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विश्‍व का सबसे दीर्घकालिक राजवंश – मेवाड़

मेवाड़ का गुहिल व सिसोदिया राजवंश :
गौरवशाली इतिहास, प्रतापी शासक एवं स्वाभिमान

गुहिल एवं सिसोदिया राजवंश (Guhil & Sisodia Dynasty) संसार का सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला गौरवशाली राजवंश है। बप्पा रावल, रावल रतन सिंह (पद्मिनी का जौहर), महाराणा कुंभा (विजय स्तम्भ व आंवल-बांवल की संधि), राणा सांगा (खानवा युद्ध), पन्ना धाय का त्याग, चित्तौड़गढ़ के 3 साके, महाराणा प्रताप (हल्दीघाटी व दिवेर) एवं राजस्थान एकीकरण का प्रामाणिक व परीक्षा-केंद्रित संपूर्ण अध्ययन।

100% प्रामाणिक संदर्भ (डॉ. गोपीनाथ शर्मा) RAS / RPSC / REET / CET उपयोगी चित्तौड़ के 3 साके सम्मिलित
त्वरित सारांश 🚩 मेवाड़ राजवंश

स्थापना वर्ष

566 ई.

मूल संस्थापक

गुहादित्य

कुलदेवी: बाण माता | आराध्य देव: एकलिंगजी (शिव)

गुहिल/सिसोदिया वंश : Complete Test
गहन प्रामाणिक अध्ययन

मेवाड़ राजवंश: सम्पूर्ण विश्लेषण

गुहिल से सिसोदिया तक का कालक्रम, प्रमुख शासकों का योगदान, कला, स्थापत्य, साके, युद्ध, 1857 क्रांति व एकीकरण में भूमिका।

1. उत्पत्ति, उपनाम एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि (Origin & Background)

मेवाड़ का प्राचीन नाम प्राग्वाट / मेदपाट था। इस क्षेत्र पर 'मेद' जाति का आधिपत्य रहने के कारण इसे मेदपाट कहा गया, जो कालान्तर में 'मेवाड़' कहलाया। प्राचीन काल में यह क्षेत्र शिवि जनपद के अंतर्गत आता था, जिसकी राजधानी मध्यमिका (वर्तमान नगरी, चित्तौड़गढ़) थी। उदयपुर में बहने वाली आयड़ नदी के किनारे विकसित प्राचीन आहड़ सभ्यता (ताम्रवती नगरी) इसी मेवाड़ अंचल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को दर्शाती है।

संस्थापक – गुहादित्य / गुहिल (566 ई.)

गुहिल वंश की स्थापना गुहादित्य (गुहिल) ने 566 ई. में की। गुहादित्य वल्लभपुर (गुजरात) के राजा शिलादित्य तथा रानी पुष्पावती के पुत्र थे। गुफा में जन्म लेने के कारण इनका नाम 'गुहादित्य' पड़ा।

सूर्यवंशी सिद्धांत

मेवाड़ के शासक स्वयं को 'हिन्दुआ सूरज' कहते हैं तथा श्री रामचंद्र के ज्येष्ठ पुत्र लव के वंशज मानते हैं।
समर्थक: कर्नल जेम्स टॉड, मुहणौत नैणसी, महामहोपाध्याय डॉ. जी.एच. ओझा।

ब्राह्मण उत्पत्ति सिद्धांत

आठपुर अभिलेख (977 ई.) एवं कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में गुहिल को आनंदपुर (गुजरात) के विप्र (ब्राह्मण) कुल का बताया गया है। डॉ. डी.आर. भंडारकर व डॉ. गोपीनाथ शर्मा इस मत का समर्थन करते हैं।

ईरान का नौशेखाँ आदिल मत

मुग़ल इतिहासकार अबुल फज़ल (आईन-ए-अकबरी) के अनुसार मेवाड़ के गुहिल ईरान के बादशाह नौशेखाँ आदिल के वंशज हैं।

मेवाड़ का राजवाक्य: "जो दृढ़ राखे धर्म को, तिही राखे करतार।" (मेवाड़ के राज्य-ध्वज पर एक तरफ राजपूत योद्धा तथा दूसरी तरफ भील योद्धा राणा पूंजा का चित्र अंकित है)।

2. रावल शाखा के प्रमुख शासक (Rawal Branch: Bappa to Ratan Singh)

2.1 बप्पा रावल / कालभोज (734 – 753 ई.) – वास्तविक संस्थापक

बप्पा रावल को मेवाड़ में गुहिल साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। इनका मूल नाम कालभोज था ('बप्पा' इनकी उपाधि थी जो पाशुपत संप्रदाय के हरित ऋषि ने दी थी)।

  • चित्तौड़ विजय (734 ई.): इन्होंने हरित ऋषि के आशीर्वाद से मौर्य शासक मानमोरी को हराकर चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार किया।
  • राजधानी व मंदिर: बप्पा रावल ने अपनी राजधानी नागदा बनाई तथा कैलाशपुरी (नागदा) में एकलिंगजी (शिव) मंदिर का निर्माण करवाया।
  • एकलिंगजी का दीवान: मेवाड़ के महाराणा स्वयं को शासक न मानकर 'श्री एकलिंगजी का दीवान' मानकर शासन संचालित करते थे।
  • प्रथम स्वर्ण सिक्का: मेवाड़ में सर्वप्रथम 115 ग्रेन का सोने का सिक्का बप्पा रावल ने ही चलाया था।
  • सी.वी. वैद्य का कथन: इतिहासकार सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना फ्रांसीसी सेनापति 'चार्ल्स मार्टेल' से की है। रावलपिंडी (पाकिस्तान) शहर का नाम बप्पा रावल के सैन्य पड़ाव के कारण ही पड़ा था।

