घूमर नृत्य:
नृत्यों का सिरमौर, अष्टताल सवाई व सांस्कृतिक गौरव
घूमर (Ghoomar Folk Dance) राजस्थान की लोक कला का हृदय तथा "नृत्यों की आत्मा" है। मूलतः भील जनजाति द्वारा माँ सरस्वती की आराधना हेतु प्रारंभ किया गया यह नृत्य कालांतर में राजपूत राजघरानों की शान बना। 80 से 120 कली के घाघरे का वृत्ताकार 'घूम', स्त्रियों की लयात्मक पद-संचालन की विशेष गति 'सवाई' (अष्टताल), गणगौर पर्व पर समर्पण तथा राजस्थान घूमर अकादमी (1986) के माध्यम से मिली वैश्विक ख्याति इस नृत्य को अद्वितीय बनाती है।
मूल जनजाति
भील जनजाति
पद-संचालन
अष्टताल
मुख्य पर्व
गणगौर
सामंतशाही रजवाड़ी शैली | 80 कली का घेरा | रजवाड़ी गौरव
राजस्थान के प्रमुख लोकनृत्य
पूरा कला एवं संस्कृति हब देखेंघूमर नृत्य: सम्पूर्ण ऐतिहासिक, तकनीकी व सांस्कृतिक विश्लेषण
भील जनजाति उत्पत्ति, राजपूत राजसी परम्परा, अष्टताल (सवाई) गति, लूर व झुमरिया प्रकार, गणगौर महत्व, एवं RPSC/RAS परीक्षाओं हेतु प्रामाणिक तथ्य।
1. परिचय एवं उपनाम (Introduction & Nicknames)
घूमर (Ghoomar) राजस्थान का सर्वप्रमुख एवं सर्वाधिक लोकप्रिय लोक नृत्य है। स्त्रियों द्वारा धीमी गति से वृत्ताकार घेरा (Circle) बनाकर किए जाने वाले इस नृत्य में लहंगे का वृत्ताकार घेरा जो बनता है, उसे स्थानीय भाषा में 'घूम' कहा जाता है, जिससे इसका नाम 'घूमर' पड़ा। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, अपितु भक्ति, मांगलिकता, नारी गरिमा तथा रजवाड़ी स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। वर्ष 1986 में इसे आधिकारिक रूप से 'राजस्थान का राज्य नृत्य' घोषित किया गया।
📌 मूल परिचय बिंदु
- प्रकृति: केवल महिलाओं द्वारा निष्पादित (स्त्री-प्रधान लोक नृत्य)
- शैली: रजवाड़ी / सामंती (Aristocratic & Royal Style)
- दर्जा: राजस्थान का राज्य नृत्य (State Folk Dance)
- भौगोलिक प्रसार: मारवाड़, मेवाड़, जयपुर (समस्त राजस्थान)
- लय व गति: मंथर (धीमी) गति से प्रारंभ होकर द्रुत (तेज) गति में समाप्त
🏷️ प्रसिद्ध उपनाम (Nicknames)
- राजस्थान के नृत्यों का सिरमौर (Crown of Rajasthani Dances)
- राजस्थान के नृत्यों की आत्मा (Soul of Rajasthani Dances)
- राजस्थान का हृदय नृत्य (Heartbeat Dance of Rajasthan)
- सामंतशाही / रजवाड़ी नृत्य (Royal Heritage Dance)
- नृत्यों का हृदय (Heart of Indian Folk Dances)
नामकरण का रहस्य: महिलाओं द्वारा पहने जाने वाले लहंगे/घाघरे की वृत्ताकार 'घूम' (घेरे) के कारण इस नृत्य का नाम 'घूमर' पड़ा।
📌 RPSC परीक्षा दृष्टि: घूमर को "लोक नृत्यों का सिरमौर" तथा "राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान" कहा जाता है। यह प्रश्न RPSC SI एवं 2nd Grade में बार-बार दोहराया गया है।
