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भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज – कछवाहा वंश

जयपुर का कछवाहा राजवंश:
उत्पत्ति, आमेर के शासक, देबारी समझौता व सवाई जयसिंह

कछवाहा राजवंश (Kachhwaha rajvansh) राजस्थान का एक अत्यंत प्रभावशाली राजवंश है। दूल्हेराय (1137 ई.), भारमल (प्रथम मुग़ल संधि 1562), राजा मानसिंह प्रथम (नवरत्न), मिर्ज़ा राजा जयसिंह (पुरंदर संधि 1665), देबारी समझौता (1708), सवाई जयसिंह द्वितीय (जयपुर स्थापना 1727 व 5 वेधशालाएँ), ईश्वरी सिंह (ईसरलाट), सवाई माधोसिंह I & II तथा सवाई प्रताप सिंह (हवामहल 1799) का संपूर्ण प्रामाणिक अध्ययन।

100% प्रामाणिक स्रोत RAS / RPSC / REET उपयोगी हवामहल व जंतर-मंतर
त्वरित सारांश 👑 ढूँढाड़ राजवंश

स्थापना वर्ष

1137 ई.

संस्थापक

दूल्हेराय

कुलदेवी: जमवाय माता | आराध्य देवी: शीला देवी (आमेर)

कछवाहा राजवंश : Complete Online Test
विस्तृत प्रामाणिक अध्ययन

कछवाहा राजवंश: इतिहास, कूटनीति व स्थापत्य कला

नरवर से ढूँढाड़ आगमन, देबारी समझौता, उत्तराधिकार संघर्ष, जयपुर नगर निर्माण, खगोलशास्त्र, जंतर-मंतर, हवामहल एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य।

1. उत्पत्ति, राजवंश प्रतीक एवं कुलदेवी (Origin & Symbols)

कछवाहा राजवंश स्वयं को भगवान श्री रामचंद्र के ज्येष्ठ पुत्र 'कुश' के वंशज मानता है। इसी कारण इन्हें 'कुशवाहा' कहा गया, जो कालान्तर में अपभ्रंश होकर 'कछवाहा' बन गया। यह राजवंश मूलतः नरवर (ग्वालियर, म.प्र.) का निवासी था।

राजध्वज व पंचरंगा

प्रारंभ में कछवाहा राजवंश का ध्वज सफेद रंग का था जिस पर कछुए का चित्र अंकित था। राजा मानसिंह प्रथम ने 5 अफ़ग़ान कबीलों को हराकर इसे 'पंचरंगा ध्वज' (लाल, पीला, सफेद, हरा, नीला) में परिवर्तित किया।

कुलदेवी व आराध्य देवी

कुलदेवी: जमवाय माता (रामगढ़)।
आराध्य देवी: शीला देवी (आमेर दुर्ग - राजा मानसिंह प्रथम पूर्वी बंगाल के केदार राजा से लाए थे)।
आराध्य देव: गोविंददेव जी (जयपुर)।

राजवाक्य

जयपुर राजवंश का प्रसिद्ध राजवाक्य है:
"यतो धर्मस्ततो जयः"
(अर्थात जहाँ धर्म है, वहीं विजय है)।

आमेर शिलालेख (1612 ई.): इस शिलालेख में कछवाहा शासकों को 'रघुकुल तिलक' कहा गया है।

2. प्रारंभिक कछवाहा शासक (Dulherai to Bharmal)

2.1 दूल्हेराय / तेजकरण (1137 ई.) – राजवंश के संस्थापक

दूल्हेराय (मूल नाम: तेजकरण) नरवर से आकर 1137 ई. में ढूँढाड़ क्षेत्र में बड़गूजरों को हराकर कछवाहा राज्य की नींव रखी।

  • प्रथम राजधानी: दौसा (बड़गूजरों को हराकर दौसा को पहली राजधानी बनाया)।
  • जमवाय माता मंदिर: मांच क्षेत्र में मीणाओं को पराजित कर मांच का नाम 'रामगढ़' रखा तथा वहाँ अपनी कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर बनवाया।

2.2 कांकिल देव (1207 ई.) – आमेर को राजधानी बनाया

  • 1207 ई. में आमेर के सुसावत मीणाओं को हराकर आमेर को कछवाहों की दूसरी राजधानी बनाया।
  • इन्होंने आमेर में 'अंबिकेश्वर महादेव मंदिर' का निर्माण करवाया।

2.3 पृथ्वीराज कछवाहा एवं राजा भारमल (1547 – 1574 ई.)

