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कालीबंगा – सिंधु घाटी सभ्यता की तीसरी राजधानी

कालीबंगा सभ्यता notes :
खोज, उत्खनन, पुरातात्विक साक्ष्य एवं नगर योजना

कालीबंगा (Kalibangan) राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में प्राचीन सरस्वती (घग्घर) नदी के तट पर स्थित कांस्य युगीन हड़प्पा सभ्यता का शीर्ष स्थल है। यहाँ से विश्व में भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य (2600 ई.पू.), दोहरे जुते हुए खेत (मिश्रित फसल), ऊंट की अस्थियां, लकड़ी की नाली, 7 अग्नि वेदियां, एवं खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के प्रमाण मिले हैं। डॉ. दशरथ शर्मा ने इसे सिंधु सभ्यता की 'तीसरी राजधानी' कहा है।

ASI प्रामाणिक उत्खनन रिपोर्ट RAS / RPSC / REET उपयोगी प्राचीनतम भूकंप व जुते हुए खेत
उत्खनन (1961-69) 🏛️ ASI रिपोर्ट

कालक्रम

2400-1700 ई.पू.

नदी घाटी

घग्घर (सरस्वती)

खोज: अमलानंद घोष (1952) | उत्खनन: बी.बी. लाल व बी.के. थापर

कालीबंगा सभ्यता : Complete Test
गहन प्रामाणिक अध्ययन

कालीबंगा (हनुमानगढ़): सम्पूर्ण पुरातात्विक विश्लेषण

उत्खनन रिपोर्ट, स्तर-विन्यास, कृषि साक्ष्य, सामाजिक व्यवस्था एवं परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य।

1. भौगोलिक स्थिति एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Origin & Geography)

कालीबंगा (Kalibangan) राजस्थान के उत्तर में हनुमानगढ़ जिले (1994 से पूर्व श्रीगंगानगर का भाग) में स्थित सिंधु घाटी (हड़प्पा) सभ्यता का एक अत्यंत प्रसिद्ध और विशाल स्थल है।

  • नदी घाटी: यह प्राचीन वैदिक सरस्वती एवं दृषद्वती नदी (वर्तमान में घग्घर नदी - मृत नदी/नाली प्रदेश) के बाएं तट पर विकसित हुई थी।
  • नामकरण का अर्थ: पंजाबी और राजस्थानी भाषा में "काली + बंगा" का शाब्दिक अर्थ 'काले रंग की चूड़ियाँ' (Black Bangles) होता है। उत्खनन में यहाँ पकी मिट्टी और शीशे की बनी काली चूड़ियों के विपुल भंडार मिले हैं।
  • सिंधु सभ्यता की तीसरी राजधानी: प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने अपनी पुस्तक 'राजस्थान थ्रू द एजेस' में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बाद कालीबंगा को सिंधु साम्राज्य की 'तीसरी राजधानी' बताया है।
  • द्वि-स्तरीय सभ्यता: यहाँ से प्राक-हड़प्पा (Pre-Harappan / 2400 ई.पू.) तथा विकसित/परिपक्व हड़प्पा (Mature Harappan / 2250–1700 ई.पू.) दोनों कालों के स्पष्ट अवशेष मिले हैं।
सर्वप्रथम पहचानकर्ता: डॉ. एल.पी. टैस्सिटोरी (L.P. Tessitori) इटली के उडीने शहर के प्रसिद्ध चारण-साहित्य शोधार्थी डॉ. लुइगी पियो टैस्सिटोरी ने बीकानेर रियासत में रहते हुए सबसे पहले कालीबंगा की प्राचीन प्रागैतिहासिक महत्ता को पहचाना था, परंतु वे इसका पुरातात्विक उत्खनन न कर सके।

2. खोज एवं उत्खनन का कालक्रम (Discovery & Excavation)

1952: अमलानंद घोष द्वारा खोज

  • स्वतंत्रता के पश्चात भारत में हड़प्पा स्थलों की खोज के दौरान अमलानंद घोष (A. Ghosh) ने 1952 में कालीबंगा की विधिवत पुरातात्विक खोज की।
  • घोष ने बीकानेर के 'सोथी' (Sothi) स्थल का भी उत्खनन किया, जिसे उन्होंने 'कालीबंगा प्रथम' की संज्ञा दी।
  • सरस्वती-दृषद्वती घाटी सर्वेक्षण में लगभग 100 से अधिक प्राचीन टीलों को चिह्नित किया गया।