2. उत्पत्ति एवं ऐतिहासिक विकास (Origin & History)
घूमर नृत्य की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। ऐतिहासिक शोधकर्ताओं एवं समाजशास्त्रियों के अनुसार घूमर का उद्भव मध्य एशिया के 'भ्रंग नृत्य' तथा राजस्थान की भील जनजाति के पारंपरिक धार्मिक कृत्यों से जुड़ा है।
🏹 भील जनजाति एवं माँ सरस्वती आराधना
- जनजातीय उत्पत्ति: प्राचीन काल में भील जनजाति की महिलाएँ देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना एवं प्राकृतिक उत्सवों के दौरान गोल घेरा बनाकर यह नृत्य करती थीं।
- आदिम स्वरूप: इसमें सादगी, प्राकृतिक वाद्य यंत्र तथा सामूहिक भक्ति का भाव मुख्य था।
👑 राजपूत राजघरानों में विलय व रजवाड़ी रूप
- राजपूत संरक्षण: 12वीं-13वीं शताब्दी के आसपास जब राजपूतों (राठौड़, कछवाहा, सिसोदिया आदि) ने भीलों के साथ सामरिक व सांस्कृतिक संबंध स्थापित किए, तब इस नृत्य ने राजप्रासादों में प्रवेश किया।
- मर्यादा व घूंघट: राजघराने की मर्यादा के अनुरूप घूमर में 'घूंघट' (ओढ़नी से मुँह ढकना) तथा आभूषणों व भारी पोशाकों का समावेश हुआ, जिससे यह 'सामंतशाही नृत्य' बन गया।
🔥 RPSC हॉट प्रश्न: घूमर नृत्य की मूल उत्पत्ति किस जनजाति से मानी जाती है? उत्तर: भील जनजाति (Bhil Tribe) से। (RPSC College Lecturer परीक्षा में पूछा गया)।
3. घूमर के विभिन्न रूप / प्रकार (Variations of Ghoomar)
राजस्थान में घूमर नृत्य भौगोलिक, सामाजिक एवं जनजातीय आधार पर तीन प्रमुख रूपों में विभाजित है:
घूमर (Ghoomar)
यह सर्वसामान्य एवं राजसी रूप है, जिसे विवाहित एवं प्रौढ़ महिलाएँ रजवाड़ी वेशभूषा व पूर्ण घूंघट के साथ गणगौर, तीज तथा विवाह उत्सवों पर प्रस्तुत करती हैं।
झुमरिया (Jhumariya)
यह रूप अविवाहित छोटी बालिकाओं/कन्याओं द्वारा किया जाता है। इसमें चंचलता, त्वरित गति तथा कम भारी परिधानों का प्रयोग होता है।
लूर (Loor)
गरासिया जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला घूमर का विशेष जनजातीय रूप। यह मुख्य रूप से सिरोही/आबू क्षेत्र में मेला व विवाह अवसरों पर वर-वधू पक्ष के मध्य प्रस्तुत किया जाता है।
4. नृत्य तकनीक एवं 'अष्टताल/सवाई' (Technique & Step Pattern)
👣 'सवाई' एवं अष्टताल गतियाँ (Ashtataal Pattern)
घूमर नृत्य में पैरों के संचालन की विशेष 8 मात्राओं (Steps) की लयबद्ध गति होती है, जिसे शास्त्रीय भाषा में 'अष्टताल' तथा राजस्थानी लोक भाषा में 'सवाई' (Sawai) कहा जाता है।
- 8 चरण विधान: 1 से 8 की गिनती पर पैर आगे-पीछे तिरछे मोड़ते हुए चक्कर पूरा किया जाता है।