2.2 अल्लट / आलू रावल (10वीं शताब्दी)

  • आहड़ राजधानी: इन्होंने नागदा के अतिरिक्त प्राचीन ताम्र-नगरी आहड़ (धूलकोट) को मेवाड़ की दूसरी राजधानी बनाया तथा वहाँ जगत प्रसिद्ध वराह मंदिर का निर्माण करवाया।
  • नौकरशाही के जनक: मेवाड़ में सर्वप्रथम नौकरशाही (Bureaucracy) की प्रशासनिक व्यवस्था शुरू करने का श्रेय अल्लट को ही जाता है।
  • प्रथम अंतर्राष्ट्रीय विवाह: राजस्थान का प्रथम अंतर्राष्ट्रीय विवाह अल्लट एवं हूण राजकुमारी हरियादेवी के मध्य संपन्न हुआ था।

2.3 जैत्रसिंह (1213 – 1253 ई.) – चित्तौड़ को पहली बार राजधानी

  • भूताला का युद्ध (1227 ई.): जैत्रसिंह ने दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुतमिश को पराजित किया (युद्ध से भागती इल्तुतमिश की सेना ने नागदा को तहस-नहस कर दिया था)। इस युद्ध का विवरण जयसिंह सूरि के ग्रंथ 'हम्मीर मदमर्दन' में मिलता है।
  • चित्तौड़ प्रथम बार राजधानी: नागदा के विध्वंस के पश्चात जैत्रसिंह ने सामरिक दृष्टि से सुरक्षित चित्तौड़गढ़ दुर्ग को मेवाड़ की नई राजधानी बनाया।
  • स्वर्ण काल: प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार जैत्रसिंह का शासनकाल मध्यकालीन मेवाड़ का 'स्वर्ण काल' था।

2.4 तेजसिंह (1253 – 1273 ई.)

इनके समय 1260 ई. में चित्तौड़गढ़ में मेवाड़ चित्रशैली का सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि' चित्रकार कमलचंद्र द्वारा ताड़पत्र पर तैयार किया गया, जो राजस्थान की चित्रकला एवं लोककला का अमर मील का पत्थर है। इनकी रानी जयतल देवी ने चित्तौड़ में श्याम पार्श्वनाथ मंदिर बनवाया।


2.5 रावल रतनसिंह (1302 – 1303 ई.) – रावल शाखा का अंतिम शासक

रतनसिंह मेवाड़ की रावल शाखा के अंतिम शासक थे। इनकी रानी पद्मिनी (सिंहल द्वीप के राजा गंधर्वसेन एवं चंपावती की पुत्री) थीं।

चित्तौड़गढ़ का प्रथम साका (26 अगस्त 1303 ई.)
  • आक्रमणकारी: दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (खिलजी ने 1301 में रणथंभौर दुर्ग जीतने के बाद चित्तौड़ पर घेरा डाला था)।
  • केसरिया: रावल रतनसिंह तथा वीर सेनापति गोरा एवं बादल के नेतृत्व में।
  • जौहर: रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1600 क्षत्राणियों ने ऐतिहासिक अग्नि-जौहर किया।
  • परिणाम: अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ पर अधिकार। खिलजी ने दुर्ग अपने पुत्र खिज्र खाँ को सौंपकर नाम 'खिज्राबाद' कर दिया।
  • ऐतिहासिक स्रोत: मलिक मोहम्मद जायसी रचित महाकाव्य 'पद्मावत' (1540 ई.) एवं अमीर खुसरो का ग्रंथ 'खजाइन-उल-फुतूह' (तारीख-ए-अलाई)।

3. सिसोदिया शाखा की स्थापना एवं सुदृढ़ीकरण (Rana Hamir & Lakha)

3.1 राणा हम्मीर (1326 – 1364 ई.) – सिसोदिया शाखा के संस्थापक

सिसोदा ग्राम के जागीरदार लक्ष्मण सिंह के पौत्र राणा हम्मीर ने 1326 ई. में मालदेव सोनगरा के पुत्र जैसा को हराकर चित्तौड़गढ़ पर पुनः गुहिलों का ध्वज फहराया। यहीं से मेवाड़ में 'रावल' पदवी समाप्त हुई और शासक 'राणा' अथवा 'महाराणा' कहलाने लगे।

  • मेवाड़ का उद्धारक: पराधीनता से मुक्त कराने के कारण इन्हें 'मेवाड़ का उद्धारक' कहा जाता है।
  • विषम घाटी पंचानन: कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) में राणा हम्मीर को 'विषम घाटी पंचानन' (विकट युद्धों में सिंह के समान) की पदवी दी गई है।
  • वीर राजा: महाराणा कुंभा द्वारा जयदेव के 'गीत गोविंद' पर लिखी टीका 'रसिकप्रिया' में हम्मीर को 'वीर राजा' कहा गया है।
  • सिंगोली का युद्ध (बांसवाड़ा): हम्मीर ने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद बिन तुग़लक़ (MBT) की सेना को पराजित कर बंधक बनाया था।
  • अन्नपूर्णा माता मंदिर: इन्होंने चित्तौड़गढ़ में बाण माता (अन्नपूर्णा देवी) के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।

3.2 राणा लाखा / लक्षसिंह (1382 – 1421 ई.)

