रामाणिक स्रोत RAS / RPSC / REET उपयोगी चित्तौड़ के 3 साके शामिल विजय स्तम्भ विशेष विवरण
त्वरित सारांश 🚩 मेवाड़ राजवंश

स्थापना वर्ष

566 ई.

मूल संस्थापक

गुहादित्य

कुलदेवी: बाण माता | आराध्य देव: एकलिंगजी (शिव)

गुहिल/सिसोदिया वंश : Complete Test
विस्तृत अध्ययन सामग्री

मेवाड़ राजवंश: प्रामाणिक इतिहास एवं सांस्कृतिक धरोहर

गुहिल से सिसोदिया तक का कालक्रम, प्रमुख शासकों का योगदान, कला, स्थापत्य, साके, युद्ध एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य।

1. उत्पत्ति, उपनाम एवं प्रारंभिक पृष्ठभूमि (Origin & Background)

मेवाड़ का प्राचीन नाम प्राग्वाट / मेदपाट था। इस क्षेत्र पर 'मेद' (मीणा) जाति का आधिपत्य रहने के कारण इसे मेदपाट कहा गया, जो कालान्तर में 'मेवाड़' कहलाया। प्राचीन काल में यह क्षेत्र शिवि जनपद के अंतर्गत आता था, जिसकी राजधानी मध्यमिका (वर्तमान नगरी, चित्तौड़गढ़) थी।

संस्थापक – गुहादित्य / गुहिल (566 ई.)

गुहिल वंश की स्थापना गुहादित्य (गुहिल) ने 566 ई. में की। गुहादित्य वल्लभपुर के राजा शिलादित्य तथा रानी पुष्पावती के पुत्र थे। गुफा में जन्म लेने के कारण इनका नाम 'गुहादित्य' पड़ा।

सूर्यवंशी सिद्धांत

मेवाड़ के शासक स्वयं को 'हिन्दुआ सूरज' कहते हैं तथा श्री रामचंद्र के ज्येष्ठ पुत्र लव के वंशज मानते हैं।
समर्थक: कर्नल जेम्स टॉड, मुहणौत नैणसी, डॉ. जी.एच. ओझा।

ब्राह्मण उत्पत्ति सिद्धांत

आठपुर अभिलेख (977 ई.) एवं कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में गुहिल को आनंदपुर (गुजरात) के विप्र (ब्राह्मण) कुल का बताया गया है। डॉ. डी.आर. भंडारकर व डॉ. गोपीनाथ शर्मा इस मत का समर्थन करते हैं।

ईरान का नौशेखाँ आदिल मत

मुग़ल इतिहासकार अबुल फज़ल (आईन-ए-अकबरी) के अनुसार मेवाड़ के गुहिल ईरान के बादशाह नौशेखाँ आदिल के वंशज हैं।

मेवाड़ का राजवाक्य: "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार।" (मेवाड़ के ध्वज पर एक तरफ राजपूत योद्धा तथा दूसरी तरफ भील योद्धा राणा पूंजा का चित्र अंकित है)।

2. रावल शाखा के प्रमुख शासक (Rawal Branch: Bappa to Ratan Singh)

2.1 बप्पा रावल / कालभोज (734 – 753 ई.) – वास्तविक संस्थापक

बप्पा रावल को मेवाड़ में गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इनका मूल नाम कालभोज था ('बप्पा' इनकी उपाधि थी जो हरित ऋषि ने दी थी)।

  • चित्तौड़ विजय (734 ई.): इन्होंने हरित ऋषि के आशीर्वाद से मौर्य शासक मानमोरी को हराकर चित्तौड़ दुर्ग पर अधिकार किया।
  • राजधानी व मंदिर: बप्पा रावल ने अपनी राजधानी नागदा बनाई तथा कैलाशपुरी (नागदा) में एकलिंगजी (शिव) मंदिर का निर्माण करवाया।
  • एकलिंगजी का दीवान: मेवाड़ के राजा स्वयं को शासक न मानकर 'श्री एकलिंगजी का दीवान' मानकर शासन करते थे।
  • प्रथम स्वर्ण सिक्का: मेवाड़ में सर्वप्रथम सोने का सिक्का (115 ग्रेन) बप्पा रावल ने चलाया था।
  • सी.वी. वैद्य का कथन: इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना फ्रांसीसी सेनापति 'चार्ल्स मार्टेल' से की है।