- हाथों की चाल: कलाई व उंगलियों को मोड़ते हुए लयात्मक मुद्राएँ (Inward-Outward hand movements)।
- लय में परिवर्तन: नृत्य धीमी (विलंबित) चाल से शुरू होकर अंत में अत्यधिक तीव्र चक्री (द्रुत लय) में बदल जाता है।
🔄 घूम की चक्राकार गति (Circular Motion)
- वृत्ताकार पदचिह्न: नृत्यांगनाएँ एक बड़ा वृत्त बनाकर घड़ी की दिशा या विपरीत दिशा में गति करती हैं।
- घूंघट संतुलन: चेहरे पर लंबा घूंघट होने के बावजूद बिना टकराए पूर्ण लयबद्धता के साथ चक्र पूरा करना इसकी सर्वोच्च कलात्मकता है।
परीक्षा में पूछा गया प्रश्न: घूमर नृत्य में चरण-संचालन की 8 मात्राओं को क्या कहते हैं? उत्तर: सवाई / अष्टताल (Sawai / Ashtataal)।
'चरखी' (तीव्र घूर्णन) व शेखावाटी चंग-घूमर
- 'चरखी' (Charkhi): घूमर के अंतिम चरण में जब अष्टताल की लय अत्यंत तीव्र (द्रुत) हो जाती है, तो नृत्यांगनाओं के तेज गोल चक्कर काटने को स्थानीय भाषा में 'चरखी' या 'चकरी' कहते हैं।
- शेखावाटी चंग-घूमर: होली के पर्व पर शेखावाटी क्षेत्र में चंग व डफ की ताल पर पुरुषों द्वारा किए जाने वाले प्रसिद्ध गींदड़ नृत्य (Ginder Dance) के साथ घूमर का विशेष सांस्कृतिक समन्वय देखने को मिलता है। RPSC उपयोगी
5. पारंपरिक वेशभूषा एवं आभूषण (Attire & Ornaments)
👗 पारंपरिक परिधान (Traditional Dress)
- 80 से 120 कली का घाघरा: घूमर में अत्यधिक कलीदार (Pleated) घाघरे का प्रयोग होता है, ताकि तेज घूर्णन के समय विशाल वृत्ताकार छतरी ('घूम') निर्मित हो सके।
- कुर्ती-कांचली: ऊपरी वस्त्र के रूप में गोटा-पत्ती या जरी वर्क से सुसज्जित कुर्ती-कांचली।
- बंधेज/लहरिया ओढ़नी: सिर पर पीला, पोमचा, या लहरिया की ओढ़नी, जिससे घूंघट निकाला जाता है।
💍 प्रमुख आभूषण (Traditional Jewels)
- माथे पर: बोरला (Borla), रखड़ी (Rakhdi), शीशफूल।
- गले में: आड़ (Aad - राजपूती कण्ठहार), ठुस्सी, मोगरी।
- हाथों में: हाथीदांत का चूड़ा, बाजूबंद, गोखरू, बँगड़ी।
- पैरों में: पायल, कड़ा, तथा छनछनाती गूँज पैदा करने वाले घूँघरू (Ghungroo)।
6. वाद्य यंत्र एवं प्रसिद्ध घूमर गीत (Instruments & Folk Songs)
🥁 प्रमुख वाद्य यंत्र (Musical Instruments)
- ढोल (Dhol): मुख्य ताल वाद्य जो अष्टताल सवाई गति को नियंत्रित करता है।
- नगाड़ा (Nagada): गूंजदार ताल हेतु प्रयुक्त।
- शहनाई (Shehnai): सुरम्य सुषिड़ वाद्य।
- मंजीरा (Manjira): धातु निर्मित घन वाद्य।
🎤 प्रसिद्ध घूमर लोक गीत (Famous Songs)
- "म्हारी घूमर छे नखराली ए मां... घूमर रमवा म्हें जास्यां" — घूमर का सबसे कालजयी गीत।
- "चिरमी" — नववधू द्वारा पीहर की याद में।
- "गोरबंद" — शेखावाटी/मरुस्थली क्षेत्र में घूमर के साथ।
- "गणगौर गीत" — "खेलण दो गणगौर भंवर म्हाने खेलण दो..."
