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राजस्थान का इतिहास – मारवाड़ राठौड़ राजवंश

मारवाड़ का राठौड़ राजवंश:
स्थापना, शौर्य गाथा, मेहरानगढ़ एवं प्रतापी शासक

मारवाड़ का राठौड़ वंश (Marwar Rathore Rajvansh) राजस्थान के सबसे प्रतापी व समृद्ध क्षत्रिय राजवंशों में प्रमुख है। राव सीहा (1273 ई.) द्वारा पाली-खेड से नींव रखने से लेकर राव चूँडा, राव जोधा (1459 ई. - मेहरानगढ़ दुर्ग), राव मालदेव (हशमत वाला राजा / गिरी-सुमेल युद्ध), राव चंद्रसेन (मारवाड़ का प्रताप), महाराजा जसवंत सिंह प्रथम एवं वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ के 30 वर्षीय संघर्ष का 100% प्रामाणिक, परीक्षा-उन्मुख एवं गहन अध्ययन।

100% प्रामाणिक स्रोत RAS / RPSC / RSSB उपयोगी गिरी-सुमेल व 30 वर्षीय संघर्ष बीठू शिलालेख (1273 ई.)
त्वरित सारांश 🚩 राठौड़ राजवंश

मूल संस्थापक

राव सीहा

जोधपुर स्थापना

1459 ई.

कुलदेवी: नागणेची माता | इष्टदेवी: चामुंडा माता | कुलदेवता: सूर्यदेव

मारवाड़ राठौड़ वंश : Complete Online Test
गहन प्रामाणिक अध्ययन

मारवाड़ का राठौड़ राजवंश: सम्पूर्ण ऐतिहासिक विश्लेषण

उत्पत्ति के मत, राव सीहा, जोधा, मालदेव, चंद्रसेन, दुर्गादास राठौड़, युद्ध, स्थापत्य व RPSC/RAS हेतु प्रामाणिक संकलन।

1. राठौड़ शब्द की व्युत्पत्ति एवं उत्पत्ति के प्रमुख सिद्धांत (Theories of Origin)

संस्कृत भाषा के 'राष्ट्रकूट' (Rashtrakuta) शब्द का प्राकृत अपभ्रंश 'रट्ठउड़' या 'राठौड़' बना। दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट एक पराक्रमी राजवंश था। मारवाड़ के राठौड़ों की उत्पत्ति के विषय में विभिन्न मत प्रचलित हैं:

1. सूर्यवंशी / कश्यप गोत्रीय सिद्धांत

राठौड़ों को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना गया है जिनका गोत्र कश्यप और कुलदेवी नागणेची माता हैं।
समर्थक/स्रोत: जोधपुर राज्य की ख्यात, दयालदास री ख्यात, चारण परंपरा।

2. कन्नौज के गहड़वालों के वंशज

कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल के प्रपौत्र राव सीहा को माना जाता है जो कन्नौज पर शहाबुद्दीन गोरी के आक्रमण के बाद पश्चिमी राजस्थान आए।
समर्थक: मुहणौत नैणसी, महाकवि सूर्यमल्ल मीषण, पृथ्वीराज रासो।

3. बदायूँ के राठौड़ों से संबंध

कर्नल जेम्स टॉड एवं डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार कन्नौज के गहड़वाल और बदायूँ के राठौड़ पृथक थे, तथा मारवाड़ के राठौड़ बदायूँ के राष्ट्रकूटों की शाखा से संबंधित थे।

4. दक्षिण के राष्ट्रकूट मत

डॉ. ए.एफ.आर. हॉर्नले एवं आधुनिक शोधकर्ताओं के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ दक्षिण के मान्यखेट के राष्ट्रकूटों के वंशज हैं जो राजस्थान में आकर बसे।

📌 RPSC प्रामाणिक निष्कर्ष: राठौड़ों का मूल पुरुष राव सीहा था। 1273 ई. के बीठू (पाली) शिलालेख में राव सीहा को 'सेतराम का पुत्र' कहा गया है। इन्होंने पाली के पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षार्थ लाखा झंवर के युद्ध में मुस्लिम आक्रमणकारियों से लड़ते हुए वीरगति पाई।

2. मारवाड़ के प्रारंभिक राठौड़ शासक (Early Rathore Rulers of Marwar)

