राजस्थान का परमार राजवंश:
उत्पत्ति, प्रमुख शाखाएँ, धारावर्ष, राजा भोज व भूमिज शैली
परमार राजवंश (Parmar rajvansh) राजस्थान एवं मालवा के स्थापत्य, शौर्य व साहित्य का आधारस्तंभ रहा है। आबू के परमार (चन्द्रावती), वागड़ के परमार (अर्थूणा), किराडू व जालौर शाखा, वीर धारावर्ष परमार, कविराज राजा भोज, भूमिज स्थापत्य शैली तथा ऐतिहासिक अभिलेखों व पतन का RPSC/RAS परीक्षा-केंद्रित संपूर्ण अध्ययन।
शाब्दिक अर्थ
शत्रु संहारक
मुख्य केंद्र
आबू / धारा
मूल राजधानी: चन्द्रावती (सिरोही) | धारा नगरी (मालवा)
परमार राजवंश की प्रमुख शाखाएँ व विषय
सभी राजवंश देखेंपरमार राजवंश: इतिहास, स्थापत्य व शौर्यगाथा
उत्पत्ति के सिद्धांत, आबू, वागड़, किराडू व जालौर शाखाएँ, धारावर्ष, राजा भोज, भूमिज शैली, अभिलेख व पतन का प्रामाणिक विवरण।
1. उत्पत्ति के सिद्धांत एवं शाब्दिक अर्थ (Origin Theories)
'परमार' शब्द का संस्कृत में अर्थ 'परम-अरि' अर्थात 'शत्रु को मारने वाला' (Killer of Enemies) होता है। परमारों का मूल निवास स्थान मालवा एवं राजस्थान का आबू क्षेत्र रहा है।
अग्निकुंड का सिद्धांत (Agnikunda Origin)
महर्षि वशिष्ठ द्वारा आबू पर्वत पर किए गए यज्ञ के अग्निकुंड से परमारों की उत्पत्ति मानी गई है। जब दैत्यों ने यज्ञ को दूषित किया तो वशिष्ठ मुनि ने मंत्र पढ़कर अग्निकुंड से एक वीर पुरुष उत्पन्न किया, जिसका नाम 'परमार' पड़ा।
समर्थक: चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो), मुहणौत नैणसी, सूर्यमल्ल मीषण तथा नवसाहसांकचरित (पद्मगुप्त)।
राष्ट्रकूट / प्रतिहारों से संबंध
अनेक इतिहासकारों के अनुसार परमार प्रारंभ में राष्ट्रकूटों तथा गुर्जर-प्रतिहारों के सामंत थे। राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय उपेन्द्र (कृष्णराज) ने 9वीं शताब्दी के प्रारंभ में मालवा में स्वतंत्र परमार राज्य की नींव रखी।
वशिष्ठ गोत्रीय ब्राह्मण मत
पिङ्गल सूत्र वृत्ति, हरसोल ताम्रपत्र (949 ई.) एवं उदयपुर प्रशस्ति के अनुसार परमारों का संबंध वशिष्ठ गोत्र से है। इन्हें ब्रह्म-क्षत्रिय (ब्राह्मण से क्षत्रिय बने) भी माना गया है।
सूर्यवंशी मत
तेजपाल के अभिलेख एवं पटौदी अभिलेख में परमारों को सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया गया है।
प्रसिद्ध उक्ति: "पृथ्वी परमारों की है, परमारों का पृथ्वी पर अधिकार रहा है।" (राजस्थान में आबू, वागड़, किराडू, जालौर तथा मालवा में धार व उज्जैन परमारों के प्रमुख केंद्र थे)।
2. आबू के परमार (Parmars of Mount Abu – Chandravati)
राजस्थान में परमारों की सबसे प्रमुख व प्राचीन शाखा आबू के परमार थे। इनकी राजधानी चन्द्रावती (सिरोही) थी, जो बनास नदी के किनारे स्थित एक समृद्ध सांस्कृतिक व व्यापारिक नगर था।
📌 संस्थापक व प्रारंभिक शासक
- उत्पलराज / धूमराज: आबू के परमार वंश के संस्थापक। वसंतगढ़ अभिलेख (1042 ई.) के अनुसार धूमराज इस वंश के प्रथम पुरुष थे।
- धंधुक परमार (1010–1040 ई.): गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव प्रथम के समकालीन। धंधुक के मंत्री विमलशाह ने 1031 ई. में देलवाड़ा (आबू) में प्रसिद्ध 'विमल वसही' जैन मंदिर (ऋषभदेव/आदिनाथ मंदिर) का निर्माण करवाया।
- विक्रमसिंह: चालुक्य सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल के समकालीन।