7. धार्मिक व सांस्कृतिक अवसर (Festivals & Occasions)
- गणगौर (Gangaur Festival): चैत्र शुक्ल तृतीया को माँ गौरी (पार्वती) के पूजन अवसर पर घूमर नृत्य करने की सर्वप्रमुख प्रथा है। गणगौर के बिना घूमर अधूरा माना जाता है।
- छोटी तीज व बड़ी तीज (Teej Festival): श्रावण व भाद्रपद मास के तीज उत्सवों पर मारवाड़ व जयपुर में विशाल घूमर समारोह आयोजित होते हैं।
- नववधू का गृह-प्रवेश (Bride Welcome): विवाह के बाद जब नववधू अपने ससुराल पहुँचती है, तब उसका स्वागत 'घूमर नृत्य' करवाकर किया जाता है।
- संतान जन्मोत्सव व मांगलिक कार्य: जच्चा-पूजन, कुआं पूजन आदि शुभ अवसरों पर।
8. घूमर संरक्षण, अकादमी एवं पद्म पुरस्कार (Preservation & Recognition)
🏛️ राजस्थान घूमर अकादमी (1986)
- संस्थापक: संतरामपुर (किशनगढ़) की राजमाता महारानी गोवर्धन कुमारी (Rajmata Goverdhan Kumari)।
- स्थापना वर्ष: 1986 ई.
- उद्देश्य: घूमर की पारंपरिक शुद्धता (अष्टताल/सवाई) को लुप्त होने से बचाना तथा बालिकाओं को इसका प्रामाणिक प्रशिक्षण देना।
🏅 पद्म श्री पुरस्कार व अंतर्राष्ट्रीय ख्याति
- पद्म श्री (2007): महाराणी गोवर्धन कुमारी को घूमर नृत्य के संरक्षण व अंतर्राष्ट्रीय संवर्धन हेतु कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।
- विश्व के शीर्ष लोक नृत्यों में स्थान: अंतर्राष्ट्रीय ट्रैवल पत्रिकाओं एवं सांस्कृतिक सर्वेक्षणों में घूमर को विश्व के सर्वश्रेष्ठ 10 लोक नृत्यों में चौथा स्थान प्राप्त हुआ है।
गरासिया 'लूर' गोत्र व लोक शोध
'लूर' की पृष्ठभूमि: 'लूर' घूमर वास्तव में सिरोही-आबू क्षेत्र की गरासिया जनजाति के 'लूर गोत्र' की महिलाओं द्वारा रिश्ते की माँग व विवाह अवसरों पर प्रस्तुत किया जाने वाला संवाद-प्रधान नृत्य है। लोक संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. महेंद्र भानावत ने घूमर के इस रूप पर गहन शोध किया है।
परीक्षार्थी ध्यान दें (Common Confusion): यूनेस्को व घूमर
कई छात्र भ्रमित होते हैं कि घूमर यूनेस्को सूची में है या नहीं। ध्यान रहे: राजस्थान का केवल कालबेलिया नृत्य वर्ष 2010 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल है। घूमर राजस्थान का आधिकारिक राज्य नृत्य (1986) है, यूनेस्को धरोहर नहीं।
9. राजस्थान के प्रमुख लोकनृत्यों का तुलनात्मक चार्ट
| नृत्य का नाम | मुख्य क्षेत्र / केंद्र | सम्बद्ध वर्ग / प्रतिभागी | मुख्य वाद्ययंत्र | मुख्य विशेषता / तकनीक |
|---|---|---|---|---|
| घूमर नृत्य (वर्तमान अध्याय) | समस्त राजस्थान (रजवाड़ी) | केवल स्त्रियाँ (महिला-प्रधान) | ढोल, नगाड़ा, शहनाई | 80 कली का घाघरा, 'सवाई' (अष्टताल), गणगौर पर्व |
| कालबेलिया नृत्य (Kalbelia) | मारवाड़ / अजमेर / पाली | कालबेलिया (सपेरा) स्त्रियाँ | पूँगी, खंजरी, डफ | UNESCO 2010 अमूर्त धरोहर, गुलाबो सपेरा |
| अग्नि नृत्य (Agni Nritya) | कतरियासर (बीकानेर) | जसनाथी सम्प्रदाय (सिद्ध पुरुष) | नगाड़ा, मंजीरा, थाली | जलते अंगारे, "फतेह-फतेह" घोष, मतीरा फोड़ना |