2.2 अल्लट / आलू रावल (10वीं शताब्दी)

  • आहाड़ राजधानी: इन्होंने नागदा के अतिरिक्त आहाड़ को मेवाड़ की दूसरी राजधानी बनाया तथा वहाँ वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
  • प्रशासनिक व्यवस्था: मेवाड़ में सर्वप्रथम नौकरशाही (Bureaucracy) की शुरुआत अल्लट ने की।
  • हूण राजकुमारी हरियादेवी से विवाह: राजस्थान का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय विवाह (International Marriage) अल्लट एवं हूण राजकुमारी हरियादेवी के मध्य हुआ।

2.3 जैत्रसिंह (1213 – 1253 ई.)

  • भूताला का युद्ध (1227 ई.): जैत्रसिंह ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को भूताला के युद्ध में पराजित किया। (युद्ध में भागती इल्तुतमिश की सेना ने नागदा को नष्ट कर दिया)।
  • चित्तौड़ को प्रथम बार राजधानी: नागदा के ध्वस्त होने के पश्चात जैत्रसिंह ने चित्तौड़गढ़ को मेवाड़ की राजधानी बनाया।
  • स्वर्ण काल: डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार जैत्रसिंह का काल मध्यकालीन मेवाड़ का 'स्वर्ण काल' था।

2.4 तेजसिंह (1253 – 1273 ई.)

इनके समय 1260 ई. में चित्तौड़ में मेवाड़ चित्रशैली का प्रथम चित्रित ग्रंथ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' कमलचंद्र द्वारा ताड़पत्र पर चित्रित किया गया।


2.5 रावल रतनसिंह (1302 – 1303 ई.) – रावल शाखा का अंतिम शासक

रतनसिंह मेवाड़ की रावल शाखा के अंतिम शासक थे। इनकी रानी पद्मिनी (सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन की पुत्री) थीं।

चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका (26 अगस्त 1303 ई.)
  • आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी (कारण: साम्राज्यवाद व रानी पद्मिनी की सुंदरता)।
  • केसरिया: रावल रतनसिंह तथा वीर सेनापति गोरा व बादल के नेतृत्व में।
  • जौहर: रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1600 वीरांगनाओं ने जौहर किया (राजस्थान का प्रसिद्ध बड़ा जौहर)।
  • परिणाम: खिलजी का अधिकार। अलाउद्दीन ने दुर्ग अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपकर इसका नाम 'खिज्राबाद' रख दिया।
  • साहित्यिक प्रमाण: मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित ग्रंथ 'पद्मावत' (1540 ई.) एवं अमीर खुसरो का ग्रंथ 'खजाइन-उल-फुतूह'।

3. सिसोदिया शाखा की स्थापना एवं प्रारंभिक शासक

3.1 राणा हम्मीर (1326 – 1364 ई.) – सिसोदिया शाखा का संस्थापक

सिसोदा ग्राम के सामंत हम्मीर देव ने 1326 ई. में मालदेव सोनगरा के पुत्र जैसा को हराकर चित्तौड़गढ़ पर पुनः अधिकार किया और सिसोदिया राजवंश की नींव रखी। इसके बाद मेवाड़ के शासक 'रावल' के स्थान पर 'राणा' या 'महाराणा' कहलाने लगे।

  • मेवाड़ का उद्धारक: राणा हम्मीर को 'मेवाड़ का उद्धारक' कहा जाता है।
  • विषम घाटी पंचानन: कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में राणा हम्मीर को 'विषम घाटी पंचानन' (विकट युद्धों में सिंह के समान) कहा गया है।
  • वीर राजा: रसिकप्रिया (कुंभा द्वारा रचित टीका) में इन्हें 'वीर राजा' कहा गया है।
  • सिंगोली का युद्ध: हम्मीर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुग़लक़ को सिंगोली (बांसवाड़ा) के युद्ध में पराजित किया।
  • अन्नपूर्णा मंदिर: चित्तौड़गढ़ दुर्ग में अन्नपूर्णा माता (बाण माता) मंदिर का निर्माण करवाया।

3.2 राणा लाखा / लक्षसिंह (1382 – 1421 ई.)

