चित्तौड़गढ़ दुर्ग (Chittorgarh Fort) :
इतिहास, वास्तुकला, तीन साके, स्तम्भ व वीरगाथा
चित्तौड़गढ़ दुर्ग (Chittorgarh Fort) राजस्थान का सबसे बड़ा आवासीय एवं दूसरा प्राचीनतम दुर्ग है। मेसा के पठार पर स्थित यह दुर्ग महाराणा कुंभा के निर्माण कार्यों, तीन ऐतिहासिक साके (1303, 1535, 1568), विजय स्तम्भ (122 फीट, 9 मंजिला), जैन कीर्ति स्तम्भ (75 फीट, 7 मंजिला), 7 प्रवेश द्वार, पद्मिनी महल एवं UNESCO विश्व धरोहर (2013) के लिए सम्पूर्ण भारत में विख्यात है।
क्षेत्रफल
700 एकड़
ऊँचाई
609 मी.
साके
3 साके
मेसा का पठार | 8 किमी लंबाई × 2 किमी चौड़ाई | 84 जलाशय
राजस्थान के प्रमुख दुर्ग
पूरा कला एवं संस्कृति हब देखेंचित्तौड़गढ़ दुर्ग: सम्पूर्ण ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विश्लेषण
मेसा का पठार, चित्रांगद मौर्य, बप्पा रावल, 3 साके, 7 प्रवेश द्वार, विजय स्तम्भ, जैन कीर्ति स्तम्भ, पद्मिनी महल, मंदिर एवं RAS/RPSC परीक्षा उपयोगी तथ्य।
1. परिचय (Introduction)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग (Chittorgarh Fort) राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में स्थित है। यह बेड़च एवं गंभीरी नदियों के संगम के समीप मेसा के पठार (609 मीटर ऊँचाई) पर बना है। यह दुर्ग राजस्थान का सबसे बड़ा एवं दूसरा प्राचीनतम दुर्ग है।
📌 प्रमुख तथ्य
- स्थान: चित्तौड़गढ़ जिला, राजस्थान
- निर्माण: चित्रांगद मौर्य (7वीं शताब्दी) — पौराणिक मान्यता
- जीर्णोद्धार: महाराणा कुंभा (15वीं शताब्दी)
- क्षेत्रफल: 700 एकड़ (305 हेक्टेयर)
- लंबाई-चौड़ाई: 8 किमी × 2 किमी
- ऊँचाई: 609 मीटर (मेसा का पठार)
- UNESCO: 21 जून 2013 को विश्व धरोहर सूची में शामिल
🏷️ उपनाम (Nicknames)
- राजस्थान का गौरव — Pride of Rajasthan
- दुर्गों का सिरमौर — "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया"
- मालवा का प्रवेश द्वार — Gateway to Malwa
- दक्षिण राजपूताने का प्रवेश द्वार
- चित्रकूटगढ़ / चित्रकोट — Chitrakut
- खिज्राबाद — अलाउद्दीन खिलजी द्वारा रखा गया नाम
प्रसिद्ध उक्ति: "गढ़ तो चित्तौड़गढ़, बाकी सब गढ़ैया" — चित्तौड़गढ़ को दुर्गों का सिरमौर कहा जाता है।
📌 RPSC परीक्षा दृष्टि: चित्तौड़गढ़ राजस्थान का सबसे बड़ा (क्षेत्रफल की दृष्टि से) दुर्ग है। भारत में सबसे ऊँचा दुर्ग महाराष्ट्र में है, द्वितीय स्थान पर मध्यप्रदेश है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं कालक्रम (History & Chronology)
⏳ कालक्रम (Chronology)
- 7वीं शताब्दी: चित्रांगद मौर्य द्वारा निर्माण (वीर विनोद के अनुसार)।
- 713 ई.: मानमोरी शिलालेख — मौर्य शासकों का प्रमाण (कर्नल टॉड द्वारा समुद्र में फेंका गया)।
- 734 ई.: बप्पा रावल ने मौर्यों से दुर्ग जीता (गुहिल वंश की नींव)।