2.1 राव सीहा, राव आस्थान एवं राव धूहड़

  • राव सीहा (1273 ई. मृत्यु): मारवाड़ के राठौड़ वंश का आदिपुरुष / मूल पुरुष / संस्थापक। इन्होंने पालीवाल ब्राह्मणों की सहायता की तथा खेड (बालोतरा/बाड़मेर) को अपनी प्रारंभिक राजधानी बनाया। इनकी छतरी व स्मारक बीठू गांव (पाली) में स्थित है। इनकी रानी पार्वती सोलंकी इनके साथ सती हुई थीं।
  • राव आस्थान: राव सीहा के पुत्र जिन्होंने गुहिलों को हराकर खेड पर पूर्ण नियंत्रण किया। जलालुद्दीन खिलजी की सेना से लड़ते हुए वीरगति पाई।
  • राव धूहड़: ये कर्नाटक से अपनी कुलदेवी चक्रेश्वरी माता (नागणेची माता) की 18 भुजाओं वाली काष्ठ प्रतिमा लेकर आए और नागाणा गांव (बाड़मेर) में मंदिर स्थापित करवाया।
  • राव मल्लीनाथ जी (1374–1399 ई.): मारवाड़ के प्रतापी वीर एवं प्रसिद्ध लोकदेवता। इन्होंने बाड़मेर क्षेत्र में अपनी राजधानी मेवानगर (तिलवाड़ा) बनाई। इनके नाम पर ही यह क्षेत्र 'मालाणी' कहलाया। 1399 ई. में इन्होंने 'कुंडा पंथ' की स्थापना की। इनकी रानी रूपादे भी लोकदेवी के रूप में पूजी जाती हैं।

2.2 राव चूँडा (1384 – 1423 ई.) – वास्तविक संस्थापक

राव चूँडा को मारवाड़ में राठौड़ सत्ता का वास्तविक संस्थापक (Real Founder) तथा सामंत प्रथा (Feudal System) का जनक माना जाता है।

  • मंडोर की प्राप्ति (1395 ई.): इंदा प्रतिहारों ने तुर्कों के विरुद्ध सहायता के बदले अपनी राजकुमारी का विवाह राव चूँडा से कर मंडोर दुर्ग दहेज में दिया। राव चूँडा ने मंडोर को राठौड़ों की राजधानी बनाया।
  • स्थापत्य: जोधपुर में 'चूंडासर तालाब' बनवाया। इनकी रानी चांदकंवर (चौहान) ने जोधपुर में प्रसिद्ध 'चांद बावड़ी' का निर्माण करवाया।
  • मृत्यु: भाटियों और सांखला राजपूतों के विरुद्ध युद्ध में 1423 ई. में वीरगति पाई।
  • राव रणमल (1427–1438 ई.): राव चूँडा के ज्येष्ठ पुत्र। चूँडा द्वारा छोटे पुत्र कान्हा को उत्तराधिकारी बनाने पर रणमल अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के महाराणा लाखा से करवाकर मेवाड़ चले गए। महाराणा मोकल व महाराणा कुंभा के प्रारंभिक समय में मेवाड़ के संरक्षक रहे। 1438 ई. में कुंभा के आदेश से दासी भारमली की सहायता से चित्तौड़ दुर्ग में रणमल की हत्या कर दी गई।

3. राव जोधा (1438 – 1489 ई.) – जोधपुर के संस्थापक व निर्माता

राव रणमल के पुत्र राव जोधा ने 1438 ई. में चित्तौड़ से भागकर मारवाड़ के काहुनी गांव में शरण ली और 15 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद 1453 ई. में मंडोर पर पुनः अधिकार कर लिया।

🤝 आंवल-बांवल की संधि (1453 ई.)

हंसाबाई की मध्यस्थता से महाराणा कुंभा एवं राव जोधा के मध्य ऐतिहासिक संधि हुई।
सीमा निर्धारण: सोजत (पाली) को मेवाड़-मारवाड़ की सीमा बनाया गया (आंवल = आंवले के हरे वृक्ष मेवाड़ क्षेत्र, बांवल = बबूल के कांटेदार वृक्ष मारवाड़ क्षेत्र)।
• राव जोधा की पुत्री श्रृंगार देवी का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से हुआ (श्रृंगार देवी ने चित्तौड़ के घोसुण्डी में बावड़ी बनवाई)।

🏰 जोधपुर व मेहरानगढ़ की स्थापना (1459 ई.)

