राजस्थान का महाधिवक्ता (Advocate General) :
संवैधानिक प्रावधान, शक्तियाँ, विधानसभा विशेषाधिकार, सम्पूर्ण सूची व RAS/RPSC नोट्स
राजस्थान राजव्यवस्था का सबसे प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन — अनुच्छेद 165 (महाधिवक्ता का पद, नियुक्ति व कार्य), उच्च न्यायालय न्यायाधीश के समकक्ष संवैधानिक अर्हताएँ, राज्यपाल के 'प्रसादपर्यंत' कार्यकाल की वास्तविकता, अनुच्छेद 177 के तहत विधानसभा में बोलने व समितियों में भाग लेने का अधिकार (बिना मताधिकार), अनुच्छेद 194(4) के संसदीय विशेषाधिकार, भारत के महान्यायवादी (Art 76) से तुलनात्मक विश्लेषण, निजी वकालत की सीमाएँ, प्रथम महाधिवक्ता जी.सी. कासलीवाल से लेकर वर्तमान महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद गुप्ता तक की अद्यतन सूची तथा RAS/RPSC विगत 15 वर्षों के प्रश्नों का गहन विश्लेषण।
राजस्थान राज्य प्रशासनिक व संवैधानिक व्यवस्था हब
सम्पूर्ण राजव्यवस्था इंडेक्स देखेंराजस्थान का महाधिवक्ता: सम्पूर्ण संवैधानिक, विधिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण
अनुच्छेद 165 व 177 की गहन व्याख्या, उच्च न्यायालय जज समतुल्य अर्हताएँ, राज्यपाल का प्रसादपर्यंत सिद्धांत, विधानसभा में बिना मताधिकार भागीदारी, निजी वकालत की वैधानिक सीमाएं और 1956 से वर्तमान तक की प्रामाणिक सूची।
1. संवैधानिक स्थिति एवं प्रमुख अनुच्छेद (Articles 165, 177, 194)
भारतीय संविधान के भाग-6 के अध्याय-2 (कार्यपालिका) के अंतर्गत अनुच्छेद 165 में राज्य के महाधिवक्ता (Advocate General for the State) के पद का उपबंध किया गया है। महाधिवक्ता राज्य का सर्वोच्च विधि सलाहकार एवं प्रथम विधि अधिकारी (Highest Law Officer of the State) होता है। यह पद केंद्र सरकार में भारत के महान्यायवादी (Attorney General of India - Art 76) के ठीक समकक्ष है। राज्य कार्यपालिका में राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रिपरिषद् और महाधिवक्ता चारों शामिल होते हैं।
| अनुच्छेद | संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Content) | RPSC / RAS परीक्षा विशेष दृष्टिकोण |
|---|---|---|
| अनुच्छेद 165(1) | महाधिवक्ता की नियुक्ति एवं अर्हता: प्रत्येक राज्य का राज्यपाल, ऐसे व्यक्ति को जो उच्च न्यायालय (High Court) का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए योग्य हो, राज्य का महाधिवक्ता नियुक्त करेगा। | यह नियुक्ति राज्यपाल अपने विवेक से नहीं, बल्कि राज्य मंत्रिमंडल (मुख्यमंत्री) की सलाह पर करता है। |
| अनुच्छेद 165(2) | महाधिवक्ता के कर्तव्य: राज्य सरकार को विधि संबंधी विषयों पर सलाह देना तथा विधिक स्वरूप के अन्य कर्तव्यों का पालन करना जो राज्यपाल उसे सौंपे। | न्यायालयों में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करना और सरकार के वैधानिक हितों की रक्षा करना। |
| अनुच्छेद 165(3) | पदावधि एवं पारिश्रमिक: महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (During the pleasure of the Governor) पद धारण करेगा तथा ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे। | RPSC Trap: महाधिवक्ता का वेतन विधानमंडल तय नहीं करता, बल्कि राज्यपाल निर्धारित करता है! |