🏛️ चन्द्रावती नगरी की विशेषताएँ
- स्थान: आबू रोड के पास चन्द्रावती मध्यकालीन स्थापत्य का महान केंद्र थी।
- उत्खनन: जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ एवं पुरातत्व विभाग द्वारा उत्खनन में यहाँ से विशाल दुर्ग, मंदिर व कांस्य प्रतिमाएँ मिलीं।
- सूमलदेव: चन्द्रावती परमारों की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक रही है।
👑 धारावर्ष परमार (1163 – 1219 ई.) – आबू के सबसे महान व पराक्रमी शासक
धारावर्ष परमार आबू शाखा के सबसे प्रतापी राजा थे। ये अपने समय के महान धनुर्धर (Archer) एवं अद्वितीय योद्धा माने जाते थे।
- कायद्रा का युद्ध (1178 ई. - आबू के पास): मुहम्मद गोरी ने जब गुजरात पर आक्रमण किया, तो गुजरात की महारानी नाइकी देवी (भीमदेव द्वितीय की माता) के नेतृत्व में धारावर्ष परमार ने गोरी की विशाल सेना को पराजित कर भगा दिया।
- धनुर्विद्या के अद्भुत धनी: पटनारायण अभिलेख (1287 ई.) के अनुसार धारावर्ष अपने एक ही तीर से तीन भैंसों (महिषों) को एक साथ बींध (छेद) देते थे। अचलेश्वर मंदिर (आबू) के मंदाकिनी कुंड के पास धारावर्ष की तीर ताने हुए मूर्ति तथा तीन छिद्रित भैंसों की मूर्तियाँ आज भी स्थापित हैं।
- धारावर्ष का भाई प्रहलादनदेव: प्रहलादनदेव ने 'पालनपुर' (गुजरात) नगर बसाया तथा संस्कृत नाटक 'पार्थ पराक्रम व्यायोग' की रचना की।
- सोमसिंह (धारावर्ष का पुत्र): इनके शासनकाल में गुजरात के मंत्रियों वस्तुपाल एवं तेजपाल ने 1230 ई. में देलवाड़ा में प्रसिद्ध 'लूण वसही' (नेमिनाथ जैन मंदिर) का निर्माण करवाया (शिल्पी: शोभनदेव)।
3. वागड़ के परमार एवं अर्थूणा (Parmars of Vagad – Banswara & Dungarpur)
वागड़ (बांसवाड़ा व डूंगरपुर क्षेत्र) में परमारों की एक स्वतंत्र शाखा ने शासन किया। इनकी राजधानी उत्थूणक (वर्तमान अर्थूणा, बांसवाड़ा) थी।
👑 प्रमुख शासक
- डम्बरसिंह (धणिक): वागड़ के परमार वंश के संस्थापक (9वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध)। मालवा के परमार राजा वाक्पतिराज के छोटे भाई।
- कंकदेव: मालवा के राजा सीयक द्वितीय का सामंत; राष्ट्रकूटों से लड़ते हुए वीरगति पाई।
- मण्डलिक: मालवा के राजा जयसिंह का सामंत; इन्होंने 1079 ई. में अर्थूणा में 'मण्डलेश्वर महादेव मंदिर' का निर्माण करवाया।
- चामुण्डराज: इन्होंने अर्थूणा में विशाल विष्णु मंदिर (विजयनाथ) बनवाया।
- विजयराज: वागड़ परमारों का अंतिम ज्ञात स्वतंत्र शासक (1108 ई. का अर्थूणा अभिलेख)।
🛕 अर्थूणा का मंदिर समूह (Arthuna Temples)
अर्थूणा (बांसवाड़ा) वागड़ परमारों की कला एवं स्थापत्य का महान केंद्र रहा है।
1. मण्डलेश्वर (माण्डव्य) शिव मंदिर: परमार राजा मण्डलिक द्वारा निर्मित (1079 ई.) मारू-गुर्जर स्थापत्य शैली का सर्वोत्कृष्ट मंदिर।
2. हनुमानगढ़ी व जैन मंदिर समूह: यहाँ 50 से अधिक छोटे-बड़े मंदिरों के भग्नावशेष स्थित हैं।
📌 RPSC हॉट-फेवरेट: वागड़ परमारों की राजधानी 'अर्थूणा' (उत्थूणक) थी। 12वीं शताब्दी के अंत में गुहिल शासक सामंतसिंह ने वागड़ के परमारों को पराजित कर वागड़ में गुहिल राजवंश की स्थापना की थी।
4. किराडू के परमार – 'राजस्थान का खजुराहो' (Kiradu Parmars)
बाड़मेर जिले के हाथमा गाँव के पास स्थित किराडू (प्राचीन नाम: किराटकूप) परमारों की एक अन्य प्रमुख शाखा का केंद्र था।