  • जावर चांदी की खान: इनके शासनकाल में जावर (उदयपुर) में विशाल चाँदी और सीसा-जस्ता की खानें निकलीं, जिससे मेवाड़ की अर्थव्यवस्था अत्यधिक सुदृढ़ हो गई।
  • पिचोला झील निर्माण: इनके काल में 'पिच्छू' (छीतर) नामक बंजारे ने अपने बैल की स्मृति में प्रसिद्ध पिचोला झील (उदयपुर) का निर्माण करवाया। इसके तट पर 'नटनी का चबूतरा' बना हुआ है।
  • मेवाड़ का भीष्म पितामह (कुंवर चूंडा): मारवाड़ के राठौड़ वंश के राव रणमल की बहन हंसाबाई का नारियल राणा लाखा के लिए आया। लाखा के ज्येष्ठ पुत्र कुंवर चूंडा ने आजीवन राजसिंहासन त्यागने और हंसाबाई के पुत्र को राजा स्वीकार करने की भीष्म प्रतिज्ञा की। इसी कारण चूंडा को 'राजस्थान / मेवाड़ का भीष्म पितामह' कहा जाता है। चूंडावतों को मेवाड़ का प्रथम श्रेणी ठिकाना 'सलूंबर' और हरावल दस्ते में रहने का गौरव प्राप्त हुआ।

4. स्वर्णिम युग: महाराणा कुंभा, विजय स्तम्भ एवं राणा सांगा

👑 4.1 महाराणा कुंभा (1433 – 1468 ई.) – राजस्थान स्थापत्य कला के जनक

महाराणा कुंभा (पिता: महाराणा मोकल, माता: सौभाग्य देवी) को 'राजस्थान की स्थापत्य कला का जनक' और 'कलम व कटार का धनी' कहा जाता है।

🎖️ प्रमुख उपाधियाँ (108 से अधिक)

अभिनव भारताचार्य / वीणा वादन प्रवीन (संगीत शिरोमणि), हिंदू सुरत्राण (मुस्लिम सुल्तानों का विजेता), राणो रासो (विद्वानों का आश्रयदाता), हाल गुरु (पहाड़ी दुर्गों का स्वामी), छाप गुरु (छापामार युद्ध विद्या के पारंगत), दान गुरु, शैल गुरु।

⚔️ प्रमुख युद्ध व रणनीतिक संधियाँ

सारंगपुर का युद्ध (1437 ई.): कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को बुरी तरह पराजित कर 6 माह बंदी रखा।
चम्पानेर की संधि (1456 ई.): मालवा व गुजरात के सुल्तानों के संयुक्त मोर्चे को कुंभा ने बदनौर के युद्ध (1457 ई.) में ध्वस्त किया।

आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.) – मेवाड़-मारवाड़ सीमा निर्धारण

रणमल की हत्या के बाद उपजे विवाद को समाप्त करने के लिए हंसाबाई की मध्यस्थता से महाराणा कुंभा और मारवाड़ के राव जोधा के बीच संधि हुई। इसके तहत सोजत (पाली) को दोनों राज्यों की सीमा तय किया गया (जहाँ बबूल/बांवल समाप्त होकर आंवला वृक्ष शुरू होते थे)। राव जोधा ने अपनी पुत्री शृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से कराया (शृंगार देवी ने चित्तौड़ में घोसुण्डी की बावड़ी बनवाई)। इसके बाद ही जोधा ने 1459 ई. में मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) बसाया।

🚩 विजय स्तम्भ (Vijay Stambha) – विशेष परीक्षा तथ्य

सारंगपुर युद्ध विजय के उपलक्ष्य में महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ में विजय स्तम्भ (कीर्ति स्तम्भ / 1440–1448 ई.) का निर्माण करवाया।

  • ऊँचाई व मंजिल: 122 फीट ऊँचा, 9 मंजिला तथा इसमें 157 सीढ़ियाँ हैं। आधार चौड़ाई 30 फीट है।
  • 3री मंजिल पर 'अल्लाह': इसकी तीसरी मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' शब्द उत्कीर्ण है।
  • प्रमुख शिल्पी / वास्तुकार: मुख्य शिल्पी जैता तथा उनके पुत्र नापा, पोमा एवं पूंजा थे। प्रशस्तिकार अत्रि व महेश भट्ट थे।
  • उपनाम: डॉ. गोपीनाथ शर्मा ने 'भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश' व 'मूर्तियों का अजायबघर' कहा। कर्नल टॉड ने इसकी तुलना 'कुतुबमीनार' से की। फर्ग्यूसन ने इसे 'रोम के टार्जन टॉवर' समान बताया।
  • प्रथम डाक टिकट (15 अगस्त 1949): राजस्थान की पहली इमारत जिस पर भारत सरकार ने 15 पैसे का डाक टिकट जारी किया। यह राजस्थान पुलिस और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE) का प्रतीक चिह्न है।
🏛️ 84 में से 32 दुर्गों के निर्माता: कविराज श्यामलदास के ग्रंथ 'वीर विनोद' के अनुसार मेवाड़ के कुल 84 दुर्गों में से 32 दुर्गों का निर्माण अकेले कुंभा ने करवाया था।
- कुंभलगढ़ दुर्ग (राजसमंद): प्रधान वास्तुकार मण्डन। इसकी प्राचीर 36 किमी लंबी है। इसका अंतःदुर्ग 'कटारगढ़' कुंभा का निवास था, जिसे 'मेवाड़ की आँख' कहा जाता है।
- अन्य निर्माण: बसंती दुर्ग (सिरोही), मचान दुर्ग, अचलगढ़ का जीर्णोद्धार, बदनौर का कुशाल माता मंदिर तथा रणकपुर के 1444 खंभों वाले जैन मंदिर (1439 ई., शिल्पी: देपाक)।
📚 कुंभा के प्रमुख ग्रंथ: संगीत राज (सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ - 5 कोष: पाठ, गीत, वाद्य, नृत्य, रस कोष), संगीत मीमांसा, सूड़ प्रबंध, कामराज रतिसार, हरिवार्तिक, संगीत क्रमदीपिका।
कुंभा की हत्या (1468 ई.): कुंभलगढ़ दुर्ग के मामदेव कुंड के पास कुंभा के ज्येष्ठ पुत्र उदा (उदयसिंह प्रथम) ने उनकी हत्या कर दी। उदा को मेवाड़ का 'प्रथम पितृहंता' कहा जाता है।

