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राजस्थान भूगोल – नवीन ज़िलों पर आधारित संपूर्ण अपवाह तंत्र

राजस्थान का अपवाह तंत्र एवं प्रमुख झीलें :
नदियाँ, अध्यारोपित/अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप, बाँध एवं जल संरक्षण

राजस्थान के अपवाह तंत्र को जल विसर्जन के आधार पर 3 प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है — 1. आंतरिक अपवाह तंत्र (~60%), 2. बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र (~24%) एवं 3. अरब सागर का अपवाह तंत्र (~16%)। नवीन ज़िला पुनर्गठन (अनूपगढ़, सलूंबर, बालोतरा, सांचौर, नीम का थाना आदि) एवं NCERT/HM Saxena आधारित अध्ययन सामग्री (RAS / RPSC / Assistant Professor स्पेशल)।

HM Saxena / NCERT Std RAS / Assistant Prof Standard नवीन ज़िले (50 Districts Updated)
जल विसर्जन विभाजन कुल जल प्रतिशत
1. आंतरिक अपवाह तंत्र ~60.2% (सर्वाधिक)
2. बंगाल की खाड़ी तंत्र ~23.8%
3. अरब सागर तंत्र ~16.0%
अरावली पर्वतमाला महान जल विभाजक

राजस्थान में भारत के कुल सतह जल (Surface Water) का केवल 1.16% भाग ही उपलब्ध है।

गहन अध्ययन नोट्स

राजस्थान का अपवाह तंत्र: विस्तृत विश्लेषण

नदियों का उद्गम, लम्बाई, प्रवाह क्षेत्र, सहायक नदियाँ, अपवाह प्रतिरूप, बाँध, मीठे व खारे पानी की झीलें तथा जल संरक्षण पद्धतियाँ।

अपवाह तंत्र का सामान्य परिचय एवं वर्गीकरण

राजस्थान में अरावली पर्वतमाला एक प्रमुख जल विभाजक (Water Divide) के रूप में कार्य करती है। यह राज्य के जल को दो प्रमुख समुद्रों—अरब सागर और बंगाल की खाड़ी—की ओर बहने वाली नदियों में बांटती है। इसके अतिरिक्त, राज्य के विशाल रेतीले शुष्क प्रदेश (थार मरुस्थल) के कारण भारत में सर्वाधिक आंतरिक अपवाह तंत्र (Inland Drainage System) राजस्थान में ही पाया जाता है।

1

1. आंतरिक अपवाह तंत्र (~60%)

वे नदियाँ जो अपना जल किसी समुद्र या महासागर तक नहीं पहुँचा पातीं तथा मरुस्थल की रेत या किसी झील में ही विलुप्त हो जाती हैं। (उदा. घग्गर, कांतली, कांकणेय, साबी, रूपारेल)।

2

2. बंगाल की खाड़ी तंत्र (~24%)

अरावली के पूर्व में बहने वाली नदियाँ जो यमुना व गंगा में मिलकर अंततः बंगाल की खाड़ी में जल विसर्जित करती हैं। (उदा. चम्बल, बनास, बाणगंगा, कालीसिंध, पार्वती)।

3

3. अरब सागर अपवाह तंत्र (~16%)

अरावली के पश्चिम एवं दक्षिण से निकलकर कच्छ के रण या खंभात की खाड़ी के माध्यम से अरब सागर में गिरने वाली नदियाँ। (उदा. लूनी, माही, साबरमती, पश्चिमी बनास)।

RPSC परीक्षा तथ्य: राजस्थान की केवल दो ही नदियाँ ऐसी हैं जो वर्षभर बहती हैं (नित्यवाही/सदावाहिनी)—चम्बल नदी एवं माही नदी। शेष सभी नदियाँ मौसमी या बरसाती (Seasonal) हैं।

राजस्थान में अपवाह प्रतिरूप (Drainage Patterns in Rajasthan - NCERT Std)

भूवैज्ञानिक संरचना, ढाल एवं चट्टानी संरचना के आधार पर राजस्थान में चार प्रमुख प्रकार के अपवाह प्रतिरूप पाए जाते हैं, जो उच्च स्तरीय परीक्षाओं (RAS Mains / Assistant Professor / RPSC 1st Grade) हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

