मुगल-राजपूत संबंध एवं प्रतिरोध:
संधियाँ, मनसबदारी, स्वाभिमान व संघर्ष (1527–1708)
बाबर व सांगा के खानवा युद्ध (1527) से लेकर अकबर की सुलह-ए-कुल नीति, नागौर दरबार (1570), महाराणा प्रताप व चंद्रसेन का अप्रतिम प्रतिरोध, मानसिंह की 7000 मनसबदारी, मेवाड़-मुगल संधि (1615), पुरंदर संधि (1665), दुर्गादास राठौड़ का 30 वर्षीय संघर्ष एवं देबारी समझौता (1708) का 100% प्रामाणिक विश्लेषण।
प्रथम संधि (आमेर)
1562 ई.
मेवाड़ संधि
1615 ई.
सर्वोच्च मनसब: 7000 (मानसिंह कछवाहा) | देबारी समझौता: 1708
1. प्रारंभिक संपर्क एवं पृष्ठभूमि (बाबर व हुमायूँ काल)
मुगल-राजपूत संबंधों का प्रारंभ 16वीं शताब्दी के आरंभ में टकराव के साथ हुआ। पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) के बाद भारत में मुगलों का सबसे बड़ा और शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी मेवाड़ के महाराणा सांगा थे।
बयाना का युद्ध (16 फरवरी 1527 ई.)
स्थान: भरतपुर। महाराणा सांगा ने बाबर के सेनापति मेहंदी ख्वाजा को पराजित कर बयाना दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में राजपूतों के शौर्य से मुगल सेना अत्यंत भयभीत हो गई थी।
खानवा का ऐतिहासिक युद्ध (17 मार्च 1527 ई.)
स्थान: रूपवास (भरतपुर)। बाबर ने अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने हेतु 'जिहाद' का नारा दिया, शराब न पीने की कसम खाई तथा मुसलमानों से 'तमगा कर' समाप्त किया।
📌 खानवा युद्ध के प्रमुख ऐतिहासिक बिंदु:
- पाती परवन प्रथा: सांगा ने प्राचीन राजपूत परम्परा के अनुसार राजस्थान के सभी राजाओं को युद्ध में आमंत्रित किया (मारवाड़ से मालदेव, बीकानेर से कल्याणमल, आमेर से पृथ्वीराज, चंदेरी से मेदिनीराय, मेवात से हसन खां मेवाती, महमूद लोदी आदि)।
- बाबर की युद्ध नीति: तुलुगमा पद्धति (उज्बेक शैली) तथा तोपखाने (तोपची: मुस्तफा व उस्ताद अली) का प्रयोग।
- विश्वासघात व परिणाम: रायसीन के सलहदी तंवर व नागौर के खानजादा के विश्वासघात तथा सांगा के घायल होने पर काठियावाड़ के झाला अज्जा ने राजचिह्न धारण किए। बाबर विजयी हुआ और उसने 'गाजी' की उपाधि धारण की।
हुमायूँ एवं रानी कर्मावती (1535 ई.): गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के चित्तौड़ पर आक्रमण के समय सांगा की विधवा रानी कर्मावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता मांगी थी। हुमायूँ समय पर नहीं पहुंचा, परिणामस्वरूप चित्तौड़ का दूसरा साका (1535 ई.) संपन्न हुआ (केसरिया: रावत बाघ सिंह, जौहर: कर्मावती)।
2. अकबर की राजपूत नीति एवं प्रथम संधियाँ (1562–1570 ई.)
अकबर ने समझा कि अफगानों और आंतरिक विद्रोहों के दमन तथा भारत में सुदृढ़ साम्राज्य स्थापना हेतु वीर व निष्ठावान राजपूतों का सहयोग अनिवार्य है। उसने 'सुलह-ए-कुल' (सर्वधर्म सद्भाव), वैवाहिक संबंधों एवं आंतरिक स्वायत्तता की नीति अपनाई।
1. आमेर से प्रथम वैवाहिक व राजनीतिक संधि (1562 ई.)