👑 4.2 राणा सांगा / संग्राम सिंह प्रथम (1509 – 1528 ई.) – 'हिंदूपत'

राणा सांगा अंतिम महान हिंदू सम्राट थे जिनके नेतृत्व में राजपूताना के सभी राजा एक छत्र तले एकत्र हुए थे। कर्नल टॉड ने इन्हें 'सैनिक का भग्नावशेष' कहा क्योंकि युद्धों में इनके शरीर पर 80 घाव लगे थे (एक आँख, एक हाथ और एक पैर क्षतिग्रस्त हो चुके थे)। इनकी पत्नी रानी कर्मवती थीं तथा इनके ज्येष्ठ पुत्र भोजराज का विवाह कृष्णभक्त संत मीराबाई से हुआ था।

⚔️ राणा सांगा के प्रमुख युद्ध
1. खातौली का युद्ध (1517 ई. - पीपल्दा, कोटा): दिल्ली सुल्तान इब्राहिम लोदी को सांगा ने पराजित किया।
2. बाड़ी का युद्ध (1518 ई. - धौलपुर): इब्राहिम लोदी के सेनापति मियां माखन व मियां हुसैन को पुनः खदेड़ा।
3. गागरोन का युद्ध (1519 ई. - झालावाड़): मालवा के महमूद खिलजी द्वितीय को हराया और चंदेरी के मेदिनीराय को शरण दी।
4. बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई. - भरतपुर): सांगा ने बाबर की सेना (महंदी ख्वाजा) को धूल चटाई।
🚩 खानवा का युद्ध (17 मार्च 1527 ई. - रूपवास, भरतपुर)

बाबर ने इस युद्ध को 'जिहाद' (धर्मयुद्ध) घोषित किया, मुसलमानों पर लगने वाला 'तमगा कर' समाप्त किया और शराब के प्याले तोड़ डाले। सांगा ने प्राचीन राजपूत परंपरा 'पाती पेरवण' के तहत सभी राजाओं को पत्र लिखकर आमंत्रित किया (आमेर से पृथ्वीराज कछवाहा, मारवाड़ से मालदेव, बीकानेर से कल्याणमल आदि शामिल हुए)।

युद्ध में सांगा के सिर पर तीर लगने से मूर्छित होने पर झाला अज्जा (सादड़ी) ने राजचिह्न धारण किए। बाबर ने 'तुलगुमा पद्धति' और उस्मानी तोपखाने (मुस्तफा व अली) के कारण विजय प्राप्त कर 'गाज़ी' की उपाधि ली।

देहावसान: 30 जनवरी 1528 को बसवा (दौसा) में सांगा का देहांत हुआ (कहा जाता है कि सामंतों ने ज़हर दिया था)। इनकी 8 खंभों की छतरी मांडलगढ़ (भीलवाड़ा) में बनी है।

5. मध्यवर्ती संघर्ष: चित्तौड़ के द्वितीय व तृतीय साके तथा पन्ना धाय का त्याग

🔥 चित्तौड़गढ़ का द्वितीय साका (1534–35 ई.) – रानी कर्मवती व बहादुर शाह का आक्रमण

  • आक्रमणकारी: गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह। (राणा सांगा के बाद अल्पवयस्क पुत्र विक्रमादित्य के समय राजमाता कर्मवती ने शासन संभाला)।
  • हुमायूँ को राखी: रानी कर्मवती ने सहायता हेतु मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी, परंतु हुमायूँ समय पर चित्तौड़ न पहुँच सका।
  • केसरिया: देवलिया (प्रतापगढ़) के रावत बाघ सिंह के नेतृत्व में वीरों ने केसरिया किया। चित्तौड़ के प्रथम द्वार 'पाडन पोल' पर बाघ सिंह का स्मारक स्थित है।
  • जौहर: राजमाता रानी कर्मवती के नेतृत्व में 13,000 वीरांगनाओं ने महा-जौहर किया।

🛡️ पन्ना धाय का अमर बलिदान (1536 ई.)

दासी पुत्र बनवीर ने राणा विक्रमादित्य की हत्या कर छोटे राजकुमार उदयसिंह की हत्या की योजना बनाई। स्वामीभक्त धाय माँ पन्ना धाय (खींची चौहान वंश की पुत्री) ने मेवाड़ के कुलदीपक की रक्षा के लिए अपने सगे पुत्र चंदन को उदयसिंह की शैय्या पर लिटाकर बलिदान कर दिया।

पन्ना धाय कुंवर उदयसिंह को सुरक्षित कुंभलगढ़ दुर्ग ले गईं जहाँ किलेदार आशा देवपुरा ने शरण दी। 1537 ई. में कुंभलगढ़ में उदयसिंह का राज्याभिषेक हुआ तथा 1540 ई. के मावली युद्ध में बनवीर का अंत हुआ।

🔥 महाराणा उदयसिंह (1537–1572 ई.) एवं चित्तौड़गढ़ का तृतीय साका (1567–1568 ई.)