  • जावर चांदी की खान: इनके शासनकाल में जावर (उदयपुर) में चाँदी एवं शीशा-जस्ता की प्रसिद्ध खानें निकलीं, जिससे मेवाड़ की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई।
  • पिचोला झील: इनके काल में एक 'छिछीमार' / 'छीतर' नामक बंजारे ने अपने बैल की स्मृति में पिचोला झील (उदयपुर) का निर्माण करवाया।
  • हंसाबाई विवाह व चुंडा की प्रतिज्ञा: मारवाड़ के राव रणमल की बहन हंसाबाई का विवाह वृद्ध राणा लाखा से हुआ। लाखा के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चुंडा ने आजीवन गद्दी पर न बैठने की भीष्म प्रतिज्ञा की, इसलिए कुंवर चुंडा को 'मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है।

4. स्वर्णिम युग: महाराणा कुंभा, विजय स्तम्भ एवं राणा सांगा

👑 4.1 महाराणा कुंभा (1433 – 1468 ई.) – राजस्थान स्थापत्य कला के जनक

महाराणा कुंभा (पिता: महाराणा मोकल, माता: सौभाग्य देवी) को 'राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक' कहा जाता है।

🎖️ प्रमुख उपाधियाँ (अभिनव भारताचार्य आदि)

अभिनव भारताचार्य (संगीत प्रेमी), हिंदू सुरत्राण (मुस्लिम शासकों को हराने वाला), राणो रासो (साहित्यकारों का आश्रयदाता), हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का स्वामी), छाप गुरु (छापामार युद्ध शैली), दान गुरु, चाप गुरु।

⚔️ प्रमुख युद्ध व विजय

सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुंभा ने मालवा के महमूद खिलजी प्रथम को हराया।
चम्पानेर की संधि (1456 ई.): मालवा (महमूद खिलजी) व गुजरात (कुतुबुद्दीन शाह) की संयुक्त सेना को कुंभा ने बदनौर युद्ध (1457 ई.) में हराया।

🚩 विजय स्तम्भ (Vijay Stambha) – विशेष परीक्षा तथ्य

सारंगपुर युद्ध (1437 ई.) विजय के उपलक्ष्य में महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग में विजय स्तम्भ (1440–1448 ई.) का निर्माण करवाया।

  • ऊँचाई व बनावट: 122 फीट ऊँचा, 9 मंजिला तथा इसमें 157 सीढ़ियाँ हैं।
  • 3री मंजिल पर 'अल्लाह': इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' लिखा हुआ है।
  • प्रमुख वास्तुकार / शिल्पी: जैता तथा उनके पुत्र नापा, पोमा एवं पूंजा
  • उपनाम: उपेन्द्रनाथ डे ने 'विष्णुध्वज' कहा; डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने 'मूर्तियों का अजायबघर' व 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' कहा।
  • प्रथम डाक टिकट (15 अगस्त 1949): राजस्थान की पहली इमारत जिस पर ₹0.15 (15 पैसे) का डाक टिकट जारी हुआ। (राजस्थान पुलिस व माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का प्रतीक चिह्न)।
🏛️ कुंभा के अन्य निर्माण: कविराज श्यामलदास के ग्रंथ 'वीर विनोद' के अनुसार मेवाड़ के 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण कुंभा ने करवाया।
- कुंभलगढ़ दुर्ग: (राजसमंद) वास्तुकार – मण्डन। इसका सर्वोच्च भाग 'कटारगढ़' (कुंभा का निवास) 'मेवाड़ की आँख' कहलाता है।
- अन्य दुर्ग व मंदिर: बसंती दुर्ग, मचान दुर्ग, भोमट दुर्ग, अचलगढ़ दुर्ग (पुनर्निर्माण) एवं रणकपुर जैन मंदिर (1439 ई., पाली, 1444 खंभे, शिल्पी: देपाक)।
📚 कुंभा द्वारा रचित ग्रंथ: संगीत राज (5 कोषों में विभक्त – पाठ, गीत, वाद्य, नृत्य, रस), संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, कामराज रतिसार, चंडीशतक टीका, रसिकप्रिया टीका।
हत्या: 1468 ई. में कुंभा की हत्या उनके पुत्र उदा (उदयसिंह प्रथम) ने कुंभलगढ़ दुर्ग के मामदेव कुंड के पास की (उदा = मेवाड़ का पहला पितृहंता)।