आमेर के राजा भारमल ने चगताई खां के सहयोग से जनवरी 1562 में सांगानेर में अकबर से भेंट की तथा मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाले राजस्थान के प्रथम शासक बने। फरवरी 1562 में सांभर में अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरखाबाई (शाही नाम: मरियम-उज-जमानी) का विवाह अकबर से किया। इसी से जहांगीर (सलीम) का जन्म हुआ।
2. रणथंभोर के हाड़ा चौहानों से संधि (1569 ई.)
अकबर ने रणथंभोर दुर्ग का घेरा डाला। आमेर के कुंवर मानसिंह व भगवानदास की मध्यस्थता से बूँदी के शासक राव सुरजन हाड़ा ने संधि की (शर्त: दोलतखाने में झाड़ू न लगाना, स्त्रियों को हरम में न भेजना आदि स्वाभिमान की रक्षा)।
3. ऐतिहासिक 'नागौर दरबार' (नवंबर 1570 ई.) – जल-विभाजक बिंदु
अकबर ने अकाल राहत कार्य के बहाने नागौर में दरबार लगाया और 'शुक्र तालाब' बनवाया। इस दरबार में राजस्थान के अधिकांश राजाओं ने मुगलों की अधीनता स्वीकार की:
• बीकानेर: राव कल्याणमल एवं उनके पुत्र रायसिंह व पृथ्वीराज राठौड़।
• जैसलमेर: रावल हरराज भाटी।
• जोधपुर: मोटा राजा उदयसिंह व राम।
• अपवाद: मारवाड़ के राव चंद्रसेन नागौर दरबार में आए किंतु अकबर का कूटनीतिक रुख देखकर बिना अधीनता स्वीकार किए दरबार छोड़कर चले गए।
3. प्रतिरोध के दो अमर महानायक – राव चंद्रसेन एवं महाराणा प्रताप
⚔️ राव चंद्रसेन (मारवाड़ – 1562–1581 ई.) – 'मारवाड़ का प्रताप'
भूला-बिसरा राजा- नागौर दरबार (1570) का विरोध कर भाद्राजूण, सिवाना (जालौर), पोकरण व सारण (पाली) की पहाड़ियों से 1564 से 1581 ई. तक निरंतर 17 वर्षों तक मुगलों के विरुद्ध छापामार युद्ध लड़ा।
- इन्होंने आर्थिक तंगी में पोकरण दुर्ग को जैसलमेर के हरराज को 1 लाख फदियों में गिरवी रखा था।
- इन्हें 'महाराणा प्रताप का अग्रगामी/पथ-प्रदर्शक' एवं 'मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा' (Forgotten Hero) कहा जाता है। 1581 ई. में सिच्याई (पाली) में इनका देहांत हुआ।
👑 महाराणा प्रताप (मेवाड़ – 1572–1597 ई.) – स्वाभिमान का प्रतीक
हिंदुआ सूरजअकबर द्वारा संधि हेतु भेजे गए 4 शिष्टमंडल (क्रम: जलाल खां कोरची [1572], कुंवर मानसिंह [1573], भगवानदास [1573], टोडरमल [1573] – ट्रिक: 'जमाभाटो') को प्रताप ने स्वाभिमानपूर्वक ठुकरा दिया।
हल्दीघाटी का युद्ध (18/21 जून 1576 ई.)
सेनापति: मानसिंह vs महाराणा प्रताप। हरावल सेनापति: हकीम खां सूर। भील सेनापति: पूंजा भील। चेतक के घायल होने पर झाला बीदा ने मुकुट धारण किया। (बदायूंनी: 'गोगुंदा का युद्ध', अबुल फजल: 'खमनौर का युद्ध', टॉड: 'थर्मोपल्ली')।
दिवेर का युद्ध (अक्टूबर 1582 ई.)
