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राजस्थान भूगोल – मृदा संसाधन एवं वैज्ञानिक वर्गीकरण

राजस्थान के मृदा संसाधन एवं वैज्ञानिक प्रकार :
USDA वर्गीकरण, मृदा समस्याएँ (सेम, लवणीयता) व समाधान

अमरीकी कृषि विभाग (USDA Soil Taxonomy) के अनुसार राजस्थान की मृदा को 5 वैज्ञानिक प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है — 1. एरिडोसॉल्स (Aridisols), 2. एंटीसॉल्स (Entisols), 3. इन्सेप्टीसॉल्स (Inceptisols), 4. एल्फ़ीसॉल्स (Alfisols) एवं 5. वर्टिसॉल्स (Vertisols)। साथ ही पारंपरिक वर्गीकरण, सेम समस्या, लवणीय मृदा सुधार (जिप्सम/रॉक फास्फेट) एवं 50 नवीन ज़िलों पर आधारित प्रामाणिक नोट्स।

USDA Standard & HM Saxena RAS / Assistant Prof Standard 50 नवीन ज़िले अपडेटेड
USDA मृदा वर्गीकरण 5 प्रमुख प्रकार
1. एंटीसॉल्स (Entisols) सर्वाधिक विस्तृत (रेतीली)
2. एरिडोसॉल्स (Aridisols) शुष्क मरुस्थलीय
3. एल्फ़ीसॉल्स (Alfisols) सर्वाधिक उपजाऊ जलोढ़
4. वर्टिसॉल्स (Vertisols) काली कपासी (हाड़ौती)

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरुआत 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से हुई थी।

गहन अध्ययन नोट्स

राजस्थान के मृदा संसाधन: वैज्ञानिक व क्षेत्रीय विश्लेषण

USDA मृदा वर्गीकरण (5 ऑर्डर), पारंपरिक प्रकार, सेम समस्या, मृदा अपरदन, लवणीयता-क्षारीयता उपचार एवं 50 नवीन ज़िलों अनुसार अध्ययन।

मृदा संसाधन का सामान्य परिचय एवं घटक

मृदा (Soil) भूपर्पटी की सबसे ऊपरी असंगठित परत है जो चट्टानों के अपक्षय (Weathering) तथा जैविक पदार्थों के संचयन से बनती है। राजस्थान में भूवैज्ञानिक विविधिता, उच्चावच एवं जलवायु विषमता के कारण विभिन्न प्रकार की मिट्टियाँ पाई जाती हैं। राज्य में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme) की शुरुआत 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से की गई थी, जिसका नारा 'स्वस्थ धरा, खेत हरा' है।

मृदा के मुख्य भौतिक एवं रासायनिक घटक

  • खनिज पदार्थ (Mineral Matter): 45% (सिलिका, एल्युमिनियम, आयरन आदि)।
  • जैविक पदार्थ (Humus/Organic Matter): 5% (राजस्थान की मृदा में ह्यूमस व नाइट्रोजन की अत्यधिक कमी होती है)।
  • मृदा जल (Soil Water): 25%
  • मृदा वायु (Soil Air): 25%

मृदा का पीएच मान (pH Scale Range)

  • सामान्य उपजाऊ मृदा: pH मान 6.5 से 7.5 (उदासीन)।
  • अम्लीय मृदा (Acidic Soil): pH मान 7.0 से कम (उपचार: चूना/रॉक फास्फेट का प्रयोग)।
  • क्षारीय/लवणीय मृदा (Alkaline Soil): pH मान 8.5 से अधिक (उपचार: जिप्सम का प्रयोग)।

RPSC परीक्षा तथ्य: पश्चिमी राजस्थान की रेतीली मिट्टी में नाइट्रोजन एवं ह्यूमस की कमी पाई जाती है, जबकि फास्फेट एवं कैल्शियम के लवण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

1. मृदा का वैज्ञानिक वर्गीकरण (USDA Soil Taxonomy - 5 प्रकार)

अमरीकी कृषि विभाग (United States Department of Agriculture - USDA) द्वारा स्वीकृत वैज्ञानिक वर्गीकरण के आधार पर राजस्थान की मृदा को 5 प्रमुख गणों (Orders) में बाँटा गया है। यह RPSC / RAS परीक्षाओं हेतु सर्वाधिक प्रामाणिक वर्गीकरण है:

1. एंटीसॉल्स (Entisols) क्षेत्रफल में सर्वाधिक

पीली-भूरी / नवीन असंगठित रेतीली मृदा

  • विशेषता: यह हल्के पीले-भूरे रंग की बिना सुविकसित परतों वाली मिट्टी है। राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर विस्तृत
  • उप-गण (Sub-orders): सामैंट्स (Psamments) एवं फ्लूवेंट्स (Fluvents)।
  • ज़िले (नवीन 50 अनुसार): लगभग सम्पूर्ण पश्चिमी एवं अर्द्ध-शुष्क राजस्थान — फलौदी, बाड़मेर, बालोतरा, सांचौर, जालोर, पाली, नागौर, डिडवाना-कुचामन, झुंझुनूं, सीकर, नीम का थाना, चूरू, बीकानेर, जैसलमेर।
2. एरिडोसॉल्स (Aridisols) शुष्क वायुमंडलीय

शुष्क रेतीली मरुस्थलीय मृदा

  • विशेषता: यह खनिज समृद्ध परंतु ह्यूमस-रहित मिट्टी है जो अति-शुष्क क्षेत्रों में बनती है। इसमें चूने (कैलशियम) व लवणों की परत पाई जाती है।
  • उप-गण (Sub-orders): ऑर्थिड्स (Orthids), आर्गिड्स (Argids)।
  • ज़िले (नवीन अनुसार): जैसलमेर, बाड़मेर, फलौदी, बीकानेर, अनूपगढ़, जोधपुर ग्रामीण, नागौर, सीकर, चूरू।
3. इन्सेप्टीसॉल्स (Inceptisols) अरावली पर्वतीय

पर्वतीय एवं आर्द्र ढालों की मृदा

  • विशेषता: यह आंशिक विकसित परतों वाली मृदा है जो पर्वतीय ढालों एवं मध्यम वर्षा वाले क्षेत्रों में पाई जाती है।
  • उप-गण: ऑच्रेप्ट्स (Ochrepts)।
  • ज़िले (नवीन अनुसार): सिरोही (माउंट आबू), उदयपुर, राजसमंद, सलूंबर, भीलवाड़ा, शाहपुरा, चित्तौड़गढ़, अजमेर, ब्यावर
4. एल्फ़ीसॉल्स (Alfisols) उपजाऊ जलोढ़

जलोढ़ एवं दोमट / कछारी मृदा

  • विशेषता: नदियों द्वारा जमा की गई उपजाऊ दोमट मिट्टी। इसमें क्ले (मृत्तिका) की मात्रा अधिक तथा कृषि उत्पादकता उच्चतम होती है।
  • उप-गण: अस्टाफ्स (Ustalfs)।
  • ज़िले (नवीन अनुसार): जयपुर (शहर व ग्रामीण), दौसा, अलवर, कोटपूतली-बहरोड़, भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, टोंक।
5. वर्टिसॉल्स (Vertisols) काली कपासी / रेगुर मृदा

हाड़ौती के पठार की चिकनी काली मृदा

  • विशेषता: बेसाल्टिक लावा के विखंडन से निर्मित। इसमें 'मॉन्टमोरिलोनाइट' खनिज क्ले प्रचुर होता है। गिला होने पर अत्यधिक चिपचिपी व सूखने पर गहरी दरारें (Self-ploughing property / स्वतः जुताई वाली मृदा) पड़ जाती हैं। जल धारण क्षमता सर्वाधिक।
  • उप-गण: उस्टर्ट्स (Usterts)।
  • ज़िले (नवीन अनुसार): कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, दक्षिणी चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़।

मृदा का वैज्ञानिक वितरण आरेख (Schematic Soil Taxonomy Diagram)

एंटीसॉल्स & एरिडोसॉल्स रेतीली शुष्क मृदा पश्चिम/थार मरुस्थल कमी: N₂ व ह्यूमस प्रचुरता: Ca व CaCo₃ जैसलमेर, फलौदी, बाड़मेर इन्सेप्टीसॉल्स पर्वतीय लाल-दोमट अरावली ढाल क्षेत्र चट्टानी अपक्षय मक्का हेतु उपयुक्त उदयपुर, सिरोही, राजसमंद एल्फीसॉल्स उपजाऊ जलोढ़ दोमट पूर्वी मैदानी भाग उच्च कृषि उत्पादकता गेहूँ व सरसों हेतु श्रेष्ठ जयपुर, अलवर, भरतपुर वर्टिसॉल्स (Vertisols) काली कपासी / लावा निर्मित मृदा दक्षिण-पूर्वी हाड़ौती पठार स्वतः जुताई (Self-Ploughing) गुण कपास, सोयाबीन व संतरा हेतु उत्तम कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़

