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राज्य की कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख : अनुच्छेद 153 से 162

राजस्थान के राज्यपाल (Governor of Rajasthan) :
संवैधानिक स्थिति, शक्तियाँ, अनुच्छेद, 4 बार राष्ट्रपति शासन व सम्पूर्ण कालक्रम

राजस्थान राजव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक अध्याय — राजप्रमुख (सवाई मानसिंह द्वितीय) से राज्यपाल पद का क्रमिक विकास, 7वाँ संविधान संशोधन 1956, कार्यपालिका, विधायी व अनुच्छेद 163 के अंतर्गत विवेकाधिकार, राजस्थान में 4 बार राष्ट्रपति शासन (1967, 1977, 1980, 1992) के समय राज्यपाल-मुख्यमंत्री समीकरण, गुरुमुख निहाल सिंह से लेकर वर्तमान तक सम्पूर्ण सूची, पद पर दिवंगत राज्यपाल, महिला राज्यपाल एवं सरकारीया-पुंछी आयोग की सिफारिशों का सम्पूर्ण RAS / RPSC स्तरीय विश्लेषण।

संवैधानिक भाग भाग-6 (अनु. 153-162)
प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह
राष्ट्रपति शासन कुल 4 बार (अनु. 356)
पद पर निधन 4 राज्यपाल
राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी एवं संवैधानिक प्रामाणिक स्रोत

राजस्थान के राज्यपाल: सम्पूर्ण संवैधानिक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन

अनुच्छेद 153 से 162 की सूक्ष्म व्याख्या, कार्यपालिका, विधायी, वित्तीय व न्यायिक अधिकार, विवेकाधिकार की सीमाएँ (अनुच्छेद 163), राष्ट्रपति शासन 356 की ऐतिहासिक पड़ताल, सभी 26+ नियमित व कार्यवाहक राज्यपालों के दुर्लभ तथ्य और विगत 15 वर्षों के RPSC/RAS प्रश्न।

1. संवैधानिक ढाँचा एवं प्रमुख अनुच्छेद (Articles 153 to 162 & Allied)

भारतीय संविधान के भाग-6 (Part VI) के अध्याय-2 में अनुच्छेद 153 से 167 तक राज्य कार्यपालिका (State Executive) का उल्लेख किया गया है। राज्य कार्यपालिका में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद् एवं राज्य का महाधिवक्ता (Advocate General - Art 165) शामिल होते हैं। राज्यपाल राज्य का संवैधानिक / औपचारिक प्रमुख (De-Jure Executive) होता है, जबकि मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद् वास्तविक कार्यपालिका (De-Facto Executive) होती है। भारत में राज्यपाल का पद कनाडा के संविधान के मॉडल (केंद्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति) से प्रेरित है।

संवैधानिक नियुक्ति एवं कार्यपालिका संरचना फ्लोचार्ट
भारत का राष्ट्रपति वारंट जारी (अनु. 155) CJ उच्च न्यायालय शपथ ग्रहण (अनु. 159) राज्यपाल नामात्र कार्यपालिका De-Jure Head (अनु. 154) CM व मंत्रिमंडल वास्तविक प्रमुख (163)
अनुच्छेद संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provision) RPSC / RAS परीक्षा विशेष टिप्पणी
अनुच्छेद 153 राज्यों के राज्यपाल: प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा। 7वें संशोधन 1956 द्वारा परंतुक जोड़ा गया: एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त हो सकता है।
अनुच्छेद 154 राज्य की कार्यपालिका शक्ति: राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी और वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा करेगा। 'अधीनस्थ अधिकारियों' में मुख्यमंत्री एवं सभी मंत्री भी शामिल माने जाते हैं।
अनुच्छेद 155 राज्यपाल की नियुक्ति: राज्य के राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र (Warrant under hand and seal) द्वारा नियुक्त करेगा। राज्यपाल का चुनाव नहीं होता; यह केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति के माध्यम से नामित पद है।
अनुच्छेद 156 राज्यपाल की पदावधि: राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करेगा। सामान्यतः 5 वर्ष, त्यागपत्र राष्ट्रपति को संबोधित। संविधान में राज्यपाल को हटाने का कोई विशिष्ट आधार या महाभियोग जैसी प्रक्रिया वर्णित नहीं है।
अनुच्छेद 157 राज्यपाल पद की अर्हताएँ: 1. भारत का नागरिक हो, 2. न्यूनतम 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो। संविधान में मात्र 2 ही योग्यताएँ लिखित हैं। संसद द्वारा कोई अतिरिक्त शैक्षणिक योग्यता निर्धारित नहीं है।
अनुच्छेद 158 राज्यपाल के पद की शर्तें: संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य न होना, लाभ का पद धारण न करना, राजभवन की पात्रता व परिलब्धियाँ। यदि एक ही व्यक्ति दो राज्यों का राज्यपाल बने, तो वेतन दोनों राज्यों के मध्य राष्ट्रपति के आदेशानुसार अनुपातिक रूप से बँटता है।
अनुच्छेद 159 राज्यपाल द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान: संविधान और विधि के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण (Preserve, Protect and Defend) की शपथ। शपथ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (अथवा वरिष्ठतम न्यायाधीश) द्वारा दिलाई जाती है (तीसरी अनुसूची में शपथ प्रारूप नहीं है)।
अनुच्छेद 160 आकस्मिकताओं में राज्यपाल के कृत्यों का निर्वहन: ऐसी आकस्मिकता जो संविधान में न दी गई हो, राष्ट्रपति जैसा ठीक समझे उपबंध कर सकता है। पड़ोसी राज्य के राज्यपाल या संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को कार्यवाहक प्रभार सौंपा जाता है।
अनुच्छेद 161 क्षमादान की शक्ति: राज्य की कार्यपालिका सीमा के तहत आने वाली विधि के उल्लंघन पर क्षमा, प्रविलंबन, विराम, परिहार या लघुकरण की शक्ति। राज्यपाल मृत्युदंड को पूर्ण क्षमा (Pardon) नहीं कर सकता (केवल निलंबन/लघुकरण) और न ही सैन्य न्यायालय (Court Martial) के निर्णयों पर शक्ति रखता है।
अनुच्छेद 163 राज्यपाल को सहायता व सलाह हेतु मंत्रिपरिषद्: जिन बातों में राज्यपाल को विवेकाधिकार है, उन्हें छोड़कर शेष कार्यों में मंत्रिपरिषद् की सलाह अनिवार्य। यदि कोई प्रश्न उठे कि कोई विषय राज्यपाल के विवेकाधिकार में है या नहीं, तो राज्यपाल का निर्णय अंतिम होता है।
अनुच्छेद 164 मंत्रियों संबंधी अन्य उपबंध: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल करेगा। मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। मंत्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी (164(2)) होती है।
अनुच्छेद 166 राज्य सरकार के कार्यों का संचालन: राज्य सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राज्यपाल के नाम से अभिव्यक्त की जाएगी। राजस्थान कार्य संचालन नियम (Rules of Business) राज्यपाल द्वारा ही बनाए जाते हैं।
अनुच्छेद 167 राज्यपाल को सूचना देने आदि के संबंध में मुख्यमंत्री के कर्तव्य: प्रशासनिक व विधायी प्रस्तावों की जानकारी देना। मुख्यमंत्री राज्यपाल और मंत्रिपरिषद् के बीच संवाद की मुख्य कड़ी (Channel of Communication) है।
अनुच्छेद 174 विधानमंडल के सत्र, सत्रावसान व विघटन: राज्यपाल समय-समय पर सदन को आहूत, सत्रावसान और विधानसभा का विघटन करता है। दो सत्रों के मध्य अधिकतम 6 माह से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।
अनुच्छेद 175 & 176 अभिभाषण व विशेष अभिभाषण: नई विधानसभा के प्रथम सत्र व प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में राज्यपाल का विशेष अभिभाषण (Art 176)। राज्यपाल का अभिभाषण राज्य सरकार के मंत्रिमंडल द्वारा तैयार किया जाता है।
अनुच्छेद 200 & 201 विधेयकों पर अनुमति: राज्यपाल विधेयक पर अनुमति दे सकता है, रोक सकता है, पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है अथवा राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित (Reserve) रख सकता है। धन विधेयक को पुनर्विचार हेतु नहीं लौटाया जा सकता। यदि विधेयक उच्च न्यायालय की शक्तियों को कम करता हो, तो राष्ट्रपति हेतु आरक्षित करना अनिवार्य है।
अनुच्छेद 213 अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति (Ordinance Power): जब विधानमंडल सत्र में न हो और तुरंत कार्रवाई आवश्यक हो। विधानमंडल का सत्र पुनः प्रारंभ होने की तिथि से 6 सप्ताह (6 Weeks) के भीतर अनुमोदन अनिवार्य, अन्यथा स्वतः निष्प्रभावी। अधिकतम अवधि: 6 माह + 6 सप्ताह।
अनुच्छेद 356 राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन: राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा राष्ट्रपति द्वारा लागू। राजस्थान में अब तक 4 बार (1967, 1977, 1980, 1992) अनुच्छेद 356 का प्रयोग हुआ है।
अनुच्छेद 361 राज्यपाल का संवैधानिक संरक्षण (Immunities): पद की शक्तियों के प्रयोग हेतु किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं, कार्यकाल के दौरान कोई दांडिक कार्यवाही (Criminal Proceedings) नहीं। व्यक्तिगत कृत्यों के विरुद्ध दीवानी मुकदमा चलाने से पूर्व 2 माह का लिखित नोटिस देना अनिवार्य है।

