राजस्थान की चित्रकला एवं लोककला:
सम्पूर्ण शैलियाँ, चित्रकार एवं हस्तकला नोट्स
राजस्थान की समृद्ध चित्रकला के चारों स्कूल (मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती), विश्वप्रसिद्ध बणी-ठणी, पिछवाई, बूंदी के पशु-पक्षी चित्र, शेखावाटी के भित्ति चित्र तथा प्रमुख लोककलाएं (फड़ चित्रांकन, थेवा कला, उस्ता कला, कावड़, मांडणा) — RAS, RPSC एवं RSSB परीक्षाओं हेतु मानक अध्ययन सामग्री।
राजस्थान कला एवं संस्कृति: विषयवार नोट्स
सम्पूर्ण कला-संस्कृति देखेंराजस्थान की चित्रकला एवं लोककला: सम्पूर्ण प्रामाणिक विश्लेषण
राजस्थानी चित्रकला के चारों स्कूल (मेवाड़, मारवाड़, ढूंढाड़, हाड़ौती), प्रमुख शैलियाँ, स्वर्णकाल, चित्रकार, चित्रित ग्रंथ एवं प्रमुख लोक हस्तकलाएं।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उत्पत्ति एवं वैज्ञानिक विभाजन
राजस्थानी चित्रकला की उत्पत्ति 15वीं शताब्दी में अपभ्रंश शैली (गुजरात व जैन शैली) से स्वतंत्र होकर मेवाड़ की भूमि पर हुई। 17वीं-18वीं शताब्दी राजस्थानी चित्रकला का 'स्वर्ण काल' (Golden Era) कहलाता है।
📚 वैज्ञानिक वर्गीकरण एवं नामकरण
- आनंद कुमार स्वामी (1916 ई.): अपनी पुस्तक 'राजपूत पेंटिंग्स' (Rajput Paintings) में राजस्थानी चित्रकला का प्रथम वैज्ञानिक विभाजन प्रस्तुत किया।
- ओ.सी. गांगुली व हेवेल: इन्होंने इसे 'राजपूत कला' कहा।
- राय कृष्णदास: इन्होंने सर्वसम्मत रूप से इसे 'राजस्थानी चित्रकला' नाम दिया।
- कर्नल जेम्स टॉड: इन्होंने इसे 'राजस्थान शैली' कहा।
- एच.सी. मेहता: पुस्तक - 'स्टडीज इन इंडियन पेंटिंग्स'।
📜 प्राचीनतम उपलब्ध चित्रित ग्रंथ
- औध निर्युक्ति वृत्ति एवं दसवैकालिक सूत्र चूर्णी (1060 ई.): जैसलमेर के 'जिनभद्र सूरी ज्ञान भंडार' में सुरक्षित भूमिगत ग्रंथ (राजस्थान के सबसे प्राचीन चित्रित ग्रंथ)।
- श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी (1260 ई.): मेवाड़ के शासक तेजसिंह के समय कमलचंद्र द्वारा आहड़ में ताड़पत्र पर चित्रित।
- सुपासनाहचरियम् / सुपार्श्वनाथ चरित्र (1423 ई.): मोकल के समय देलवाड़ा में हीरानंद द्वारा चित्रित ग्रंथ।
🗺️ राजस्थानी चित्रकला के 4 प्रमुख स्कूल (वर्गीकरण)
उदयपुर, नाथद्वारा, देवगढ़, चावंड, शाहपुरा शैली।
जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जैसलमेर, नागौर, सिरोही।
आमेर, जयपुर, अलवर, उणियारा, शेखावाटी शैली।
बूंदी शैली एवं कोटा शैली, झालावाड़।
2. मेवाड़ स्कूल (Mewar School of Painting)