1. अध्यारोपित अपवाह प्रतिरूप (Superimposed Drainage)

जब नदियाँ अपनी प्रारंभिक सतह की ढाल का अनुसरण करते हुए कठोर कठोरतम चट्टानी संरचनाओं (जैसे अरावली के क्वार्टजाइट एवं विंध्यन कगार) को काटकर अपनी घाटी को गहराई में गहरा करती हैं।
उदाहरण: चम्बल नदी एवं बनास नदी का अपवाह क्षेत्र।

2. अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप (Centripetal Pattern)

जब चारों ओर की ऊँची पहाड़ियों या धरातल से निकलकर विभिन्न नदियाँ केंद्र में स्थित किसी निम्न गर्त, द्रोणी या झील में अपना जल लाकर विसर्जित करती हैं।
उदाहरण: सांभर झील बेसिन (जिसमें मंथा, रूपनगढ़, खारी व खांडेल नदियाँ चारों दिशाओं से आकर गिरती हैं)।

3. द्रुमाकृतिक / वृक्षाकार प्रतिरूप (Dendritic Pattern)

जब मुख्य नदी तथा उसकी सहायक नदियाँ वृक्ष की शाखाओं (Tree Branches) की भाँति बहती हुई जाल बनाती हैं।
उदाहरण: बनास एवं लूनी नदी का मुख्य प्रवाह क्षेत्र

4. अरीय अपवाह प्रतिरूप (Radial Pattern)

जब किसी केंद्रीय उच्च पठारी या पर्वतीय गुंबदाकार क्षेत्र से नदियाँ चारों दिशाओं में बाहर की ओर बहती हैं।
उदाहरण: आबू पर्वतखण्ड (माउंट आबू) एवं गोगुंदा की पहाड़ियाँ से निकलने वाली नदियाँ।

NCERT विशेष नोट: चम्बल नदी द्वारा निर्मित 'उत्खात भूमि' (Badland Topography) तथा 'अवनालिका अपरदन' अध्यारोपित अपवाह के निरंतर गर्त कर्तन (Vertical Erosion) का ही परिणाम है।

चम्बल नदी का प्रवाह एवं बाँध अनुक्रम (Visual Flowchart)

जनापाव पहाड़ी (M.P.) उद्गम स्थल 1. गांधी सागर बाँध मंदसौर (म.प्र.) चौरसीगढ़ (प्रवेश) चित्तौड़गढ़ (राज.) 2. राणा प्रताप सागर चूलिया प्रपात (18 मी.) 3. जवाहर सागर बाँध कोटा-बूंदी 4. कोटा बैराज केवल सिंचाई बाँध रामेश्वरम संगम + बनास + सीप यमुना नदी (U.P.) मुरादगंज (इटावा)

1. आंतरिक अपवाह तंत्र की नदियाँ (Inland Rivers - ~60.2%)

(i) घग्गर नदी (Ghaggar River) – प्राचीन सरस्वती नदी

आंतरिक प्रवाह की सबसे लंबी नदी
  • उद्गम: शिवालिक पहाड़ियाँ (कालका, हिमाचल प्रदेश)
  • राजस्थान में प्रवेश: तलवाड़ा गाँव (टिब्बी तहसील, हनुमानगढ़)
  • प्रवाह ज़िले (नवीन पुनर्गठन): हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर एवं अनूपगढ़ (अंतर्राष्ट्रीय सीमा पार कर पाकिस्तान के 'फोर्ट अब्बास' तक जाती है)।
  • उपनाम: मृत नदी (Dead River), सोतर, द्वेषद्वती, नाली, नट नदी।
  • विशेषताएँ: • इसके पाठ (नदी पेटे) को राजस्थान में 'नाली' तथा पाकिस्तान में 'हकरा' (Hakra) कहा जाता है। • हनुमानगढ़ में इसके मुहाने पर तलवाड़ा झील (राजस्थान की सबसे नीची झील) स्थित है। • प्रसिद्ध कालीबंगा, पीलीबंगा एवं रंगमहल सभ्यताएँ इसी नदी के तट पर स्थित हैं।