स्थापना तिथि: 12 मई 1459 ई. (ज्येष्ठ सुदी एकादशी)।
पहाड़ी: चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर दुर्ग बनवाया (चिड़ियानाथ योगी का स्थान)।
नींव का पत्थर: लोकदेवी श्री करणी माता (रिद्धू बाई) के कर-कमलों से रखवाया गया।
बलिदान: दुर्ग की नींव में राजाराम मेघवाल (रज़िया भाम्बी) को जीवित चिनाया गया।
उपनाम: मयूरध्वजगढ़, गढ़ चिंतामणि, कागमुखी, सूर्यगढ़।

🌊 प्रमुख स्थापत्य व धार्मिक निर्माण

  • मेहरानगढ़ में चामुंडा माता मंदिर एवं नागणेची माता मंदिर का निर्माण करवाया।
  • राव जोधा की हाड़ी रानी जसमादे ने जोधपुर में प्रसिद्ध 'रानीसर तालाब' बनवाया।
  • राव सातलदेव (1489–1492 ई.): जोधा के उत्तराधिकारी। 1492 ई. में पीपाड़ में 140 तीजनियों का अपहरण करने वाले अजमेर के सूबेदार के सेनापति मल्लू खां / घुड़ले खां का वध किया (कोसाना का युद्ध)। इसी स्मृति में मारवाड़ में चैत्र कृष्ण अष्टमी को 'घुड़ला त्यौहार' व 'घुड़ला नृत्य' मनाया जाता है।
  • राव गांगा (1515–1531 ई.): खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की सहायतार्थ अपने पुत्र कुंवर मालदेव के नेतृत्व में 4,000 मारवाड़ी सैनिक भेजे।

4. राव मालदेव (1531 – 1562 ई.) – हशमत वाला राजा व 52 युद्धों का विजेता

राव मालदेव का राज्याभिषेक 1531 ई. में सोजत (पाली) में हुआ था। फ़ारसी इतिहासकारों (निजामुद्दीन, फरिश्ता) एवं बदायूनी ने इन्हें 'हशमत वाला राजा' (The King of Splendour/वैभवशाली शासक) तथा 'हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक' कहा है। बदायूंनी ने इन्हें 'हिंदू बादशाह' की संज्ञा दी।

⚔️ प्रमुख सैन्य विजय अभियान

  • 52 युद्धों व 58 परगनों का विजेता: मालदेव ने भद्राजून (सिंधल), नागौर (दौलत खां), मेड़ता (वीरमदेव), सिवाना (डूंगरसी), जालोर, सांचोर आदि जीते।
  • पाहेबा / साहेबा का युद्ध (1541-42 ई.): मालदेव के सेनापति जैता व कूंपा ने बीकानेर के राव जैतसी को पराजित कर मार डाला। बीकानेर पर मालदेव का अधिकार हुआ (कुंवर कल्याणमल शेरशाह के पास चला गया)।
  • हुमायूं को शरण का प्रस्ताव: शेरशाह से पराजित होकर जब हुमायूं मारवाड़ आया (जोगी तीर्थ/फलौदी), तब मालदेव ने बीकानेर परगना देने का प्रस्ताव रखा था, किंतु संदेहवश हुमायूं अमरकोट चला गया।

👸 रूठी रानी – उमादे भटियाणी

जैसलमेर के रावल लूणकरण की पुत्री उमादे का विवाह मालदेव से हुआ। विवाह की प्रथम रात्रि को ही दासी भारमली के कारण मालदेव से रुष्ट होकर जीवनभर अजमेर के तारागढ़ दुर्ग में रहीं। इतिहास में 'रूठी रानी' के नाम से प्रसिद्ध हुईं। 1562 ई. में मालदेव की मृत्यु पर उनकी पगड़ी (छत्र) के साथ गुंदोज (पाली) में सती (अनुमरण) हुईं।

🔥 गिरी-सुमेल का युद्ध (5 जनवरी 1544 ई.) – ऐतिहासिक मोड़

स्थान: जैतारण (पाली) के निकट गिरी एवं सुमेल गांव।
प्रतिद्वंद्वी: शेरशाह सूरी (साथ में मेड़ता के वीरमदेव व बीकानेर के कल्याणमल) बनाम मालदेव के वीर सेनानायक जैता एवं कूंपा
कूटनीति: शेरशाह ने जाली पत्रों द्वारा मालदेव के मन में जैता-कूंपा के प्रति अविश्वास पैदा कर दिया, जिससे मालदेव युद्धभूमि छोड़कर जोधपुर लौट गए।
अमर बलिदान: अपनी निष्ठा सिद्ध करने हेतु जैता व कूंपा ने मुट्ठी भर सैनिकों के साथ शेरशाह की विशाल सेना पर आत्मघाती प्रहार किया और वीरगति प्राप्त की।