मेवाड़ शैली को राजस्थानी चित्रकला की मूल शैली (जनक शैली) माना जाता है। इसमें लाल एवं पीले रंग की प्रधानता तथा कदम के वृक्ष एवं मीन सदृश (मछली जैसी) आँखें प्रमुख विशेषता हैं।
🎨 (A) उदयपुर शैली (मूल मेवाड़ शैली)
• स्वर्णकाल: महाराणा जगतसिंह प्रथम का काल (1628-1652 ई.)। इन्होंने राजमहलों में 'तस्वीरा रो कारखानो' (चितेरों की ओवरी) नामक कला विद्यालय खोला।
• प्रमुख चित्रकार: साहिबदीन (रागमाला, गीत गोविंद, रसिकप्रिया, भागवत पुराण के चितेरे) एवं मनोहर (रामायण का चित्रण)।
• 'कलीला-दमना': पंचतंत्र की कहानियों पर आधारित दो सियार (कलीला = शुभ, दमना = अशुभ) का चित्रण महाराणा संग्रामसिंह द्वितीय के समय हुआ (चित्रकार: नुरूद्दीन)।
🦚 (B) नाथद्वारा शैली
• उद्भव: राजसिंह के समय (1672 ई. में श्रीनाथ जी मूर्ति स्थापना)। यह मेवाड़ व ब्रज शैली का सम्मिश्रण है।
• प्रधानता: 'पिछवाई चित्रण' (भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति के पीछे पर्दे पर कपड़े पर लीलाओं का अंकन), गायों का चित्रण, केले के वृक्ष व पीले-हरे रंग की अधिकता।
• प्रमुख चित्रकार: नारायण, चतुर्भुज, घासीराम, उदयराम।
• महिला चित्रकार: कमला एवं इलायची (RPSC का अति-पसंदीदा प्रश्न)।
🏰 (C) देवगढ़ व चावंड शैली
• देवगढ़ शैली: रावत द्वारकादास चूंडावत के समय 1680 में प्रारंभ। इसे प्रकाश में लाने का श्रेय डॉ. श्रीधर अंधारे को जाता है। मारवाड़, जयपुर व मेवाड़ शैली का समन्वय। (चित्रकार: बगता, चोखा, कवाला, बैजनाथ)।
• चावंड शैली: महाराणा प्रताप के समय प्रारंभ। 1605 ई. में अमरसिंह प्रथम के समय निसारदीन (निसारदी) ने 'रागमाला' का प्रसिद्ध चित्रण किया।
3. मारवाड़ स्कूल (Marwar School of Painting)
🐎 (A) जोधपुर शैली
• प्रारंभ: राव मालदेव (चोखेलाव महल के भित्ति चित्र व उत्तराध्ययन सूत्र)।
• स्वर्णकाल: महाराजा मानसिंह (नाथ संप्रदाय के चित्रों की भरमार - नाथ चरित्र, शिव पुराण)।
• विशेषता: बादाम जैसी आँखें, आम के वृक्ष, पीले रंग की प्रधानता, 'ढोला-मारू' एवं 'मूमल-निहालदे' प्रेम आख्यानों का चित्रण।
• चित्रकार: अमरदास, भाटी शिवदास, जीतमल, छज्जू भाटी, किशनदास, वीरजी (1623 ई. में रागमाला)।
🦢 (B) किशनगढ़ शैली (बणी-ठणी)
• स्वर्णकाल: राजा सावंतसिंह (नागरीदास) का शासनकाल (1748-1764 ई.)।
• बणी-ठणी (Bani-Thani): नागरीदास की प्रेमिका। चित्रकार: मोरध्वज निहालचंद। एरिक डिक्सन ने इसे 'भारत की मोनालिसा' कहा। 5 मई 1973 को 20 पैसे का डाक टिकट जारी।
• नाक का आभूषण: बणी-ठणी की नाक में 'बेसरि' (Besari) आभूषण चित्रित है।