महाराणा उदयसिंह ने 1559 ई. में नई राजधानी के रूप में उदयपुर नगर बसाया तथा प्रसिद्ध उदयसागर झील का निर्माण करवाया।

🚩 चित्तौड़गढ़ का तृतीय साका (फरवरी 1568 ई.)
  • मुगल आक्रमणकारी: अकबर (अक्टूबर 1567 में घेरा डाला)। सामंतों के आग्रह पर उदयसिंह दुर्ग का भार जयमल व पत्ता को सौंपकर गोगुंदा की पहाड़ियों में चले गए।
  • केसरिया: जयमल राठौड़ (मेड़ता) तथा पत्ता सिसोदिया (आमेट) के अद्वितीय नेतृत्व में।
  • 'चार हाथों वाले लोकदेवता' (वीर कल्लाजी राठौड़): अकबर की 'संग्राम' बंदूक की गोली से जयमल घायल हो गए, तब उनके भतीजे वीर कल्लाजी राठौड़ ने जयमल को अपने कंधों पर बिठाकर दोनों हाथों से तलवारें चलाईं। इसी कारण कल्लाजी को 'चार हाथों और दो सिर वाले लोकदेवता' के रूप में पूजा जाता है। भैरव पोल पर इनकी छतरी है।
  • जौहर: पत्ता सिसोदिया की पत्नी वीरांगना फूलकँवर के नेतृत्व में सैकड़ों महिलाओं ने जौहर की ज्वाला में प्रवेश किया।
  • अकबर का कत्लेआम: दुर्ग जीतने के बाद अकबर ने 30,000 निर्दोष नागरिकों के कत्लेआम का आदेश दिया (अकबर के जीवन पर अमिट कलंक)। जयमल-पत्ता की वीरता से प्रभावित होकर अकबर ने आगरा किले के द्वार पर दोनों वीरों की पाषाण गजारूढ़ मूर्तियां लगवाई थीं।

6. स्वाभिमान के अमर प्रतीक: महाराणा प्रताप (1572 – 1597 ई.)

📌 प्रारंभिक परिचय व राज्याभिषेक

  • जन्म: 9 मई 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया, वि.सं. 1597) को कुंभलगढ़ के कटारगढ़ स्थित बादल महल में।
  • माता-पिता: महाराणा उदयसिंह एवं महारानी जयवंताबाई (पाली के अखैराज सोनगरा चौहान की पुत्री)।
  • बचपन का नाम: 'कीका' (भील जनजाति में छोटे बच्चों का लाडला संबोधन)।
  • राज्याभिषेक: प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी 1572 को गोगुंदा में (होलिका दहन के दिन) तथा दूसरा विधिवत उत्सव कुंभलगढ़ में हुआ जहाँ मारवाड़ के राव चंद्रसेन भी उपस्थित थे।
  • अकबर के 4 शिष्टमंडल (सुलाह दल):
    1. जलाल खाँ कोरची (नवंबर 1572)
    2. कुंवर मानसिंह (जून 1573)
    3. राजा भगवान दास (सितंबर 1573)
    4. राजा टोडरमल (दिसंबर 1573) — (ट्रिक: JMBT)

⚔️ हल्दीघाटी का युद्ध (18 / 21 जून 1576 ई.)

  • स्थान: खमनौर (राजसमंद)। मुगल सेनापति: आमेर के कुंवर मानसिंह व आसफ खाँ।
  • प्रताप के प्रमुख योद्धा: अफगान सेनापति हकीम खाँ सूरी (हरावल दस्ता), भील सरदार राणा पूंजा, ग्वालियर के रामशाह तंवर, भामाशाह एवं ताराचंद।
  • झाला बीदा का त्याग: प्रताप के घायल होने पर बड़ी सादड़ी के झाला बीदा (मन्ना) ने राजमुकुट धारण कर प्रताप को सुरक्षित निकाला।
  • स्वामिभक्त चेतक: बलीचा गांव (राजसमंद) में वीर चेतक की छतरी बनी हुई है।
  • इतिहासकारों के नामकरण:
    - अबुल फज़ल: 'खमनौर का युद्ध'
    - अब्दुल कादिर बदायूँनी: 'गोगुंदा का युद्ध' (स्वयं उपस्थित था)
    - कर्नल जेम्स टॉड: 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली'
🚩 दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.) – 'मेवाड़ का मैराथन'

प्रताप एवं उनके पुत्र अमरसिंह ने अकबर के काका सुल्तान खाँ की मुगल छावनी को ध्वस्त कर विजय प्राप्त की। कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को 'मेवाड़ का मैराथन' कहा, जिसके बाद मुगलों के पाँव मेवाड़ से उखड़ गए।


🏰 चावंड राजधानी (1585 ई.) एवं अंतिम दिन

1585 ई. में प्रताप ने लूणा चावंडिया को हराकर चावंड को मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी बनाया (यह 28 वर्षों तक राजधानी रही)। यहाँ चामुंडा माता मंदिर का निर्माण हुआ और चित्रकार निसारदीन के नेतृत्व में चावंड चित्रशैली (रागमाला) फली-फूली।

महाप्रयाण: 19 जनवरी 1597 को चावंड में धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाते समय घायल होने से 57 वर्ष की आयु में निधन। बांडोली (केहड़ नदी, सलूंबर) में प्रताप की 8 खंभों की छतरी बनी हुई है।

7. उत्तरवर्ती सिसोदिया शासक (Amar Singh to Raj Singh & Hurda Conference)

7.1 अमरसिंह प्रथम (1597 – 1620 ई.) – मुग़ल-मेवाड़ संधि (1615 ई.)