"बोल्यो सूरी राज यूं, गिरी सुमेल मजाल।
मुट्ठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण॥"
शेरशाह का कथन: "मैंने एक मुट्ठी बाजरे के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो दी होती।"

🏗️ मालदेव कालीन प्रमुख स्थापत्य दुर्ग

  • मेहरानगढ़ दुर्ग का परकोटा बनवाया।
  • मालकोट दुर्ग (मेड़ता), पोकरण दुर्ग, रियांबड़ी दुर्ग व सोजत दुर्ग का सुदृढ़ीकरण।
  • जोधपुर में 'रानीसर' के पास 'पदमसर तालाब' का निर्माण रानी उत्तमदे (झाली) द्वारा।

5. राव चंद्रसेन (1562 – 1581 ई.) – मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा एवं प्रताप का अग्रगामी

राव मालदेव ने अपने बड़े पुत्रों (रामसिंह व उदयसिंह) के स्थान पर अपने तीसरे पुत्र राव चंद्रसेन को मारवाड़ का शासक बनाया। चंद्रसेन राजपूताने के पहले शासक थे जिन्होंने मुगलों की अधीनता का विरोध कर स्वतंत्रता के लिए आजीवन संघर्ष का मार्ग चुना।

👑 प्रमुख ऐतिहासिक उपनाम

  • मारवाड़ का प्रताप: प्रताप के समान ही मुगलों से आजीवन संघर्ष करने के कारण।
  • प्रताप का अग्रगामी / पथ-प्रदर्शक: प्रताप से पूर्व छापामार/गुरिल्ला युद्ध नीति अपनाने के कारण।
  • मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा (Forgotten Hero of Marwar): इतिहास में उचित स्थान न मिलने के कारण।

📍 नागौर दरबार (नवंबर 1570 ई.)

अकबर ने भारमल के सहयोग से नागौर में दरबार लगाया तथा 'शुक्र तालाब' का निर्माण करवाया। चंद्रसेन नागौर गए किंतु अकबर के दरबार में अपने प्रतिद्वंद्वी भाइयों (राम व उदयसिंह) को देखकर बिना अधीनता स्वीकार किए चुपचाप दरबार से निकलकर भाद्राजून चले गए।

🏹 छापामार संघर्ष एवं देहांत

  • मुगल अभियान: अकबर ने जलाल खां, शाहबाज खां एवं बीकानेर के रायसिंह को चंद्रसेन के विरुद्ध भेजा। अकबर ने 1572 से 1574 ई. तक जोधपुर का प्रशासक रायसिंह (बीकानेर) को बनाया।
  • संघर्ष के केंद्र: भाद्राजून ➔ सिवाना दुर्ग (बाड़मेर) ➔ काणूजा ➔ पीपलोद ➔ सारण की पहाड़ियाँ (पाली)।
  • पोकरण दुर्ग गिरवी: युद्ध के खर्च हेतु राव चंद्रसेन ने पोकरण दुर्ग जैसलमेर के रावल हरराय भाटी को 1 लाख फदियों (मुद्रा) में गिरवी रखा था।
  • देहांत: 11 जनवरी 1581 ई. को सारण की पहाड़ियों (सिचियाई गांव, पाली) में सामंत बैरसाल द्वारा विष देने से इनका देहांत हुआ। सारण में चंद्रसेन का अश्वारोही स्मारक बना है जहाँ 5 रानियाँ इनके साथ सती हुईं।

खालसा भूमि (1581–1583 ई.): राव चंद्रसेन की मृत्यु के बाद अकबर ने जोधपुर को लगभग 2 वर्ष (1581–1583 ई.) तक प्रत्यक्ष केंद्रीय नियंत्रण में रखा, जिसे 'खालसा घोषित करना' कहते हैं।