- 1303 ई.: अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण — प्रथम साका (पद्मिनी जौहर)।
- 1433–1468 ई.: महाराणा कुंभा द्वारा जीर्णोद्धार एवं भव्य निर्माण।
- 1440–1448 ई.: विजय स्तम्भ का निर्माण (8 वर्ष)।
- 1535 ई.: बहादुर शाह (गुजरात) का आक्रमण — द्वितीय साका (कर्मावती जौहर)।
- 1567–1568 ई.: अकबर का आक्रमण — तृतीय साका (फूलकँवर जौहर)।
- 2013 ई.: UNESCO विश्व धरोहर सूची में शामिल।
👑 प्रमुख शासक
- चित्रांगद मौर्य — मूल निर्माता (मौर्य वंश)।
- मानमोरी — अंतिम मौर्य शासक (713 ई. शिलालेख)।
- बप्पा रावल — गुहिल वंश के संस्थापक जिन्होंने दुर्ग जीता।
- राणा रतनसिंह — प्रथम साका (1303) के समय शासक।
- महाराणा कुंभा — आधुनिक निर्माता, जीर्णोद्धारकर्ता एवं विजेता।
- राणा सांगा — खानवा युद्ध के महानायक।
- महाराणा विक्रमादित्य — द्वितीय साका (1535) के समय शासक।
- महाराणा उदयसिंह — तृतीय साका (1568) के समय शासक।
📌 ऐतिहासिक संदर्भ: महाराणा कुंभा ने चित्तौड़गढ़ के अतिरिक्त मेवाड़ की सुरक्षा हेतु विश्वविख्यात कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण भी करवाया था। गुहिल एवं सिसोदिया शासकों के सम्पूर्ण कालक्रम के लिए पढ़ें — मेवाड़ राजवंश का प्रामाणिक इतिहास ।
3. वास्तुकला एवं आयाम (Architecture & Features)
🏗️ स्थापत्य विशेषताएँ
- आकृति: व्हेल मछली (Fish-shaped) के समान।
- पठार: मेसा का पठार (609 मीटर ऊँचाई)।
- परकोटा: सुदृढ़, अभेद्य एवं चौड़ी प्राचीर।
- प्रवेश द्वार: कुल 7 प्रमुख द्वार (Pols)।
- क्षेत्रफल: 700 एकड़ (305 हेक्टेयर)।
- कृषि: भारत का एकमात्र दुर्ग जहाँ भीतर कृषि की जाती है।
- श्रेणी: धान्वन (रेगिस्तानी) श्रेणी को छोड़कर सभी श्रेणियों (गिरि, एरण, पारिख, पारिध) में आता है।
- जल स्त्रोत: प्राचीन काल में 84 जल स्त्रोत थे (वर्तमान में 22–40 क्रियाशील)।
📐 दुर्ग के आयाम
- लंबाई: 8 किमी
- चौड़ाई: 2 किमी
- क्षेत्रफल: 305 हेक्टेयर
- ऊँचाई: 609 मीटर (समुद्र तल से)
- प्राचीर की ऊँचाई: 30–40 फीट
- प्राचीर की चौड़ाई: 15–20 फीट
- विशेष: राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट (आवासीय दुर्ग)।
4. सात प्रवेश द्वार (Seven Gates – Pols)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग में प्रवेश हेतु सर्पिलाकार मार्ग पर 7 प्रमुख द्वार (Pols) हैं। इन सभी द्वारों का वर्तमान सुदृढ़ीकरण महाराणा कुंभा ने करवाया था:
पाडनपोल
प्रथम प्रवेश द्वार — देवलिया के रावत बाघ सिंह का स्मारक (1535 ई. के द्वितीय साके में वीरगति)।
भैरव पोल
द्वितीय प्रवेश द्वार — देसूरी के भैरोदास सोलंकी के नाम पर (1535 ई. में वीरगति)।
हनुमान पोल
तृतीय प्रवेश द्वार — भैरवपोल व हनुमानपोल के मध्य जयमल व कल्ला राठौड़ की छतरियाँ हैं।
गणेश पोल
चतुर्थ प्रवेश द्वार — भगवान श्री गणेश को समर्पित।