मुग़ल-मेवाड़ प्रथम संधि (5 फरवरी 1615 ई.): शहज़ादा खुर्रम (शाहजहाँ) एवं मेवाड़ के कुंवर कर्णसिंह की मध्यस्थता से जहाँगीर व अमरसिंह के मध्य मुगल-मेवाड़ संधि हुई।

  • शर्तें: महाराणा स्वयं मुग़ल दरबार में उपस्थित नहीं होंगे (कुंवर कर्णसिंह 5000 के मनसबदार बने), चित्तौड़ दुर्ग वापस लौटाया गया लेकिन मरम्मत पर रोक रही, कोई वैवाहिक संबंध मुगलों से नहीं किया जाएगा।
  • आहड़ (उदयपुर) के गंगोद्भव तीर्थ पर अमरसिंह प्रथम की पहली छतरी बनी, जिसके बाद यह स्थल 'महासतियाँ' कहलाया।

7.2 महाराणा राजसिंह प्रथम (1652 – 1680 ई.) – 'विजयकातकाटू'

औरंगजेब की कट्टर नीतियों को खुली चुनौती देने वाले तेजस्वी शासक। उपाधि: 'विजयकातकाटू' एवं 'हाइड्रोलिक रुलर'।

  • औरंगजेब की नीतियों का विरोध: 1679 में जजिया कर का कड़ा विरोध पत्र लिखा, किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से विवाह कर औरंगजेब के मंसूबे तोड़े तथा मारवाड़ के अजीतसिंह व दुर्गादास राठौड़ को शरण दी।
  • हाड़ा रानी सहल कँवर (सीस दान): राजसिंह के सेनापति रतनसिंह चूंडावत की नवविवाहिता पत्नी हाड़ा रानी सहल कँवर ने कर्तव्य-स्मरण हेतु अपना सिर काटकर निशानी (सेनाणी) के रूप में भेंट कर दिया था (मेघराज मुकुल की कविता: "चूंड़ावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी")।
  • राजसमंद झील व राजप्रशस्ति: कांकरोली (राजसमंद) में गोमती नदी पर राजसमंद झील बनाई। इसकी 'नौचौकी पाल' पर रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा 25 काले संगमरमर के पत्थरों पर संस्कृत में उत्कीर्ण राजप्रशस्ति (विश्व की सबसे बड़ी शिलालेख प्रशस्ति) स्थित है।
  • पुष्टिमार्गीय मंदिरों की स्थापना: सिहाड़ (नाथद्वारा) में श्रीनाथजी मंदिर तथा कांकरोली में द्वारकाधीश मंदिर स्थापित करवाया।

🤝 7.3 महाराणा जगतसिंह द्वितीय (1734 – 1751 ई.) एवं हुरड़ा सम्मेलन

🚩 हुरड़ा सम्मेलन (Hurda Conference – 17 जुलाई 1734 ई.)

राजपूताना में मराठों की चौथ वसूली और लूटमार के विरुद्ध सभी राजपूत राजाओं का संयुक्त मोर्चा बनाने के लिए भीलवाड़ा के हुरड़ा में सम्मेलन हुआ।

  • अध्यक्षता: मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की (योजना आमेर के सवाई जयसिंह की थी)।
  • प्रतिभागी शासक: जोधपुर के अभयसिंह, आमेर के सवाई जयसिंह, बीकानेर के जोरावर सिंह, कोटा के दुर्जनसाल, नागौर के बख्तसिंह आदि।
  • परिणाम: वर्षा ऋतु बाद रामपुर (कोटा) में सैन्य जमाव का अहदनामा (समझौता) हुआ, किंतु राजाओं के पारस्परिक अविश्वास के कारण यह सम्मेलन असफल रहा।

7.4 महाराणा भीमसिंह (1778 – 1828 ई.) – ईस्ट इंडिया कंपनी से संधि व कृष्णा कुमारी विवाद

13 जनवरी 1818 को चार्ल्स मेटकाफ के माध्यम से ईस्ट इंडिया कंपनी से सहायक संधि की। इनकी पुत्री को लेकर प्रसिद्ध 'कृष्णा कुमारी विवाद' (1807 ई. का गांगोली का युद्ध, परबतसर - जयपुर बनाम जोधपुर) हुआ, जिसके बाद अमीर खां पिंडारी के दबाव में कृष्णा कुमारी को विष दिया गया।

8. आधुनिक मेवाड़: 1857 की क्रांति, किसान आंदोलन, प्रजामंडल व एकीकरण

1857 की क्रांति में मेवाड़ की भूमिका

1857 की क्रांति के समय मेवाड़ के शासक महाराणा स्वरूप सिंह तथा पॉलिटिकल एजेंट मेजर शॉवर्स थे। नीमच छावनी में विद्रोह के बाद 40 अंग्रेज शरणार्थियों (डूंगला गांव से मुक्त कराए गए) को महाराणा ने उदयपुर की पिछोला झील स्थित 'जग मंदिर' महलों में सुरक्षित शरण दी थी।

ऐतिहासिक किसान आंदोलन

भारत का सबसे लंबा अहिंसक आंदोलन बिजोलिया किसान आंदोलन (1897-1941) मेवाड़ रियासत का ही 'ऊपरमाल' प्रथम श्रेणी ठिकाना था, जिसका नेतृत्व साधु सीताराम दास, विजय सिंह पथिक और माणिक्यलाल वर्मा ने किया। यहीं रामनारायण चौधरी के नेतृत्व में बेंगू किसान आंदोलन भी हुआ।

मेवाड़ प्रजामंडल आंदोलन (1938 ई.)