1961-69: ASI का वृहद उत्खनन

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के निर्देशन में बी.बी. लाल (ब्रजवासी लाल) तथा बी.के. थापर (बालकृष्ण थापर) ने 9 सत्रों में उत्खनन करवाया।
  • सहयोगी उत्खननकर्ता: एम.डी. खरे, के.एम. श्रीवास्तव, एवं एस.पी. जैन।
  • यहाँ उत्खनन कार्य कुल 5 स्तरों (Phases) में संपन्न हुआ (स्तर 1 व 2 प्राक-हड़प्पा तथा स्तर 3, 4 व 5 विकसित हड़प्पा कालीन)।

3. नगर नियोजन, स्थापत्य एवं ईंटों का अनुपात (Architecture)

🏗️ दोहरा परकोटा (Two Mounds System)

  • पश्चिमी टीला (KLB-1 / गढ़ी क्षेत्र): यह उच्च वर्ग, पुरोहितों और प्रशासनिक कार्यों हेतु सुरक्षा प्राचीर (परकोटे) से सुरक्षित दुर्ग था।
  • पूर्वी टीला (KLB-2 / निचला नगर): यहाँ आम नागरिक, व्यापारी और शिल्पी निवास करते थे।
  • दुर्लभ विशेषता: हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के विपरीत कालीबंगा में दोनों टीले अलग-अलग रक्षा प्राचीर (परकोटे) से घिरे हुए थे।
  • सड़कें: सड़कें ग्रिड पद्धति (ऑक्सफोर्ड सर्कस / शतरंज जाल) पर समकोण (90°) पर काटती थीं। मुख्य सड़कें 7.2 मीटर तक चौड़ी थीं।

🧱 ईंटों का अनुपात व अलंकृत फर्श

  • परिपक्व हड़प्पा ईंट अनुपात: 4 : 2 : 1 (लंबाई : चौड़ाई : मोटाई = 30 सेमी : 15 सेमी : 7.5 सेमी)।
  • प्राक-हड़प्पा ईंट अनुपात: 3 : 2 : 1 (30 सेमी : 20 सेमी : 10 सेमी)।
  • दीन-हीन बस्ती (Poor Settlement): मकानों के निर्माण में कच्ची (धूप में सुखाई गई) ईंटों का अधिक प्रयोग होने के कारण पुरातत्वविदों ने इसे 'दीन-हीन बस्ती' कहा।
  • अलंकृत फर्श: मकान के फर्श पर पकी ईंटों पर ज्यामितीय आकृतियों वाले अलंकृत ईंटों (Decorated Tiles) के साक्ष्य पूरे हड़प्पा में केवल कालीबंगा से मिले हैं।
  • दरवाजे: मकानों के दरवाजे मुख्य सड़क पर न खुलकर पीछे की ओर गलियों में खुलते थे।
विश्व की एकमात्र 'लकड़ी की नाली' (Wooden Drain System) कालीबंगा में घरों के गंदे पानी की निकासी के लिए लकड़ी के लट्ठों को बीच से खोखला करके बनाई गई नाली मिली है। सार्वजनिक पक्की नालियों का अभाव यहाँ की विशिष्टता थी; गंदा पानी सोखने हेतु घरों के बाहर मिट्टी के घड़ों (सोखता गड्ढे) का प्रयोग होता था।

4. कृषि साक्ष्य एवं पशुपालन (Agriculture & Animals)

🌾 दोहरे जुते हुए खेत (विश्व का प्राचीनतम साक्ष्य)

  • कालीबंगा के दक्षिण-पूर्वी भाग में प्राक-हड़प्पा स्तर से जुते हुए खेत (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं। यह विश्व में कृषि जुताई का सबसे पहला पुरातात्विक प्रमाण है।
  • खेतों में आड़ी-तिरछी (Grid pattern) दो दिशाओं में हल की नालियां बनी हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि एक साथ दो फसलें (मिश्रित फसल) उगाई जाती थीं।
  • कम दूरी वाली नालियों में चना तथा अधिक दूरी वाली नालियों में सरसों बोई जाती थी। इसके अतिरिक्त गेहूँ और जौ भी प्रमुख उपज थे।
  • लकड़ी या तांबे के फाल वाले हलों का उपयोग किया जाता था।