📌 इतिहास व प्रमुख शासक
- संस्थापक: सिंधुराज (सिंधुराज के पुत्र धरणीवराह ने किराडू, मारवाड़ व आबू क्षेत्रों पर शासन किया)।
- सोमेश्वर परमार: किराडू के सबसे प्रसिद्ध परमार शासक (1161 ई. का किराडू अभिलेख)। ये गुजरात के चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल के सामंत थे।
🛕 सोमेश्वर मंदिर – 'राजस्थान का खजुराहो'
किराडू का 'सोमेश्वर मंदिर' (शिव मंदिर) अपनी कामुक मूर्तियों, उत्कृष्ट नक्काशी एवं महा-मारू स्थापत्य शैली के लिए प्रसिद्ध है।
इसी कारण किराडू को 'राजस्थान का खजुराहो' कहा जाता है। (नोट: 'मेवाड़ का खजुराहो' = जगत का अंबिका मंदिर; 'हाड़ौती का खजुराहो' = भंडदेवरा, बारां)।
5. जालौर एवं मालानी के परमार (Jalore & Malani Parmars)
10वीं शताब्दी में जालौर (स्वर्णगिरि) एवं सांचौर (सत्यपुर) क्षेत्र में परमारों ने अपनी सत्ता स्थापित की।
📌 संस्थापक व इतिहास
- संस्थापक: जालौर शाखा के संस्थापक वाक्पतिराज (चन्दन) थे।
- प्रमुख शासक: विशला, देवराज एवं बीजल।
- जालौर परमार प्रारंभ में मालवा के परमार शासकों के अधीन थे।
🕌 संस्कृत पाठशाला व 'तोपखाना मस्जिद'
मालवा के राजा भोज / वाक्पति मुंज ने जालौर दुर्ग में एक भव्य संस्कृत पाठशाला बनवाई थी।
1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जब जालौर दुर्ग पर अधिकार किया तो उसने इस संस्कृत पाठशाल को तोड़कर 'तोपखाना मस्जिद' (खिलजी मस्जिद) में बदल दिया।
RPSC परीक्षा प्रश्न: जालौर दुर्ग स्थित 'तोपखाना मस्जिद' मूलतः किसके द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला थी? ➔ परमार शासकों (राजा भोज) द्वारा।
6. मालवा के परमार, वाक्पति मुंज एवं राजा भोज
6.1 वाक्पति मुंज (973 – 995 ई.) – 'कवि वृष'
वाक्पति मुंज मालवा के परमारों के महान विद्वान व योद्धा शासक थे। इन्होंने चालुक्य राजा तैलप द्वितीय को 6 बार पराजित किया, किन्तु 7वीं बार बंदी बनाकर मार दिए गए।
- उपाधियाँ: श्रीवल्लभ, पृथ्वीवल्लभ, अमोघवर्ष, 'कवि वृष' (कवियों में श्रेष्ठ)।
- चित्तौड़ पर अधिकार: इन्होंने मेवाड़ के गुहिल राजा शक्ति कुमार को हराकर चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार किया था तथा वहाँ 'मुंजसार तालाब' बनवाया।
- दरबारी विद्वान: पद्मगुप्त ('नवसाहसांकचरित'), धनंजय ('दशरूपक'), धनिक ('यशोरूपावलोक'), हलायुध ('अभिधान रत्नमाला')।
👑 राजा भोज (1000 – 1055 ई.) – 'कविराज' व महान विद्याप्रेमी
राजा भोज (पिता: सिंधुराज) परमार राजवंश के सर्वाधिक प्रसिद्ध, विद्वान एवं सार्वभौम शासक थे। इनकी विद्वता के कारण इन्हें 'कविराज' की उपाधि दी गई।
📚 राजा भोज द्वारा रचित प्रमुख ग्रंथ
- समरांगण सूत्रधार: स्थापत्य कला व वास्तुशास्त्र का महान ग्रंथ।
- सरस्वती कंठाभरण: व्याकरण एवं काव्यशास्त्र ग्रंथ।
- शृंगार प्रकाश: साहित्य व नाटक ग्रंथ।
- आयुर्वेद सर्वस्व: चिकित्सा विज्ञान ग्रंथ।
- युक्ति कल्पतरु: जहाज निर्माण (Shipbuilding) व गृह निर्माण।
- तत्व प्रकाश: शैव दर्शन ग्रंथ।
🏛️ स्थापत्य व निर्माण कार्य
- भोजशाला (धार, म.प्र.): धार में प्रसिद्ध सरस्वती मंदिर व 'भोजशाला' (संस्कृत महाविद्यालय) बनवाया।