👑 4.2 राणा सांगा / संग्राम सिंह प्रथम (1509 – 1528 ई.) – 'हिंदूपत'

राणा सांगा अंतिम हिंदू सम्राट थे जिनके नेतृत्व में राजपूताना के सभी राजा एक छत्र तले एकत्र हुए थे। कर्नल टॉड ने इन्हें 'सैनिक का भग्नावशेष' कहा (शरीर पर 80 घाव होने के कारण)।

⚔️ राणा सांगा के प्रमुख युद्ध
1. खातौली का युद्ध (1517 ई. - कोटा): दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को पराजित किया।
2. बाड़ी का युद्ध (1518 ई. - धौलपुर): इब्राहिम लोदी की सेना (मियां माखन) को पुनः हराया।
3. गागरोन का युद्ध (1519 ई. - झालावाड़): मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय को हराया व बंदी बनाया।
4. बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई.): बाबर की मुगल सेना (महंदी ख्वाजा) को बुरी तरह खदेड़ा।
🚩 खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई. - रूपवास, भरतपुर)

बाबर ने इस युद्ध को 'जिहाद' (धर्मयुद्ध) घोषित किया, तमगा कर समाप्त किया तथा शराब न पीने की कसम खाई। सांगा ने राजपूत परंपरा 'पाती पेरवण' के तहत सभी राजपूत राजाओं को आमंत्रित किया। युद्ध के दौरान सांगा के घायल होने पर झाला अज्जा (सादड़ी) ने राजचिह्न धारण किया। बाबर ने तुलगुमा युद्ध पद्धति व तोपखाने के बल पर विजय प्राप्त की और 'गाज़ी' की उपाधि धारण की।

मृत्यु: 30 जनवरी 1528 को बसवा (दौसा) में ज़हर देने के कारण; समाधि / छतरी: मांडलगढ़ (भीलवाड़ा)।

4.3 मध्यवर्ती संघर्ष: चित्तौड़ के द्वितीय व तृतीय साके तथा पन्ना धाय का त्याग

🔥 चित्तौड़गढ़ का द्वितीय साका (1535 ई.) – रानी कर्मवती व बहादुर शाह का आक्रमण

  • आक्रमणकारी: गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह। (राणा सांगा की मृत्यु के बाद अल्पवयस्क पुत्र विक्रमादित्य शासक थे, अतः संरक्षिका राजमाता रानी कर्मवती थीं)।
  • हुमायूँ को राखी: रानी कर्मवती ने सहायता हेतु मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी थी, किंतु समय पर सहायता न मिल सकी।
  • केसरिया: देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघ सिंह के नेतृत्व में राजपूतों ने केसरिया किया (इसी कारण बाघ सिंह की पाडन पोल पर छतरी बनी है)।
  • जौहर: रानी कर्मवती के नेतृत्व में 13,000 वीरांगनाओं ने जौहर किया।

🛡️ पन्ना धाय का अतुलनीय बलिदान (1536 ई.)

दासी पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर छोटे राजकुमार उदयसिंह की हत्या का प्रयास किया। स्वामिभक्त धात्री माँ पन्ना धाय (खींची चौहान) ने अपने स्वयं के पुत्र चंदन का बलिदान देकर कुंवर उदयसिंह के प्राणों की रक्षा की।

पन्ना धाय कुंवर उदयसिंह को सुरक्षित कुंभलगढ़ दुर्ग ले गईं जहाँ आशा देवपुरा (किलेदार) ने उन्हें शरण दी। यहीं 1537 ई. में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ तथा 1540 ई. में मावली के युद्ध में बनवीर को मारकर उदयसिंह ने पूर्ण अधिकार किया।

🔥 महाराणा उदयसिंह (1537–1572 ई.) एवं चित्तौड़गढ़ का तृतीय साका (1567–1568 ई.)