पृथ्वीराज कछवाहा:

खानवा युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की ओर से लड़े। इन्होंने आमेर को अपने 12 पुत्रों में विभाजित किया जो 'बारह कोटड़ी' कहलाया।

राजा भारमल (1547–1574 ई.) – मुग़ल अधीनता स्वीकारने वाले प्रथम शासक:

भारमल राजस्थान के प्रथम राजपूत शासक थे जिन्होंने मुग़ल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा वैवाहिक संबंध स्थापित किए।
सांभर विवाह (फरवरी 1562 ई.): सांभर में अपनी पुत्री हरखा बाई (शाही नाम: मरियाम-उज़-जमानी) का विवाह अकबर से किया।
उपाधियाँ: अकबर ने भारमल को 'अमीर-उल-उमरा' तथा 'राजा' की उपाधि दी एवं 5000 का मनसब दिया।

3. राजा मानसिंह प्रथम (1589 – 1614 ई.) – मुग़ल नवरत्न व महान सेनापति

राजा मानसिंह प्रथम (जन्म: 1550 ई. मोजमाबाद) कछवाहा राजवंश के सबसे प्रभावशाली शासक थे। इन्होंने मुग़ल साम्राज्य (अकबर व जहांगीर) की 52 वर्षों तक सेवा की।

🎖️ उपाधियाँ व मनसब

  • फरज़ंद (पुत्र) व मिर्ज़ा राजा: अकबर द्वारा प्रदत्त उपाधियाँ।
  • 7000 का मनसब: अकबर द्वारा किसी भी गैर-मुस्लिम राजपूत राजा को दिया गया सर्वाधिक मनसब।
  • अकबर के 'नवरत्नों' में शामिल थे।

⚔️ प्रमुख सैन्य अभियान

  • रणथंभोर अभियान (1569 ई.): सुरजन हाड़ा को मुग़ल अधीनता में लाए।
  • हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.): मुग़ल सेना के मुख्य सेनापति।
  • काबुल सूबेदारी (1585 ई.): 5 अफ़ग़ान कबीलों को हराकर पंचरंगा ध्वज बनाया।
  • बंगाल सूबेदारी (1592 ई.): केदार राजा को हराकर शीला देवी की मूर्ति आमेर लाए।

🏛️ स्थापत्य व कला में योगदान

  • आमेर दुर्ग के महल: 1592 ई. में हिंदू-मुग़ल शैली के महल निर्मित करवाए।
  • शीला देवी मंदिर: आमेर दुर्ग में प्रसिद्ध शीला देवी मंदिर बनवाया।
  • जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर): रानी कंकावती ने पुत्र जगतसिंह की स्मृति में बनवाया (मीराबाई द्वारा पूजित श्री कृष्ण मूर्ति स्थापित)।
  • गोविंददेव जी मंदिर (वृंदावन): वृंदावन में 7 मंजिला मंदिर बनवाया।

📚 दरबारी विद्वान

1. पुण्डरीक विट्ठल: 'राग मंजरी', 'राग माला', 'नर्तन निर्णय'।
2. जगन्नाथ: 'मानसिंह कीर्ति मुक्तावली'।

4. मिर्ज़ा राजा जयसिंह (1621 – 1667 ई.) – 46 वर्षों का दीर्घकाल

मिर्ज़ा राजा जयसिंह ने कछवाहा राजवंश में सर्वाधिक 46 वर्षों तक शासन किया। इन्होंने 3 मुग़ल सम्राटों (जहांगीर, शाहजहाँ एवं औरंगजेब) की सेवा की।

📌 उपाधि व कंधार अभियान

  • 'मिर्ज़ा राजा' की उपाधि: 1638 ई. में कंधार अभियान के समय शाहजहाँ ने प्रदान की।

🤝 ऐतिहासिक पुरंदर की संधि (11 जून 1665 ई.)