| अनुच्छेद 177 | सदन में मंत्रियों व महाधिवक्ता के अधिकार: प्रत्येक मंत्री और राज्य के महाधिवक्ता को विधानसभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार है, परंतु उसे मतदान (Right to Vote) करने का अधिकार नहीं होगा। | RPSC का सर्वाधिक पूछा जाने वाला प्रश्न: महाधिवक्ता सदन में बोल सकता है परंतु वोट नहीं दे सकता। |
| अनुच्छेद 194(4) | संसदीय विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां: विधानमंडल और उसकी समितियों में भाग लेने वाले व्यक्तियों (महाधिवक्ता सहित) को वही विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां (Privileges & Immunities) प्राप्त होंगी जो एक विधायक (MLA) को प्राप्त होती हैं। | सदन में दिए गए भाषण या मत (विचार) के संबंध में उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में कार्यवाही नहीं की जा सकती। |
संवैधानिक स्पष्टीकरण (Critical RPSC Nuance): कई छात्र भ्रमित होते हैं कि क्या महाधिवक्ता बनने के लिए 62 वर्ष की सेवानिवृत्ति आयु सीमा लागू होती है? उत्तर है: बिल्कुल नहीं! संविधान के अनुच्छेद 165(1) में केवल "उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्ह" (Qualified to be appointed a Judge of a High Court) लिखा है। इसका अर्थ केवल योग्यता (10 वर्ष वकालत/न्यायिक अनुभव) से है, आयु सीमा से नहीं। 62 वर्ष से अधिक आयु का व्यक्ति भी महाधिवक्ता बन सकता है।
2. महाधिवक्ता की नियुक्ति, अर्हताएँ (Qualifications) एवं पारिश्रमिक
संवैधानिक अर्हताएँ [अनुच्छेद 165(1) + 217(2)]
महाधिवक्ता बनने हेतु व्यक्ति में राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद की सभी योग्यताएँ होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक (Citizen of India) हो।
- भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्ष तक न्यायिक पद (Judicial Office) धारण कर चुका हो, अथवा
- किसी उच्च न्यायालय में या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों में लगातार कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) रहा हो।
- (नोट: राष्ट्रपति की दृष्टि में पारंगत विधिवेत्ता होने का प्रावधान केवल सर्वोच्च न्यायालय/महान्यायवादी हेतु है, उच्च न्यायालय/महाधिवक्ता हेतु नहीं)।
पारिश्रमिक एवं सेवा शर्तें [अनुच्छेद 165(3)]
महाधिवक्ता का वेतन-भत्ता संविधान द्वारा निर्धारित नहीं है:
- महाधिवक्ता को ऐसा पारिश्रमिक मिलता है जो राज्यपाल द्वारा अवधारित (Determined by the Governor) किया जाए।
- व्यावहारिक रूप से राज्य सरकार (मंत्रिमंडल) द्वारा पारिश्रमिक, रिटेनर फीस (Retainer Fee) व पैरवी भत्ता तय किया जाता है।
- उसे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समकक्ष प्रोटोकॉल एवं सुविधाएँ दी जाती हैं।
- उसका पद पूर्णकालिक सरकारी सेवक का नहीं होता।
3. महाधिवक्ता की पदावधि (Tenure), पदमुक्ति एवं परंपराएँ
संविधान के अनुच्छेद 165(3) के अनुसार महाधिवक्ता के कार्यकाल की कोई निश्चित अवधि (जैसे 3 वर्ष या 5 वर्ष) तय नहीं की गई है। वह राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the Governor) अपने पद पर बना रहता है।
कोई प्रक्रिया नहीं
संविधान में महाधिवक्ता को पद से हटाने का कोई आधार या महाभियोग जैसी प्रक्रिया वर्णित नहीं है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की सलाह पर उसे कभी भी हटा सकता है।