संवैधानिक बारीकी (RPSC Trap Point): राष्ट्रपति की शपथ संविधान की तीसरी अनुसूची में नहीं बल्कि अनुच्छेद 60 में है, ठीक उसी प्रकार राज्यपाल की शपथ भी तीसरी अनुसूची में नहीं, बल्कि अनुच्छेद 159 में दी गई है! राज्यपाल संविधान के "परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण" (Preserve, Protect and Defend) की शपथ लेता है, जबकि सामान्य मंत्री पद व गोपनीयता की शपथ तीसरी अनुसूची के प्रारूप अनुसार लेते हैं।

2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 'राजप्रमुख' से 'राज्यपाल' पद का क्रमिक विकास

स्वतंत्रता के समय राजस्थान की 19 रियासतों एवं 3 ठिकानों के एकीकरण के विभिन्न चरणों के दौरान राज्य प्रमुख के रूप में 'राजप्रमुख' (Rajpramukh) तथा 'महाराज प्रमुख' का पद अस्तित्व में था:

1
मत्स्य संघ व पूर्व राजस्थान (1948): मत्स्य संघ के राजप्रमुख धौलपुर महाराजा उदयभान सिंह बने। द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में कोटा महाराव भीमसिंह राजप्रमुख रहे।
2
संयुक्त राजस्थान व वृहत् राजस्थान (1949): तृतीय चरण में मेवाड़ महाराणा भूपाल सिंह को राजप्रमुख बनाया गया। चतुर्थ चरण (30 मार्च 1949 - वृहत् राजस्थान) में जयपुर महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय को आजीवन राजप्रमुख तथा महाराणा भूपाल सिंह को 'महाराज प्रमुख' (एकमात्र महाराज प्रमुख) का पद दिया गया।
3
राज्य पुनर्गठन आयोग (फज़ल अली आयोग) एवं 7वाँ संविधान संशोधन (1956): राज्यों के क, ख, ग श्रेणियों के वर्गीकरण को समाप्त कर दिया गया। राजस्थान 'ख' (Part B) श्रेणी का राज्य था। 7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 के माध्यम से 'राजप्रमुख' पद को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया तथा पूरे देश के समान 'राज्यपाल' का पद सृजित हुआ।
4
1 नवम्बर 1956 — प्रथम राज्यपाल का पदभार: 31 अक्टूबर 1956 को सवाई मानसिंह द्वितीय का राजप्रमुख कार्यकाल समाप्त हुआ और 1 नवम्बर 1956 को सरदार गुरुमुख निहाल सिंह ने राजस्थान के प्रथम राज्यपाल के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ग्रहण की।

RPSC प्रीलिम्स सीधा प्रश्न: राजस्थान के एकमात्र 'महाराज प्रमुख' कौन थे? → महाराणा भूपाल सिंह (उदयपुर)। राजस्थान के अंतिम राजप्रमुख कौन थे? → महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय (जयपुर), जिनका कार्यकाल 30 मार्च 1949 से 31 अक्टूबर 1956 तक रहा।