मिर्ज़ा राजा जयसिंह एवं छत्रपति शिवाजी महाराज के मध्य हुई। शर्त के अनुसार शिवाजी महाराज ने अपने 35 में से 23 दुर्ग मुग़लों को सौंपे।

📚 दरबारी कवि बिहारी एवं 'बिहारी सतसई':

कवि बिहारी इनके दरबारी कवि थे, जिन्होंने 'बिहारी सतसई' (713 दोहे) की रचना की।
स्थापत्य में इन्होंने आमेर दुर्ग में 'जयमंदिर' (दीवान-ए-खास) एवं 'शीशमहल' बनवाया।

5. सवाई जयसिंह द्वितीय (1700 – 1743 ई.) – देबारी समझौता व जयपुर स्थापना

सवाई जयसिंह द्वितीय 7 मुग़ल सम्राटों के समकालीन थे। औरंगजेब ने इनकी वाकपटुता से प्रभावित होकर इन्हें 'सवाई' की उपाधि दी।

🤝 देबारी समझौता (Debari Pact - 1708 ई.)

मुग़ल बादशाह बहादुरशाह प्रथम ने आमेर का नाम बदलकर 'मोमिनाबाद' (इस्लामाबाद) कर दिया था और सवाई जयसिंह को राज्य से बेदखल कर दिया था। इसके विरोध में 1708 ई. में उदयपुर के देबारी नामक स्थान पर त्रिगुट समझौता हुआ:

  • शामिल शासक: 1. मेवाड़ (महाराणा अमरसिंह द्वितीय) 2. मारवाड़ (अजीत सिंह) 3. आमेर (सवाई जयसिंह द्वितीय)।
  • ऐतिहासिक शर्त: अमरसिंह द्वितीय ने अपनी पुत्री चंद्रकुँवरी का विवाह सवाई जयसिंह से इस शर्त पर किया कि चंद्रकुँवरी से उत्पन्न पुत्र (माधोसिंह I) ही जयपुर का अगला राजा बनेगा।
  • परिणाम: तीनों रियासतों की संयुक्त सेना ने आमेर व जोधपुर पर पुनः अधिकार कर लिया, लेकिन आगे चलकर इसी शर्त के कारण जयपुर में भीषण गृहयुद्ध हुआ।

🏰 जयपुर नगर की स्थापना (18 नवंबर 1727 ई.)

  • स्थापना तिथि: 18 नवंबर 1727 (नींव का पहला पत्थर जगन्नाथ सम्राट द्वारा रखा गया)।
  • वास्तुकार: बंगाल के महान वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य
  • नगर नियोजन: जयपुर भारत का प्रथम योजनाबद्ध शहर है, जो 'नौ वर्गों के सिद्धांत' (Grid System) पर बसाया गया है।