जोडला / लोकन पोल
पंचम प्रवेश द्वार — इसे लोहला पोल भी कहा जाता है।
लक्ष्मण पोल
षष्ठ प्रवेश द्वार — लक्ष्मण जी को समर्पित।
राम पोल
मुख्य एवं अंतिम प्रवेश द्वार — इसके सामने पत्ता सिसोदिया का स्मारक है (1568 में वीरगति)।
📌 अतिरिक्त: सूरज पोल दुर्ग के पूर्वी दिशा में स्थित है। त्रिपोलिया द्वार दुर्ग के आंतरिक भाग में स्थित है।
5. दुर्ग के प्रमुख महल एवं हवेलियाँ (Palaces & Havelis)
🏰 प्रमुख महल
- कुंभा महल — महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित, यहीं उदयसिंह का जन्म हुआ। पन्नाधाय द्वारा उदयसिंह की रक्षा एवं चंदन के बलिदान की ऐतिहासिक घटना यहीं हुई।
- पद्मिनी महल — दुर्ग का सबसे बड़ा आकर्षण, पद्मिनी तालाब के उत्तरी तट पर स्थित, 3 मंजिला महल, बीच में जलमहल (गज़ेबो) भी है।
- गोरा-बादल महल — पद्मिनी महल के दक्षिण-पूर्व में स्थित दो गुम्बदाकार इमारतें।
- फतेह प्रकाश महल — महाराणा फतेहसिंह द्वारा निर्मित, वर्तमान में राजकीय संग्रहालय (Museum) संचालित।
🏠 अन्य महल एवं हवेलियाँ
- कंवरपदा के महल — सांगा ने मीरा के लिए बनवाये।
- नौ कोठा मकान / नौलखा भंडार — बनवीर द्वारा निर्मित अधूरा लघुदुर्ग, जिसे "बनवीर की दीवार" भी कहते हैं।
- भामाशाह हवेली — तोपखाने के पास, दानवीर भामाशाह का निवास।
- जयमल-पत्ता की हवेलियाँ — दुर्ग के भीतर स्थित।
- हिंगलू आहाड़ा के महल — हिंगलू डूँगरपुर के सरदार के महल।
- श्रृंगार चंदरी (श्रृंगार चौरी) — निर्माण: कुंभा के कोषाध्यक्ष भंडारी वेल्का (1448–49 ई.), मूलतः शांतिनाथ जैन मंदिर, यहीं कुंभा की पुत्री रमाबाई (वागीश्वरी) का विवाह हुआ था। RPSC हॉट
6. दुर्ग के प्रमुख मंदिर (Temples)
🛕 प्रमुख मंदिर
- कालिका माता मंदिर — मूलतः सूर्य मंदिर (8वीं-9वीं सदी), प्रतिहारकालीन महामारू शैली।
- तुलजा भवानी मंदिर — दासीपुत्र बनवीर ने अपने तुलादान के धन से बनवाया (छत्रपति शिवाजी की कुलदेवी)।
- समिधेश्वर मंदिर / मोकलजी का मंदिर — परमार राजा भोज (1011–1055 ई.) द्वारा 'त्रिभुवन नारायण मंदिर' नाम से निर्मित, महाराणा मोकल (1428 ई.) द्वारा जीर्णोद्धार, शिव की त्रिमुखी मूर्ति।
- कुंभ श्याम मंदिर — मूलतः शिव मंदिर, बाद में वैष्णव मंदिर, महाराणा कुंभा (1459 ई.) द्वारा जीर्णोद्धार, विष्णु के वराह अवतार की मूर्ति स्थापित।
- मीरा बाई मंदिर — कुंभ श्याम मंदिर परिसर में, सामने संत रैदास की 4 खम्भों की छतरी स्थित है।
🕉️ अन्य मंदिर
- सतबीस देवरी — 11वीं शताब्दी, 27 देवरियाँ (श्वेतांबर जैन मंदिर)।
- नीलकंठ महादेव मंदिर — महाभारत काल, भीम द्वारा स्थापित मान्यता।
- बाण माता मंदिर — गुहिल/सिसोदिया वंश की कुलदेवी।
- अन्नपूर्णा माता मंदिर — महाराणा हम्मीर द्वारा निर्मित।
- कुक्कड़ेश्वर महादेव मंदिर — कुकड़ेश्वर कुण्ड के पास।