6. मुगलों से संबंध, महाराजा जसवंत सिंह प्रथम एवं वीर दुर्गादास राठौड़

6.1 मोटा राजा उदयसिंह व गजसिंह प्रथम

  • मोटा राजा उदयसिंह (1583–1595 ई.): मुगलों की अधीनता स्वीकार करने तथा मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले मारवाड़ के प्रथम राठौड़ शासक। इन्होंने 1587 ई. में अपनी पुत्री मानबाई / जगत गुसाईं (जोधाबाई) का विवाह जहांगीर (सलीम) से किया, जिससे खुर्रम (शाहजहाँ) का जन्म हुआ। अकबर ने इन्हें 'मोटा राजा' की उपाधि दी थी।
  • राव सूरसिंह (1595–1619 ई.): अकबर ने इन्हें 'सवाई राजा' की उपाधि दी।
  • महाराजा गजसिंह प्रथम (1619–1638 ई.): जहांगीर ने इन्हें 'दलथंभन' (फौज को रोकने वाला) की उपाधि दी तथा 'महाराजा' का पद दिया। अपनी अनारा बेगम (पासवान) के प्रभाव में आकर बड़े पुत्र अमरसिंह राठौड़ को राज्य से वंचित कर छोटे पुत्र जसवंत सिंह को उत्तराधिकारी बनाया। (अमरसिंह को शाहजहाँ ने नागौर की जागीर दी - मतीरे की राड़ 1644 ई.)।

6.2 महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1638 – 1678 ई.)

  • उत्तराधिकार युद्ध (1658 ई.): धरमत के युद्ध (उज्जैन, मध्य प्रदेश) में शाही सेनापति कासिम खां के साथ दारा शिकोह के पक्ष में औरंगजेब के विरुद्ध लड़े। पराजय के बाद जब जोधपुर लौटे तो इनकी हाड़ी रानी जसवंतदे ने मेहरानगढ़ दुर्ग के द्वार खोलने से इनकार कर दिया था ("राजपूत या तो जीतकर लौटते हैं या वीरगति पाते हैं")।
  • साहित्यिक रचनाएँ: जसवंत सिंह स्वयं उच्च कोटि के विद्वान थे। प्रमुख ग्रंथ: भाषा भूषण (अलंकार शास्त्र का प्रसिद्ध ग्रंथ), प्रबोध चंद्रोदय, आनंद विलास, सिद्धांत बोध, अपरोक्ष सिद्धांत सार।
  • दरबारी विद्वान:
    1. मुहणौत नैणसी: जसवंत सिंह के दीवान थे। 'मुहणौत नैणसी री ख्यात' तथा 'मारवाड़ रा परगना री विगत' (इसे 'राजस्थान का गजेटियर' कहा जाता है) की रचना की। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को 'राजपूताने का अबुल फजल' कहा।
    2. दलपति मिश्र: 'जसवंत विलास' की रचना की।
    3. नरहरिदास: 'अवतार चरित्र' ग्रंथ की रचना की।
  • मृत्यु: 28 नवंबर 1678 ई. को अफगानिस्तान के जमरूद (खैबर दर्रा) में देहांत। इनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था: "आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया" (Today the gate of infidelity is broken)।

6.3 वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ एवं 30 वर्षीय मारवाड़ संघर्ष (1679 – 1707 ई.)

जसवंत सिंह की मृत्यु के समय वे निःसंतान थे। बाद में लाहौर में उनकी रानी जसवंतदे ने अजीत सिंह को जन्म दिया। औरंगजेब ने अजीत सिंह को दिल्ली की रूपसिंह राठौड़ की हवेली में नजरबंद कर मारवाड़ पर इंद्रसिंह को शासक घोषित किया और मारवाड़ को खालसा कर दिया।

🌟 वीर दुर्गादास राठौड़ का ऐतिहासिक योगदान
  • जन्म: 13 अगस्त 1638 ई. को सालवा कलां (जोधपुर) में। पिता: आसकरण (जसवंत सिंह के मंत्री), माता: नेतकंवर।
  • गोरा धाय (मारवाड़ की पन्नाधाय): दुर्गादास व गोरा धाय ने अपनी सूझबूझ से शिशु अजीत सिंह को दिल्ली से सकुशल बाहर निकाला। अजीत सिंह को सिरोही के कालिंद्री गांव में पुरोहित जयदेव व मुकनदास खींची के संरक्षण में गुप्त रूप से रखा गया।
  • उपाधियाँ: कर्नल जेम्स टॉड ने इन्हें 'राठौड़ों का यूलीसेस' (Ulysses of Rathores), गौरीशंकर ओझा ने 'मारवाड़ का अणबिंदिया मोती' तथा जनमानस ने 'मारवाड़ का उद्धारक' कहा।
  • देबारी समझौता (1708 ई.): मेवाड़ महाराणा अमरसिंह द्वितीय, जयपुर के सवाई जयसिंह तथा अजीत सिंह के मध्य हुआ। इसके बाद अजीत सिंह जोधपुर के स्वतंत्र शासक बने।
  • अंतिम समय: अजीत सिंह ने कान के कच्चे होने के कारण दुर्गादास को देश निकाला दे दिया। दुर्गादास मेवाड़ (महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने विजयपुर व रामपुरा की जागीर दी) और अंततः उज्जैन चले गए। 22 नवंबर 1718 ई. को उज्जैन में देहांत हुआ। शिप्रा नदी के तट पर दुर्गादास राठौड़ की 8 खंभों की लाल पत्थर की छतरी बनी हुई है।

7. उत्तरवर्ती मारवाड़ शासक एवं ऐतिहासिक घटनाक्रम

🌳 महाराजा अभयसिंह (1724 – 1749 ई.) – खेजड़ली बलिदान (1730 ई.)