3. नियुक्ति, योग्यताएँ, सेवा शर्तें, वेतन, शपथ एवं पदावधि

संवैधानिक अर्हताएँ (अनुच्छेद 157)

  • वह भारत का नागरिक हो।
  • उसने 35 वर्ष की आयु पूरी कर ली हो।

दो प्रमुख स्वस्थ परंपराएँ (Conventions)

  • बाहरी व्यक्ति का सिद्धांत: वह उस राज्य का निवासी न हो जहाँ उसे राज्यपाल नियुक्त किया जा रहा है (ताकि वह स्थानीय राजनीति से मुक्त रहे)।
  • मुख्यमंत्री से परामर्श: नियुक्ति से पूर्व राष्ट्रपति द्वारा संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से अनौपचारिक सलाह की परंपरा। (यद्यपि संविधान में बाध्यकारी नहीं)।

पद की शर्तें एवं वेतन (अनुच्छेद 158)

  • संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य नहीं हो सकता। यदि सदस्य नियुक्त हो जाए तो पदभार ग्रहण करने की तिथि से सदन में उसका स्थान रिक्त मान लिया जाता है।
  • कोई अन्य लाभ का पद (Office of Profit) धारण नहीं करेगा।
  • वर्तमान मासिक वेतन: ₹3,50,000 (3.5 लाख रुपये) प्रतिमाह (2018 में संशोधित)।
  • वेतन व भत्ते राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund of the State) पर भारित (Charged) होते हैं, जिस पर विधानमंडल में मतदान नहीं हो सकता।
  • पेंशन: भारत की संचित निधि पर भारित होती है।
  • कार्यकाल के दौरान वेतन व भत्तों में कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

राज्यपाल की पदावधि एवं पदमुक्ति (Tenure Analysis)

अनुच्छेद 156(1) के तहत राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Doctrine of Pleasure) पद धारण करता है। अनुच्छेद 156(3) के अनुसार सामान्य कार्यकाल पदभार ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष होता है, परंतु वह अपने 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने के बाद भी तब तक पद पर बना रहता है जब तक कि उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण न कर ले। वह किसी भी समय राष्ट्रपति को संबोधित स्वहस्ताक्षरित त्यागपत्र देकर पदमुक्त हो सकता है।

⚖️ बी.पी. सिंघल बनाम भारत संघ वाद (2010): सर्वोच्च न्यायालय की संवैधानिक पीठ ने निर्णय दिया कि राष्ट्रपति राज्यपाल को बिना किसी ठोस व वैध कारण के मनमाने तरीके से नहीं हटा सकता। यद्यपि दुर्भावना या असंवैधानिक कृत्य सिद्ध होने पर न्यायालय इस निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकता है।

4. राज्यपाल की शक्तियाँ एवं कार्य (Powers and Functions)

A कार्यपालिका शक्तियाँ (Executive Powers)

राज्य सरकार के समस्त प्रशासनिक कार्य राज्यपाल के नाम से संपन्न होते हैं। राज्यपाल द्वारा राज्य के प्रमुख संवैधानिक व वैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ की जाती हैं:

प्रमुख नियुक्तियाँ (Appointments):
  • मुख्यमंत्री एवं उसकी सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति (Art 164)।
  • राज्य का महाधिवक्ता (Advocate General - Art 165)।
  • राज्य लोक सेवा आयोग (RPSC) के अध्यक्ष व सदस्य (Art 316)।
  • राज्य निर्वाचन आयुक्त (State Election Commissioner - Art 243K)।
  • राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission - Art 243I) के अध्यक्ष व सदस्य।
  • राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC) के अध्यक्ष व सदस्य।
  • राज्य मुख्य सूचना आयुक्त व लोकायुक्त की नियुक्ति।
हटाने संबंधी विशेष सीमा (Removal Limitations):
  • RPSC अध्यक्ष व सदस्य: नियुक्ति राज्यपाल करता है, परंतु इन्हें हटाने का अधिकार केवल भारत के राष्ट्रपति को है (सुप्रीम कोर्ट की जांच रिपोर्ट के बाद - Art 317)।
  • राज्य निर्वाचन आयुक्त: हटाने की रीति उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही होगी (संसद द्वारा महाभियोग प्रक्रिया)। राज्यपाल इन्हें पद से नहीं हटा सकता।
  • उच्च न्यायालय के न्यायाधीश: राज्यपाल की सलाह पर राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं, शपथ राज्यपाल दिलाता है।

B विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

  • राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अभिन्न अंग (Integral Part - Art 168) होता है।
  • विधानसभा सत्र को आहूत (Summon), सत्रावसान (Prorogue) तथा विधानसभा को भंग (Dissolve - Art 174) करने की शक्ति।
  • अभिभाषण (Art 175-176): प्रत्येक आम चुनाव के पश्चात् प्रथम सत्र के आरंभ में तथा प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र (बजट सत्र) में अनिवार्य अभिभाषण।
  • विधेयक पर सहमति (Art 200): राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल के हस्ताक्षर के बिना कानून नहीं बन सकता। राज्यपाल स्वीकृति दे सकता है, रोक सकता है, धन विधेयक के अतिरिक्त अन्य विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा सकता है, अथवा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकता है (Art 201)।
  • विधान परिषद् में मनोनयन: यदि राज्य में विधान परिषद् हो, तो कुल सदस्य संख्या के 1/6 सदस्यों को साहित्य, विज्ञान, कला, सहकारिता आंदोलन तथा समाज सेवा के क्षेत्र से मनोनीत करता है। (ध्यान रहे: राजस्थान में वर्तमान में एकसदनीय विधानसभा है, विधान परिषद् नहीं है)।
  • अध्यादेश जारी करने की शक्ति (Ordinance Power - Art 213): विधानमंडल सत्र में न होने पर तात्कालिक आवश्यकता पड़ने पर जारी। सत्र प्रारंभ होने के 6 सप्ताह के भीतर इसका विधानसभा से पारित होना अनिवार्य है।

C वित्तीय शक्तियाँ (Financial Powers)