महाराणा उदयसिंह ने 1559 ई. में उदयपुर नगर बसाया तथा 'उदयसागर झील' का निर्माण करवाया।

🚩 चित्तौड़गढ़ का तृतीय साका (फरवरी 1568 ई.)
  • मुगल आक्रमणकारी: अकबर (अक्टूबर 1567 में घेरा डाला)। सामंतों की सलाह पर उदयसिंह दुर्ग का भार जयमल व पत्ता को सौंपकर गिरवा की पहाड़ियों में चले गए।
  • केसरिया: जयमल राठौड़ (मेड़ता) तथा पत्ता सिसोदिया (आमेट) के नेतृत्व में।
  • 'चार हाथों वाले देवता' (वीर कल्लाजी राठौड़): अकबर की 'संग्राम' बंदूक की गोली से जयमल के पैर में चोट लगने पर कल्लाजी राठौड़ ने उन्हें अपने कंधों पर बिठाकर युद्ध लड़ा। युद्धभूमि में 4 हाथ और 2 सिर दिखाई देने के कारण कल्लाजी को 'चार हाथों वाले लोकदेवता' कहा गया।
  • जौहर: पत्ता सिसोदिया की पत्नी फूलकँवर के नेतृत्व में सैकड़ों वीरांगनाओं ने जौहर किया।
  • अकबर की गजारूढ़ मूर्तियाँ: जयमल व पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा किले के मुख्य द्वार पर दोनों वीरों की पाषाण गजारूढ़ (हाथी पर सवार) मूर्तियाँ लगवाई थीं। (वर्तमान में बीकानेर के जूनागढ़ दुर्ग पर लगी हैं)।

5. स्वाभिमान के प्रतीक: महाराणा प्रताप (1572 – 1597 ई.)

📌 प्रारंभिक परिचय

  • जन्म: 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, वि.सं. 1597) को कुंभलगढ़ के कटारगढ़ स्थित बादल महल में।
  • माता-पिता: महाराणा उदयसिंह एवं महारानी जयवंताबाई (पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री)।
  • बचपन का नाम: 'कीका' (भील भाषा में छोटे बच्चे को कहते हैं)।
  • राज्याभिषेक: 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में (द्वितीय औपचारिक राज्याभिषेक कुंभलगढ़ में)।
  • अकबर के 4 शिष्टमंडल (सुलह दल):
    1. जलाल खाँ कोरची (नवंबर 1572)
    2. मानसिंह (जून 1573)
    3. भगवान दास (सितंबर 1573)
    4. टोडरमल (दिसंबर 1573) — (टिप: JMBT)

⚔️ हल्दीघाटी का युद्ध (18 / 21 जून 1576 ई.)

  • स्थान: खमनौर (राजसमंद)। मुगल सेनापति: कुंवर मानसिंह व आसफ खाँ।
  • प्रताप के सहयोगी: हकीम खाँ सूरी (हरावल दस्ता), राणा पूंजा (भील सेना), ग्वालियर के रामशाह तंवर, झाला बीदा।
  • झाला बीदा का बलिदान: प्रताप के घायल होने पर झाला बीदा (सादड़ी) ने राजमुकुट धारण किया।
  • चेतक: बलीचा (राजसमंद) में चेतक की छतरी स्थित है।
  • इतिहासकारों के उपनाम:
    - अबुल फज़ल: 'खमनौर का युद्ध'
    - बदायूँनी: 'गोगुंदा का युद्ध' (बदायूँनी ने राजपूतों के रक्त से दाढ़ी रँगी थी)
    - कर्नल टॉड: 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली'
🚩 दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.) – 'मेवाड़ का मैराथन'

प्रताप ने अकबर के चाचा सुल्तान खाँ को पराजित कर विजय का बिगुल बजाया। कर्नल टॉड ने दिवेर के युद्ध को 'मेवाड़ का मैराथन' कहा।


🏰 चावंड राजधानी (1585 ई.)