7. विजय स्तम्भ (Vijay Stambh / विष्णु ध्वज)
विजय स्तम्भ (जय स्तम्भ) चित्तौड़गढ़ दुर्ग का सर्वाधिक प्रमुख स्मारक है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने सारंगपुर विजय (1437 ई.) के उपलक्ष्य में करवाया था, जिसमें उन्होंने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम को परास्त किया था।
🏛️ स्तम्भ की विशेषताएँ
- निर्माण काल: 1440–1448 ई. (8 वर्ष में पूर्ण)।
- ऊँचाई: 122 फीट (चौड़ाई 30 फीट)।
- मंजिलें: 9 मंजिला (157 सीढ़ियाँ)।
- वास्तुकार: जैता, नाथा, पोमा, पूंजा।
- तीसरी मंजिल: अरबी भाषा में 9 बार "अल्लाह" लिखा है।
- 8वीं मंजिल: कोई मूर्ति नहीं है। (बिजली गिरने के बाद महाराणा स्वरूपसिंह ने पुनर्निर्माण करवाया)।
📜 प्रशस्ति एवं प्रमुख उपनाम
- कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति: 1460 ई., कवि अत्रि एवं उनके पुत्र महेश द्वारा रचित।
- "भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश" — डॉ. गर्ट्ज।
- "हिंदू देवी-देवताओं का अजायबघर" — डॉ. गोपीनाथ शर्मा।
- "रोम के टार्जन टॉवर से तुलना" — फर्ग्यूसन।
- कर्नल टॉड: "कुतुबमीनार भले ही ऊंची हो, पर विजय स्तम्भ की कारीगरी श्रेष्ठतर है।"
- प्रतीक चिह्न: राजस्थान पुलिस, माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (RBSE), अभिनव भारत।
प्रथम डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 को भारत सरकार द्वारा विजय स्तम्भ पर 1 रुपये का डाक टिकट जारी किया गया (राजस्थान की प्रथम इमारत जिस पर डाक टिकट जारी हुआ)।
8. जैन कीर्ति स्तम्भ (Jain Keerti Stambh)
जैन कीर्ति स्तम्भ विजय स्तम्भ से पूर्णतः भिन्न है। इसका निर्माण 12वीं-13वीं शताब्दी (1301 ई.) में दिगंबर जैन संप्रदाय के जीजा शाह बघेरवाल (बधेरवाल वीना एवं पुण्य सिंह) द्वारा करवाया गया था।
🏛️ स्तम्भ की विशेषताएँ
- ऊँचाई: 75 फीट
- मंजिलें: 7 मंजिला
- समर्पित: जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) को।
- मूर्ति: चारों दिशाओं में आदिनाथ जी की 5 फीट ऊंची दिगंबर मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।
📌 RPSC महत्वपूर्ण विभेद
- यह स्तम्भ जैन धर्म की समृद्धि एवं धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक है।
- विजय स्तम्भ = 9 मंजिल (कुंभा, विष्णु)।
- जैन कीर्ति स्तम्भ = 7 मंजिल (जीजा शाह, आदिनाथ)।
9. विजय स्तम्भ बनाम जैन कीर्ति स्तम्भ (Pillar Comparison)
विजय स्तम्भ (Vijay Stambh)
- निर्माता: महाराणा कुंभा (1440-48 ई.)
- ऊँचाई व मंजिल: 122 फीट, 9 मंजिला (157 सीढ़ियाँ)
- समर्पित: भगवान विष्णु (विष्णुध्वज)
- उद्देश्य: मालवा (सारंगपुर) विजय स्मारक
- प्रशस्तिकार: कवि अत्रि व पुत्र महेश
जैन कीर्ति स्तम्भ (Jain Keerti Stambh)
- निर्माता: जीजा शाह बघेरवाल (1301 ई.)