🐪 ऊँट की अस्थियाँ व पालतू पशु

  • ऊँट की अस्थियां (Camel Bones): कालीबंगा से ऊँट की हड्डियाँ प्रचुर मात्रा में मिली हैं, जो मरुस्थलीय वातावरण और ऊँट पालन का अकाट्य प्रमाण हैं।
  • पालतू पशुओं में गाय, कूबड़दार बैल, भेड़, बकरी, भैंस और कुत्ता शामिल थे।
  • ⚠️ घोड़े के साक्ष्य नहीं: कालीबंगा से घोड़े की हड्डियां नहीं मिली हैं (सिंधु सभ्यता में घोड़े के अस्थि अवशेष सुरकोटड़ा, गुजरात से मिले हैं)।

5. धार्मिक विश्वास, कर्मकांड एवं 7 अग्नि-वेदियाँ

🔥 7 आयताकार अग्नि-वेदियाँ (Fire Altars)

  • दुर्ग (पश्चिमी टीले) के चबूतरे पर एक कतार में 7 आयताकार अग्नि-वेदियां (हवन कुंड) प्राप्त हुई हैं।
  • इन वेदियों के भीतर राख, कोयला और पकी मिट्टी के त्रिकोणीय पिंड (Terracotta Cakes) मिले हैं। पास ही एक कुआं और स्नान चबूतरा मिला है, जो अनुष्ठानिक शुद्धि स्नान का संकेत है।
  • एक वेदी में पशुओं की जली हुई अस्थियां मिली हैं, जो बलि प्रथा की ओर संकेत करती हैं।
  • यह राजस्थान में अग्नि-पूजा की प्राचीन परंपरा को प्रमाणित करता है, जिसे सांस्कृतिक रूप से बाद में अग्नि नृत्य और हवन परंपराओं में देखा जा सकता है।

🕉️ शिव-लिंग एवं मातृदेवी का अभाव

  • मिट्टी का शिव-लिंग: कालीबंगा से योनि-पीठ सहित पकी मिट्टी का बना शिवलिंग मिला है, जो प्रारंभिक शैव धर्म का प्रमाण है।
  • 📌 मातृदेवी की मूर्तियों का पूर्ण अभाव: हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में मातृदेवी की मृण्मूर्तियां बहुतायत से मिली हैं, किंतु कालीबंगा से मातृदेवी की कोई मूर्ति नहीं मिली। यहाँ समाज पुरुष-प्रधान या यज्ञ-प्रधान प्रतीत होता है।
  • तंदूरनुमा चूल्हे: घरों में वर्तमान आधुनिक तंदूर के समान चूल्हे मिले हैं, जो रोटियां सेकने की घरेलू विधि को दर्शाते हैं।

6. कला, शिल्प, मुहरें एवं मेसोपोटामियाई व्यापार

🏺 मृद्भांड (Fabric A to F)

बी.बी. लाल ने प्राक-हड़प्पा मृद्भांडों को फ़ैब्रिक A से F (6 प्रकार) में वर्गीकृत किया। ये चाक पर बने लाल व गुलाबी रंग के बर्तन हैं जिन पर काले व सफेद रंग से ज्यामितीय चित्र बने हैं।

🔩 धातु व तांबा व्यापार

तांबे की कुल्हाड़ी, भाले और कांस्य का आक्रामक वृषभ (बैल) मिला है। कालीबंगा को कच्चा तांबा सीकर-झुंझुनू की गणेश्वर सभ्यता और खेतड़ी की खानों से प्राप्त होता था।

📜 मेसोपोटामियाई मुहर

कालीबंगा से एक बेलनाकार मुहर (Cylindrical Seal) मिली है, जो मेसोपोटामिया (सुमेरियन सभ्यता) की शैली की है। यह विदेशी सामुद्रिक व स्थलीय व्यापार का प्रमाण है।

7. शवाधान के 3 प्रकार एवं विश्व की प्राचीनतम शल्य चिकित्सा

🪦 3 प्रकार की समाधियाँ (Burial Types)

  • 1. पूर्ण शवाधान (आयतकार कब्र): मृतक को उत्तर दिशा में सिर और दक्षिण में पैर करके लिटाया जाता था। साथ में मिट्टी के बर्तन और दर्पण रखे जाते थे।
  • 2. आंशिक शवाधान (गोलाकार गड्ढे): जंगली पशु-पक्षियों के खाने के बाद बची अस्थियों को गाड़ा जाता था।
  • 3. दाह संस्कार / कलश शवाधान (Pot Burial): अस्थियों को बड़े कलश (घड़े) में रखकर मिट्टी में दफनाया जाता था।
  • चिरायु कब्र: कालीबंगा से ईंटों से चिनी गई एक आयताकार समाधि भी मिली है।