1585 ई. में प्रताप ने लूणा चावंडिया को हराकर चावंड को मेवाड़ की आपातकालीन राजधानी बनाया (यह अगले 28 वर्षों तक मेवाड़ की राजधानी रही)। यहीं मेवाड़ चित्रशैली का स्वतंत्र विकास हुआ (प्रसिद्ध चित्रकार: निसारदीन जिन्होंने ढोला-मारू का चित्र बनाया)।

मृत्यु: 19 जनवरी 1597 को चावंड में; अंतिम संस्कार / छतरी: बांडोली (भीलवाड़ा) में 8 खंभों की छतरी।

6. उत्तरवर्ती प्रमुख सिसोदिया शासक (Amar Singh to Raj Singh & Hurda Conference)

6.1 अमरसिंह प्रथम (1597 – 1620 ई.) – मुग़ल-मेवाड़ संधि

मुग़ल-मेवाड़ प्रथम संधि (5 फरवरी 1615 ई.): शहज़ादा खुर्रम (शाहजहाँ) एवं कुंवर कर्णसिंह के प्रयासों से जहांगीर व अमरसिंह के मध्य संधि हुई।

  • शर्तें: महाराणा दरबार में नहीं जाएगा (कुंवर कर्णसिंह मुग़ल दरबार में गए), चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत नहीं की जाएगी, मेवाड़ मुग़लों को 1000 घुड़सवार देगा।
  • आहड़ (उदयपुर) में अमरसिंह प्रथम की पहली छतरी बनी (महाकल्प/महासतियाँ)।

6.2 महाराणा राजसिंह प्रथम (1652 – 1680 ई.) – 'विजयकातकाटू'

औरंगजेब की नीतियों का खुलकर विरोध करने वाले वीर शासक। उपाधि: 'विजयकातकाटू' (सेना को जीतने वाला) एवं 'हाइड्रोलिक रुलर'।

  • औरंगजेब का विरोध: जजिया कर (1679 ई.) का विरोध, रूपनगढ़ (किशनगढ़) की राजकुमारी चारुमती से विवाह कर औरंगजेब की योजना विफल की।
  • हाड़ा रानी सहल कँवर (हाड़ा रानी का बलिदान): राजसिंह के सेनापति रतनसिंह चूंडावत की पत्नी हाड़ा रानी सहल कँवर ने रणभूमि जाते समय अपना सिर काटकर निशानी के रूप में दिया था ("छत्राणी ने दे दियो काटी सीस" - मेघराज मुकुल की कविता 'सेनाणी')।
  • राजसमंद झील व राजप्रशस्ति: कांकरोली (राजसमंद) में गोमती नदी का पानी रोककर राजसमंद झील बनाई। इस झील की पाल (नौचौकी) पर राजप्रशस्ति महाकाव्य (रंचोड़ भट्ट तैलंग द्वारा 25 काले संगमरमर के शिलालेखों पर उत्कीर्ण) विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति है।
  • धार्मिक स्थापत्य: सिहाड़ गांव में श्रीनाथजी मंदिर (नाथद्वारा) तथा कांकरोली में द्वारकाधीश मंदिर का निर्माण करवाया।

🤝 6.3 महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734 – 1751 ई.) एवं हुरड़ा सम्मेलन

🚩 हुरड़ा सम्मेलन (Hurda Conference – 17 जुलाई 1734 ई.)