  • वार्षिक वित्तीय विवरण (बजट - Art 202): राज्यपाल प्रत्येक वित्तीय वर्ष में विधानमंडल के समक्ष बजट प्रस्तुत करवाता है।
  • धन विधेयक (Money Bill - Art 199/207): धन विधेयक केवल राज्यपाल की पूर्व अनुमति (Prior Recommendation) से ही विधानसभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है।
  • अनुदान की माँगें (Demands for Grants): राज्यपाल की सिफारिश के बिना कोई भी अनुदान की माँग नहीं की जा सकती।
  • राज्य की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund of State - Art 267(2)): यह निधि राज्यपाल के अधीन होती है। अप्रत्याशित व्यय हेतु अग्रिम धन राज्यपाल ही जारी करता है।
  • राज्य वित्त आयोग (Art 243I & 243Y): पंचायतों एवं नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति की समीक्षा हेतु प्रत्येक 5 वर्ष में वित्त आयोग का गठन करता है।

D न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)

  • क्षमादान शक्ति (अनुच्छेद 161): राज्य विधि के अंतर्गत दोषसिद्ध व्यक्तियों के दंड को क्षमा, प्रविलंबन, विराम या परिहार करने अथवा दंडादेश का निलंबन, परिहार या लघुकरण करने की शक्ति। (मृत्युदंड पूर्णतः माफ करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति में है)।
  • अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीश: उच्च न्यायालय के परामर्श से जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना एवं पदोन्नति (Art 233) करता है।
  • उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीशों को शपथ (Art 219) राज्यपाल ही दिलाता है।

5. राज्यपाल के विवेकाधिकार (Discretionary Powers - Art 163) एवं प्रमुख न्यायिक निर्णय

संविधान में राष्ट्रपति के पास स्पष्ट रूप से कोई विवेकाधिकार उल्लिखित नहीं है, परंतु अनुच्छेद 163(1) एवं 163(2) के तहत राज्यपाल को स्पष्ट संवैधानिक विवेकाधिकार प्राप्त हैं। जब राज्यपाल अपने विवेकाधिकार से कार्य करता है, तो उसके निर्णय की वैधता पर इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता कि उसे सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए था या नहीं।

राज्यपाल के विवेकाधिकार (अनुच्छेद 163) का द्वि-स्तरीय वर्गीकरण
विवेकाधिकार (Art. 163) 1. संवैधानिक विवेकाधिकार • विधेयक आरक्षित करना (Art 200) • राष्ट्रपति शासन संस्तुति (Art 356) 2. परिस्थितिगत विवेकाधिकार • त्रिशंकु विधानसभा में CM चयन • बहुमत खोने पर सरकार बर्खास्तगी

1. संवैधानिक विवेकाधिकार (Constitutional Discretion)

  • अनुच्छेद 200: राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना।
  • अनुच्छेद 356: राज्य में संवैधानिक तंत्र की विफलता पर राष्ट्रपति शासन की संस्तुति भेजना।
  • अनुच्छेद 167(c): किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को, जिस पर मंत्रिपरिषद् ने विचार न किया हो, मुख्यमंत्री से संपूर्ण मंत्रिपरिषद् के समक्ष रखवाने को कहना।
  • असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम में जनजातीय जिला परिषदों की रॉयल्टी का निर्धारण आदि (अनुसूची 6)।

2. परिस्थितिगत विवेकाधिकार (Situational Discretion)

  • त्रिशंकु विधानसभा (Hung Assembly): आम चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर सबसे बड़े दल/गठबंधन के नेता को सरकार बनाने हेतु आमंत्रित करना।
  • मुख्यमंत्री का आकस्मिक निधन: जब मुख्यमंत्री का आकस्मिक निधन हो जाए और कोई सर्वमान्य उत्तराधिकारी तय न हो।
  • मंत्रिपरिषद् की बर्खास्तगी: जब मंत्रिपरिषद् विधानसभा में अपना बहुमत खो चुकी हो और इस्तीफा देने से इनकार कर दे।
  • विधानसभा भंग करना: जब अल्पमत में आई सरकार विधानसभा भंग करने की सिफारिश करे।

राज्यपाल की शक्तियों पर सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक वाद (Landmark Case Laws)

1. शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974): उच्चतम न्यायालय की 7 जजों की पीठ ने स्पष्ट किया कि संसदीय प्रणाली में राष्ट्रपति और राज्यपाल दोनों केवल संवैधानिक प्रमुख हैं और वे कुछ अपवादों को छोड़कर अपनी शक्तियों का प्रयोग मंत्रिपरिषद् की सलाह पर ही करते हैं।

2. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने निर्धारित किया कि किसी सरकार के बहुमत का परीक्षण राजभवन में नहीं, बल्कि विधानसभा के पटल पर (Floor Test) ही होना चाहिए। अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक समीक्षा के अधीन है।

3. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (बिहार विधानसभा वाद 2006): राज्यपाल केवल अपनी व्यक्तिपरक धारणा के आधार पर विधानसभा भंग नहीं कर सकता। चुनाव पश्चात सरकार बनाने के उचित प्रयास अनिवार्य हैं।

4. नबाम रेबिया बनाम डिप्टी स्पीकर (अरुणाचल प्रदेश वाद 2016): राज्यपाल विधानसभा सत्र आहूत करने, स्थगित करने या एजेंडा तय करने में मंत्रिपरिषद् की सलाह मानने हेतु बाध्य है। वह समानांतर विधायिका का संचालन नहीं कर सकता।

6. राजस्थान में 4 बार राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356): सम्पूर्ण विश्लेषणात्मक तालिका

राजस्थान में अब तक कुल 4 बार अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन लगाया गया है। RPSC परीक्षाओं (RAS, SI, कॉलेज व्याख्याता) में राष्ट्रपति शासन की तिथियों, तत्कालीन राज्यपालों तथा तत्कालीन मुख्यमंत्रियों से सर्वाधिक प्रश्न पूछे जाते हैं:

राजस्थान: 4 बार राष्ट्रपति शासन तुलनात्मक टाइमलाइन
1967 (प्रथम) 44 दिन (न्यूनतम) 1977 (द्वितीय) 53 दिन 1980 (तृतीय) 111 दिन 1992 (चतुर्थ) 354 दिन (सर्वाधिक)
क्रम अवधि (कब से कब तक) कुल दिन तत्कालीन राज्यपाल तत्कालीन मुख्यमंत्री कारण / विशेष परीक्षा तथ्य
प्रथम 13 मार्च 1967 से 26 अप्रैल 1967 44 दिन
(न्यूनतम अवधि)
डॉ. सम्पूर्णानंद
(समाप्ति पर: सरदार हुकुम सिंह)
मोहनलाल सुखाड़िया चौथे आम चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा (अस्पष्ट बहुमत)। सुखाड़िया जी ने सरकार बनाने से मना किया। राजस्थान का सबसे छोटा राष्ट्रपति शासन।
द्वितीय 30 अप्रैल 1977 से 22 जून 1977 53 दिन वेदपाल त्यागी
(कार्यवाहक राज्यपाल)
हरिदेव जोशी केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद कांग्रेस शासित राज्य सरकारों को बर्खास्त किया गया। समाप्ति के बाद भैरोंसिंह शेखावत पहली बार मुख्यमंत्री बने।
तृतीय 16 फरवरी 1980 से 6 जून 1980 111 दिन रघुकुल तिलक भैरोंसिंह शेखावत केंद्र में इंदिरा गांधी सरकार की वापसी पर जनता पार्टी समर्थित सरकारों की बर्खास्तगी। समाप्ति पर जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान के प्रथम दलित मुख्यमंत्री बने।
चतुर्थ 15 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर 1993 354 दिन
(सर्वाधिक अवधि)
डॉ. एम. चन्ना रेड्डी
(मध्य में: डॉ. स्वरूप सिंह, समाप्ति पर: बलीराम भगत)
भैरोंसिंह शेखावत अयोध्या बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद शेखावत सरकार बर्खास्त। राजस्थान का सर्वाधिक लंबा (लगभग 1 वर्ष) राष्ट्रपति शासन।

RPSC रामबाण अवलोकन: राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में दो बार (1980 एवं 1992) राष्ट्रपति शासन लगा। प्रथम राष्ट्रपति शासन सबसे कम अवधि (44 दिन) का था और चतुर्थ राष्ट्रपति शासन सबसे लंबी अवधि (354 दिन) का था।

7. राजस्थान के राज्यपालों की सम्पूर्ण कालक्रम सूची (1956 से वर्तमान)

नीचे राजस्थान के प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह से लेकर वर्तमान राज्यपाल तक की प्रामाणिक व अद्यतन सूची दी गई है, जिसमें कार्यवाहक (Acting/Addl. Charge) राज्यपाल एवं उनके कार्यकाल के विशिष्ट ऐतिहासिक तथ्य सम्मिलित हैं:

क्र.सं. राज्यपाल का नाम कार्यकाल (अवधि) विशिष्ट ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य
1 सरदार गुरुमुख निहाल सिंह 01-11-1956 से 15-04-1962 राजस्थान के प्रथम राज्यपाल। राजस्थान में सर्वाधिक दीर्घ कार्यकाल (लगभग 5 वर्ष 5 माह) तक रहने वाले एकमात्र राज्यपाल। पूर्व में दिल्ली के दूसरे मुख्यमंत्री रहे।
2 डॉ. सम्पूर्णानंद 16-04-1962 से 15-04-1967 प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान एवं यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री। इनके कार्यकाल में प्रथम बार राष्ट्रपति शासन (1967) लगा।
3 सरदार हुकुम सिंह 16-04-1967 से 19-11-1970
(प्रथम कार्यकाल)
लोकसभा के तीसरे अध्यक्ष (Speaker) रहे। प्रथम राष्ट्रपति शासन की समाप्ति इन्हीं के समय हुई।
- न्यायमूर्ति जगत नारायण (कार्यवाहक) 20-11-1970 से 23-12-1970 राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश; राजस्थान के प्रथम कार्यवाहक राज्यपाल
(3) सरदार हुकुम सिंह 24-12-1970 से 30-06-1972
(द्वितीय कार्यकाल)
दो अलग-अलग कार्यकालों में पदभार संभालने वाले राज्यपाल।
4 सरदार जोगिन्दर सिंह 01-07-1972 से 14-02-1977 कार्यकाल पूर्ण होने से पूर्व ही अपने पद से त्यागपत्र (Resigned) दिया।
- न्यायमूर्ति वेदपाल त्यागी (कार्यवाहक) 15-02-1977 से 11-05-1977 हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस। इनके समय द्वितीय राष्ट्रपति शासन (1977) लगाया गया।
5 रघुकुल तिलक 12-05-1977 से 08-08-1981 गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व RPSC सदस्य। इनके कार्यकाल में तृतीय राष्ट्रपति शासन (1980) लगा। भारत के राष्ट्रपति द्वारा बर्खास्त (Dismissed) किए जाने वाले राजस्थान के प्रथम राज्यपाल।
- न्यायमूर्ति के.डी. शर्मा (कार्यवाहक) 08-08-1981 से 05-03-1982 राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश; कार्यवाहक प्रभार।
6 एयर चीफ मार्शल ओ.पी. मेहरा (ओमप्रकाश मेहरा) 06-03-1982 से 04-01-1985
(प्रथम कार्यकाल)
भारतीय वायुसेना के पूर्व प्रमुख (Air Chief Marshal); सैन्य पृष्ठभूमि से आने वाले प्रथम राज्यपाल।
- न्यायमूर्ति पी.के. बनर्जी (कार्यवाहक) 05-01-1985 से 31-01-1985 हाईकोर्ट चीफ जस्टिस; कार्यवाहक पदभार।
(6) एयर चीफ मार्शल ओ.पी. मेहरा 01-02-1985 से 03-11-1985
(द्वितीय कार्यकाल)
इन्होंने भी अपने पद से इस्तीफा दिया था।
- न्यायमूर्ति डी.पी. गुप्ता (कार्यवाहक) 04-11-1985 से 19-11-1985 हाईकोर्ट चीफ जस्टिस; अल्पकालिक प्रभार।
7 प्रभात कुमार मुखर्जी (वसंतराव पाटिल) 20-11-1985 से 14-10-1987 महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री। इन्होंने भी त्यागपत्र दिया।
- न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा (जगदीश शरण वर्मा) 16-10-1987 से 19-02-1988 कार्यवाहक राज्यपाल; बाद में भारत के 27वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) बने। प्रसिद्ध विशाखा गाइडलाइंस व वर्मा समिति के अध्यक्ष।
8 डॉ. सुखदेव प्रसाद 20-02-1988 से 02-02-1990 उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनेता व केंद्रीय उप-मंत्री।
- न्यायमूर्ति मिलाप चंद जैन (कार्यवाहक) 03-02-1990 से 13-02-1990 राजस्थान के जोधपुर निवासी; राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस व लोकायुक्त रहे।
9 प्रो. देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय (डी.पी. चट्टोपाध्याय) 14-02-1990 से 25-08-1991 प्रख्यात दार्शनिक, केंद्रीय वाणिज्य मंत्री रहे।
- डॉ. स्वरूप सिंह (अतिरिक्त प्रभार) 26-08-1991 से 04-02-1992 गुजरात के राज्यपाल, राजस्थान का अतिरिक्त प्रभार संभाला। दिल्ली वि.वि. के कुलपति रहे।
10 डॉ. एम. चन्ना रेड्डी (मर्री चन्ना रेड्डी) 05-02-1992 से 30-05-1993 आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री। इनके समय चतुर्थ राष्ट्रपति शासन (1992) लगा।
- डॉ. स्वरूप सिंह (द्वितीय बार अतिरिक्त प्रभार) 31-05-1993 से 29-06-1993 पुनः अतिरिक्त प्रभार।
11 बलीराम भगत 30-06-1993 से 01-05-1998 लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष (Speaker)। चतुर्थ राष्ट्रपति शासन की समाप्ति इन्हीं के समय हुई। इन्होंने अपना पूर्ण 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।
12 दरबारा सिंह 01-05-1998 से 24-05-1998 पद पर रहते हुए मृत्यु (Demised in Office) को प्राप्त होने वाले राजस्थान के प्रथम राज्यपाल। नियमित राज्यपालों में सबसे न्यूनतम कार्यकाल (मात्र 24 दिन)
- न्यायमूर्ति एन.एल. टिबरेवाल (नवरंग लाल टिबरेवाल) 25-05-1998 से 15-01-1999 हाईकोर्ट कार्यवाहक चीफ जस्टिस; कार्यवाहक राज्यपाल।
13 न्यायमूर्ति अंशुमान सिंह 16-01-1999 से 13-05-2003 इलाहाबाद व राजस्थान उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश रहे। पूर्ण कार्यकाल लगभग 4 वर्ष 4 माह।
14 निर्मल चंद जैन 14-05-2003 से 22-09-2003 पद पर रहते हुए मृत्यु को प्राप्त होने वाले राजस्थान के दूसरे राज्यपाल
- कैलाशपति मिश्र (अतिरिक्त प्रभार) 22-09-2003 से 13-01-2004 गुजरात के तत्कालीन राज्यपाल।
15 मदनलाल खुराना 14-01-2004 से 01-11-2004 दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री। सक्रिय राजनीति में लौटने हेतु पद से इस्तीफा दिया
- टी.वी. राजेश्वर (अतिरिक्त प्रभार) 01-11-2004 से 08-11-2004 उत्तर प्रदेश के राज्यपाल; पूर्व IB निदेशक।
16 श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल 08-11-2004 से 21-06-2007 राजस्थान की प्रथम महिला राज्यपाल। 2007 में भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति निर्वाचित होने के कारण राज्यपाल पद से त्यागपत्र दिया।
- डॉ. ए.आर. किदवई (अखलाक उर रहमान किदवई) 21-06-2007 से 06-09-2007 हरियाणा के राज्यपाल; अतिरिक्त प्रभार। पूर्व UPSC अध्यक्ष।
17 एस.के. सिंह (शैलेंद्र कुमार सिंह) 06-09-2007 से 01-12-2009 भारत के पूर्व विदेश सचिव (IFS)। पद पर रहते हुए मृत्यु को प्राप्त होने वाले तीसरे राज्यपाल
18 श्रीमती प्रभा राव 25-01-2010 से 26-04-2010
(प्रभार: 02-12-2009 से)
राजस्थान की दूसरी महिला राज्यपालपद पर रहते हुए मृत्यु को प्राप्त होने वाली राजस्थान की चौथी राज्यपाल (एकमात्र महिला राज्यपाल)
- शिवराज पाटिल (अतिरिक्त प्रभार) 26-04-2010 से 12-05-2012 पंजाब के राज्यपाल; पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री व लोकसभा अध्यक्ष।
19 श्रीमती मारग्रेट अल्वा 12-05-2012 से 07-08-2014 राजस्थान की तीसरी महिला राज्यपाल। पूर्व केंद्रीय मंत्री व उत्तराखंड की राज्यपाल।
- राम नाईक (अतिरिक्त प्रभार) 08-08-2014 से 03-09-2014 उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल।
20 कल्याण सिंह 04-09-2014 से 08-09-2019 उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री। 1967 के बाद पूरे 5 वर्ष का कार्यकाल पूर्ण करने वाले प्रथम राज्यपाल (गुरुमुख निहाल सिंह व बलीराम भगत के बाद तीसरे)।
21 कलराज मिश्र 09-09-2019 से 31-07-2024 पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे। इन्होंने अपना पूर्ण 5 वर्ष का सफल कार्यकाल पूरा किया। 'संविधान संस्कृति और राष्ट्र' पुस्तक के लेखक।
वर्तमान हरिभाऊ किसनराव बागड़े 31-07-2024 से वर्तमान राजस्थान के वर्तमान राज्यपाल। महाराष्ट्र विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष (Speaker), 'नानाजी' के नाम से लोकप्रिय वरिष्ठ राजनेता।

8. राजस्थान में महिला राज्यपाल (Women Governors of Rajasthan)

राजस्थान के इतिहास में अब तक कुल 3 महिलाओं ने राज्यपाल का पद सुशोभित किया है। इन तीनों से संबंधित विशिष्ट तथ्य आगामी परीक्षाओं हेतु अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं:

प्रथम महिला राज्यपाल

श्रीमती प्रतिभा पाटिल

कार्यकाल: 2004 – 2007

राजस्थान की प्रथम महिला राज्यपाल। अपने पद से इस्तीफा देकर भारत की 12वीं एवं देश की प्रथम महिला राष्ट्रपति बनीं। इनके राज्यपाल कार्यकाल में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे थीं (यानी राज्य के शीर्ष दोनों पदों पर महिलाएँ थीं)।

द्वितीय महिला राज्यपाल

श्रीमती प्रभा राव

कार्यकाल: 2009 – 2010

राजस्थान की दूसरी महिला राज्यपाल। पूर्व में हिमाचल प्रदेश की राज्यपाल रहीं। 26 अप्रैल 2010 को नई दिल्ली में पद पर रहते हुए इनका आकस्मिक निधन हुआ।