| गींदड़ नृत्य (Ginder) | शेखावाटी (सीकर, चूरू, झुंझुनूं) | केवल पुरुष (महिला पात्र: गणगौर/मेहरी) | नगाड़ा, चंग, डफ | होली पर्व पर विशुद्ध पुरुष नृत्य, डंडा रोपण से प्रारंभ |
| कच्ची घोड़ी (Kacchi Ghodi) | शेखावाटी (व्यावसायिक) | सरगरा, नायक, ढोली (पुरुष) | बाँकिया, झाँझ, ढोल | काठ की घोड़ी, फूल खिलने व बंद होने का आभास |
| तेरहताली (Terah Tali) | पादरला (पाली) / रामदेवरा | कामड़ जाति की महिलाएँ | 13 मंजीरे, तानपूरा/चौतारा | बैठकर प्रस्तुत, मुँह में तलवार, रामदेव जी का मेला |
10. परीक्षा-उपयोगी त्वरित तथ्य (High-Yield Facts)
⚡ स्मरण रखने योग्य तथ्य (Part 1)
- दर्जा: राजस्थान का 'राज्य नृत्य' (State Folk Dance of Rajasthan)।
- उपनाम: नृत्यों का सिरमौर, नृत्यों की आत्मा, सामंतशाही नृत्य।
- मूल उत्पत्ति: भील जनजाति की सरस्वती पूजा से।
- अष्टताल सवाई: 8 मात्राओं वाले पद-संचालन का विशेष विधान।
⚡ स्मरण रखने योग्य तथ्य (Part 2)
- लूर नृत्य: गरासिया जनजाति की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला घूमर का रूप।
- झुमरिया: अविवाहित कन्याओं/बालिकाओं का घूमर।
- गणगौर उत्सव: घूमर का मुख्य धार्मिक अवसर (चैत्र सुदी ३)।
- घूमर अकादमी (1986): संस्थापिका - महारानी गोवर्धन कुमारी (पद्म श्री 2007)।
11. विगत परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Model & RPSC Past PYQs)
प्रश्न 1: 'राजस्थान के लोक नृत्यों की आत्मा' किस नृत्य को कहा जाता है? [RPSC SI Exam / Patwari]
उत्तर: घूमर नृत्य (Ghoomar Folk Dance) को।
प्रश्न 2: घूमर नृत्य में पद-संचालन की 8 मात्राओं की विशेष लय को क्या कहा जाता है? [RAS Prelims]
उत्तर: सवाई (अष्टताल / Sawai) कहा जाता है।
प्रश्न 3: गरासिया जनजाति द्वारा किया जाने वाला घूमर का विशेष रूप कौन सा है? [RPSC Teacher Grade-II]
उत्तर: लूर नृत्य (Loor Folk Dance)।
प्रश्न 4: 'राजस्थान घूमर अकादमी' की स्थापना कब और किसके प्रयास से हुई थी?
उत्तर: वर्ष 1986 में महारानी गोवर्धन कुमारी के प्रयासों से।
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घूमर नृत्य क्यों महत्वपूर्ण है?
घूमर नृत्य राजस्थान की कला व संस्कृति पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग है। RPSC (RAS, SI, Teacher Grade I/II/III, Reet, Patwari) तथा SSC में इससे जुड़े प्रश्न लगभग हर वर्ष पूछे जाते हैं।
- 1 राज्य नृत्य का दर्जा: 1986 से स्वीकृत राजकीय पहचान।
- 2 अष्टताल (सवाई): शास्त्रीय एवं लोक लय का अद्भुत समागम।
- 3 जनजातीय एवं रजवाड़ी संगम: भील उत्पत्ति से लेकर राजपूत राजसी परम्परा तक।
- 4 पद्म श्री सम्मान: महारानी गोवर्धन कुमारी का घूमर संवर्धन।
राज्य नृत्य
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लूर व झुमरिया
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