कुंवर अमर सिंह ने मुगल थानेदार सुल्तान खां को भाले के एक वार से घोड़े सहित चीर दिया। कर्नल टॉड ने इसे 'मेवाड़ का मैराथन' कहा। इसके बाद प्रताप ने 1585 में चावंड को राजधानी बनाया।
4. मुगल सेवा, सर्वोच्च मनसबदारी एवं प्रमुख सैन्य विजय (सहयोग काल)
👑 मानसिंह प्रथम (आमेर)
7000 मनसबदार- अकबर द्वारा 'फर्जंद' (बेटा) एवं 'मिर्जा राजा' की उपाधि।
- मुगल साम्राज्य में मिर्जा अजीज कोका के साथ सर्वाधिक 7,000 जात व 6,000 सवार का मनसब।
- काबुल (रोशनाई विद्रोह दमन), बिहार (1587), उड़ीसा (1592) एवं बंगाल (1594) के सूबेदार रहे। बंगाल में अकबरनगर (राजमहल) बसाया।
- पूर्वी बंगाल के राजा केदार को हराकर प्रसिद्ध शीला माता की प्रतिमा आमेर लाए।
👑 महाराजा रायसिंह (बीकानेर)
5000 मनसबदार- मुंशी देवीप्रसाद ने इन्हें 'राजपूताने का कर्ण' कहा।
- अकबर व जहांगीर के विश्वस्त; 5,000 का मनसब।
- 1572-1574 तक जोधपुर के प्रशासक रहे। गुजरात के मिर्जाओं का दमन तथा काबुल व कंधार अभियानों में प्रमुख भूमिका।
- जूनागढ़ दुर्ग के सूरजपोल पर जयमल-फत्ता की गजारूढ़ मूर्तियां स्थापित करवाईं।
5. जहांगीर व शाहजहाँ काल – मेवाड़ संधि (1615) एवं पुरंदर की संधि (1665)
📜 मेवाड़-मुगल संधि (5 फरवरी 1615 ई.)
ऐतिहासिक संधिशासक: महाराणा अमर सिंह प्रथम एवं मुगल बादशाह जहांगीर (शहजादा खुर्रम व शुभकरण-हरिदास झाला की मध्यस्थता)।
1. महाराणा स्वयं मुगल दरबार में उपस्थित नहीं होंगे, उनके स्थान पर युवराज (कुंवर कर्ण सिंह) उपस्थित होंगे।
2. मुगलों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने की कोई बाध्यता नहीं होगी।
3. चित्तौड़ दुर्ग मेवाड़ को वापस लौटाया जाएगा, परंतु सामरिक दृष्टि से उसकी मरम्मत या किलेबंदी नहीं की जाएगी।
4. मेवाड़ 1,000 घुड़सवारों की सैन्य टुकड़ी मुगल सेवा में रखेगा तथा युवराज को 5,000 का मनसब मिलेगा।
🛡️ मिर्जा राजा जयसिंह (1621–1667) एवं पुरंदर की संधि (1665 ई.)