• 'चांदनी रात की संगोष्ठी': चित्रकार अमरचंद द्वारा चित्रित।
• विशेषता: खंजन पक्षी जैसी आँखें, कमल से भरे सरोवर, तैरते हंस, श्वेत व गुलाबी रंग।
🐪 (C) बीकानेर, जैसलमेर व नागौर
• बीकानेर शैली: स्वर्णकाल - महाराजा अनूपसिंह। उस्ता कला (ऊंट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी) व मथेरणा कला (जैन भित्ति चित्र)। चित्रकार चित्र पर नाम व तिथि अंकित करते थे (चित्रकार: अली रजा, रुकनुद्दीन, रामलाल)।
• जैसलमेर शैली: इस पर किसी बाहरी (मुगल/कंपनी) शैली का प्रभाव नहीं पड़ा। प्रधान चित्र: 'मूमल'।
• नागौर शैली: बुझे हुए (धुंधले) रंगों का प्रयोग एवं पारदर्शी वेशभूषा।
4. ढूंढाड़ स्कूल (Dhundhar School of Painting)
ढूंढाड़ स्कूल पर मुगल शैली का सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। इसमें उद्यानों, फव्वारों, आदमकद पोर्ट्रेट एवं भित्ति चित्रों की प्रचुरता है।
🏛️ (A) आमेर - जयपुर शैली
• प्रारंभ: मानसिंह प्रथम (रज्मनामा का फारसी चित्रण)। सवाई जयसिंह ने 'सूरतखाना' बनवाया।
• स्वर्णकाल: सवाई प्रतापसिंह का काल (हवामहल निर्माता)।
• आदमकद चित्र (Portraits): चित्रकार साहिबराम ने महाराजा ईश्वरीसिंह का प्रथम आदमकद चित्र बनाया।
• भित्ति चित्र पद्धति: आरायश / आलागीला / फ्रेश्को बुओनो / मोराकाशी (गीले प्लास्टर पर स्थायी चित्र बनाना)।
• चित्रकार: साहिबराम, मोहम्मद शाह, लालचंद (पशुओं की लड़ाई के चितेरे)।
🌿 (B) अलवर शैली
• प्रारंभ: राव राजा प्रतापसिंह (1775 ई.)।
• स्वर्णकाल: महाराजा विनयसिंह (शेख सादी के 'गुलिस्तां' पांडुलिपि का चित्रण बलदेव व गुलाम अली द्वारा कराया)।
• विशिष्ट पहचान: राजस्थान की एकमात्र शैली जिसमें गणिकाओं (वेश्याओं) के चित्र बने।
• हाथी दांत पर चित्रण: चित्रकार मूलचंद एवं उदयराम हाथी दांत के फलकों पर सूक्ष्म चित्रण हेतु विख्यात थे।
• बसलो चित्रण: चित्रों के बॉर्डर (हाशिए) पर सुनहरी बेल-बूटे बनाना।
🖼️ (C) शेखावाटी व उणियारा शैली
• शेखावाटी भित्ति चित्र: शेखावाटी को अपनी हवेलियों के भित्ति चित्रों के कारण 'ओपन आर्ट गैलरी' (Open Art Gallery) कहा जाता है (नवलगढ़, मंडावा, फतेहपुर)।
• विशेषता: कथई, नीले व पीले रंगों से रेलगाड़ी, मोटरगाड़ी, अंग्रेजों के चित्र एवं बड़े-बड़े हाथी-घोड़े चित्रित।
• उणियारा शैली (टोंक): ढूंढाड़ व बूंदी शैली का मिश्रण। चित्रकार: मीरबख्श, काशी, धीमा, लखन।
5. हाड़ौती स्कूल (Hadoti School of Painting)
🦚 (A) बूंदी शैली – पशु-पक्षियों की चित्रशैली
• उपनाम: 'पशु-पक्षियों की चित्रकला शैली' (Bird & Animal Style)।