🧠 खोपड़ी की शल्य चिकित्सा (Trephination)

  • कालीबंगा के कब्रिस्तान से एक बालक की खोपड़ी मिली है, जिसमें 6 सूक्ष्म छिद्र बने हुए हैं।
  • पुरातत्वविदों के अनुसार यह मस्तिष्क शोध या जलशीर्ष (Hydrocephalus) रोग के उपचार हेतु की गई विश्व की प्राचीनतम कपाल शल्य-चिकित्सा (Brain Surgery) का प्रमाण है।
  • छिद्रों के आसपास हड्डियों के भरने (Healing) के निशान दर्शाते हैं कि सर्जरी के बाद बालक कुछ समय तक जीवित रहा था।

8. शिलालेख, लिपि एवं मुहरें (Inscriptions & Seals)

📜 भावचित्रात्मक लिपि (Boustrophedon Script)

  • कालीबंगा से प्राप्त मृद्भांडों के ठीकरों (Potsherds) पर उत्कीर्ण लिपि 'भावचित्रात्मक' (Pictographic) है।
  • लेखन शैली: यह लिपि दाएं से बाएं (Right to Left) तथा अगली पंक्ति में बाएं से दाएं लिखी जाती थी। इस पद्धति को 'बूस्ट्रोफेडन' (Boustrophedon / गोमूत्राकार) लिपि कहा जाता है। बी.बी. लाल ने ओवरलैपिंग चिह्नों के आधार पर इसे सिद्ध किया था।
  • रोटी पकाने के मिट्टी के चकले (Chakla) और मिट्टी के कंगन पर भी लिपि के 5-6 अक्षर उत्कीर्ण मिले हैं।

🏷️ स्टीटाइट व मेसोपोटामियाई मुहरें

  • कालीबंगा से सेलखड़ी (Steatite) की बनी वर्गाकार मुहरें मिली हैं, जिन पर एक-शृंगी बैल (Unicorn), वृषभ एवं बाघ के चित्र तथा ऊपर सैंधव लिपि अंकित है।
  • बेलनाकार मुहर (Cylindrical Seal): यहाँ से मेसोपोटामिया (सुमेरिया) शैली की एक बेलनाकार मुहर मिली है, जिसके ऊपर अर्द्ध-मानव और अर्द्ध-बाघ (शार्दूल) की आकृति है। यह मेसोपोटामिया के साथ प्रत्यक्ष वैदेशिक व्यापार का अकाट्य साक्ष्य है।
  • एक त्रिकोणीय मिट्टी के केक पर सींग वाले देवता और बलि हेतु बांधे गए बकरे का दृश्य उत्कीर्ण है।

9. अर्थव्यवस्था, व्यापार एवं बाट-माप (Economy, Trade & Weights)

⚖️ बाट और माप-तौल प्रणाली

  • कालीबंगा से चर्ट (Chert) और अगेट पत्थर के बने घनाकार बाट (Cubic Weights) मिले हैं।
  • यह तौल प्रणाली 16 के गुणज (1, 2, 4, 8, 16, 32, 64...) में विभाजित द्वि-आधारी (Binary) एवं दशमलव प्रणाली पर आधारित थी।
  • सोना व कीमती मणियों को तौलने हेतु छोटे शंक्वाकार बाट मिले हैं (0.48 ग्राम से 136 ग्राम तक)।
  • पैमाना (Scale): हाथीदांत और मिट्टी की बनी एक मापक पटरी (Scale) मिली है। इसके अलावा निर्माण कार्य में सीध नापने का साहुल-सूत्र (Plumb-bob) भी प्राप्त हुआ है।

📦 आंतरिक व सुदूर व्यापार संबंध

  • तांबा: सीकर की गणेश्वर सभ्यता और खेतड़ी (झुंझुनू) की खानों से आता था।
  • सीप व शंख: गुजरात के तटीय स्थलों (लोथल/धोलावीरा) से आयात किए जाते थे।
  • लापीस लाजुली (लाजवर्त मणि): बदख्शां (अफगानिस्तान) से मंगाया जाता था।
  • परिवहन के लिए दो पहियों वाली मिट्टी की बैलगाड़ी (खिलौना गाड़ी) और प्राचीन सरस्वती जलमार्ग का उपयोग होता था।