🔭 5 वेधशालाएँ (जंतर-मंतर) – खगोलशास्त्र में योगदान

1. दिल्ली (1724 ई. - सबसे प्राचीन)
2. जयपुर (1728 ई. - बड़ी, UNESCO 2010)
3. उज्जैन
4. वाराणसी
5. मथुरा
📐 सवाई जयसिंह के प्रमुख खगोलीय व साहित्यिक विद्वान:
  • सम्राट जगन्नाथ: इन्होंने ग्रीक खगोलशास्त्री टॉलेमी के ग्रंथ 'अलमाजेस्ट' का संस्कृत अनुवाद 'सिद्धान्त कौस्तुभ' नाम से किया तथा 'सिद्धान्त सम्राट' ग्रंथ लिखा।
  • केवलराम: इन्होंने पश्चिमी गणित ग्रंथ (Logarithm) का संस्कृत अनुवाद 'विभाग सारणी' नाम से किया।
  • पुण्डरीक रत्नाकर: 'जयसिंह कल्पद्रुम' ग्रंथ के रचयिता तथा सवाई जयसिंह के 1740 ई. अश्वमेध यज्ञ के मुख्य पुरोहित।
  • नयनसुख उपाध्याय: यूक्लिड की रेखागणित का अरबी से संस्कृत अनुवाद ('उकर') किया।

6. उत्तराधिकार संघर्ष: सवाई ईश्वरी सिंह एवं सवाई माधोसिंह प्रथम

सवाई जयसिंह द्वितीय की मृत्यु (1743 ई.) के बाद देबारी समझौते की शर्त के कारण उनके दो पुत्रों - सवाई ईश्वरी सिंह (ज्येष्ठ पुत्र) एवं सवाई माधोसिंह प्रथम (चंद्रकुँवरी के पुत्र) के मध्य जयपुर गद्दी हेतु भीषण संघर्ष हुआ।

⚔️ 6.1 सवाई ईश्वरी सिंह (1743 – 1750 ई.) एवं ईसरलाट का निर्माण

  • राजमहल का युद्ध (मार्च 1747 ई. - टोंक): ईश्वरी सिंह ने मेवाड़, मारवाड़, कोटा, बूंदी व मराठों की संयुक्त सेना (माधोसिंह I समर्थित) को करारी शिकस्त दी।
  • ईसरलाट (सरगासूली) निर्माण: राजमहल युद्ध विजय की स्मृति में सवाई ईश्वरी सिंह ने जयपुर के त्रिपोलिया बाज़ार में 7 मंजिला 'ईसरलाट' (सरगासूली) का निर्माण करवाया।
  • बागरू का युद्ध (1748 ई.): इस युद्ध में मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर के सहयोग से माधोसिंह I ने ईश्वरी सिंह को हराया तथा 4 परगने हासिल किए।
  • ऐतिहासिक आत्महत्या (दिसंबर 1750 ई.): मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर के जयपुर पर चढ़ाई करने तथा भारी आर्थिक माँग (खिराज) के दबाव से तंग आकर सवाई ईश्वरी सिंह ने अपनी रानियों व जलचरों सहित 'ईसरलाट' से कूदकर आत्महत्या कर ली। (जयपुर इतिहास की एकमात्र दुखद घटना)।

👑 6.2 सवाई माधोसिंह प्रथम (1750 – 1768 ई.) – सवाई माधोपुर के संस्थापक

  • मराठों का कत्लेआम (1751 ई.): ईश्वरी सिंह की मृत्यु के बाद जयपुर में घुसे 1500 से अधिक मराठों को जयपुर की जनता ने एक ही दिन में मौत के घाट उतार दिया।
  • सवाई माधोपुर नगर स्थापना (1763 ई.): 1763 ई. में रणथंभोर के निकट सवाई माधोपुर शहर की स्थापना की।
  • भटवाड़ा का युद्ध (1761 ई.): कोटा के राजा शत्रुशाल हाड़ा (सेनापति झाला ज़ालिम सिंह) से रणथंभोर दुर्ग के अधिकार को लेकर युद्ध हुआ जिसमें माधोसिंह I की पराजय हुई।
  • मोती डूंगरी महल: जयपुर में मोती डूंगरी के महलों का निर्माण करवाया।

7. सवाई प्रताप सिंह (1778 – 1803 ई.) – हवामहल व गुणीजन ख़ाना

🏛️ हवामहल का निर्माण (1799 ई.)