• स्वर्णकाल: राव उम्मेदसिंह का शासनकाल।
• चित्रशाला (रंग महल): उम्मेदसिंह द्वारा तारागढ़ दुर्ग (बूंदी) में निर्मित, जिसे 'भित्ति चित्रों का स्वर्ग' कहा जाता है।
• विशेषता: घने जंगल, नाचता मोर, खजूर के पेड़, सरोवर में जलक्रीड़ा करते पक्षी, सुनहरी लाल व हरा रंग।
• प्रमुख चित्रकार: सुरजन, अहमद, साधुराम, रामलाल, श्रीकिशन।
🏹 (B) कोटा शैली – शिकार के दृश्यों की शैली
• उद्भव: 1631 ई. में माधवसिंह के समय।
• स्वर्णकाल: महाराव उम्मेदसिंह प्रथम का काल।
• विशिष्ट पहचान: रानियों व स्त्रियों को भी शिकार करते हुए चित्रित किया गया है (RPSC में बार-बार पूछा गया)।
• चित्रित ग्रंथ: 1768 ई. में चित्रकार डालू द्वारा चित्रित प्रसिद्ध 'रागमाला सेट'।
• प्रमुख चित्रकार: डालू, नूर मोहम्मद, गोविंदराम, रघुनाथ, लच्छीराम।
6. राजस्थान की प्रमुख लोककलाएँ एवं हस्तशिल्प (Folk Arts & Crafts)
📜 1. फड़ चित्रांकन (Phad Painting)
• केंद्र: शाहपुरा (भीलवाड़ा)। खादी/रेजी के कपड़े पर लोक देवताओं के जीवन चरित्र का रंगों से चित्रण।
• प्रसिद्ध चितेरे: पद्मश्री श्रीलाल जोशी, प्रदीप जोशी।
• प्रथम महिला चितेरी: पार्वती जोशी एवं गोतली देवी।
• फड़ के जीर्ण-शीर्ण होने पर पुष्कर सरोवर में विसर्जित करना 'फड़ ठंडा करना' कहलाता है।
💎 2. थेवा कला (Thewa Art)
• केंद्र: प्रतापगढ़। हरे रंग के बेल्जियम कांच पर सोने की बारीक व नक्काशीदार जड़ाई।
• प्रवर्तक: नाथूजी सोनी (राजसोनी परिवार इस गुप्त विद्या का एकमात्र संरक्षक है)।
• पद्मश्री प्राप्त: महेश राजसोनी (2015), हरीश राजसोनी।
🐪 3. उस्ता कला / मुनव्वती कला
• केंद्र: बीकानेर। ऊंट की खाल पर सोने की नक्काशी व मीनाकारी।
• प्रसिद्ध शिल्पी: हिसामुद्दीन उस्ता (पद्मश्री सम्मानित) एवं हनीफ उस्ता।
• प्रशिक्षण संस्थान: कैमल हाइड ट्रेनिंग सेंटर (बीकानेर)।
🚪 4. कावड़ कला (Kavad Art)
• केंद्र: बस्सी (चित्तौड़गढ़)। लकड़ी से बना चलता-फिरता लाल रंग का मंदिरनुमा देवघर, जिसमें कई कपाट (द्वार) होते हैं।
• इसे 'चलता-फिरता देवघर' कहते हैं (भाटों द्वारा वाचन)।
• प्रसिद्ध कलाकार: मांगीलाल मिस्त्री।
🌺 5. पिछवाई एवं सांझी कला
• पिछवाई: नाथद्वारा (राजसमंद) में श्रीनाथ जी के पीछे कृष्णलीला का कपड़ा अंकन (विट्ठलदास, नरोत्तम)।
• सांझी: श्राद्ध पक्ष में कुंआरी कन्याओं द्वारा गोबर व मिट्टी से दीवार पर बनाई जाने वाली आकृतियाँ। केले की सांझी - नाथद्वारा मंदिर प्रसिद्ध है। मत्स्येंद्रनाथ मंदिर (उदयपुर) 'सांझी का मंदिर' कहलाता है।