खेजड़ली कांड: 28 अगस्त 1730 ई. (भाद्रपद शुक्ल दशमी, वि.सं. 1787) को जोधपुर के खेजड़ली गांव में मेहरानगढ़ दुर्ग के निर्माण हेतु चूने के पकाने के लिए हरे खेजड़ी वृक्षों को काटने का आदेश हाकिम गिरधारी दास ने दिया।
अमृता देवी विश्नोई के नेतृत्व में 363 विश्नोई नर-नारियों (69 महिलाएँ, 294 पुरुष) ने पेड़ों से लिपटकर प्राणों की आहुति दी। इसे 'साका/खड़ाणा' कहते हैं। प्रतिवर्ष यहाँ विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला भरता है।
दरबारी कवि: करणीदान (सूरज प्रकाश) एवं वीरभाण (राजरूपक - अहमदाबाद युद्ध का वर्णन)।

👑 महाराजा विजयसिंह (1752 – 1793 ई.)
  • कविराज श्यामलदास ने इन्हें अपनी पासवान 'गुलाबराय' के अत्यधिक प्रभाव के कारण 'जोधपुर का जहांगीर' तथा गुलाबराय को 'नूरजहाँ' कहा।
  • इन्होंने मारवाड़ में 'विजयशाही सिक्के' चलाए। तुंगा का युद्ध (1787 ई.) में मराठा महादजी सिंधिया को पराजित किया।
🧘 महाराजा मानसिंह (1803 – 1843 ई.) – संन्यासी राजा
  • नाथ संप्रदाय (आयस देवनाथ) के अनुयायी होने के कारण 'संन्यासी राजा' कहलाए। जोधपुर में 'महामंदिर' (नाथ संप्रदाय की प्रधान पीठ) तथा 'मान पुस्तक प्रकाश' पुस्तकालय की स्थापना की।
  • गिंगोली का युद्ध (1807 ई., परबतसर): मेवाड़ की राजकुमारी कृष्णा कुमारी से विवाह को लेकर जयपुर के जगतसिंह द्वितीय से युद्ध हुआ। 6 जनवरी 1818 ई. को अंग्रेजों से सहायक संधि की।

🏛️ 1857 की क्रांति से एकीकरण तक के शासक

महाराजा तख्तसिंह (1843–1873 ई.):

1857 की क्रांति के समय शासक। अंग्रेजों का साथ दिया। बिथोड़ा व चेलावास के युद्ध में क्रांतिकारी ठाकुर कुशालसिंह से इनकी सेना पराजित हुई।

महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय (1873–1895 ई.):

1883 ई. में स्वामी दयानंद सरस्वती जोधपुर आए। इनकी स्मृति में पुत्र सरदार सिंह ने जसवंत थड़ा (राजस्थान का ताजमहल) बनवाया।

महाराजा हनवंत सिंह (1947–1949 ई.):

राजस्थान एकीकरण के समय मारवाड़ के अंतिम शासक। मारवाड़ को पाकिस्तान में विलय करने का असफल प्रयास किया, अंततः भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए।

8. राठौड़ वंश की अन्य प्रमुख शाखाएँ – बीकानेर व किशनगढ़

बीकानेर शाखा (1465 ई.)

बीकानेर का राठौड़ राजवंश

  • राव बीका: राव जोधा के पुत्र। 1465 ई. में करणी माता के आशीर्वाद से जांगल प्रदेश में राठौड़ राज्य तथा 1488 ई. (अक्षय तृतीया) में बीकानेर नगर की स्थापना की।
  • राव लूणकरण (1505–1526 ई.): बिठू सूजा ने 'छंद राव जैतसी रो' में इन्हें 'कलयुग का कर्ण' कहा। लूणकरणसर झील बनवाई।
  • महाराजा रायसिंह (1571–1612 ई.): मुंशी देवीप्रसाद ने इन्हें 'राजपूताने का कर्ण' कहा। इन्होंने बीकानेर में 1589-94 ई. में जूनागढ़ दुर्ग (जमीन का जेवर) का निर्माण प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में करवाया।
  • महाराजा अनूप सिंह (1669–1698 ई.): दक्षिण अभियान में औरंगजेब ने इन्हें 'माही मरातिब' की उपाधि दी। इनके काल को बीकानेर चित्रकला का 'स्वर्ण काल' कहा जाता है। 'अनूप संस्कृत पुस्तकालय' की स्थापना की।
किशनगढ़ शाखा (1609 ई.)