वास्तुकार: लालचंद उस्ता।

मंजिलें (5 मंजिला): 1. शरद मंदिर 2. रतन मंदिर 3. विचित्र मंदिर 4. प्रकाश मंदिर 5. हवा मंदिर।

झरोखे व खिड़कियाँ: 953 झरोखे एवं 365 खिड़कियाँ।

उद्देश्य: रानियों द्वारा तीज-गणगौर की सवारी देखने हेतु बिना नींव के निर्मित।

🎨 'गन्धर्व बाईसी' / गुणीजन ख़ाना: सवाई प्रताप सिंह स्वयं 'ब्रजनिधि' उपनाम से कविताएँ लिखते थे। इनके दरबार में 22 कवियों व गुणीजनों का समूह 'गन्धर्व बाईसी' रहता था।
⚔️ प्रमुख युद्ध: 1. तुंगा का युद्ध (1787 ई.): मराठा सेनापति महादजी सिंधिया को पराजित किया।
2. पाटन का युद्ध (1790 ई.): मराठों से पराजित।

8. उत्तरवर्ती कछवाहा शासक (रामसिंह II, माधोसिंह II व मानसिंह II)

👑 8.1 सवाई रामसिंह द्वितीय (1835 – 1880 ई.) – 'जयपुर को गुलाबी रंग' व आधुनिक सुधारक

  • गुलाबी (गेरुआ) रंग (1876 ई.): प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर संपूर्ण जयपुर शहर को गेरुआ/गुलाबी रंग से पुतवाया। (स्टेन्ले रीड ने इसे 'पिंक सिटी' कहा)।
  • 1857 की क्रांति: अंग्रेजों की सहायता पर अंग्रेजों ने इन्हें 'सितार-ए-हिंद' की उपाधि दी।
  • मदरसा-ए-हुनरी (1857 ई.): स्थापना की जो आगे चलकर 'राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स' बना।
  • अल्बर्ट हॉल (1876 ई.): नींव रखी गई (वास्तुकार: सैम्युअल स्विंटन जैकब)।

👑 8.2 सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880 – 1922 ई.) – 'बब्बर शेर' व चाँदी के गंगालज

सवाई माधोसिंह द्वितीय को अपने दानशील स्वभाव व विशाल व्यक्तित्व के कारण 'बब्बर शेर' या 'बबाज़्यू' कहा जाता था।

  • विश्व के सबसे बड़े चाँदी के पात्र (गंगालज): 1902 ई. में एडवर्ड सप्तम के राज्याभिषेक समारोह में भाग लेने इंग्लैंड जाते समय गंगाजल ले जाने हेतु चाँदी के दो विशाल बर्तन बनवाए जो आज भी सिटी पैलेस (जयपुर) में रखे हैं (गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड)।
  • मुबारक महल (सिटी पैलेस): जयपुर सिटी पैलेस में अतिथियों के स्वागत हेतु 'मुबारक महल' बनवाया जो राजपूत, मुग़ल एवं यूरोपीय स्थापत्य कला का सुंदर मिश्रण है।
  • नाहरगढ़ के 9 महल: अपनी 9 पासवानों (प्रेमिकाओं) के लिए नाहरगढ़ दुर्ग में एक जैसी विक्टोरिया शैली के 9 महल बनवाए।
  • बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU): मदन मोहन मालवीय को BHU निर्माण हेतु ₹5 लाख की आर्थिक सहायता दी।

👑 8.3 सवाई मानसिंह द्वितीय (1922 – 1949 ई.) – प्रथम राजप्रमुख

30 मार्च 1949 को वृहत् राजस्थान के गठन पर इन्हें राजस्थान का प्रथम व एकमात्र 'राजप्रमुख' बनाया गया। इनकी पत्नी महारानी गायत्री देवी थीं।

9. आमेर व जयपुर की स्थापत्य कला एवं चित्रशैली (Art & Culture)