- ऊँचाई व मंजिल: 75 फीट, 7 मंजिला
- समर्पित: भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव)
- उद्देश्य: जैन धर्म कीर्ति प्रसार
- शैली: सोलंकी/चालुक्य जैन स्थापत्य
10. चित्तौड़गढ़ के तीन ऐतिहासिक साके (Three Sakas)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने तीन साकों (केसरिया + जौहर) के लिए विश्व इतिहास में अद्वितीय है:
प्रथम साका — 1303 ई.
26 अगस्त 1303आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी
शासक: रावल रतनसिंह
केसरिया: सेनापति गोरा व बादल
जौहर: रानी पद्मिनी (1600 वीरांगनाओं संग)
नया नाम: खिज्राबाद (खिज्र खां को सौंपा)
स्रोत: अमीर खुसरो कृत 'खजाइन-उल-फुतुह'
द्वितीय साका — 1535 ई.
8 मार्च 1535आक्रमणकारी: सुल्तान बहादुरशाह (गुजरात)
शासक: महाराणा विक्रमादित्य (अल्पवयस्क)
केसरिया: देवलिया के रावत बाघसिंह
जौहर: रानी कर्मावती (13000 वीरांगनाओं संग)
ऐतिहासिक संदर्भ: कर्मावती द्वारा मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजना
तृतीय साका — 1568 ई.
25 फरवरी 1568आक्रमणकारी: मुगल बादशाह अकबर
शासक: महाराणा उदयसिंह (गोगुंदा प्रस्थान)
केसरिया: जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया, कल्ला राठौड़
जौहर: रानी फूलकँवर (पत्ता की रानी)
अकबर का कलंक: दुर्ग विजय उपरांत 30,000 निर्दोषों का कत्लेआम
कल्ला राठौड़: चार हाथों वाले लोकदेवता के रूप में ख्याति
11. तीनों साकों की तुलनात्मक तालिका (Quick Revision Table)
| साका | वर्ष | मेवाड़ शासक | आक्रमणकारी | केसरिया नेतृत्व | जौहर नेतृत्व |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रथम साका | 1303 ई. | रावल रतनसिंह | अलाउद्दीन खिलजी | गोरा एवं बादल | रानी पद्मिनी |
| द्वितीय साका | 1535 ई. | महाराणा विक्रमादित्य | बहादुरशाह (गुजरात) | रावत बाघसिंह (देवलिया) | रानी कर्मावती |
| तृतीय साका | 1568 ई. | महाराणा उदयसिंह | मुगल बादशाह अकबर | जयमल राठौड़ व पत्ता सिसोदिया | रानी फूलकँवर |
12. दुर्ग के प्रमुख जलाशय (Water Bodies)
💧 कुण्ड एवं बावड़ियाँ
- गोमुख कुण्ड: समिधेश्वर मंदिर के समीप, प्राकृतिक चट्टान से निरंतर जलधारा बहती है।
- भीमलत कुण्ड: महाभारतकालीन किंवदंती, भीम के पैर की ठोकर से निर्मित माना जाता है।
- कुकड़ेश्वर कुण्ड: कुकड़ेश्वर महादेव मंदिर के समीप।
- सूर्य कुण्ड: कालिका माता मंदिर के समीप।
🏊 प्रमुख तालाब
- चित्रांग मोरी तालाब: चित्रांगद मौर्य द्वारा निर्मित ऐतिहासिक तालाब।
- पद्मिनी तालाब: पद्मिनी महल के मध्य स्थित।
- कुंभ सागर तालाब: महाराणा कुंभा द्वारा निर्मित।
- रत्नेश्वर तालाब: दुर्ग के उत्तरी भाग में।
13. अन्य महत्वपूर्ण स्थल एवं मानमोरी शिलालेख
🏛️ प्रमुख स्थल
- मोहर मगरी: 1567 ई. में अकबर ने सैनिकों को प्रति तगारी 1 सोने की मोहर देकर चित्तौड़ी बुर्ज पर तोप चढ़ाने हेतु यह कृत्रिम टीला बनवाया था।
- महासती स्थल: जौहर स्थल, जहाँ वीरांगनाओं ने अग्निकुंड में आत्मबलिदान दिया।
- चित्तौड़ी बुर्ज: दुर्ग का दक्षिणतम रक्षात्मक मोर्चा।
- जौहर मेला: प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी को दुर्ग में भव्य जौहर मेले का आयोजन होता है।
📜 मानमोरी शिलालेख (713 ई.)