किशनगढ़ का राठौड़ राजवंश

  • संस्थापक (1609 ई.): मोटा राजा उदयसिंह के आठवें पुत्र किशनसिंह ने किशनगढ़ राज्य की स्थापना की।
  • सावंत सिंह / नागरीदास (1748–1764 ई.): वल्लभ संप्रदाय के परम भक्त होकर राजपाट त्यागकर वृंदावन चले गए।
  • बणी-ठणी चित्रकला: सावंत सिंह के काल में चित्रकार निहालचंद ने सावंत सिंह की प्रेयसी 'बणी-ठणी' का विश्वप्रसिद्ध चित्र बनाया, जिसे एरिक डिकिंसन ने 'भारत की मोनालिसा' कहा।
  • रतलाम शाखा (म.प्र.): मारवाड़ के राव महेशदास के पुत्र रतनसिंह राठौड़ (धरमत युद्ध के वीर) ने रतलाम रियासत की नींव रखी।

9. प्रमुख ऐतिहासिक एवं साहित्यिक स्रोत (Literary Sources)

ग्रंथ / ख्यात का नाम रचयिता / लेखक संबंधित विषय / ऐतिहासिक विवरण
मारवाड़ रा परगना री विगत मुहणौत नैणसी राजस्थान का गजेटियर, मारवाड़ की सामाजिक-आर्थिक स्थिति व जनगणना
मुहणौत नैणसी री ख्यात मुहणौत नैणसी राजस्थान की प्रथम व सर्वाधिक प्रामाणिक ख्यात, राठौड़ों की वंशावली
भाषा भूषण महाराजा जसवंत सिंह प्रथम संस्कृत काव्यशास्त्र एवं 212 दोहों में रचित अलंकार ग्रंथ
सूरज प्रकाश कवि करणीदान महाराजा अभयसिंह का जीवन चरित्र एवं गुजरात/अहमदाबाद युद्ध
राजरूपक वीरभाण रतनू अभयसिंह एवं सरबुलंद खां के मध्य अहमदाबाद युद्ध का प्रत्यक्ष विवरण
छंद राव जैतसी रो बिठू सूजा (डिंगल) राव जैतसी द्वारा बाबर के पुत्र कामरान पर विजय का वर्णन
दयालदास री ख्यात सिंढायच दयालदास बीकानेर के राठौड़ों का राव बीका से सरदार सिंह तक का प्रामाणिक इतिहास
अजीत चरित्र / अजीतोदय जगजीवन भट्ट (संस्कृत) महाराजा अजीत सिंह एवं दुर्गादास के मुगलों से 30 वर्षीय संघर्ष का विवरण

10. राठौड़ रियासतों एवं शाखाओं की त्वरित तुलनात्मक तालिका

रियासत / शाखा संस्थापक शासक स्थापना वर्ष राजधानी नगर प्रसिद्ध शासक / ऐतिहासिक पहचान
मारवाड़ (जोधपुर) राव सीहा / राव जोधा 1273 ई. / 1459 ई. मंडोर ➔ जोधपुर मालदेव, चंद्रसेन, जसवंत सिंह I, दुर्गादास
बीकानेर राव बीका 1465 ई. / 1488 ई. बीकानेर (जूनागढ़) राव जैतसी, रायसिंह, अनूप सिंह, गंगा सिंह
किशनगढ़ किशनसिंह 1609 ई. किशनगढ़ सावंत सिंह (नागरीदास), बणी-ठणी चित्रकला
मेड़ता राव दूदा (जोधा के पुत्र) 15वीं शताब्दी मेड़ता (मालकोट) भक्त शिरोमणि मीरां बाई, वीर जयमल मेड़तिया
रतलाम / झाबुआ (म.प्र.) रतनसिंह राठौड़ 1652 ई. रतलाम धरमत युद्ध के बलिदानी अमर नायक

11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Exam Facts for RAS/RPSC/RSSB)