46 वर्ष सेवाजयसिंह ने 3 मुगल बादशाहों (जहांगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब) की सेवा की। शाहजहाँ ने 1637 में शुजा के विरुद्ध कंधार अभियान पर इन्हें 'मिर्जा राजा' की पदवी दी।
6. औरंगजेब काल – टकराव, जजिया विरोध एवं 'राठौड़-सिसोदिया गठबंधन'
औरंगजेब की धार्मिक कट्टरता (मंदिर तोड़ो अभियान व 1679 में जजिया कर पुनः लगाना) तथा मारवाड़ को खालसा घोषित करने के कारण राजपूत-मुगल संबंधों में भारी दरार आ गई।
👑 महाराणा राजसिंह (मेवाड़ – 1652–1680)
- चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत करवाकर 1615 संधि की शर्त तोड़ी।
- औरंगजेब के जजिया कर (1679) के विरुद्ध ऐतिहासिक विरोध-पत्र लिखा।
- किशनगढ़ की राजकुमारी चारुमती से औरंगजेब की इच्छा के विरुद्ध विवाह किया।
- मथुरा से लाई गई श्रीनाथजी (सिहाड़/नाथद्वारा) व द्वारकाधीश (कांकरोली) की मूर्तियों को संरक्षण देकर मंदिर बनवाए।
- विश्व की सबसे बड़ी 'राजप्रशस्ति' (25 काले पाषाणों पर रणछोड़ भट्ट तैलंग द्वारा संस्कृत महाकाव्य) राजसमंद झील पर उत्कीर्ण करवाई।
⚔️ वीर दुर्गादास राठौड़ (30 वर्षीय संघर्ष)
- जसवंत सिंह की मृत्यु (1678) पर औरंगजेब ने कहा: "आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया।"
- दुर्गादास ने गोरा धाय (मारवाड़ की पन्नाधाय) की मदद से शिशु अजीत सिंह को दिल्ली से सकुशल निकाला।
- 1678 से 1707 तक लगातार 30 वर्षों तक मुगलों से स्वाधीनता संग्राम लड़ा।
- राठौड़-सिसोदिया गठबंधन (1679 ई.): महाराणा राजसिंह व दुर्गादास ने संयुक्त मोर्चा बनाकर औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर को अपने पक्ष में कर विद्रोह करवाया।
- कर्नल टॉड ने दुर्गादास को 'राठौड़ों का यूलीसेस' एवं 'मारवाड़ का अणबींध्या मोती' कहा।
7. उत्तर-मुगल काल – 'देबारी समझौता' (1708) एवं सवाई जयसिंह द्वितीय
🤝 देबारी समझौता (उदयपुर – 1708 ई.)
मुगल बादशाह बहादुरशाह प्रथम द्वारा आमेर (मोमिनाबाद) व जोधपुर को छीनने के बाद 3 प्रमुख रियासतों ने देबारी (उदयपुर) में ऐतिहासिक त्रिगुट बनाया:
1. मेवाड़: महाराणा अमर सिंह द्वितीय | 2. मारवाड़: अजीत सिंह | 3. आमेर: सवाई जयसिंह द्वितीय।
विवाह शर्त: महाराणा अमर सिंह द्वितीय की पुत्री चंद्रकुंवरी का विवाह सवाई जयसिंह से इस शर्त पर हुआ कि उससे उत्पन्न पुत्र (माधोसिंह) ही आमेर का राजा बनेगा (जिसने बाद में ईश्वरी सिंह व माधोसिंह के मध्य राजमहल व बगरू के गृहयुद्ध को जन्म दिया)।
👑 सवाई जयसिंह द्वितीय (1699–1743 ई.) – कूटनीतिज्ञ व खगोलशास्त्री
- औरंगजेब ने इनकी वाकपटुता से प्रभावित होकर 'सवाई' की उपाधि दी। इन्होंने 7 मुगल बादशाहों का शासनकाल देखा।
- 18 नवंबर 1727 को वास्तुकार विद्याधर भट्टाचार्य के नक्शे पर जयपुर नगर की स्थापना की।
- भारत में 5 खगोलीय वेधशालाएं (जंतर-मंतर) बनवाईं: जयपुर, दिल्ली, उज्जैन, मथुरा, वाराणसी।