(ii) कांतली नदी (Kantli River)

पूर्णतः राजस्थान में आंतरिक प्रवाह की सबसे लंबी (100 किमी)
  • उद्गम: खंडेला की पहाड़ियाँ (नीम का थाना जिला)
  • प्रवाह क्षेत्र: नीम का थाना, सीकर, झुंझुनूं (झुंझुनूं को दो भागों में बांटती है तथा चूरू की सीमा पर विलुप्त हो जाती है)।
  • प्रवाह क्षेत्र का नाम: 'तोरावाटी' (Torawati)
  • सभ्यता: इसके तट पर गणेश्वर सभ्यता (ताम्रयुगीन सभ्यताओं की जननी - नीम का थाना) तथा सुनारी सभ्यता स्थित है।
(iii) कांकणेय / काकनी (मसूरदी)

उद्गम: कोटड़ी गाँव (जैसलमेर)। सबसे छोटी आंतरिक नदी (17 किमी)। यह मीठे पानी की 'बुझ झील' का निर्माण करती है।

(iv) साबी नदी (Sabi River)

उद्गम: सेवर की पहाड़ियाँ (जयपुर ग्रामीण)। कोटपूतली-बहरोड़, खैरथल-तिजारा होते हुए हरियाणा के गुड़गांव में नजफगढ़ झील में समाप्त होती है। (तट पर: जोधपुरा सभ्यता)।

(v) रूपारेल नदी (वराह / लसवारी)

उद्गम: उदयनाथ की पहाड़ी (थानागाजी, अलवर)। अलवर व डीग/भरतपुर में बहती है। (तट पर: मोती झील बाँध - भरतपुर की जीवन रेखा)।

(vi) मंथा / मेंढा नदी

उद्गम: मनोहरपुर (जयपुर)। यह सांभर झील में उत्तर दिशा से आकर सर्वाधिक लवण (नमक) जमा करने वाली नदी है।

(vii) रूपनगढ़ नदी

उद्गम: कुचिल (अजमेर)। दक्षिण दिशा से सांभर झील में गिरती है। (तट पर: निम्बार्क पीठ, सलेमाबाद)।

(viii) खारी व खांडेल

ये नदियाँ भी सांभर झील में जल विसर्जित करती हैं। (अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप का सर्वोत्तम उदाहरण)।

2. बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र (Bay of Bengal System - ~23.8%)

🌊 चम्बल नदी (Chambal River) – चर्मण्वती / नित्यवाही (अध्यारोपित अपवाह)

राजस्थान की सबसे लंबी नदी (965/1051 किमी)
  • उद्गम: जनापाव की पहाड़ियाँ (महू, मध्य प्रदेश)
  • राजस्थान में प्रवेश: चौरसीगढ़ (भैंसरोड़गढ़, चित्तौड़गढ़)
  • समाप्ति: मुरादगंज (इटावा, उत्तर प्रदेश) – यमुना नदी में विलय।
  • प्रवाह ज़िले: चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर। (राजस्थान-मप्र की 241 किमी लंबी अंतर्राज्यीय सीमा बनाती है)।
  • जलप्रपात: चूलिया जलप्रपात (18 मीटर ऊँचा, भैंसरोड़गढ़) – राजस्थान का सबसे ऊँचा प्रपात।
🏗️ चम्बल नदी पर स्थित 4 प्रमुख बाँध (क्रमवार: दक्षिण से उत्तर)
  1. गांधी सागर बाँध: मन्दसौर (मध्य प्रदेश) – राजस्थान से बाहर।
  2. राणा प्रताप सागर बाँध: रावतभाटा (चित्तौड़गढ़) – भराव क्षमता में राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध।
  3. जवाहर सागर बाँध: बोराबास (कोटा) – पिक-अप बाँध।
  4. कोटा बैराज: कोटा शहर – केवल सिंचाई एवं नहरों हेतु प्रयोग।
सहायक नदियाँ: बनास, कालीसिंध, पार्वती, बामनी, कुराल, मेज, शिप्रा, चाकण। चम्बल नदी अपने बीहड़ (Ravines) व अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) के लिए प्रसिद्ध है।

🌊 बनास नदी (Banas River) – 'वन की आशा' (Varnasha)

पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी (512 किमी)
  • उद्गम: खमनौर की पहाड़ियाँ (कुंभलगढ़, राजसमंद)
  • विलय: रामेश्वरम (पदरा गाँव, सवाई माधोपुर) में चम्बल नदी में।
  • प्रवाह ज़िले (नवीन अनुसार): राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी, टोंक, सवाई माधोपुर।
  • प्रमुख बाँध: बीसलपुर बाँध (टोंक): राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना। ईसरदा बाँध (सवाई माधोपुर): जल स्तर बनाए रखने हेतु। मेजा बाँध (भीलवाड़ा): कोठारी नदी (बनास की सहायक) पर।
  • सहायक नदियाँ: बेड़च (आयड़), मेनाल, कोठारी, खारी, मानसी, धुंध, मोरेल।
  • विशेष आकृति: इसका प्रवाह सर्पाकार (Serpentine) एवं वृक्षाकार (Dendritic) है तथा इसका बेसिन उपजाऊ भूरी मिट्टी के लिए प्रसिद्ध है।
बाणगंगा नदी (Arjun's Arrow / ताला नदी)

उद्गम: बैराठ की पहाड़ियाँ (जयपुर ग्रामीण)। कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, भरतपुर होते हुए यमुना में गिरती थी (अब इसे 'रुण्डित सरिता' (Rundit River) कहा जाता है, क्योंकि यह मुख्य नदी से पहले ही मैदानी भाग में समाप्त हो जाती है)। इस पर जमवा रामगढ़ बाँध बना है।

कालीसिंध व पार्वती नदी

कालीसिंध: देवास (मप्र) से निकलकर झालावाड़ (बिंदा गाँव) में प्रवेश करती है। गागरोन दुर्ग (जलदुर्ग) कालीसिंध व आहू नदी के संगम पर स्थित है।
पार्वती: सेहोर (मप्र) से निकलकर छत्रपुरा (बाराँ) में प्रवेश कर चम्बल में मिलती है।

3. अरब सागर का अपवाह तंत्र (Arabian Sea System - ~16.0%)

🌵 लूनी नदी (Luni River) – 'आधी मीठी, आधी खारी' / लवणवती

पश्चिमी राजस्थान की सबसे मुख्य नदी (495 किमी / राज. में 330 किमी)
  • उद्गम: नाग पहाड़ (अजमेर) – उद्गम स्थल पर इसे 'सागरामती' तथा पुष्कर की सकरी नदी मिलने के बाद 'लूनी' कहते हैं।
  • विलय: कच्छ का रण (गुजरात)।
  • प्रवाह क्षेत्र (नवीन 7 ज़िले): अजमेर, नागौर, ब्यावर, पाली, जोधपुर ग्रामीण, बाड़मेर, बालोतरा एवं सांचौर
  • जल का खारापन: अजमेर से बालोतरा (नवीन ज़िला) तक जल मीठा रहता है, परंतु बालोतरा के आगे मृदा में सोडियम क्लोराइड की प्रचुरता के कारण जल खारा हो जाता है।
  • सांचौर बेसिन: लूनी नदी सांचौर (नवीन ज़िला) के दलदली क्षेत्र में 'नेहड़' (Rann) का निर्माण करते हुए गुजरात में प्रवेश करती है।
  • सहायक नदियाँ: जोझड़ी (Jojari): दाईं ओर से मिलने वाली एकमात्र सहायक नदी (नागौर से निकलती है, अरावली से नहीं निकलती)। • बाईं ओर से: बांडी, सुकड़ी, जवाई, गुहिया, सागी, मीठड़ी, लीलड़ी।
  • प्रमुख बाँध: जवाई बाँध (सुमेरपुर, पाली) – इसे 'मारवाड़ का अमृत सरोवर' कहते हैं। दूसरा: पिचियाक / जसवंत सागर बाँध (जोधपुर)।

🌴 माही नदी (Mahi River) – 'वागड़ व कांठल की गंगा'