📌 अति-महत्वपूर्ण तथ्य

  • राठौड़ों का आदिपुरुष: राव सीहा (बीठू शिलालेख 1273 ई.)।
  • मंडोर दहेज में प्राप्त: राव चूँडा को इंदा प्रतिहारों द्वारा 1395 ई. में।
  • जोधपुर व मेहरानगढ़: 12 मई 1459 ई. को राव जोधा द्वारा, नींव करणी माता ने रखी।
  • घुड़ला पर्व: राव सातलदेव द्वारा मल्लू खां/घुड़ले खां के वध की स्मृति में (चैत्र कृष्ण अष्टमी)।
  • हशमत वाला राजा: फ़ारसी इतिहासकारों द्वारा राव मालदेव को प्रदत्त उपाधि।
  • गिरी-सुमेल का युद्ध: 5 जनवरी 1544 ई. (जैता-कूंपा vs शेरशाह सूरी)।
  • मारवाड़ का प्रताप: राव चंद्रसेन (प्रताप का अग्रगामी/भूला-बिसरा राजा)।

📝 RPSC में बार-बार पूछे गए प्रश्न

  • मुगलों से प्रथम वैवाहिक संबंध: मोटा राजा उदयसिंह (पुत्री मानीबाई/जगत गुसाईं का विवाह जहांगीर से)।
  • 'आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया': औरंगजेब का कथन महाराजा जसवंत सिंह प्रथम की मृत्यु (1678 ई.) पर।
  • राजपूताने का अबुल फजल: मुंशी देवीप्रसाद ने मुहणौत नैणसी को कहा।
  • राठौड़ों का यूलीसेस: कर्नल जेम्स टॉड ने वीर दुर्गादास राठौड़ को कहा।
  • दुर्गादास की छतरी: शिप्रा नदी के तट पर, उज्जैन (मध्य प्रदेश)।
  • खेजड़ली बलिदान: 1730 ई. भाद्रपद शुक्ल दशमी (महाराजा अभयसिंह के काल में अमृता देवी के नेतृत्व में 363 बलिदान)।
प्रामाणिक इतिहास अभ्यास विगत 15 वर्षों के RPSC/RSMSSB प्रश्न

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

मारवाड़ राठौड़ राजवंश से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

मारवाड़ में राठौड़ वंश का संस्थापक राव सीहा (1273 ई.) को माना जाता है। इन्होंने पाली के निकट खेड (बाड़मेर) को केंद्र बनाकर राठौड़ राज्य की नींव रखी। इनकी मृत्यु का उल्लेख 1273 ई. के बीठू (पाली) शिलालेख में मिलता है।
गिरी-सुमेल (जैतारण, पाली) का युद्ध 5 जनवरी 1544 ई. को शेरशाह सूरी और राव मालदेव के वीर सेनानायकों जैता और कूंपा के मध्य लड़ा गया। जैता-कूंपा के अदम्य शौर्य से प्रभावित होकर शेरशाह ने कहा था- "खुदा का शुक्र है कि फतह हो गई, वरना मैंने एक मुट्ठी बाजरे के लिए पूरे हिंदुस्तान की बादशाहत खो दी होती।"
राव चंद्रसेन ने अकबर के 1570 ई. के नागौर दरबार में अधीनता स्वीकार नहीं की और जीवनपर्यंत जंगलों व पहाड़ों (भाद्राजून, सिवाना, सारण) में रहकर मुगलों के विरुद्ध छापामार संघर्ष जारी रखा। महाराणा प्रताप से पहले छापामार युद्ध पद्धति अपनाने के कारण उन्हें 'प्रताप का अग्रगामी/पथ प्रदर्शक' तथा इतिहास में समुचित ख्याति न मिलने के कारण 'भूला-बिसरा राजा' (Forgotten Hero) कहा जाता है।
वीर दुर्गादास राठौड़ को कर्नल जेम्स टॉड ने 'राठौड़ों का यूलीसेस' (Ulysses of Rathores) तथा 'मारवाड़ का अणबिंदिया मोती' कहा। उन्होंने 30 वर्षों तक संघर्ष कर अजीत सिंह को जोधपुर का शासक बनाया। दुर्गादास राठौड़ की 8 खंभों की छतरी मध्य प्रदेश के उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर स्थित है।
जोधपुर नगर की स्थापना राव जोधा ने 12 मई 1459 ई. को की थी तथा चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग (मयूरध्वजगढ़/गढ़ चिंतामणि) की नींव लोकदेवी श्री करणी माता (रिद्धू बाई) के कर-कमलों से रखवाई थी।

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