- 1740 ई. में भारत का अंतिम वैदिक अश्वमेध यज्ञ करवाया (पुरोहित: पुंडरीक रत्नाकर)।
- मराठों के विरुद्ध राजस्थान के राजाओं को संगठित करने हेतु 17 जुलाई 1734 को भीलवाड़ा में 'हुरड़ा सम्मेलन' आयोजित किया।
8. प्रशासनिक व्यवस्था – वतन जागीर एवं प्रमुख मनसबदारों की तुलनात्मक तालिका
मुगलों ने राजपूत शासकों के पैतृक क्षेत्रों को 'वतन जागीर' (Watan Jagir) के रूप में मान्यता दी, जो वंशानुगत होती थी और सामान्यतः स्थानांतरित नहीं की जाती थी।
| शासक का नाम | रियासत | प्राप्त सर्वोच्च मनसब | मुगल उपाधि / विशेष भूमिका |
|---|---|---|---|
| मानसिंह प्रथम | आमेर | 7,000 जात / 6,000 सवार | 'फर्जंद' व 'मिर्जा राजा' (काबुल, बंगाल, बिहार विजय) |
| महाराजा रायसिंह | बीकानेर | 5,000 जात / 5,000 सवार | 'राजपूताने का कर्ण' (जोधपुर व दक्षिण प्रशासक) |
| मिर्जा राजा जयसिंह | आमेर | 5,000 जात / 5,000 सवार | 'मिर्जा राजा' (पुरंदर संधि 1665 के कर्ताधर्ता) |
| महाराजा जसवंत सिंह I | मारवाड़ | 6,000 जात / 6,000 सवार | 'महाराजा' (धरमत युद्ध व जमरूद अभियान) |
| सवाई जयसिंह द्वितीय | आमेर/जयपुर | 7,000 जात / 7,000 सवार | 'सवाई' व 'राज राजेश्वर' (मालवा सूबेदार) |
| महाराजा अनूप सिंह | बीकानेर | 3,500 जात | 'माही मरातिब' (दक्षिण अभियान में औरंगजेब द्वारा) |
9. सांस्कृतिक समन्वय – स्थापत्य, चित्रकला एवं साहित्य पर प्रभाव
1. स्थापत्य कला
राजपूत प्रसादों में मुगल शैली के मेहराब, खंभेदार बारहदरी, संगमरमर की पच्चीकारी, शीशमहल एवं चारबाग पद्धति के उद्यान अपनाए गए।
• उदाहरण: आमेर का शीशमहल (दीवान-ए-खास), बीकानेर का अनूप महल, उदयपुर का जनाना महल।
2. चित्रकला
चित्रों में मुगल दरबारी वेशभूषा, पारदर्शी वस्त्र, शिकार के दृश्य व प्राकृतिक पृष्ठभूमि शामिल हुई।
• बीकानेर शैली: मुगल उस्ताद कलाकारों द्वारा उस्ता कला व मथेरण कला का विकास।
• जयपुर शैली: साहिबराम द्वारा आदमकद (पोर्ट्रेट) चित्र।
3. साहित्य व भाषा
संस्कृत, डिंगल व फारसी का अनुपम संगम हुआ।
• महाकवि बिहारी कृत 'बिहारी सतसई' (मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में)।
• पृथ्वीराज राठौड़ कृत 'वेलि क्रिसन रुकमणी री'।
10. विगत वर्षों के RPSC / RSMSSB परीक्षा प्रश्न (व्याख्या सहित)
उत्तर: 1. जलाल खां (1572) ➔ 2. मानसिंह (1573) ➔ 3. भगवानदास (1573) ➔ 4. टोडरमल (1573)। (शॉर्ट ट्रिक: ज-मा-भा-टो)
उत्तर: महाराणा अमर सिंह प्रथम। (शहजादा खुर्रम की मध्यस्थता से संधि हुई थी)।
उत्तर: मारवाड़ के महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (1678 ई. में जमरूद, अफगानिस्तान में निधन पर)।
उत्तर: महाराणा अमर सिंह द्वितीय (अन्य दो: अजीत सिंह व सवाई जयसिंह)।
उत्तर: बीकानेर के महाराजा रायसिंह को (जबकि 'कलयुग का कर्ण' राव लूणकरण को कहा जाता है)।
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