कर्क रेखा को दो बार काटने वाली विश्व की एकमात्र नदी
  • उद्गम: मेहद झील (धार जिला, अमझोरा, मध्य प्रदेश)
  • राजस्थान में प्रवेश: खांदू गाँव (बांसवाड़ा)
  • आकृति: अंग्रेजी के उल्टे 'U' (∩) आकार में बहती है। दक्षिण से प्रवेश कर पुनः दक्षिण (खंभात की खाड़ी) की ओर निकल जाती है।
  • प्रवाह ज़िले: बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर। (प्रतापगढ़ में इसके तटीय भाग को 'कांठल' कहते हैं)।
  • प्रमुख बाँध: माही बजाज सागर बाँध (लोहारिया, बांसवाड़ा): राजस्थान का सबसे लंबा बाँध (3109 मीटर)। कागदी पिक-अप बाँध (बांसवाड़ा) कडाणा बाँध: पंचमहल जिला (गुजरात) में।
  • सहायक नदियाँ: सोम, जाखम, अनास, हरण, चाप, मोरेन।
साबरमती नदी (Sabarmati River)

उद्गम: झाड़ोल (उदयपुर) की पहाड़ियाँ। उद्गम राजस्थान में है परंतु मुख्य महत्व गुजरात में है (गांधीनगर व अहमदाबाद इसी तट पर हैं)। खंभात की खाड़ी में गिरती है।

पश्चिमी बनास (West Banas River)

उद्गम: नया सांवरा गाँव (सिरोही)। सिरोही से बहकर गुजरात के कच्छ के छोटे रण में विलुप्त होती है। गुजरात का 'डीसा शहर' इसी नदी के तट पर स्थित है।

4. राजस्थान की प्रमुख झीलें (Lakes of Rajasthan - Updated)

(A) खारे पानी की प्रमुख झीलें (Salt Lakes - टेथिस सागर के अवशेष)

1. सांभर झील (जयपुर ग्रामीण / दूदू / नागौर)

• भारत की सबसे बड़ी प्राकृतिक अंतर्देशीय खारे पानी की झील।
अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप (Centripetal Pattern) का उदाहरण।
• भारत के कुल नमक उत्पादन का 8.7% यहाँ बनता है।
• 1990 में रामसर साइट (Ramsar Wetland Site) घोषित।

2. पचपदरा झील (बालोतरा जिला)

• अब बालोतरा (नवीन ज़िला) में आती है (पूर्व में बाड़मेर)।
• इस झील का नमक खाने की दृष्टि से सर्वोत्तम (98% NaCl)।
• 'खारवाल जाति' के लोग 'मोरली झाड़ी' की टहनी से नमक के स्फटिक बनाते हैं।

3. डिडवाना झील (डिडवाना-कुचामन)

• नवीन ज़िला डिडवाना-कुचामन में स्थित।
• यहाँ के नमक में सोडियम सल्फेट अधिक होने के कारण यह अखाद्य (खाने योग्य नहीं) है।
• स्थानीय संस्थाएँ: 'देवल'।

* अन्य खारे पानी की झीलें: फलौदी (फलौदी जिला), लूणकरणसर (बीकानेर - 'राजस्थान का राजकोट'), कावोद (जैसलमेर - आयोडीन सर्वोत्तम), पोकरण (जैसलमेर), बाप (जोधपुर ग्रामीण), रेवासा व कोचोर (सीकर)।

(B) मीठे पानी की प्रमुख झीलें (Freshwater Lakes)