तृतीय महिला राज्यपाल

श्रीमती मारग्रेट अल्वा

कार्यकाल: 2012 – 2014

राजस्थान की तीसरी महिला राज्यपाल। पूर्व में केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री एवं उत्तराखंड की राज्यपाल रहीं। 'Courage & Commitment' इनकी आत्मकथा है।

9. राज्यपाल के पदेन पद (Ex-Officio Roles) एवं सांस्थानिक जिम्मेदारियाँ

संवैधानिक प्रमुख होने के साथ-साथ राज्यपाल राजस्थान में विभिन्न शीर्ष शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं कल्याणकारी संस्थाओं के पदेन अध्यक्ष / कुलाधिपति होते हैं:

🎓 राज्य विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (Chancellor): राज्यपाल राज्य के समस्त सरकारी / राज्य वित्तपोषित विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति होते हैं। वे कुलपतियों (Vice Chancellors - VC) की नियुक्ति करते हैं। (अपवाद: केंद्रीय विश्वविद्यालयों (Central Universities) के कुलाध्यक्ष भारत के राष्ट्रपति होते हैं, राज्यपाल नहीं)।
🎨 पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (WZCC, उदयपुर): उदयपुर स्थित पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (बागोर की हवेली) के पदेन अध्यक्ष राजस्थान के राज्यपाल होते हैं।
🎖️ राजस्थान राज्य पूर्व सैनिक कल्याण बोर्ड: भूतपूर्व सैनिकों एवं युद्ध वीरांगनाओं के पुनर्वास व कल्याणकारी बोर्ड के पदेन अध्यक्ष राज्यपाल होते हैं।
🏥 भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी (राजस्थान शाखा): रेडक्रॉस सोसाइटी तथा राजस्थान स्काउट्स एवं गाइड्स के मुख्य संरक्षक / पदेन अध्यक्ष राज्यपाल होते हैं।

10. राज्यपाल पद सुधार आयोग एवं प्रमुख सिफारिशें

1. सरकारीया आयोग (Sarkaria Commission - 1983-1988)

  • राज्यपाल उस राज्य से बाहर का प्रतिष्ठित एवं निर्विवादित व्यक्ति होना चाहिए।
  • वह सक्रिय स्थानीय दलगत राजनीति से कम से कम 2 वर्ष दूर रहा हो।
  • नियुक्ति से पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री से अनिवार्य रूप से वास्तविक परामर्श होना चाहिए।
  • उसे 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल मिलना चाहिए; मनमाने ढंग से स्थानांतरित या पदमुक्त न किया जाए।
  • अनुच्छेद 356 का प्रयोग "अंतिम विकल्प" (Last Resort) के रूप में ही हो।

2. एम.एम. पुंछी आयोग (Punchhi Commission - 2007-2010)

  • राज्यपाल को हटाने के लिए संविधान में राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत सिद्धांत के स्थान पर राज्य विधानमंडल द्वारा महाभियोग (Impeachment) का प्रावधान होना चाहिए।
  • राज्यपाल की नियुक्ति हेतु प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष एवं संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री की एक समिति बननी चाहिए।
  • राज्यपाल को विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति पद के वैधानिक दायित्वों से मुक्त रखा जाए ताकि वे विवादों से परे रहें।
  • विधेयक पर सहमति देने या राष्ट्रपति को भेजने हेतु अधिकतम 6 माह की समय-सीमा तय हो।

11. परीक्षा-उपयोगी त्वरित रामबाण तथ्य (High-Yield RPSC/RAS Revision Points)

⚡ त्वरित स्मरणीय तथ्य (Part 1)

  • प्रथम राज्यपाल: सरदार गुरुमुख निहाल सिंह (01 नव. 1956 से 15 अप्रै. 1962)।
  • सर्वाधिक दीर्घ कार्यकाल: सरदार गुरुमुख निहाल सिंह (5 वर्ष 5 माह)।
  • न्यूनतम कार्यकाल (नियमित): दरबारा सिंह (मात्र 24 दिन, 1 मई से 24 मई 1998)।
  • प्रथम कार्यवाहक राज्यपाल: न्यायमूर्ति जगत नारायण (1970)।
  • बर्खास्त होने वाले एकमात्र राज्यपाल: रघुकुल तिलक (1981 में केंद्र सरकार द्वारा बर्खास्त)।
  • त्यागपत्र देने वाले प्रमुख राज्यपाल: सरदार जोगिन्दर सिंह, ओ.पी. मेहरा, वसंतराव पाटिल, मदनलाल खुराना, श्रीमती प्रतिभा पाटिल।

⚡ त्वरित स्मरणीय तथ्य (Part 2)

  • पद पर रहते हुए दिवंगत 4 राज्यपाल: 1. दरबारा सिंह (1998), 2. निर्मल चंद जैन (2003), 3. एस.के. सिंह (2009), 4. श्रीमती प्रभा राव (2010)।
  • महिला राज्यपाल (कुल 3): 1. प्रतिभा पाटिल, 2. प्रभा राव, 3. मारग्रेट अल्वा।
  • RPSC सदस्य रहे राज्यपाल: रघुकुल तिलक (1958 से 1960 तक RPSC सदस्य रहे थे)।
  • लोकसभा अध्यक्ष रहे राज्यपाल: सरदार हुकुम सिंह तथा बलीराम भगत।
  • वायुसेना प्रमुख रहे राज्यपाल: एयर चीफ मार्शल ओ.पी. मेहरा।
  • CJI रहे कार्यवाहक राज्यपाल: न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा (जगदीश शरण वर्मा)।

12. विगत RPSC/RAS परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past & Model Questions)

प्रश्न 1: संविधान के किस अनुच्छेद के तहत राज्यपाल विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है? [RAS Pre 2021 / 2nd Grade 2022]

उत्तर: अनुच्छेद 200। (तथा अनुच्छेद 201 में राष्ट्रपति द्वारा उस आरक्षित विधेयक पर विचार एवं निर्णय की प्रक्रिया दी गई है)।

प्रश्न 2: राजस्थान के निम्नांकित राज्यपालों में से कौन राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) के सदस्य भी रहे हैं? [RAS Pre 2018]

उत्तर: रघुकुल तिलक। रघुकुल तिलक 1958 से 1960 तक RPSC अजमेर के सदस्य रहे थे और बाद में 1977 से 1981 तक राजस्थान के राज्यपाल रहे।