राज्यपाल को संबोधित
महाधिवक्ता किसी भी समय राज्यपाल को अपना स्वहस्ताक्षरित त्यागपत्र सौंपकर पद से मुक्त हो सकता है।
सरकार परिवर्तन पर इस्तीफा
परंपरानुसार जब राज्य सरकार (मंत्रिपरिषद्) त्यागपत्र देती है या नई सरकार चुनकर आती है, तो महाधिवक्ता भी पद से त्यागपत्र दे देता है, क्योंकि उसकी नियुक्ति तत्कालीन सरकार की सलाह पर ही हुई थी।
4. महाधिवक्ता के कार्य, शक्तियाँ एवं विधिक दायित्व (Powers & Duties)
संविधान के अनुच्छेद 165(2) के अनुसार राज्य के मुख्य विधि अधिकारी के रूप में महाधिवक्ता निम्नलिखित दायित्वों का निर्वहन करता है:
विधिक सलाह एवं राय देना
- राज्य सरकार को ऐसे विधि संबंधी विषयों पर परामर्श देना, जो राज्यपाल द्वारा समय-समय पर उसे निर्देशित या प्रेषित किए जाएं।
- विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने वाले जटिल संवैधानिक व विधिक विधेयकों (Bills) के प्रारूप की वैधानिकता का परीक्षण करना।
- अनुच्छेद 200 के तहत जब राज्यपाल किसी विधेयक को राष्ट्रपति हेतु आरक्षित करने पर विचार करे, तो कानूनी स्थिति स्पष्ट करना।
न्यायालयों में सरकार का प्रतिनिधित्व
- राजस्थान उच्च न्यायालय (जोधपुर पीठ व जयपुर बेंच) में राज्य सरकार से संबंधित सभी मुकदमों में सरकार की ओर से पेश होना।
- राज्य से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों में भारत के उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में भी राजस्थान सरकार का पक्ष रखना।
- राज्य के किसी भी अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Court) में सरकार की ओर से सुनवाई का अधिकार रखना।
सुनवाई का अधिकार (Right to Audience): महाधिवक्ता को अपने कार्यपालिका कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान राज्य के भीतर स्थित किसी भी न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर सुनवाई कराने का अधिकार (Right to be heard) प्राप्त होता है।
5. राज्य विधानमंडल में महाधिवक्ता के अधिकार (अनुच्छेद 177 एवं 194)
महाधिवक्ता विधानमंडल का सदस्य (MLA) नहीं होता, फिर भी भारतीय संविधान उसे सदन के भीतर विशेष विशेषाधिकार प्रदान करता है:
अनुच्छेद 177 : सदन में उपस्थिति व वक्तव्य का अधिकार
- उसे राजस्थान विधानसभा की कार्यवाही में बोलने (Right to Speak) का अधिकार है।
- वह सदन की कार्यवाहियों में प्रत्यक्ष भाग ले सकता है।
- विधानसभा की किसी ऐसी समिति (Committee of Legislature) में, जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में नामित किया गया हो, वह भाग ले सकता है और बोल सकता है।
- प्रतिबंध: वह सदन में मतदान (Right to Vote) नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 194(4) : विधायक के समान विशेषाधिकार
- सदन में अपने कर्तव्यों के संपादन के दौरान महाधिवक्ता को वे सभी विशेषाधिकार, उन्मुक्तियाँ और संरक्षण प्राप्त होते हैं जो एक विधान सभा सदस्य (विधायक) को प्राप्त होते हैं।
- विधानसभा या उसकी समिति में उसके द्वारा कही गई किसी बात या प्रस्तुत राय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई विधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती।