24 अप्रैल 1938 को बलवंत सिंह मेहता की अध्यक्षता और माणिक्यलाल वर्मा के महामंत्रीत्व में मेवाड़ प्रजामंडल की स्थापना हुई। इसके प्रथम अधिवेशन (1941) में जे.बी. कृपलानी व श्रीमती विजयलक्ष्मी पंडित ने भाग लिया था।

राजस्थान एकीकरण में मेवाड़ का विलय

राजस्थान के एकीकरण के तृतीय चरण (संयुक्त राजस्थान - 18 अप्रैल 1948) में मेवाड़ का विलय हुआ। मेवाड़ के अंतिम महाराणा भूपाल सिंह को आजीवन 'महाराजप्रमुख' बनाया गया और उदयपुर को राजधानी बनाया गया, जिसका उद्घाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया।

9. मेवाड़ के ऐतिहासिक युद्धों व प्रमुख घटनाओं की सारणी

युद्ध / घटना का नाम वर्ष मेवाड़ शासक / नेतृत्वकर्ता विपक्षी शासक / विवरण परिणाम / विशेष महत्व
भूताला का युद्ध 1227 ई. जैत्रसिंह इल्तुतमिश (गुलाम वंश) जैत्रसिंह विजयी (चित्तौड़ राजधानी बनी)
चित्तौड़ का प्रथम साका 1303 ई. रावल रतनसिंह (गोरा-बादल) अलाउद्दीन खिलजी खिलजी का अधिकार, रानी पद्मिनी का 1600 वीरांगनाओं संग जौहर
सिंगोली का युद्ध 1336 ई. राणा हम्मीर मोहम्मद बिन तुग़लक़ राणा हम्मीर विजयी (सिसोदिया वंश प्रतिष्ठापित)
सारंगपुर का युद्ध 1437 ई. महाराणा कुंभा महमूद खिलजी प्रथम (मालवा) कुंभा विजयी (ऐतिहासिक विजय स्तम्भ निर्मित)
आंवल-बांवल की संधि 1453 ई. महाराणा कुंभा राव जोधा (मारवाड़) सोजत में सीमा निर्धारण, कुंभा व जोधा में मैत्री
खातौली का युद्ध 1517 ई. राणा सांगा इब्राहिम लोदी राणा सांगा विजयी
खानवा का युद्ध 1527 ई. राणा सांगा बाबर (मुगल संस्थापक) बाबर विजयी (तुलगुमा व तोपखाना पद्धति)
चित्तौड़ का द्वितीय साका 1535 ई. रावत बाघ सिंह (राजमाता कर्मवती) बहादुर शाह (गुजरात) रानी कर्मवती का जौहर (हुमायूँ को राखी प्रसंग)
चित्तौड़ का तृतीय साका 1568 ई. जयमल राठौड़, पत्ता व कल्लाजी मुगल सम्राट अकबर फूलकँवर का जौहर, कल्लाजी 4 हाथों वाले देवता कहलाए
हल्दीघाटी का युद्ध 1576 ई. महाराणा प्रताप मानसिंह कछवाहा / आसफ खाँ अकबर प्रताप को बंदी न बना सका, चेतक का अमर बलिदान
दिवेर का युद्ध 1582 ई. महाराणा प्रताप सुल्तान खाँ (मुगल सेनापति) महाराणा प्रताप विजयी ('मेवाड़ का मैराथन')
मुग़ल-मेवाड़ संधि 1615 ई. महाराणा अमरसिंह प्रथम मुगल बादशाह जहाँगीर सशर्त शांति समझौता, कुंवर कर्णसिंह दरबार में गए
हुरड़ा सम्मेलन 1734 ई. महाराणा जगतसिंह द्वितीय (अध्यक्ष) मराठों के विरुद्ध राजपूताना संघ राजपूत राजाओं का संयुक्त राजनीतिक मंच

10. मेवाड़ की कला, स्थापत्य व प्रमुख साहित्य (Art & Literature)

📚 प्रमुख दरबारी विद्वान एवं ग्रंथ

  • मण्डन (कुंभा के प्रधान शिल्पी): देवमूर्ति प्रकरण, प्रसाद मण्डन (मंदिर निर्माण), रूप मण्डन (मूर्तिकला), वास्तु मण्डन, राजवल्लभ।
  • गोविंद (मण्डन के पुत्र): कलानिधि (शिखर विधा), द्वारदीपिका, उद्धारधोरणी।
  • नाथा (मण्डन के भ्राता): वास्तु मंजरी।
  • काह्न व्यास: एकलिंग महात्म्य (प्रथम भाग 'राजवर्णन' कुंभा द्वारा रचित)।
  • रणछोड़ भट्ट तैलंग: राजप्रशस्ति महाकाव्य एवं अमरकाव्य वंशावली।
  • कविराज श्यामलदास: वीर विनोद (महाराणा सज्जन सिंह के समय रचित प्रसिद्ध इतिहास ग्रंथ)।