10. राजस्थान की प्रमुख सभ्यताओं की तुलनात्मक सारणी

सभ्यता का नाम जिला एवं नदी काल / युग मुख्य उत्खननकर्ता अद्वितीय पहचान / साक्ष्य
कालीबंगा हनुमानगढ़ (घग्घर/सरस्वती) कांस्य युगीन (हड़प्पा) अमलानंद घोष, बी.बी. लाल, बी.के. थापर जुते खेत, 7 अग्नि-वेदियां, भूकंप, लकड़ी की नाली
गणेश्वर सभ्यता नीम का थाना (कांतली नदी) ताम्र युगीन जननी (2800 ई.पू.) रतनचंद्र अग्रवाल (R.C. Agrawal), विजय कुमार 99% शुद्ध तांबे के तीर, मछली पकड़ने का कांटा
आहड़ सभ्यता उदयपुर (आयड़/बेड़च नदी) ताम्रवती नगरी / बनास संस्कृति अक्षय कीर्ति व्यास, आर.सी. अग्रवाल, एच.डी. सांकलिया काले-लाल मृद्भांड (BRW), तांबा गलाने की भट्ठियां
बैराठ सभ्यता कोटपूतली-बहरोड़ (बाणगंगा नदी) लौह युगीन / मौर्य / बौद्ध काल दयाराम साहनी, नीलरत्न बनर्जी, के.एन. पुरी भाब्रू शिलालेख, बीजक की पहाड़ी, गोल बौद्ध मंदिर
रंगमहल सभ्यता हनुमानगढ़ (घग्घर नदी) कुषाण एवं गुप्त काल डॉ. हन्ना रिड (स्वीडिश दल - 1952-54) गंधार शैली की मिट्टी की मूर्तियां, कुषाणकालीन सिक्के

11. पतन के कारण एवं कालक्रम (Decline of Kalibangan)

  • विश्व के प्राचीनतम भूकंप के साक्ष्य (2600 ई.पू.): प्राक-हड़प्पा स्तरों की दीवारों में गहरी दरारें और धंसे हुए चबूतरे मिले हैं। पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि इस भीषण भूकंप ने पहले नगर को विनष्ट कर दिया था।
  • सरस्वती (घग्घर) नदी का सूखना: भूगर्भीय हलचलों के कारण यमुना और सतलुज नदियों ने अपना मार्ग बदल लिया, जिससे सरस्वती नदी सूख गई और पेयजल व सिंचाई संकट पैदा हुआ।
  • जलवायु परिवर्तन व मरुस्थलीकरण: वर्षा में भारी कमी और थार मरुस्थल के प्रसार के कारण सभ्यता लगभग 1750 ईसा पूर्व के आसपास उजड़ गई।
  • कालांतर में इसी घग्घर घाटी में लौह युगीन PGW संस्कृति और कुषाणकालीन रंगमहल सभ्यता फली-फूली।

12. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Facts for RPSC/RAS)

📌 अति-महत्वपूर्ण स्मरणीय तथ्य

  • कालीबंगा का जिला: हनुमानगढ़ (घग्घर नदी का बायां तट)।
  • खोजकर्ता: अमलानंद घोष (1952)। उत्खननकर्ता: बी.बी. लाल व बी.के. थापर (1961-69)।
  • तीसरी राजधानी: डॉ. दशरथ शर्मा ने घोषित किया।
  • दोहरे जुते हुए खेत: विश्व का प्रथम साक्ष्य (चना और सरसों की फसल)।
  • ईंटों का अनुपात: 4:2:1 (हड़प्पा काल) और 3:2:1 (प्राक-हड़प्पा)।
  • लकड़ी की नाली: भारत में लकड़ी की जल निकासी नाली का एकमात्र स्थल।

📝 विगत RPSC परीक्षाओं के प्रश्न

  • भूकंप के साक्ष्य: 2600 ई.पू. के दरारदार परकोटे के साक्ष्य।
  • ऊँट की हड्डियाँ: राजस्थान के कालीबंगा से प्राप्त हुईं।
  • घोड़े की हड्डियाँ: कालीबंगा से नहीं मिलीं (सुरकोटड़ा से मिलीं)।
  • मातृदेवी की मूर्तियाँ: कालीबंगा से अनुपस्थित (नहीं मिलीं)।
  • कपाल शल्य चिकित्सा: 6 छिद्रों वाली बालक की खोपड़ी मिली।
  • कालीबंगा संग्रहालय: 1983 में हनुमानगढ़ में पुरातात्विक सामग्री के संरक्षण हेतु स्थापित किया गया।
प्रामाणिक इतिहास अभ्यास विगत 15 वर्षों के RPSC/RSMSSB प्रश्न

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परीक्षा में महत्व

कालीबंगा सभ्यता परीक्षा हेतु महत्वपूर्ण क्यों है?