राजस्थान में बढ़ते मराठा आक्रमणों व वसूली के विरुद्ध राजपूताना के राजाओं को संगठित करने के उद्देश्य से हुरड़ा (वर्तमान भीलवाड़ा जिला) नामक स्थान पर सम्मेलन बुलाया गया।

  • अध्यक्षता: मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की (योजना आमेर के सवाई जयसिंह की थी)।
  • प्रमुख प्रतिभागी शासक: जोधपुर के अभयसिंह, आमेर के सवाई जयसिंह, बीकानेर के जोरावर सिंह, कोटा के दुर्जनसाल, नागौर के बख्तसिंह आदि।
  • अहदमदनामा/समझौता: वर्षा ऋतु के पश्चात रामपुर (कोटा) में मराठों के विरुद्ध एकत्र होने का निर्णय लिया गया, परंतु आपसी अविश्वास के कारण यह सम्मेलन असफल रहा।

6.4 महाराणा भीमसिंह (1778 – 1828 ई.) – ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि

13 जनवरी 1818 को अंग्रेजों (ईस्ट इंडिया कंपनी) से सहायक संधि की। प्रसिद्ध 'कृष्णा कुमारी विवाद' (1807 ई. का गांगोली का युद्ध - जयपुर बनाम मारवाड़) इन्हीं के समय हुआ था।

7. मेवाड़ के ऐतिहासिक युद्धों व प्रमुख घटनाओं की सारणी

युद्ध / घटना का नाम वर्ष मेवाड़ शासक / नेतृत्वकर्ता विपक्षी शासक / विवरण परिणाम / विशेष महत्व
भूताला का युद्ध 1227 ई. जैत्रसिंह इल्तुतमिश (दिल्ली) जैत्रसिंह विजयी
चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 ई. रावल रतनसिंह (गोरा-बादल) अलाउद्दीन खिलजी खिलजी का अधिकार, रानी पद्मिनी का जौहर
सिंगोली का युद्ध 1336 ई. राणा हम्मीर मोहम्मद बिन तुग़लक़ राणा हम्मीर विजयी
सारंगपुर का युद्ध 1437 ई. महाराणा कुंभा महमूद खिलजी I (मालवा) कुंभा विजयी (विजय स्तम्भ निर्मित)
खातौली का युद्ध 1517 ई. राणा सांगा इब्राहिम लोदी राणा सांगा विजयी
खानवा का युद्ध 1527 ई. राणा सांगा बाबर (मुगल) बाबर विजयी (गाज़ी उपाधि)
चित्तौड़ का द्वितीय साका 1535 ई. रावत बाघ सिंह (संरक्षिका: कर्मवती) बहादुर शाह (गुजरात) रानी कर्मवती का जौहर (हुमायूँ को राखी)
चित्तौड़ का तृतीय साका 1568 ई. जयमल, पत्ता व वीर कल्लाजी अकबर (मुगल) फूलकँवर का जौहर, कल्लाजी 4 हाथों वाले देव कहलाए
हल्दीघाटी का युद्ध 1576 ई. महाराणा प्रताप मानसिंह / अकबर अनिर्णीत / प्रताप का अभूतपूर्व प्रतिरोध
दिवेर का युद्ध 1582 ई. महाराणा प्रताप सुल्तान खाँ (मुगल) महाराणा प्रताप विजयी ('मेवाड़ का मैराथन')
हुरड़ा सम्मेलन 1734 ई. महाराणा जगतसिंह द्वितीय (अध्यक्ष) मराठों के विरुद्ध राजपूताना संघ मराठों के विरुद्ध राजपूत राजाओं की ऐतिहासिक बैठक

8. मेवाड़ की कला, स्थापत्य व प्रमुख साहित्य (Art & Literature)

📚 प्रमुख ग्रंथ व रचयिता

  • मण्डन (कुंभा के वास्तुकार): प्रसाद मण्डन, रूप मण्डन (मूर्ति कला), देवमूर्ति प्रकरण, वास्तु मण्डन, राजवल्लभ।
  • गोविंद (मण्डन का पुत्र): कलानिधि (शिखर निर्माण), द्वारदीपिका, उद्धारधोरणी।
  • नाथा (मण्डन का भाई): वास्तु मंजरी।
  • रंचोड़ भट्ट तैलंग: राजप्रशस्ति (विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति) एवं अमरकाव्य वंशावली।
  • कविराज श्यामलदास: वीर विनोद (सज्जन सिंह के समय)।