RPSC प्रीलिम्स में बार-बार आने वाला कथन: "राज्य का वह कौन-सा अधिकारी है जो राज्य विधानमंडल का सदस्य न होते हुए भी सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है और बोल सकता है, परंतु मतदान नहीं कर सकता?" → राज्य का महाधिवक्ता (Advocate General - Art 177)।
6. महाधिवक्ता पर संवैधानिक प्रतिबंध एवं निजी वकालत (Private Practice)
महाधिवक्ता राज्य सरकार का पूर्णकालिक सरकारी सेवक (Full-time Civil Servant) नहीं होता है और न ही उसे सरकारी कर्मचारियों की श्रेणी में माना जाता है। इसी कारण उसे निजी कानूनी वकालत (Private Legal Practice) से वंचित नहीं किया जाता, परंतु हितों के टकराव (Conflict of Interest) से बचने हेतु उस पर निम्नलिखित वैधानिक प्रतिबंध लगाए गए हैं:
7. भारत के महान्यायवादी (Art 76) बनाम राज्य के महाधिवक्ता (Art 165) की तुलना
आरपीएससी एवं यूपीएससी परीक्षाओं में अक्सर महान्यायवादी और महाधिवक्ता के मध्य तुलनात्मक प्रश्न पूछे जाते हैं:
| तुलना का आधार | भारत का महान्यायवादी (Attorney General) | राज्य का महाधिवक्ता (Advocate General) |
|---|---|---|
| 1. संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 76 (भाग-5, केंद्र सरकार) | अनुच्छेद 165 (भाग-6, राज्य सरकार) |
| 2. विधिक प्रास्थिति | भारत सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी | राज्य सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी |
| 3. नियुक्ति प्राधिकारी | केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा | राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा |
| 4. पद हेतु अर्हताएँ | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) का न्यायाधीश बनने की योग्यता | उच्च न्यायालय (High Court) का न्यायाधीश बनने की योग्यता |
| 5. पदावधि एवं कार्यकाल | राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (कोई निश्चित अवधि नहीं) | राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (कोई निश्चित अवधि नहीं) |
| 6. पारिश्रमिक निर्धारण | राष्ट्रपति द्वारा अवधारित | राज्यपाल द्वारा अवधारित |
| 7. सदन में अधिकार | संसद (लोकसभा व राज्यसभा) में बोलने का अधिकार, मताधिकार नहीं (Art 88) | राज्य विधानमंडल में बोलने का अधिकार, मताधिकार नहीं (Art 177) |
| 8. संसदीय विशेषाधिकार | अनुच्छेद 105(4) के तहत सांसद के समान | अनुच्छेद 194(4) के तहत विधायक (MLA) के समान |
8. अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG), शासकीय अधिवक्ता एवं विधिक ढाँचा
राजस्थान में मुकदमों के अत्यधिक बोझ और उच्च न्यायालय की दो पीठों (प्रधान पीठ जोधपुर एवं जयपुर बेंच) के कारण महाधिवक्ता की सहायता हेतु विधिक अधिकारियों का एक संपूर्ण प्रशासनिक ढाँचा कार्य करता है:
Additional Advocate General का पद संवैधानिक पद नहीं है। यह राज्य सरकार द्वारा कार्य की अधिकता के कारण विधिक नियमों के तहत सृजित पद है। ये जोधपुर व जयपुर पीठ तथा सुप्रीम कोर्ट में सरकार का पक्ष रखते हैं।
Government Advocate (GA) तथा अतिरिक्त राजकीय अधिवक्ता उच्च न्यायालय में विभिन्न विभागों के नियमित मुकदमों की पैरवी हेतु विधि विभाग द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