🏛️ प्रमुख स्थापत्य स्मारक

  • जयगढ़ दुर्ग: सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित (जयबाण तोप स्थित)।
  • नाहरगढ़ दुर्ग: सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित (9 महल माधोसिंह II द्वारा)।
  • ईसरलाट (सरगासूली): सवाई ईश्वरी सिंह द्वारा 1747 ई. में निर्मित।
  • जलमहल: मानसागर झील में सवाई जयसिंह द्वारा निर्मित।

🎨 जयपुर चित्रशैली व हस्तकला

  • साहिबराम: ईश्वरी सिंह का आदमकद (Life-size) पोर्ट्रेट चित्र बनाने वाला चित्रकार।
  • ब्लू पॉटरी: प्रसिद्ध कलाकार पद्मश्री कृपाल सिंह शेखावत।
  • मीनाकारी: लाहौर से मानसिंह प्रथम द्वारा लाई गई।

10. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)

📌 अति-महत्वपूर्ण तथ्य

  • देबारी समझौता (1708 ई.): मेवाड़ (अमरसिंह II), मारवाड़ (अजीत सिंह) व आमेर (जयसिंह II) के मध्य।
  • ईसरलाट (सरगासूली): राजमहल युद्ध (1747) विजय पर ईश्वरी सिंह द्वारा निर्मित; 1750 में इसी से कूदकर आत्महत्या की।
  • सवाई माधोपुर शहर: 1763 ई. में सवाई माधोसिंह प्रथम द्वारा बसाया गया।
  • चाँदी के विशाल गंगालज: 1902 में सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा निर्मित।

📝 RPSC में पूछे गए प्रश्न

  • सिद्धान्त कौस्तुभ: सवाई जयसिंह के दरबारी सम्राट जगन्नाथ द्वारा रचित ग्रंथ।
  • नाहरगढ़ के 9 महल: सवाई माधोसिंह द्वितीय द्वारा अपनी 9 पासवानों के लिए निर्मित।
  • हवामहल: 1799 ई. (सवाई प्रताप सिंह, 5 मंजिला, 953 झरोखे)।
  • जयपुर स्थापना: 18 नवंबर 1727 (वास्तुकार: विद्याधर भट्टाचार्य)।
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

कछवाहा राजवंश से संबंधित महत्वपूर्ण परीक्षा प्रश्नोत्तर

देबारी समझौता 1708 ई. में मेवाड़ महाराणा अमरसिंह द्वितीय, मारवाड़ के अजीत सिंह और आमेर के सवाई जयसिंह द्वितीय के मध्य हुआ था। इसकी मुख्य शर्त यह थी कि महाराणा अमरसिंह द्वितीय की पुत्री चंद्रकुँवरी से उत्पन्न पुत्र (माधोसिंह I) ही आमेर/जयपुर का अगला राजा बनेगा।
सवाई ईश्वरी सिंह ने दिसंबर 1750 ई. में ईसरलाट (सरगासूली) से कूदकर आत्महत्या की थी। इसका कारण मराठा सेनापति मल्हारराव होलकर द्वारा जयपुर पर बार-बार आक्रमण करना तथा अत्यधिक धन (खिराज) की माँग का भारी दबाव था।
सवाई माधोसिंह प्रथम (1750-1768 ई.): इन्होंने 1763 ई. में सवाई माधोपुर नगर बसाया तथा भटवाड़ा का युद्ध लड़ा।
सवाई माधोसिंह द्वितीय (1880-1922 ई.): इन्हें 'बब्बर शेर' कहा जाता था। इन्होंने 1902 में इंग्लैंड जाते समय चाँदी के विशाल गंगालज पात्र बनवाए तथा नाहरगढ़ में 9 एक जैसे महल बनवाया।
सम्राट जगन्नाथ ने यूनानी खगोलशास्त्री टॉलेमी के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'अलमाजेस्ट' का संस्कृत में अनुवाद 'सिद्धान्त कौस्तुभ' नाम से किया था तथा 'सिद्धान्त सम्राट' ग्रंथ की रचना की। इन्होंने ही 1727 ई. में जयपुर स्थापना का पहला पत्थर रखा था।

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