- त्रिभुवन नारायण मंदिर (चित्तौड़गढ़): चित्तौड़गढ़ दुर्ग में 'त्रिभुवन नारायण मंदिर' (भोज स्वामी मंदिर) बनवाया। (इसे ही कालान्तर में महाराणा मोकल ने जीर्णोद्धार कराकर 'समिधेश्वर मंदिर' नाम दिया)।
- भोजपुर नगर व भोजसर तालाब: भोपाल के पास भोजपुर नगर बसाया तथा वहाँ विशाल शिवलिंग वाला भोजेश्वर मंदिर बनवाया।
राजा भोज की मृत्यु पर उक्ति: "अद्य धारा निराधारा निरालम्बा सरस्वती। पण्डिता खण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवंगते॥" (अर्थात राजा भोज के स्वर्गारोहण से धारा नगरी अनाथ हो गई, सरस्वती निराश्रित हो गई तथा विद्वान व पंडित छिन्न-भिन्न हो गए)।
7. परमारों की अद्वितीय स्थापत्य देन: 'भूमिज शैली' (Bhumija Style)
उत्तर भारत की नागर मंदिर शैली की एक विशिष्ट उपशैली 'भूमिज शैली' (Bhumija Style) कहलाती है, जिसका उद्भव एवं सर्वाधिक विकास परमार राजाओं के काल (10वीं-11वीं सदी) में हुआ।
📐 भूमिज शैली की प्रमुख विशेषताएँ
- शिखर संरचना: मंदिर के मुख्य शिखर के चारों ओर छोटे-छोटे शिखर (कूट-शृंग) क्षैतिज व लंबवत पंक्तियों में सजाए जाते हैं।
- रथ-विभाजन: ये मंदिर सामान्यतः त्रिरथ, पंचरथ या सप्तरथ योजना पर आधारित होते हैं।
- माप व सौंदर्य: यह शैली अपनी उत्कृष्ट ज्यामितीय गणितीय संरचना व नक्काशी के लिए जानी जाती है।
🛕 भूमिज शैली के प्रमुख उदाहरण (RPSC Favorite)
- महानालेश्वर मंदिर (मेनाल, चित्तौड़गढ़/भीलवाड़ा): राजस्थान में भूमिज शैली का सबसे प्राचीन व प्रमुख उदाहरण।
- उंडेश्वर/शिव मंदिर (बिजोलिया, भीलवाड़ा): राजस्थान का प्रसिद्ध भूमिज शैली मंदिर।
- सूर्य मंदिर (झालावाड़/झालरापाटन): सात सहेलियों का मंदिर (आंशिक भूमिज प्रभाव)।
- उदयेश्वर मंदिर (उदायनगर/विदिशा, म.प्र.): परमार राजा उदयादित्य द्वारा निर्मित भूमिज शैली का भारत में सर्वश्रेष्ठ उदाहरण।
RPSC स्पेशल तथ्य: राजस्थान का सबसे प्राचीन भूमिज शैली का शिव मंदिर कौन सा है? ➔ मेनाल का महानालेश्वर मंदिर (चित्तौड़गढ़)।
8. परमार राजवंश के प्रमुख ऐतिहासिक अभिलेख व ताम्रपत्र
| अभिलेख का नाम | वर्ष / समय | स्थान | संबंधित राजा | ऐतिहासिक महत्त्व / प्राप्त जानकारी |
|---|---|---|---|---|
| वसंतगढ़ अभिलेख | 1042 ई. | सिरोही | पूर्णपाल / धूमराज | आबू के परमारों की वंशावली मिलती है; धूमराज को आबू शाखा का प्रथम पुरुष माना गया है। |
| हरसोल ताम्रपत्र | 949 ई. | अहमदाबाद (गुजरात) | सीयक द्वितीय | परमारों को राष्ट्रकूटों का वंशज व वशिष्ठ गोत्रीय माना गया है। |
| अर्थूणा अभिलेख | 1079 व 1108 ई. | बांसवाड़ा (वागड़) | मण्डलिक व विजयराज | वागड़ परमारों की वंशावली तथा मण्डलेश्वर मंदिर निर्माण का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। |
| किराडू अभिलेख | 1161 ई. | हाथमा, बाड़मेर | सोमेश्वर परमार | किराडू परमारों की चालुक्य राजा सिद्धराज जयसिंह व कुमारपाल की अधीनता का वर्णन। |
| पटनारायण अभिलेख | 1287 ई. | गिरवर, सिरोही | धारावर्ष परमार | धारावर्ष द्वारा एक ही तीर से तीन महिषों (भैंसों) को बींधने की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख। |
9. परमार राजवंश का पतन एवं अंत (Decline & Fall)
13वीं व 14वीं शताब्दी के प्रारंभ में गुजरात के सोलंकी/वघेला राजवंश, चौहान राजवंश तथा दिल्ली सल्तनत के आक्रमणों के कारण राजस्थान व मालवा में परमार सत्ता समाप्त हो गई।
🏔️ आबू शाखा का अंत (1311 ई.)