2. राजस्थान की मृदा का पारंपरिक/क्षेत्रीय वर्गीकरण

1. रेतीली बलुई मृदा (Desert Soil)

थार मरुस्थल में विस्तृत। मोटे कणों वाली, जल धारण क्षमता कम। बाजरा, ग्वार व मोठ हेतु उपयुक्त।

2. लाल-दोमट मृदा (Red Loam Soil)

डूंगरपुर, बांसवाड़ा, सलूंबर व उदयपुर। लौह अयस्क (Iron Content) के कारण लाल रंग। मक्का की फसल हेतु सर्वाधिक उपयुक्त।

3. मध्यम काली मृदा (Black Soil)

हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़)। कपास, सोयाबीन, संतरा, अफीम हेतु सर्वोत्तम।

4. जलोढ़ / कछारी मृदा (Alluvial Soil)

पूर्वी मैदान (जयपुर, अलवर, भरतपुर, टोंक)। सर्वाधिक उपजाऊ, चूना व पोटेशियम प्रचुर।

5. भूरी रेतीली मृदा (Brown Sandy Soil)

नागौर, डिडवाना-कुचामन, पाली, सीकर, झुंझुनूं (अरावली के पश्चिम में)। फास्फेट प्रचुर।

6. लाल-पीली मृदा (Red-Yellow Soil)

सवाई माधोपुर, करौली, भीलवाड़ा, अजमेर। ग्रेनाइट व नीस चट्टानों के अपक्षय से निर्मित।

3. राजस्थान में मृदा की समस्याएँ एवं समाधान (Soil Issues & Reclamation)

(i) सेम समस्या (Sem Problem / Waterlogging)

इंदिरा गांधी नहर क्षेत्र (IGNP)

अत्यधिक सिंचाई व नहरों के रिसाव (Seepage) के कारण भूमिगत जल स्तर ऊपर उठ जाने से दलदली स्थिति बनना तथा नीचे से लवणीय लवणों का केशिकत्व (Capillarity) क्रिया द्वारा ऊपर आना।
सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र: बड़ोपल (हनुमानगढ़), रावतसर, सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर), अनूपगढ़ (नवीन ज़िला)
समाधान/उपचार: यूकेलिप्टस (सफेदा) पौधे लगाना, इंडो-डच जल निकासी परियोजना, जिप्सम का प्रयोग।

(ii) लवणीयता एवं क्षारीयता (Salinity & Alkalinity - रेह/कल्लर/ऊसर)

pH > 8.5
लवणीय मृदा (Solonchak): इसमें सोडियम क्लोराइड की प्रचुरता होती है। इसे स्थानीय भाषा में 'रेह', 'कल्लर' या 'ऊसर' कहते हैं।
उपचार: भूमि की लिलाइ (Leaching with water) एवं रॉक फास्फेट (Rock Phosphate) का प्रयोग।
क्षारीय मृदा (Alkaline Soil): इसमें सोडियम कार्बोनेट की अधिकता होती है।
उपचार: जिप्सम (Gypsum - CaSO₄·2H₂O) तथा पायराइट्स (Pyrites) का प्रयोग।

4. राजस्थान में मृदा अपरदन (Soil Erosion - 'रेंगती हुई मृत्यु')

मृदा अपरदन को 'कृषि का कैंसर' या 'रेंगती हुई मृत्यु' (Creeping Death) कहा जाता है। राजस्थान में दो मुख्य प्रकार से अपरदन होता है:

1. वायु अपरदन (Wind Erosion - सर्वाधिक क्षेत्रफल)

• पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल) में तीव्र शुष्क हवाओं द्वारा।
• राजस्थान में सर्वाधिक मृदा अपरदन वायु द्वारा ही होता है।
• सर्वाधिक प्रभावित ज़िले: जैसलमेर, बीकानेर, फलौदी, बाड़मेर।

2. जल अपरदन (Water Erosion)