Public Prosecutor (CrPC/BNSS के तहत) जिला एवं सत्र न्यायालयों में आपराधिक मामलों में राज्य सरकार की ओर से अभियोजन का संचालन करते हैं।
9. राजस्थान के महाधिवक्ताओं की सम्पूर्ण कालक्रम सूची (1956 से वर्तमान)
राजस्थान के पुनर्गठन (1 नवम्बर 1956) के पश्चात् से लेकर वर्तमान तक राज्य के प्रमुख महाधिवक्ताओं की प्रामाणिक सूची नीचे प्रस्तुत है:
| क्र.सं. | महाधिवक्ता का नाम | कार्यकाल / दौर | विशिष्ट ऐतिहासिक एवं परीक्षा उपयोगी तथ्य |
|---|---|---|---|
| 1 | श्री जी.सी. कासलीवाल (गुलाब चंद कासलीवाल) | 1956 से 1968 | राजस्थान के प्रथम महाधिवक्ता। राजस्थान में सर्वाधिक दीर्घ अवधि (लगभग 12 वर्ष) तक महाधिवक्ता पद पर रहने का ऐतिहासिक रिकॉर्ड। प्रथम राज्यपाल सरदार गुरुमुख निहाल सिंह व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के समय नियुक्त। |
| 2 | श्री राज नारायण चौधरी | 1968 से 1977 | सुखाड़िया एवं बरकतुल्लाह खान सरकार के दौर में राज्य के प्रमुख मुकदमों में विधिक पैरवी। |
| 3 | श्री एन.एल. जैन (नवरतन मल सिंघवी / जैन) | 1977 से 1980 | भैरोंसिंह शेखावत की जनता पार्टी सरकार के समय महाधिवक्ता बने। |
| 4 | श्री एस.एम. मेहता | विभिन्न दौर | वरिष्ठ विधिवेत्ता; राज्य सरकार के कई जटिल संवैधानिक वादों का निस्तारण किया। |
| 5 | श्री पी.के. गर्ग / श्री एन.एम. लोढ़ा | विभिन्न दौर (2003-2008 / 2013-2018) | वसुंधरा राजे सरकार के कार्यकाल के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता नरपत मल लोढ़ा (N.M. Lodha) महाधिवक्ता रहे। |
| 6 | श्री जी.एस. बाफना | 2008 से 2013 | अशोक गहलोत सरकार के द्वितीय कार्यकाल में महाधिवक्ता पद संभाला। |
| 7 | श्री महेंद्र सिंह सिंघवी (M.S. Singhvi) | जनवरी 2019 से दिसंबर 2023 | 15वीं विधानसभा (अशोक गहलोत तृतीय कार्यकाल) में महाधिवक्ता रहे। 2023 विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद त्यागपत्र दिया। |
| 8 | श्री राजेंद्र प्रसाद गुप्ता (Rajendra Prasad Gupta) | 03 फरवरी 2024 से वर्तमान | राजस्थान के वर्तमान महाधिवक्ता। 16वीं विधानसभा (भजन लाल शर्मा सरकार) के गठन के बाद राजस्थान उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद गुप्ता को महाधिवक्ता नियुक्त किया गया। |
10. परीक्षा-उपयोगी त्वरित रामबाण तथ्य (High-Yield RPSC/RAS Revision Bullets)
⚡ महत्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य (Part 1)
- संवैधानिक पद: अनुच्छेद 165 के अंतर्गत (भाग-6, कार्यपालिका का अंग)।
- राज्य का प्रथम विधि अधिकारी: महाधिवक्ता।
- नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की मंत्रिपरिषद की अनुशंसा पर।
- योग्यता: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के समान (10 वर्ष वकालत/न्यायिक कार्य)।
- कार्यकाल: राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (संविधान में कोई निश्चित अवधि नहीं)।
- वेतन-भत्ता: राज्यपाल द्वारा निर्धारित (विधानमंडल द्वारा नहीं)।
⚡ महत्वपूर्ण परीक्षा तथ्य (Part 2)
- विधानसभा में अधिकार: अनुच्छेद 177 - बोलने व भाग लेने का अधिकार, परंतु मतदान का अधिकार नहीं।
- विशेषाधिकार: अनुच्छेद 194(4) - विधायक (MLA) के समान।
- प्रथम महाधिवक्ता: श्री जी.सी. कासलीवाल (सर्वाधिक लंबा कार्यकाल)।