कालीबंगा राजस्थान के प्राचीन इतिहास और सिंधु घाटी सभ्यता के अध्ययन का मुख्य आधार स्तंभ है। RPSC RAS, CET, REET, Patwar और Police Constable में इस स्थल से सीधे प्रश्न पूछे जाते हैं।

  • 1 विश्व का प्राचीनतम भूकंपीय साक्ष्य: लगभग 2600 ईसा पूर्व की दीवारों में भूकंपीय दरारें।
  • 2 उत्खननकर्ता: अमलानंद घोष (1952) एवं बी.बी. लाल व बी.के. थापर (1961-69) – बार-बार पूछा जाने वाला तथ्य।
  • 3 तकनीकी उपलब्धि: 4:2:1 अनुपात की ईंटें, लकड़ी की नाली, और अलंकृत फर्श – प्राचीन स्थापत्य का बेजोड़ नमूना।
  • 4 सिंधु साम्राज्य की तीसरी राजधानी: डॉ. दशरथ शर्मा द्वारा दिया गया प्रसिद्ध ऐतिहासिक दर्जा।
  • 5 कपाल शल्य चिकित्सा: 6 छिद्रों वाली बालक की खोपड़ी – प्राचीन भारत में चिकित्सा विज्ञान का प्रमाण।

प्राचीनतम भूकंप

2600 ई.पू. के साक्ष्य

दोहरे जुते खेत

चना एवं सरसों की मिश्रित फसल

7 अग्नि वेदियां

हवन कुंड व बलि प्रथा

शल्य चिकित्सा

6 छिद्रों वाली खोपड़ी

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

कालीबंगा सभ्यता से संबंधित महत्वपूर्ण परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर।

कालीबंगा को सबसे पहले प्रागैतिहासिक स्थल के रूप में इतालवी भाषाविद डॉ. एल.पी. टैस्सिटोरी ने पहचाना था। स्वतंत्रता के बाद 1952 ई. में इसकी विधिवत पुरातात्विक खोज अमलानंद घोष (A. Ghosh) द्वारा की गई।
कालीबंगा का व्यापक उत्खनन 1961 से 1969 के मध्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के बी.बी. लाल (ब्रजवासी लाल) तथा बी.के. थापर (बालकृष्ण थापर) के निर्देशन में संपन्न हुआ। यहाँ कुल 5 स्तरों (Phases) में उत्खनन किया गया था।
अद्वितीय साक्ष्य: विश्व में भूकंप के प्राचीनतम साक्ष्य (2600 ई.पू.), एक साथ दो फसलें उगाने वाले दोहरे जुते हुए खेत, लकड़ी की बनी जल निकासी नाली, 7 आयताकार अग्नि-वेदियां (हवन कुंड), ऊँट की अस्थियां, बालक की खोपड़ी में 6 छेद (शल्य चिकित्सा/हाइड्रोसिफैलिस के प्रमाण) तथा अलंकृत फर्श (ज्यामितीय ईंटें)।
नहीं, कालीबंगा से घोड़े की हड्डियाँ नहीं मिली हैं। कालीबंगा ऊँट की अस्थियों (Camel Bones) के लिए प्रसिद्ध है। हड़प्पा सभ्यता में घोड़े के वास्तविक अस्थि अवशेष गुजरात के सुरकोटड़ा (Surkotada) से प्राप्त हुए हैं।
परिपक्व हड़प्पा काल में कालीबंगा की ईंटों का अनुपात 4:2:1 (30 सेमी × 15 सेमी × 7.5 सेमी) था, जो मानक हड़प्पा ईंट थी। वहीं प्राक-हड़प्पा काल में ईंटों का अनुपात 3:2:1 (30 सेमी × 20 सेमी × 10 सेमी) पाया गया है।
इतिहासकार डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा के सुदृढ़ नगर नियोजन (दोहरा परकोटा), 7 अग्नि-वेदियों, विस्तृत व्यापारिक महत्व और कृषि उत्पादन के आधार पर इसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के बाद सिंधु साम्राज्य की 'तीसरी राजधानी' कहा था।

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