1. जयसमंद झील (ढेबर झील) सलूंबर ज़िला (नवीन)
  • अब सलूंबर ज़िले के अंतर्गत आती है (पूर्व में उदयपुर)।
  • राजस्थान की सबसे बड़ी एवं भारत की दूसरी सबसे बड़ी कृत्रिम मीठे पानी की झील।
  • निर्माण: महाराणा जयसिंह (1685-1691) द्वारा गोमती नदी का जल रोककर।
  • झील में 7 बड़े-छोटे टापू हैं (सबसे बड़ा: 'बाबा का भाकड़ा', सबसे छोटा: 'प्यारी')।
2. राजसमंद झील (कांकरोली, राजसमंद)
  • निर्माण: महाराणा राजसिंह द्वारा अकाल राहत कार्य हेतु।
  • झील की उत्तरी पाल को 'नौचौकी की पाल' कहते हैं।
  • यहाँ 25 काले संगमरमर के शिलालेखों पर संस्कृत में 'राजप्रशस्ति' (रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा) उत्कीर्ण है (विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख)।
3. आणासागर व पुष्कर झील (अजमेर)
  • आणासागर: अर्णोराज (आनाजी) द्वारा (1137 ई.)। जहाँ शाहजहाँ ने 'दौलत बाग' (सुभाष उद्यान) व 'बारादरी' बनवाई।
  • पुष्कर: राजस्थान की सबसे पवित्र व सर्वाधिक प्रदूषित प्राकृतिक झील (52 घाट, कार्तिक पूर्णिमा मेला)।
4. नक्की झील (माउंट आबू, सिरोही)
  • राजस्थान की सर्वाधिक ऊँचाई (1200 मीटर) पर स्थित एवं सबसे गहरी झील।
  • मान्यतानुसार देवताओं ने अपने नाखूनों (Nails) से खोदा। क्रेटर झील का उदाहरण।
  • प्रसिद्ध चट्टानें: टॉड रॉक (मेढक जैसी), नन रॉक (घूंघट निकाले स्त्री)।

* अन्य मीठे पानी की झीलें: पिछोला झील (उदयपुर - नटनी का चबूतरा, जगमंदिर, जगनिवास), फतेहसागर (उदयपुर), कोलायत (बीकानेर - कपिल मुनि आश्रम), सिलीसेढ़ (अलवर - 'राजस्थान का नंदनकानन'), बालसमंद व कायलाना (जोधपुर शहर)।

5. राजस्थान के प्रमुख त्रिवेणी संगम (Triveni Confluences)

1. बेणेश्वर (डूंगरपुर)
सोम + माही + जाखम

'आदिवासियों का महाकुंभ' (माघ पूर्णिमा मेला)।

2. बीगोद (भीलवाड़ा)
बनास + बेड़च + मेनाल

भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़ के समीप।

3. राजमहल (टोंक)
बनास + खारी + डाई

देवली तहसील, टोंक जिला।

4. रामेश्वरम (सवाई माधोपुर)
चम्बल + बनास + सीप

पदरा गाँव, सवाई माधोपुर।

6. राजस्थान में जल संरक्षण की पारंपरिक पद्धियाँ

शुष्क प्रदेश होने के कारण राजस्थान में जल संग्रहण एवं संरक्षण की कई अनुपम पारंपरिक तकनीकें विकसित की गईं जो प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं:

1. खड़ीन (Khadin)

जैसलमेर में 15वीं शताब्दी में पालीवाल ब्राह्मणों द्वारा विकसित कृषि-सह-जल संरक्षण तकनीक। इसमें ढलान के नीचे मिट्टी का बांध बनाकर वर्षा जल रोका जाता है।

2. टांका / कुंडी (Taanka)

पश्चिमी राजस्थान के घरों व खेतों में वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए बनाया गया पक्का भूमिगत कुआँ/हौज।

3. जोहड़ (Johad)

शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, नीम का थाना, चूरू, झुंझुनूं) में वर्षा जल संचयन हेतु बनाए गए कच्चे कुएँ या छोटे पोखर। राजेंद्र सिंह (वाटरमैन ऑफ इंडिया) इससे जुड़े हैं।

4. बावड़ी (Stepwell)

सीढ़ीदार कुएँ। बूंदी को 'बावड़ियों का शहर' (City of Stepwells) कहा जाता है। आबानेरी (दौसा) की चाँद बावड़ी विश्व प्रसिद्ध है।

5. बेरी / कुई (Beri)

तालाब या खारे पानी के गड्ढों के पास बनाया गया 10-12 मीटर गहरा कम व्यास वाला गड्ढा, जिसमें रिसाव (Seepage) द्वारा मीठा पानी एकत्र होता है।

6. टोबा (Toba)

नाडी की तरह का संरचनात्मक ढाँचा परंतु गहराई नाडी से अधिक होती है, जहाँ रेतीले क्षेत्र में पानी लम्बे समय तक ठहरता है।

7. प्रमुख नदियों की तुलनात्मक सारणी (अपडेटेड)