🎨 मेवाड़ चित्रशैली की विशेषताएँ

  • मूल शैली: राजस्थान की चित्रशैलियों की जननी।
  • प्रारंभिक ग्रंथ: श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260 ई. - तेजसिंह के समय)।
  • स्वर्ण काल: महाराणा जगतसिंह प्रथम का काल। इन्होंने महल में 'चितेरों री ओबरी' (तस्वीरां रो कारखानो) बनवाया।
  • प्रमुख चित्रकार: साहबदीन, मनोहर, निसारदीन, कृपा राम।

9. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)

📌 अति-महत्वपूर्ण तथ्य

  • गुहिल वंश संस्थापक: गुहादित्य (566 ई.)। वास्तविक संस्थापक: बप्पा रावल (734 ई.)।
  • विजय स्तम्भ डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 (15 पैसे) - राजस्थान की पहली डाक टिकट वाली इमारत।
  • चार हाथों वाले देवता: वीर कल्लाजी राठौड़ (चित्तौड़ के तृतीय साके 1568 ई. में जयमल को कंधे पर बिठाकर लड़े)।
  • चित्तौड़ के 3 साके: 1303 ई. (पद्मिनी-खिलजी), 1535 ई. (कर्मवती-बहादुरशाह), 1568 ई. (फूलकँवर-अकबर)।
  • पन्ना धाय का बलिदान: अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर बनवीर से कुंवर उदयसिंह की रक्षा की।

📝 RPSC में पूछे गए प्रश्न

  • हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता: 17 जुलाई 1734 ई. को महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की।
  • विजय स्तम्भ की 3री मंजिल: 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' उत्कीर्ण है।
  • विषम घाटी पंचानन: कुंभलगढ़ प्रशस्ति में राणा हम्मीर को दी गई उपाधि।
  • चार्ल्स मार्टेल: सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना फ्रांस के सेनापति चार्ल्स मार्टेल से की।
  • पाती पेरवण: राणा सांगा द्वारा खानवा युद्ध से पूर्व राजपूत राजाओं को एकत्रित करने की प्रथा।
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

मेवाड़ के गुहिल व सिसोदिया राजवंश से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

चित्तौड़गढ़ में कुल 3 साके हुए: 1. प्रथम साका (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी आक्रमण | रानी पद्मिनी का जौहर & रावल रतनसिंह का केसरिया। 2. द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के बहादुर शाह का आक्रमण | रानी कर्मवती का जौहर & रावत बाघ सिंह का केसरिया। 3. तृतीय साका (1568 ई.): अकबर का आक्रमण | फूलकँवर का जौहर & जयमल, पत्ता व वीर कल्लाजी का केसरिया।
वीर कल्लाजी राठौड़ को 'चार हाथों वाले लोकदेवता' कहा जाता है। 1568 ई. के चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में जब जयमल पैर में गोली लगने से घायल हो गए, तब कल्लाजी ने उन्हें अपने कंधों पर बिठाकर युद्ध लड़ा था।
विजय स्तम्भ 122 फीट ऊँचा, 9 मंजिला है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने 1437 ई. के सारंगपुर युद्ध विजय के उपलक्ष्य में करवाया था। इसके वास्तुकार जैता, नापा, पोमा, पूंजा थे। इसकी 3री मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' लिखा है तथा यह 15 अगस्त 1949 को राजस्थान की प्रथम डाक टिकट वाली इमारत बनी।
हुरड़ा सम्मेलन 17 जुलाई 1734 ई. को भीलवाड़ा के हुरड़ा में आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मराठा आक्रमणों के विरुद्ध राजस्थान के सभी राजपूत राजाओं का एक संयुक्त मोर्चा बनाना था। इसकी अध्यक्षता मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की थी।
अबुल फज़ल ने हल्दीघाटी युद्ध को 'खमनौर का युद्ध' कहा, जबकि बदायूँनी ने इसे 'गोगुंदा का युद्ध' कहा। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली' कहा।

अन्य महत्वपूर्ण इतिहास नोट्स पढ़ें

राजस्थान एवं भारत के प्रमुख राजवंशों व विषयों का संपूर्ण अध्ययन