प्रश्न 3: राज्यपाल के अध्यादेश जारी करने की शक्ति के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: [College Lecturer 2021]

1. यह शक्ति अनुच्छेद 213 में वर्णित है।
2. विधानमंडल के पुनः सत्र प्रारंभ होने से 6 सप्ताह के भीतर इसका अनुमोदन अनिवार्य है।
3. यह शक्ति राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति नहीं है बल्कि मंत्रिपरिषद् की सलाह पर प्रयुक्त होती है।
सत्यापन: तीनों कथन पूर्णतः सही हैं।

प्रश्न 4: राजस्थान में जब चतुर्थ राष्ट्रपति शासन (1992-93) लगाया गया, उस समय राज्यपाल कौन थे? [PSI 2021]

उत्तर: डॉ. एम. चन्ना रेड्डी। (तथा समाप्ति के समय बलीराम भगत राज्यपाल थे)।

🌿 5वीं अनुसूची के तहत राज्यपाल के विशिष्ट विधायी अधिकार (Scheduled Areas & PESA):

संविधान की 5वीं अनुसूची के पैरा 5 के तहत राज्यपाल को यह असाधारण शक्ति प्राप्त है कि वह लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि संसद या राज्य विधानसभा का कोई अधिनियम राजस्थान के अनुसूचित क्षेत्रों (टीएसपी क्षेत्र यथा बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़) पर लागू नहीं होगा अथवा ऐसे संशोधनों के साथ लागू होगा जैसा वह विनिर्दिष्ट करे। इसके अतिरिक्त वह जनजाति सलाहकार परिषद् (TAC) के परामर्श से विनियम (Regulations) बना सकता है।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

राज्यपाल विशेष

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): "राज्यपाल राज्य का केवल संवैधानिक कठपुतली नहीं है, बल्कि उसके पास वास्तविक विवेकाधिकार हैं।" अनुच्छेद 163 के आलोक में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर संकेत: अनुच्छेद 163(1) राज्यपाल को कुछ मामलों में विवेकाधिकार से कार्य करने की छूट देता है तथा 163(2) के अनुसार उसके निर्णय की वैधता पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। उदाहरण: 1. त्रिशंकु विधानसभा में मुख्यमंत्री का चयन, 2. अनुच्छेद 200 के तहत विधेयक राष्ट्रपति हेतु आरक्षित करना, 3. अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) की संस्तुति भेजना, 4. अविश्वास प्रस्ताव के समय सदन में शक्ति परीक्षण का निर्देश देना।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): राजस्थान में पद पर रहते हुए दिवंगत होने वाले राज्यपालों के नाम लिखिए।

उत्तर संकेत: 1. दरबारा सिंह (1998), 2. निर्मल चंद जैन (2003), 3. एस.के. सिंह (2009), 4. श्रीमती प्रभा राव (2010)।
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RPSC की RAS प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा, SI, असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल व्याख्याता तथा RSMSSB की CET एवं पटवार परीक्षाओं में राज्य व्यवस्था के कुल प्रश्नों में से कम से कम 2 से 3 प्रश्न सीधे राज्यपाल की शक्तियों, अनुच्छेदों, न्यायिक वादों एवं राजस्थान के राज्यपालों के इतिहास से अवश्य पूछे जाते हैं।

  • 1 अनुच्छेदों का गहन मिलान: अनुच्छेद 154, 156, 159, 163, 167, 200 एवं 213 से संबंधित बहुविकल्पीय प्रश्न।
  • 2 राष्ट्रपति शासन (1967, 1977, 1980, 1992): तत्कालीन राज्यपाल-मुख्यमंत्री युग्म का ऐतिहासिक विश्लेषण।
  • 3 विशिष्ट राज्यपाल तथ्य: पद पर निधन, त्यागपत्र देने वाले, RPSC सदस्य रहे, लोकसभा अध्यक्ष रहे राज्यपाल।
  • 4 सुधार आयोग व वाद: सरकारीया, पुंछी आयोग एवं बोम्मई, नबाम रेबिया, बी.पी. सिंघल वाद से विश्लेषणात्मक प्रश्न।

अनुच्छेद 153-162

संवैधानिक प्रावधान एवं शपथ

4 राष्ट्रपति शासन

1967, 1977, 1980 व 1992

4 पद पर निधन

दरबारा सिंह, जैन, सिंह, राव

3 महिला राज्यपाल

पाटिल, राव व अल्वा

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थान के राज्यपाल से संबंधित परीक्षोपयोगी प्रश्न एवं प्रामाणिक उत्तर।

राजस्थान के प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह थे। उनका कार्यकाल 1 नवम्बर 1956 से 15 अप्रैल 1962 तक रहा। वे राजस्थान में सर्वाधिक दीर्घ अवधि (लगभग 5 वर्ष 5 माह) तक पद पर रहने वाले राज्यपाल भी हैं।
7वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1956 तथा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 द्वारा 1 नवम्बर 1956 को 'राजप्रमुख' (सवाई मानसिंह द्वितीय) का पद समाप्त कर पूरे देश के समान 'राज्यपाल' का संवैधानिक पद सृजित किया गया।
राजस्थान में कुल 4 बार राष्ट्रपति शासन लगा है:
1. प्रथम (1967): डॉ. सम्पूर्णानंद (समाप्ति पर सरदार हुकुम सिंह)
2. द्वितीय (1977): वेदपाल त्यागी (कार्यवाहक राज्यपाल)
3. तृतीय (1980): रघुकुल तिलक
4. चतुर्थ (1992-1993): डॉ. एम. चन्ना रेड्डी (समाप्ति पर बलीराम भगत)।
राजस्थान के कुल 4 राज्यपालों का निधन पद पर रहते हुए हुआ:
1. दरबारा सिंह (1998) — सबसे कम कार्यकाल वाले नियमित राज्यपाल (24 दिन)
2. निर्मल चंद जैन (2003)
3. एस.के. सिंह (2009)
4. श्रीमती प्रभा राव (2010) — एकमात्र महिला राज्यपाल जिनका पद पर निधन हुआ।
संविधान के अनुच्छेद 159 के तहत राज्यपाल को शपथ संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of High Court) अथवा उनकी अनुपस्थिति में उपलब्ध वरिष्ठतम न्यायाधीश द्वारा दिलाई जाती है।

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