- यह शिलालेख चित्तौड़गढ़ में मौर्य राजा मानमोरी और उनके पूर्वजों (महेश्वर, भीम, भोज, मान) का प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य था।
- कर्नल जेम्स टॉड जब इसे जहाज से इंग्लैंड ले जा रहे थे, तो जहाज का संतुलन बिगड़ने के कारण इसे समुद्र में फेंक दिया गया।
14. UNESCO विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage)
21 जून 2013 को कंबोडिया की राजधानी नोम पेन्ह (Phnom Penh) में आयोजित 37वीं विश्व धरोहर समिति की बैठक में चित्तौड़गढ़ दुर्ग सहित राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्गों (Hill Forts of Rajasthan) को UNESCO विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया:
राजस्थान के 6 विश्व धरोहर पर्वतीय दुर्ग (ट्रिक: "चीकू गाजर आम") :
15. परीक्षा-उपयोगी त्वरित तथ्य (High-Yield Exam Facts)
⚡ स्मरण रखने योग्य तथ्य (Part 1)
- स्थान व पठार: चित्तौड़गढ़ जिला, मेसा का पठार (609 मी.)।
- निर्माता: चित्रांगद मौर्य (मूल) व महाराणा कुंभा (आधुनिक)।
- क्षेत्रफल: 700 एकड़ (राजस्थान का सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट)।
- प्रवेश द्वार: 7 पोल (पाडन, भैरव, हनुमान, गणेश, जोडला, लक्ष्मण, राम)।
- विजय स्तम्भ: 122 फीट, 9 मंजिल, 157 सीढ़ियाँ, विष्णु को समर्पित।
⚡ स्मरण रखने योग्य तथ्य (Part 2)
- जैन कीर्ति स्तम्भ: 75 फीट, 7 मंजिल, भगवान आदिनाथ को समर्पित।
- तीन साके: 1303 (पद्मिनी), 1535 (कर्मावती), 1568 (फूलकँवर)।
- डाक टिकट: 15 अगस्त 1949 (1 रु.) विजय स्तम्भ पर।
- श्रृंगार चौरी: भंडारी वेल्का (1448-49), कुंभा पुत्री रमाबाई का विवाह।
- चार हाथों वाले देवता: वीर कल्लाजी राठौड़ (1568 साका)।
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चित्तौड़गढ़ दुर्ग क्यों अति-महत्वपूर्ण है?
चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान के इतिहास, राजपूत वीरता, स्थापत्य कला और मध्यकालीन साकों के अध्ययन का केंद्रबिंदु है। RPSC (RAS, SI, Teacher Grade 1/2/3) एवं RSMSSB परीक्षाओं में इस दुर्ग से संबंधित प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं।
- 1 राजस्थान का सबसे बड़ा दुर्ग: क्षेत्रफल (700 एकड़) एवं सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट।
- 2 तीन ऐतिहासिक साके: 1303 (खिलजी), 1535 (बहादुरशाह), 1568 (अकबर) — वीरता व बलिदान का प्रतीक।
- 3 विजय स्तम्भ: 122 फीट, 9 मंजिला — भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश।
- 4 जैन कीर्ति स्तम्भ: 1301 ई., 75 फीट, 7 मंजिल — भगवान आदिनाथ को समर्पित।
- 5 UNESCO विश्व धरोहर: 2013 में राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्गों में सर्वोच्च स्थान।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
चित्तौड़गढ़ दुर्ग से संबंधित परीक्षोपयोगी प्रश्न एवं प्रामाणिक उत्तर।
द्वितीय साका (1535 ई.): रानी कर्मावती एवं विवाहर बाई
तृतीय साका (1568 ई.): रानी फूलकँवर (पत्ता सिसोदिया की रानी)
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