- वर्तमान महाधिवक्ता: श्री राजेंद्र प्रसाद गुप्ता (फरवरी 2024 से)।
- निजी वकालत: अनुमत है, परंतु राज्य सरकार के विरुद्ध पैरवी नहीं कर सकता।
- त्यागपत्र: राज्यपाल को संबोधित किया जाता है।
11. विगत RPSC/RAS परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Questions & Analysis)
प्रश्न 1: राजस्थान के महाधिवक्ता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए: [RAS Pre 2021]
2. वह राज्य विधानसभा की कार्यवाहियों में भाग ले सकता है और बोल सकता है।
3. उसे राज्य विधानसभा में मतदान करने का अधिकार होता है।
सत्यापन: कथन 1 व 2 सही हैं, परंतु कथन 3 असत्य है क्योंकि अनुच्छेद 177 के तहत उसे मतदान का अधिकार नहीं है।
प्रश्न 2: भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के अनुसार राज्य का महाधिवक्ता राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है? [College Lecturer 2021]
उत्तर: अनुच्छेद 165(3)। इसी उपबंध में यह भी लिखा है कि महाधिवक्ता ऐसा पारिश्रमिक प्राप्त करेगा जो राज्यपाल अवधारित करे।
प्रश्न 3: राजस्थान के प्रथम महाधिवक्ता (Advocate General) कौन थे? [Sub Inspector 2021 / 2nd Grade GK 2022]
उत्तर: श्री जी.सी. कासलीवाल (गुलाब चंद कासलीवाल)। वे 1956 से 1968 तक इस पद पर रहे।
प्रश्न 4: महाधिवक्ता पद पर नियुक्ति हेतु व्यक्ति के पास किसकी समकक्ष योग्यता होना अनिवार्य है? [Patwar 2021]
उत्तर: उच्च न्यायालय के न्यायाधीश (High Court Judge)। (अनुच्छेद 165(1) के अनुसार)।
RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर
विधिक पदप्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): राज्य के महाधिवक्ता को राज्य विधानमंडल में कौन-से विशिष्ट अधिकार प्राप्त हैं? क्या वह सामान्य विधायकों के समान है?
प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): क्या महाधिवक्ता निजी कानूनी वकालत (Private Practice) कर सकता है? क्या सीमाएं हैं?
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राजस्थान राजव्यवस्था
- राजस्थान के राज्यपाल अनु. 153
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Cultureराजस्थान का भूगोल (नवीन)
50 ज़िले'राजस्थान का महाधिवक्ता' अध्याय क्यों अति-महत्वपूर्ण है?
RPSC की RAS प्रारंभिक एवं मुख्य परीक्षा, SI, असिस्टेंट प्रोफेसर, स्कूल व्याख्याता तथा RSMSSB की CET एवं पटवार परीक्षाओं में राज्य कार्यपालिका से संबंधित 1 से 2 प्रश्न सीधे महाधिवक्ता के संवैधानिक प्रावधानों, अनुच्छेद 165 व 177 के सूक्ष्म नियमों, सदन में मतदान के प्रतिबंध तथा प्रथम व वर्तमान महाधिवक्ता से अवश्य पूछे जाते हैं।
- 1 अनुच्छेद 165 के उपखंड: नियुक्ति, उच्च न्यायालय जज समतुल्य योग्यता व राज्यपाल का प्रसादपर्यंत सिद्धांत।
- 2 अनुच्छेद 177 का अपवाद: विधानसभा में उपस्थित होकर बोलने का अधिकार, किंतु मतदान का अधिकार न होना।
- 3 विशेषाधिकार व उन्मुक्तियां: अनुच्छेद 194(4) के तहत विधानसभा सदस्य (MLA) के समान अधिकार प्राप्त होना।
- 4 ऐतिहासिक व अद्यतन आंकड़े: प्रथम महाधिवक्ता जी.सी. कासलीवाल से लेकर वर्तमान राजेंद्र प्रसाद गुप्ता तक का कालक्रम।
अनुच्छेद 165
सर्वोच्च विधि अधिकारी
अनुच्छेद 177
सदन में वक्तव्य (बिना वोट)
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