🎎 6. कठपुतली, मांडणा एवं व्हील
• कठपुतली: आडू की लकड़ी से निर्मित (नट जाति, उदयपुर)। देवीलाल सामर ने 'भारतीय लोक कला मंडल' (1952) के माध्यम से इसे वैश्विक ख्याति दिलाई।
• मांडणा: आंगन/दीवार पर खड़िया व गेरू से ज्यामितीय आकृतियाँ (पगलिया, ताम, चौकड़ी)।
• व्हील (Mahal): ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी से बनी कलात्मक खाद्य-संग्रहण कोठियां।
राजस्थान के प्रमुख आधुनिक चित्रकार (उपनाम)
🦬 परमानंद चोयल
"भैंसों के चितेरे"
कोटा निवासी। भैंसों के जीवन पर अद्भुत चित्रांकन।
🏹 गोवर्धन लाल जोशी 'बाबा'
"भीलों के चितेरे"
कांकरोली निवासी। भील जनजीवन व बारात के प्रसिद्ध चित्र।
🪺 सौभाग्यमल गहलोत
"नीड़ के चितेरे"
पक्षियों के घोंसलों (नीड़) के जीवंत चित्रांकन हेतु विख्यात।
🐕 जगमोहन माथोडिया
"श्वान (कुत्तों) के चितेरे"
जयपुर निवासी। श्वानों के स्वभाव व मुद्राओं के चितेरे।
🦜 देवकीनंदन शर्मा
"मास्टर ऑफ नेचर / पक्षियों के चितेरे"
अलवर निवासी। वनस्पति व मयूर चित्रांकन में अंतरराष्ट्रीय ख्याति।
🏺 पद्मश्री कृपाल सिंह शेखावत
"ब्लू पॉटरी के जादूगर"
मऊ (सीकर)। 25 नए रंगों का आविष्कार कर ब्लू पॉटरी को नई पहचान दी।
राजस्थान की प्रमुख कला दीर्घाएँ एवं संस्थाएँ
7. प्रमुख चित्रकला शैलियाँ, रंग, वृक्ष एवं चित्रकारों का मास्टर चार्ट
| शैली का नाम | प्रधान रंग | प्रधान वृक्ष / पशु-पक्षी | नेत्रों की बनावट | प्रमुख प्रसिद्ध चित्रकार |
|---|---|---|---|---|
| उदयपुर (मेवाड़) | लाल, पीला | कदम वृक्ष, हाथी व चकोर | मीन सदृश (मछली जैसी) | साहिबदीन, मनोहर, कमलचंद्र, हीरानंद, नुरूद्दीन |
| नाथद्वारा | पीला, हरा | केले का वृक्ष, गायें | भावपूर्ण विशाल नेत्र | घासीराम, नारायण, चतुर्भुज, कमला व इलायची (महिला) |
| जोधपुर (मारवाड़) | पीला, लाल | आम का वृक्ष, ऊंट, चील | बादाम सदृश आँखें | शिवदास, अमरदास, किशनदास, छज्जू भाटी, वीरजी |
| किशनगढ़ | सफेद, गुलाबी | केले का वृक्ष, तैरते हंस | खंजन पक्षी / कमान जैसी | मोरध्वज निहालचंद, अमरचंद, सीताराम, नानकराम |
| बीकानेर | पीला, जामुनी | आम, खजूर, ऊंट | खंजन सदृश | अली रजा, रुकनुद्दीन, रामलाल, मुन्नालाल (मथेरणा) |
| जयपुर (आमेर) | लाल, पीला, हरा | वट (बरगद) व पीपल, मोर | मृगनयनी (हिरण जैसी) | साहिबराम (आदमकद), मोहम्मद शाह, लालचंद |
| अलवर | हरा, नीला, सुनहरी | पीपल, शीशम | सामान्य मछलीनुमा | बलदेव, गुलाम अली, मूलचंद (हाथी दांत), सालिगराम |
| बूंदी | सुनहरा, लाल, हरा | खजूर का पेड़, नाचता मोर | तीखे व पतले नेत्र | सुरजन, अहमद, साधुराम, रामलाल, श्रीकिशन |
