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राज्य की वास्तविक नीति निर्धारक कार्यपालिका : अनुच्छेद 163 व 164

राजस्थान की मंत्रिपरिषद् (State Council of Ministers) :
संवैधानिक स्थिति, संरचना, 91वाँ संशोधन, कार्यप्रणाली व सम्पूर्ण प्रशासनिक ढाँचा

राजस्थान राजव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक संवैधानिक विश्लेषण — अनुच्छेद 163 (राज्यपाल को सलाह), अनुच्छेद 164 (मंत्रियों की नियुक्ति, शपथ व योग्यता), 91वें संविधान संशोधन 2003 द्वारा निर्धारित सीमाएँ (न्यूनतम 12 व अधिकतम 30 मंत्री), सामूहिक उत्तरदायित्व [164(2)] बनाम व्यक्तिगत उत्तरदायित्व [164(1)], मंत्रिपरिषद व मंत्रिमंडल (कैबिनेट) में तुलनात्मक अंतर, संसदीय सचिव (Parliamentary Secretaries) की ऐतिहासिक व विधिक स्थिति, कैबिनेट सचिवालय एवं कार्य संचालन नियम, तथा RPSC/RAS विगत 15 वर्षों के प्रश्नों का गहन अध्ययन।

संवैधानिक आधार अनुच्छेद 163-164
अधिकतम सदस्य संख्या 30 मंत्री (15%)
न्यूनतम सदस्य संख्या 12 मंत्री (CM सहित)
सामूहिक उत्तरदायित्व विधानसभा के प्रति
राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी एवं संवैधानिक प्रामाणिक स्रोत

राजस्थान की मंत्रिपरिषद्: सम्पूर्ण संवैधानिक एवं व्यावहारिक विश्लेषण

अनुच्छेद 163 से 167 के संवैधानिक प्रावधान, 91वें संशोधन (2003) की 15% सीमा व न्यूनतम 12 की बाध्यता, कैबिनेट व राज्य मंत्रियों का वर्गीकरण, सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत, संसदीय सचिव व्यवस्था और विगत 15 वर्षों के RPSC प्रश्न।

1. मंत्रिपरिषद् का संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 163, 164, 166 एवं 167

संसदीय शासन प्रणाली में राज्यपाल राज्य का नाममात्र (De-Jure) प्रमुख होता है, जबकि राज्य की वास्तविक कार्यपालिका शक्ति मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) में निहित होती है, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है। भारतीय संविधान के भाग-6 के अध्याय-2 में राज्य मंत्रिपरिषद् से संबंधित निम्नलिखित प्रावधान दिए गए हैं:

मंत्रिपरिषद का उत्तरदायित्व एवं शक्ति संरचना फ्लोचार्ट
विधानसभा बहुमत सामूहिक उत्तरदायित्व मुख्यमंत्री (प्रधान) मंत्रिपरिषद का नेता अनुच्छेद 163(1) मंत्रिपरिषद् कैबिनेट + राज्य + उप राज्यपाल सहायता व सलाह
अनुच्छेद विस्तृत संवैधानिक प्रावधान (Detailed Constitutional Content) RPSC / RAS परीक्षा विशेष विश्लेषण
अनुच्छेद 163(1) राज्यपाल को सहायता व सलाह: जिन बातों में राज्यपाल को संविधान द्वारा या इसके अधीन विवेकाधिकार (Discretion) दिया गया है, उन बातों को छोड़कर राज्यपाल को अपने कृत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद् होगी, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होगा। यह सिद्ध करता है कि राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तियों का वास्तविक प्रयोग मंत्रिपरिषद् ही करती है।
अनुच्छेद 163(2) विवेकाधिकार पर अंतिम निर्णय: यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय राज्यपाल के विवेकानुसार आता है या नहीं, तो राज्यपाल का अपने विवेक से किया गया निर्णय ही अंतिम और मान्य होगा। राज्यपाल के इस निर्णय को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि उसने सलाह के अनुसार कार्य किया अथवा नहीं।
अनुच्छेद 163(3) न्यायालयी समीक्षा से उन्मुक्ति: इस प्रश्न की किसी भी न्यायालय में जाँच (Enquiry) नहीं की जाएगी कि क्या मंत्रियों ने राज्यपाल को कोई सलाह दी, और यदि दी तो क्या दी। RPSC का पसंदीदा प्रश्न: मंत्रिपरिषद की सलाह न्यायिक जाँच के दायरे से पूर्णतः बाहर है।
अनुच्छेद 164(1) मंत्रियों की नियुक्ति: मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राज्यपाल, मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (During Pleasure) पद धारण करेंगे। राज्यपाल अपनी मर्जी से किसी व्यक्ति को मंत्री नहीं बना सकता; मुख्यमंत्री की सिफारिश अनिवार्य है।
अनुच्छेद 164(1A) मंत्रिपरिषद् का आकार (91वां संशोधन 2003): किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं होगी तथा किसी भी स्थिति में न्यूनतम 12 से कम नहीं होगी। राजस्थान हेतु: 200 का 15% = अधिकतम 30 मंत्री और न्यूनतम 12 मंत्री
अनुच्छेद 164(1B) दलबदल आधार पर अयोग्यता: 10वीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) के तहत अयोग्य घोषित सदस्य उस अवधि तक मंत्री बनने हेतु भी अयोग्य रहेगा। 91वें संविधान संशोधन 2003 द्वारा अंतःस्थापित किया गया।
अनुच्छेद 164(2) सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility): मंत्रिपरिषद् राज्य की विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी। यदि विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाए, तो पूरी मंत्रिपरिषद् को त्यागपत्र देना होता है।
अनुच्छेद 164(3) शपथ का प्रारूप: राज्यपाल किसी मंत्री को अपना पद ग्रहण करने से पूर्व तीसरी अनुसूची (Third Schedule) में दिए गए प्रारूप के अनुसार 'पद एवं गोपनीयता' की शपथ दिलाएगा। मंत्री दो शपथ लेते हैं: 1. पद की शपथ, 2. गोपनीयता की शपथ।
अनुच्छेद 164(4) गैर-विधायक का मंत्री बनना: कोई मंत्री जो निरंतर 6 माह तक राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रहता है, वह उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा। कोई भी बाहरी व्यक्ति मंत्री बन सकता है, बशर्ते 6 माह के भीतर विधानसभा उपचुनाव जीतकर सदस्यता ग्रहण करे।
अनुच्छेद 164(5) वेतन व भत्ते: मंत्रियों के वेतन व भत्ते राज्य विधानमंडल द्वारा विधि बनाकर निर्धारित किए जाते हैं। यह राज्य की संचित निधि (Consolidated Fund) से देय होते हैं।
अनुच्छेद 166(3) कार्य संचालन एवं विभागों का आवंटन: राज्यपाल राज्य सरकार के कार्य संचालन एवं मंत्रियों में कार्य आवंटन (Rules of Business) हेतु नियम बनाएगा। मंत्रियों के बीच विभागों का वितरण व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री तय करता है।
अनुच्छेद 177 सदन में मंत्रियों के अधिकार: प्रत्येक मंत्री को विधानसभा की कार्यवाही में भाग लेने और बोलने का अधिकार है, परंतु वह मतदान (Vote) केवल उसी सदन में कर सकता है जिसका वह सदस्य है राजस्थान एकसदनीय है, अतः मंत्री केवल विधानसभा में मतदान करता है।

संवैधानिक अपवाद (RPSC सूक्ष्म विश्लेषण): अनुच्छेद 164(1) के परंतुक में लिखा है कि छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा राज्यों में जनजातीय कल्याण हेतु एक स्वतंत्र मंत्री होगा। राजस्थान इस परंतुक में शामिल नहीं है, यद्यपि 94वें संविधान संशोधन (2006) द्वारा बिहार को इस सूची से बाहर कर दिया गया था।

2. 91वाँ संविधान संशोधन (2003): राजस्थान में मंत्रिपरिषद की संख्या सीमा (12 से 30)

वर्ष 2003 से पूर्व संविधान में मंत्रिपरिषद के आकार पर कोई संवैधानिक प्रतिबंध नहीं था, जिसके चलते सरकारों द्वारा 'जंबो कैबिनेट' बनाई जाती थी। 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा अनुच्छेद 164 में खंड (1A) जोड़कर मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित किया गया:

अधिकतम सीमा (Maximum Limit)

विधानसभा का 15% (मुख्यमंत्री सहित)

राजस्थान विधानसभा की कुल सदस्य संख्या 200 है। अतः 200 का 15% = अधिकतम 30 मंत्री (1 मुख्यमंत्री + 29 अन्य मंत्री) हो सकते हैं। राजस्थान में 30 से अधिक मंत्री नहीं बनाए जा सकते।

न्यूनतम सीमा (Minimum Limit)

कुल 12 मंत्री (मुख्यमंत्री सहित)

संविधान के अनुच्छेद 164(1A) में स्पष्ट लिखा है कि किसी भी राज्य में मंत्रियों की संख्या 12 से कम नहीं होगी (1 मुख्यमंत्री + 11 अन्य मंत्री)। यह नियम छोटे राज्यों (जैसे गोवा, सिक्किम) के लिए भी सुरक्षा कवच है।

RPSC प्रीलिम्स में बार-बार पूछा जाने वाला प्रश्न: "राजस्थान में मुख्यमंत्री सहित मंत्रिपरिषद की न्यूनतम एवं अधिकतम सदस्य संख्या क्रमशः कितनी हो सकती है?" → न्यूनतम 12 एवं अधिकतम 30 (कुल सीमा 12 से 30)।

3. मंत्रियों की तीन श्रेणियाँ (Three-Tier Classification of Ministers)

संविधान में मंत्रियों के वर्गीकरण का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, परंतु ब्रिटिश संसदीय परंपरा के आधार पर राजस्थान राज्य मंत्रिपरिषद में मंत्रियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

1
कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers / मंत्रिमंडल सदस्य):

ये राज्य सरकार के सबसे वरिष्ठ और महत्वपूर्ण विभागों (जैसे गृह, वित्त, राजस्व, ऊर्जा, शिक्षा, चिकित्सा) के प्रशासनिक व राजनीतिक मुखिया होते हैं। ये सीधे कैबिनेट की प्रत्येक बैठक में भाग लेते हैं और राज्य की नीतियों का निर्धारण करते हैं।

2
राज्य मंत्री (Ministers of State):

राज्य मंत्री दो प्रकार के होते हैं:
(A) स्वतंत्र प्रभार (Independent Charge): इन्हें किसी विभाग का स्वतंत्र दायित्व दिया जाता है। ये अपने विभाग से संबंधित मामलों में कैबिनेट मंत्री के समान कार्य करते हैं, परंतु कैबिनेट बैठक में केवल तभी भाग लेते हैं जब उनके विभाग का कोई विषय बैठक की कार्यसूची (Agenda) में हो।
(B) संबद्ध राज्य मंत्री: ये किसी कैबिनेट मंत्री के अधीन रहकर उनके प्रशासनिक कार्यों में सहायता करते हैं।

3
उप-मंत्री (Deputy Ministers):

ये कनिष्ठ स्तर के मंत्री होते हैं। इन्हें किसी विभाग का स्वतंत्र प्रभार नहीं दिया जाता। इनका कार्य कैबिनेट मंत्रियों अथवा राज्य मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, विधायी व संसदीय कार्यों में सहयोग देना होता है। ये कैबिनेट की बैठकों में भाग नहीं लेते।

उप-मुख्यमंत्री (Deputy Chief Minister) का पद: उप-मुख्यमंत्री भी मंत्रिपरिषद में कैबिनेट मंत्री का ही दर्जा रखते हैं। वे कैबिनेट मंत्री के रूप में ही शपथ लेते हैं और उनका वेतन-भत्ता भी कैबिनेट मंत्री के समान होता है।

4. मंत्रिपरिषद् बनाम मंत्रिमंडल (Council of Ministers vs Cabinet) – सूक्ष्म तुलना

सामान्य बोलचाल में मंत्रिपरिषद और मंत्रिमंडल को एक ही समझ लिया जाता है, परंतु भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में दोनों में स्पष्ट और गहरा अंतर है:

तुलना का आधार मंत्रिपरिषद् (Council of Ministers) मंत्रिमंडल / कैबिनेट (Cabinet)
1. संवैधानिक स्थिति अनुच्छेद 163 व 164 में विस्तृत उल्लेख है। यह मूल संविधान का अभिन्न अंग है। मूल संविधान में यह शब्द नहीं था। 44वें संविधान संशोधन (1978) द्वारा केवल अनुच्छेद 352 में इसे शामिल किया गया।
2. संरचना एवं आकार यह एक वृहत् निकाय (Broader Body) है, जिसमें मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उप-मंत्री सभी शामिल होते हैं (राजस्थान में अधिकतम 30)। यह मंत्रिपरिषद का एक लघु एवं आंतरिक भाग है, जिसमें केवल मुख्यमंत्री और कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ मंत्री शामिल होते हैं (सामान्यतः 10-18 सदस्य)।
3. शक्तियाँ व कार्य सैद्धांतिक रूप से सभी कार्यपालिका शक्तियाँ मंत्रिपरिषद में निहित हैं, परंतु व्यावहारिक रूप से यह सामूहिक बैठक नहीं करती। यह वास्तविक नीति निर्धारक (Policy Making Core) संस्था है। यह मंत्रिपरिषद की शक्तियों का व्यावहारिक प्रयोग करती है।
4. बैठकें (Meetings) मंत्रिपरिषद की सामूहिक बैठकें औपचारिक अवसरों को छोड़कर नियमित रूप से नहीं होती हैं। मंत्रिमंडल की बैठकें नियमित (साप्ताहिक या पाक्षिक) रूप से मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में आयोजित होती हैं।
5. उत्तरदायित्व अनुच्छेद 164(2) के तहत संपूर्ण मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। मंत्रिमंडल मंत्रिपरिषद के प्रति उत्तरदायी होता है तथा मंत्रिपरिषद के सामूहिक निर्णयों को लागू करवाता है।

5. सामूहिक उत्तरदायित्व बनाम व्यक्तिगत उत्तरदायित्व (Principles of Responsibility)

सामूहिक उत्तरदायित्व [अनुच्छेद 164(2)]

संसदीय व्यवस्था का आधारभूत सिद्धांत है— "मंत्रिमंडल एक साथ तैरता है और एक साथ डूबता है" (Swim and Sink Together)

  • मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य विधानसभा (Legislative Assembly) के प्रति जवाबदेह होती है।
  • यदि विधानसभा मंत्रिपरिषद के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पारित कर दे, तो सभी मंत्रियों (चाहे वे किसी भी दल या सदन के हों) को त्यागपत्र देना पड़ता है।
  • कैबिनेट के निर्णयों से सभी मंत्री सार्वजनिक रूप से सहमत होने के लिए बाध्य हैं। यदि कोई मंत्री कैबिनेट के किसी निर्णय से असहमत है, तो उसे त्यागपत्र देना होता है।

व्यक्तिगत उत्तरदायित्व [अनुच्छेद 164(1)]

प्रत्येक मंत्री व्यक्तिगत रूप से राज्यपाल (Governor) के प्रति उत्तरदायी होता है।

  • मंत्री राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (During Pleasure) पद धारण करते हैं।
  • राज्यपाल किसी भी मंत्री को अपनी मर्जी से नहीं हटा सकता; वह केवल मुख्यमंत्री की सिफारिश पर ही किसी मंत्री को पदमुक्त (Dismiss) कर सकता है।
  • यदि मुख्यमंत्री किसी मंत्री की कार्यशैली से असंतुष्ट हो, तो वह उससे त्यागपत्र मांग सकता है या राज्यपाल को उसे बर्खास्त करने की सलाह दे सकता है।

6. मंत्रियों की नियुक्ति, योग्यता, शपथ, पदावधि एवं पदमुक्ति

नियुक्ति एवं अर्हताएँ (Eligibility & Appointment)

  • नियुक्ति: मुख्यमंत्री की लिखित अनुशंसा पर राज्यपाल द्वारा (अनुच्छेद 164(1))।
  • योग्यता: भारत का नागरिक हो, न्यूनतम 25 वर्ष की आयु पूर्ण हो, तथा राज्य विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य हो।
  • 6 माह की छूट [164(4)]: कोई गैर-विधायक भी मंत्री बन सकता है, बशर्ते 6 माह के भीतर विधानसभा सदस्यता हासिल करे।

शपथ एवं पदमुक्ति (Oath & Removal)