आबू के अंतिम परमार शासक सूमलदेव को 1311 ई. में जालौर के कान्हड़देव चौहान के भाई राव लुम्भा (देवड़ा चौहान) ने पराजित कर चन्द्रावती पर अधिकार कर लिया तथा सिरोही में देवड़ा चौहान वंश की नींव रखी।
🌴 वागड़ शाखा का अंत (12वीं सदी)
12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मेवाड़ के गुहिल राजा सामंतसिंह ने वागड़ (अर्थूणा) के परमार शासक को पराजित कर वागड़ में स्वतंत्र गुहिल राजवंश स्थापित किया।
🏛️ मालवा शाखा का अंत (1305 ई.)
1305 ई. में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने मालवा के अंतिम परमार राजा महलक देव को पराजित कर मालवा को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया।
10. राजस्थान में परमार शाखाओं की त्वरित सारणी (Branch Comparison)
| शाखा का नाम | राजधानी | संस्थापक | प्रसिद्ध शासक | मुख्य स्थापत्य / विशेषता |
|---|---|---|---|---|
| आबू के परमार | चन्द्रावती (सिरोही) | उत्पलराज / धूमराज | धारावर्ष परमार, धंधुक | विमल वसही (1031 ई.) व लूण वसही (1230 ई.) मंदिर |
| वागड़ के परमार | अर्थूणा (उत्थूणक) | डम्बरसिंह (धणिक) | मण्डलिक, चामुण्डराज | मण्डलेश्वर शिव मंदिर (अर्थूणा, 1079 ई.) |
| किराडू के परमार | किराडू (बाड़मेर) | सिंधुराज | सोमेश्वर परमार | सोमेश्वर मंदिर ('राजस्थान का खजुराहो') |
| जालौर के परमार | जालौर (स्वर्णगिरि) | वाक्पतिराज / चन्दन | विशला, राजा भोज | संस्कृत पाठशाला (तोपखाना मस्जिद) |
| मालवा के परमार | उज्जैन ➔ धार | उपेन्द्र (कृष्णराज) | राजा भोज, वाक्पति मुंज | भोजशाला, समिधेश्वर मंदिर, भूमिज शैली विकास |
11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)
📌 अति-महत्वपूर्ण तथ्य
- आबू के परमारों की राजधानी: चन्द्रावती (सिरोही)।
- कायद्रा का युद्ध (1178 ई.): धारावर्ष परमार ने गुजरात की महारानी नाइकी देवी के साथ मिलकर मुहम्मद गोरी को पराजित किया।
- तीन भैंसों को एक तीर से बींधना: धारावर्ष परमार की वीरता का प्रतीक (अचलेश्वर मंदिर, आबू एवं पटनारायण अभिलेख)।
- भूमिज शैली का उद्भव: परमार काल में निर्मित नागर उपशैली। उदाहरण: मेनाल का महानालेश्वर मंदिर।
- तोपखाना मस्जिद (जालौर): राजा भोज/मुंज द्वारा निर्मित संस्कृत पाठशाला को अलाउद्दीन खिलजी ने बदला।
📝 RPSC में पूछे गए प्रश्न
- अर्थूणा (बांसवाड़ा): वागड़ के परमारों की राजधानी। मण्डलेश्वर मंदिर 1079 ई. में राजा मण्डलिक द्वारा निर्मित।
- राजस्थान का खजुराहो: किराडू (बाड़मेर) का सोमेश्वर शिव मंदिर।
- त्रिभुवन नारायण मंदिर (चित्तौड़): राजा भोज द्वारा निर्मित (कालान्तर में समिधेश्वर मंदिर कहलाया)।
- आबू में देवड़ा चौहानों का अधिकार: 1311 ई. में राव लुम्भा ने अंतिम परमार राजा सूमलदेव को हराकर सिरोही जीता।
- पार्थ पराक्रम व्यायोग: धारावर्ष के भाई प्रहलादनदेव (पालनपुर के संस्थापक) द्वारा रचित संस्कृत नाटक।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
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