| कोटा | नीला, पीला | खजूर, शिकार करते शेर | उग्र व बड़े नेत्र | डालू (रागमाला), नूर मोहम्मद, लच्छीराम, गोविंदराम |
8. चित्रकला याद रखने के आसान स्मरण सूत्र (Mnemonics)
🎯 ट्रिक 1: नाथद्वारा शैली की महिला चित्रकार
"नाथद्वारा में कमला ने इलायची बांटी"
कमला एवं इलायची दोनों नाथद्वारा शैली की प्रसिद्ध महिला चितेरी हैं।
🎯 ट्रिक 2: हाड़ौती की दोनों शैलियों का मूल अंतर
"बूंदी में पक्षी नाचें, कोटा में नारी शिकार करे"
• बूंदी शैली: पशु-पक्षी एवं नाचता मोर (Bird Style)
• कोटा शैली: रानियों व महिलाओं द्वारा शिकार के दृश्य (Hunting Scenes)
⚠️ कन्फ्यूजन बस्टर: साहिबराम बनाम साहिबदीन
• साहिबराम (जयपुर शैली): आदमकद पोर्ट्रेट चितेरे (ईश्वरीसिंह का आदमकद चित्र बनाया)।
• साहिबदीन (उदयपुर/मेवाड़ शैली): महाराणा जगतसिंह प्रथम के दरबारी (रागमाला, गीत गोविंद के चितेरे)।
9. विगत परीक्षाओं में पूछे गए अति-महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)
📌 चित्रकला शैली परीक्षा तथ्य
- 'राजपूत पेंटिंग्स': आनंद कुमार स्वामी द्वारा 1916 में लिखित पुस्तक।
- चितेरों की ओवरी: उदयपुर राजमहल में जगतसिंह प्रथम द्वारा स्थापित कला विद्यालय।
- बणी-ठणी: किशनगढ़ शैली का चित्र, निहालचंद द्वारा निर्मित ('भारत की मोनालिसा')।
- बेसरि आभूषण: बणी-ठणी की नाक में चित्रित विशिष्ट आभूषण।
- चित्रशाला (रंगमहल): बूंदी के तारागढ़ दुर्ग में राव उम्मेदसिंह द्वारा निर्मित।
- हाथी दांत पर चित्रकारी: अलवर शैली के मूलचंद चित्रकार द्वारा की गई।
- नाम व तिथि अंकित करना: बीकानेर शैली के उस्ता व मथेरणा कलाकारों की पहचान।
📌 लोककला व हस्तशिल्प तथ्य
- फड़ चित्रांकन: शाहपुरा का जोशी परिवार (श्रीलाल जोशी, पार्वती जोशी)।
- थेवा कला: प्रतापगढ़ का राजसोनी परिवार (हरे बेल्जियम कांच पर सोने की जड़ाई)।
- कावड़ कला: बस्सी (चित्तौड़गढ़) के मांगीलाल मिस्त्री (चलता-फिरता देवघर)।
- उस्ता कला: बीकानेर में ऊंट की खाल पर सोने की नक्काशी (हिसामुद्दीन उस्ता)।
- भारतीय लोक कला मंडल: 1952 में उदयपुर में देवीलाल सामर द्वारा स्थापित।
- केले की सांझी: नाथद्वारा के श्रीनाथ जी मंदिर की प्रसिद्ध।
- आलागीला / आरायश: जयपुर में दीवारों पर चूने के गीले प्लास्टर पर भित्ति चित्र बनाने की पद्धति।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
राजस्थानी चित्रकला एवं लोककला से जुड़े प्रमुख संशय निवारण।
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