🎨 मेवाड़ चित्रशैली की विलक्षणता

  • मूल शैली: राजस्थान की समस्त चित्रशैलियों की जननी (मातृ शैली)।
  • प्राचीन ग्रंथ: श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णि (1260 ई. - तेजसिंह के समय) व सुपासनाह चरिअम (1423 ई. - मोकल के समय)।
  • स्वर्ण काल: महाराणा जगतसिंह प्रथम का काल। इन्होंने राजमहल में 'चितेरों री ओबरी' (तस्वीरां रो कारखानो) नामक चित्रशाला स्थापित करवाई।
  • प्रमुख चितेरे: साहबदीन (रागमाला, गीत गोविंद, रसिकप्रिया का चित्रण), मनोहर, निसारदीन, कृपाराम।

11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)

📌 अति-महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य

  • गुहिल वंश संस्थापक: गुहादित्य (566 ई.)। वास्तविक संस्थापक: बप्पा रावल (734 ई.)।
  • चित्तौड़ को पहली बार राजधानी: जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को भूताला युद्ध में हराने के बाद बनाया।
  • आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.): कुंभा व राव जोधा के मध्य सोजत (पाली) को सीमा बनाकर की गई।
  • विजय स्तम्भ डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 (15 पैसे) - राजस्थान की पहली डाक टिकट वाली इमारत।
  • चार हाथों वाले देवता: वीर कल्लाजी राठौड़ (चित्तौड़ के तृतीय साके 1568 ई. में जयमल को कंधे पर बिठाकर लड़े)।
  • चित्तौड़ के 3 साके: 1303 ई. (पद्मिनी-खिलजी), 1535 ई. (कर्मवती-बहादुरशाह), 1568 ई. (फूलकँवर-अकबर)।

📝 विगत RPSC/RSMSSB प्रश्नों का निचोड़

  • हुरड़ा सम्मेलन की अध्यक्षता: 17 जुलाई 1734 ई. को महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की।
  • विजय स्तम्भ की 3री मंजिल: 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' उत्कीर्ण है।
  • विषम घाटी पंचानन: कुंभलगढ़ प्रशस्ति में राणा हम्मीर को दी गई पदवी है।
  • चार्ल्स मार्टेल: सी.वी. वैद्य ने बप्पा रावल की तुलना फ्रांस के सेनापति चार्ल्स मार्टेल से की।
  • पाती पेरवण: राणा सांगा द्वारा खानवा युद्ध से पूर्व समस्त राजपूत राजाओं को आमंत्रित करने की प्राचीन परंपरा।
  • एकीकरण में मेवाड़: तृतीय चरण (संयुक्त राजस्थान - 18 अप्रैल 1948) में विलय, भूपाल सिंह आजीवन महाराजप्रमुख बने।
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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

मेवाड़ के गुहिल व सिसोदिया राजवंश से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

चित्तौड़गढ़ में कुल 3 साके हुए:
1. प्रथम साका (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण | रानी पद्मिनी का 1600 वीरांगनाओं संग जौहर एवं रावल रतनसिंह का केसरिया।
2. द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह का आक्रमण | रानी कर्मवती का जौहर एवं रावत बाघ सिंह का केसरिया।
3. तृतीय साका (1568 ई.): मुगल बादशाह अकबर का आक्रमण | फूलकँवर का जौहर एवं जयमल, पत्ता व वीर कल्लाजी राठौड़ का केसरिया।
वीर कल्लाजी राठौड़ को 'चार हाथों वाले लोकदेवता' कहा जाता है। 1568 ई. के चित्तौड़गढ़ के तीसरे साके में जब जयमल पैर में गोली लगने से घायल हो गए, तब कल्लाजी ने उन्हें अपने कंधों पर बिठाकर वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था।
आंवल-बांवल की संधि 1453 ई. में मेवाड़ के महाराणा कुंभा और मारवाड़ के राव जोधा के मध्य हंसाबाई के प्रयासों से संपन्न हुई थी। इसके द्वारा मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा सोजत (पाली) को बनाया गया तथा दोनों राजवंशों के दीर्घकालिक वैमनस्य का अंत हुआ।
विजय स्तम्भ 122 फीट ऊँचा, 9 मंजिला है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने 1437 ई. के सारंगपुर युद्ध विजय के उपलक्ष्य में करवाया था। इसके वास्तुकार जैता, नापा, पोमा, पूंजा थे। इसकी 3री मंजिल पर 9 बार अरबी भाषा में 'अल्लाह' लिखा है तथा यह 15 अगस्त 1949 को राजस्थान की प्रथम डाक टिकट वाली इमारत बनी।
हुरड़ा सम्मेलन 17 जुलाई 1734 ई. को भीलवाड़ा के हुरड़ा में आयोजित किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य मराठा आक्रमणों के विरुद्ध राजस्थान के सभी राजपूत राजाओं का एक संयुक्त मोर्चा बनाना था। इसकी अध्यक्षता मेवाड़ के महाराणा जगतसिंह द्वितीय ने की थी।
अबुल फज़ल ने हल्दीघाटी युद्ध को 'खमनौर का युद्ध' कहा, जबकि बदायूँनी ने इसे 'गोगुंदा का युद्ध' कहा। कर्नल जेम्स टॉड ने इसे 'मेवाड़ की थर्मोपल्ली' कहा था।

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