  • शपथ: राज्यपाल द्वारा संविधान की तीसरी अनुसूची के प्रारूप अनुसार दो शपथ: 1. पद की शपथ, 2. गोपनीयता की शपथ।
  • पदावधि: कोई निश्चित कार्यकाल नहीं; राज्यपाल के प्रसादपर्यंत (बहुमत रहने तक)।
  • त्यागपत्र: मंत्री अपना त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित कर मुख्यमंत्री के माध्यम से सौंपते हैं।
  • मुख्यमंत्री का प्रभाव: मुख्यमंत्री के त्यागपत्र या आकस्मिक निधन से संपूर्ण मंत्रिपरिषद स्वतः भंग हो जाती है।

7. राजस्थान में संसदीय सचिव (Parliamentary Secretaries) व्यवस्था – ऐतिहासिक व विधिक स्वरूप

संसदीय सचिव का पद कोई संवैधानिक पद नहीं है। इसका गठन प्रशासनिक कार्यों में मंत्रियों की सहायता करने तथा 91वें संशोधन की 15% सीमा के प्रभाव को राजनीतिक रूप से संतुलित करने के लिए किया जाता रहा है:

📜 राजस्थान में प्रथम शुरुआत: राजस्थान में सर्वप्रथम संसदीय सचिव पद की व्यवस्था 1967 में चतुर्थ विधानसभा के दौरान मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया के कार्यकाल में प्रारंभ की गई थी।
⚖️ नियुक्ति एवं शपथ: संसदीय सचिवों की नियुक्ति और उन्हें पद की शपथ मुख्यमंत्री द्वारा दिलाई जाती है (राज्यपाल द्वारा नहीं)। यह RPSC का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।
🏛️ विधिक स्थिति एवं न्यायिक निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय (बिमलंगशु रॉय वाद 2017) तथा उच्च न्यायालयों द्वारा संसदीय सचिवों को 'लाभ का पद' (Office of Profit) तथा गैर-संवैधानिक घोषित किया जा चुका है, क्योंकि राज्य विधानसभाओं के पास ऐसा पद सृजित करने की विधायी शक्ति नहीं है।

8. कैबिनेट की कार्यप्रणाली, कैबिनेट समितियाँ एवं कैबिनेट सचिवालय

कैबिनेट समितियाँ (Cabinet Committees):

कैबिनेट के अत्यधिक कार्यभार को कम करने तथा विशिष्ट मामलों के त्वरित निस्तारण हेतु मुख्यमंत्री विभिन्न कैबिनेट समितियों का गठन करते हैं। ये समितियाँ दो प्रकार की होती हैं:
1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees): जैसे राजनीतिक मामलों की समिति, वित्त व संसाधन समिति।
2. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees): किसी तात्कालिक संकट या विशिष्ट नीति परीक्षण हेतु गठित।

कैबिनेट सचिवालय एवं मुख्य सचिव:

कैबिनेट की बैठकों का एजेंडा तैयार करना, बैठकों के कार्यवृत्त (Minutes) तैयार करना तथा निर्णयों के क्रियान्वयन की निगरानी मंत्रिमंडल सचिवालय (Cabinet Secretariat) करता है। राज्य का मुख्य सचिव (Chief Secretary) कैबिनेट का पदेन सचिव (Ex-Officio Secretary to Cabinet) होता है।

9. राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद का त्रिकोणीय संबंध (Articles 163, 164, 167)

राज्य शासन में सत्ता का संचालन राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं मंत्रिपरिषद के अंतर्संबंधों पर निर्भर करता है:

🔗 मुख्यमंत्री - संवाद की मुख्य कड़ी (Channel of Communication): मुख्यमंत्री मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों से राज्यपाल को अवगत कराता है। मंत्रिपरिषद का कोई भी मंत्री सीधे राज्यपाल को कैबिनेट के फैसलों की सूचना नहीं दे सकता।
🔗 अनुच्छेद 167(c) का विशेष प्रभाव: यदि किसी मंत्री ने अपने विभाग से संबंधित किसी विषय पर निर्णय ले लिया है, परंतु उस पर संपूर्ण मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है, तो राज्यपाल मुख्यमंत्री से अपेक्षा कर सकता है कि उस मामले को मंत्रिपरिषद के समक्ष विचारार्थ रखा जाए।