नदी का नाम उद्गम स्थल समाप्ति / विसर्जन प्रवाह के प्रमुख ज़िले (नवीन) अपवाह प्रतिरूप विशेष पहचान
चम्बल नदी जनापाव (म.प्र.) यमुना (इटावा, उ.प्र.) चित्तौड़गढ़, कोटा, बूंदी, स.माधोपुर, करौली, धौलपुर अध्यारोपित (Superimposed) नित्यवाही, चूलिया प्रपात, 4 बाँध, बीहड़
बनास नदी खमनौर (राजसमंद) चम्बल (सवाई माधोपुर) राजसमंद, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी, टोंक, स.माधोपुर वृक्षाकार (Dendritic) पूर्णतः राज. में सबसे लंबी, बीसलपुर बाँध
लूनी नदी नाग पहाड़ (अजमेर) कच्छ का रण (गुजरात) अजमेर, ब्यावर, नागौर, पाली, बालोतरा, बाड़मेर, सांचौर द्रुमाकृतिक / समानांतर आधी मीठी-आधी खारी (बालोतरा के आगे)
माही नदी मेहद झील (म.प्र.) खंभात की खाड़ी बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर अरीय / अण्डाकार (∩ Shape) कर्क रेखा को 2 बार काटती है
घग्गर नदी शिवालिक (ह.प्र.) फोर्ट अब्बास (पाक.) हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, अनूपगढ़ आंतरिक प्रवाह (Inland) मृत नदी, नाली / हकरा पाठ, तलवाड़ा झील

परीक्षा-उपयोगी अति-महत्वपूर्ण तथ्य (Quick One-Liners)

  • जयसमंद झील अब नवीन सलूंबर जिले के अंतर्गत आती है (पूर्व में उदयपुर)।
  • घग्गर नदी का प्रवाह अब हनुमानगढ़ व श्रीगंगानगर के साथ नवीन अनूपगढ़ जिले में भी है।
  • लूनी नदी का जल बालोतरा (नवीन ज़िला) के पश्चात् खारा होता है तथा यह सांचौर जिले में नेहड़ दलदल बनाती है।
  • सांभर झील भारत में 'अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप' (Centripetal Pattern) का सर्वोत्तम उदाहरण है।
  • चम्बल व बनास नदियाँ 'अध्यारोपित अपवाह' (Superimposed Drainage) का निर्माण करती हैं।
  • बाणगंगा नदी को अब 'रुण्डित सरिता' (Rundit River) कहा जाता है।
  • राजस्थान के केवल दो जिले चूरू एवं बीकानेर ऐसे हैं जिनमें कोई भी नदी नहीं बहती है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक नदियाँ कोटा संभाग में प्रवाहित होती हैं।
  • 'वाटरमैन ऑफ इंडिया' (जल पुरुष) के नाम से राजेंद्र सिंह (अलवर) जाने जाते हैं।
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

जब नदियाँ अपनी प्रारंभिक सतह की ढाल का अनुसरण करते हुए कठोर पर्वतीय संरचनाओं (जैसे अरावली व विंध्यन कगार) को काटकर अपनी घाटी गहरा करती हैं, तो उसे अध्यारोपित अपवाह कहते हैं। राजस्थान में चम्बल एवं बनास नदियाँ इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
नवीन जिला पुनर्गठन के अनुसार, जयसमंद झील (ढेबर झील) अब सलूंबर जिले के अंतर्गत आती है (पूर्व में यह उदयपुर जिले का भाग थी)।
सांभर झील अभिकेंद्री अपवाह प्रतिरूप (Centripetal Pattern) का उदाहरण है, क्योंकि इसमें उत्तर से मंथा, दक्षिण से रूपनगढ़ तथा खारी व खांडेल नदियाँ चारों ओर से आकर एक ही गर्त में जल विसर्जित करती हैं।
बाणगंगा नदी पूर्व में सीधे यमुना में मिलती थी, परंतु अब जल की कमी के कारण यह अपनी मुख्य नदी (यमुना) में मिलने से पहले ही मैदानी भाग में विलुप्त हो जाती है। इसीलिए इसे रुण्डित सरिता (Rundit River) कहा जाता है।
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