अवनालिका अपरदन (Gully Erosion): चम्बल नदी द्वारा कोटा, सवाई माधोपुर, करौली व धौलपुर में (बीहड़ निर्माण)।
चादरी अपरदन (Sheet Erosion): पर्वतीय ढालों पर सिरोही, उदयपुर व राजसमंद में वर्षा जल द्वारा ऊपरी परत बहना।

5. वैज्ञानिक एवं पारंपरिक मृदा की तुलनात्मक सारणी

वैज्ञानिक नाम (USDA) पारंपरिक नाम मुख्य विशेषता प्रमुख उप-गण (Sub-order) प्रमुख ज़िले (नवीन 50 अनुसार)
एंटीसॉल्स (Entisols) पीली-भूरी रेतीली सर्वाधिक विस्तृत, असंगठित परत Psamments, Fluvents बालोतरा, सांचौर, डिडवाना, फलौदी, नागौर
एरिडोसॉल्स (Aridisols) शुष्क मरुस्थलीय शुष्क जलवायु, चुना परत Orthids, Argids जैसलमेर, बाड़मेर, अनूपगढ़, चूरू
इन्सेप्टीसॉल्स (Inceptisols) पर्वतीय लाल-दोमट अरावली ढाल, आंशिक विकसित B-Horizon Ochrepts उदयपुर, सिरोही, सलूंबर, शाहपुरा, ब्यावर
एल्फीसॉल्स (Alfisols) जलोढ़ / कछारी उच्च क्ले, उच्चतम कृषि उत्पादकता Ustalfs जयपुर, अलवर, भरतपुर, कोटपूतली, डीग
वर्टिसॉल्स (Vertisols) काली कपासी / रेगुर स्वतः जुताई गुण, अत्यधिक जलधारण Usterts कोटा, बूंदी, बाराँ, झालावाड़, प्रतापगढ़

परीक्षा-उपयोगी अति-महत्वपूर्ण तथ्य (Quick One-Liners)

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना की शुरुआत 19 फरवरी 2015 को सूरतगढ़ (श्रीगंगानगर) से हुई थी।
  • राजस्थान में सर्वाधिक भू-भाग पर पाई जाने वाली वैज्ञानिक मृदा एंटीसॉल्स (Entisols) है।
  • क्षारीय मृदा के उपचार हेतु जिप्सम (Gypsum) का प्रयोग किया जाता है।
  • अम्लीय मृदा तथा लवणीय मृदा के उपचार हेतु क्रमशः चूना / रॉक फास्फेट का प्रयोग किया जाता है।
  • काली कपासी मृदा में 'मॉन्टमोरिलोनाइट' (Montmorillonite) खनिज क्ले पाया जाता है।
  • मृदा अपरदन को 'रेंगती हुई मृत्यु' (Creeping Death) या 'कृषि का कैंसर' कहा जाता है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक अवनालिका अपरदन (Gully Erosion) चम्बल नदी द्वारा होता है।
  • लाल-दोमट मिट्टी में लौह अयस्क की अधिकता के कारण यह मक्का की फसल हेतु सर्वाधिक उपयुक्त है।
  • 'सेम समस्या' से सर्वाधिक प्रभावित हनुमानगढ़ का बड़ोपल गाँव है।
सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर एंटीसॉल्स (Entisols) प्रकार की मृदा पाई जाती है, जो कि पीले-भूरे रंग की असंगठित रेतीली मिट्टी है और सम्पूर्ण पश्चिमी व अर्द्ध-शुष्क मैदानी भागों में विस्तृत है।
क्षारीय मृदा (pH > 8.5) के रासायनिक सुधार हेतु जिप्सम (Gypsum / CaSO₄·2H₂O) तथा पायराइट्स का उपयोग किया जाता है।
इंदिरा गांधी नहर (IGNP) क्षेत्र में अत्यधिक सिंचाई एवं नहरों के जल रिसाव के कारण भूमिगत जलस्तर ऊपर आ जाने से भूमि का दलदली व लवणीय हो जाना 'सेम समस्या' कहलाता है। हनुमानगढ़ का बड़ोपल गाँव तथा अनूपगढ़ क्षेत्र इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं।
वर्टिसॉल्स (Vertisols) या मध्यम काली कपासी मृदा को स्वतः जुताई वाली मिट्टी कहते हैं, क्योंकि यह सूखने पर सिकुड़कर गहरी दरारों में बदल जाती है जिससे हवा व धूप अंदर तक पहुँच जाती है।
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