10. परीक्षा-उपयोगी त्वरित रामबाण तथ्य (High-Yield RPSC/RAS Revision Bullets)

⚡ महत्वपूर्ण सांख्यिकीय तथ्य (Part 1)

  • मंत्रिपरिषद का संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 163 एवं 164।
  • राजस्थान में अधिकतम मंत्री: 30 (विधानसभा का 15%)।
  • राजस्थान में न्यूनतम मंत्री: 12 (मुख्यमंत्री सहित)।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व: अनुच्छेद 164(2) - विधानसभा के प्रति।
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: अनुच्छेद 164(1) - राज्यपाल के प्रति।
  • शपथ का प्रारूप: संविधान की तीसरी अनुसूची में।

⚡ महत्वपूर्ण सांख्यिकीय तथ्य (Part 2)

  • संसदीय सचिव की शुरुआत: 1967 (मोहनलाल सुखाड़िया सरकार)।
  • संसदीय सचिव को शपथ: मुख्यमंत्री दिलाता है।
  • मंत्रिमंडल शब्द का संविधान में उल्लेख: केवल अनुच्छेद 352 में।
  • विभागों का आधिकारिक आवंटन: राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री की सलाह पर।
  • कैबिनेट का सचिव: राज्य का मुख्य सचिव (Chief Secretary)।
  • गैर-विधायक मंत्री की अधिकतम अवधि: 6 माह।

11. विगत RPSC/RAS परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Questions & Analysis)

प्रश्न 1: संविधान के किस संशोधन द्वारा यह निर्धारित किया गया कि किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या उस राज्य की विधानसभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी? [RAS Pre 2016 / 1st Grade GK 2020]

उत्तर: 91वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003। इसके द्वारा अनुच्छेद 164(1A) अंतःस्थापित किया गया।

प्रश्न 2: राजस्थान में संसदीय सचिव किसके समक्ष शपथ लेते हैं अथवा प्रतिज्ञान करते हैं? [RAS Pre 2013 / College Lecturer 2016]

उत्तर: मुख्यमंत्री के समक्ष। (सामान्य मंत्रियों को राज्यपाल शपथ दिलाते हैं, परंतु संसदीय सचिव को शपथ मुख्यमंत्री दिलाते हैं)।

प्रश्न 3: राजस्थान मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से किसके प्रति उत्तरदायी होती है? [2nd Grade Teacher 2018]

उत्तर: राज्य विधानसभा (Legislative Assembly) के प्रति। (अनुच्छेद 164(2) के अनुसार)।

प्रश्न 4: क्या कोई मंत्री किसी ऐसे सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है जिसका वह सदस्य नहीं है? [Sub Inspector 2021]

उत्तर: हाँ, अनुच्छेद 177 के अनुसार वह कार्यवाही में भाग ले सकता है और बोल सकता है, परंतु मतदान केवल उसी सदन में कर सकता है जिसका वह सदस्य है।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

मंत्रिपरिषद एवं उत्तरदायित्व

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): राज्य मंत्रिपरिषद के सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility) के सिद्धांत का परीक्षण कीजिए।

उत्तर संकेत: अनुच्छेद 164(2) के अनुसार मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति जवाबदेह है। यदि विधानसभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, तो सभी मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ता है। कैबिनेट बैठकों में लिया गया निर्णय सभी मंत्रियों का संयुक्त निर्णय माना जाता है; असहमति की स्थिति में मंत्री को पद छोड़ना पड़ता है।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा राजस्थान मंत्रिपरिषद के संबंध में क्या सीमा तय की गई?

उत्तर संकेत: अनुच्छेद 164(1A) के तहत मंत्रियों की कुल संख्या विधानसभा का अधिकतम 15% (30 मंत्री) तथा न्यूनतम 12 मंत्री (मुख्यमंत्री सहित) निर्धारित की गई।
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  • 1 संख्या सीमा का गणित: 91वें संशोधन अनुसार 15% का नियम (अधिकतम 30) तथा न्यूनतम 12 की बाध्यता।
  • 2 उत्तरदायित्व का सिद्धांत: अनुच्छेद 164(2) सामूहिक उत्तरदायित्व एवं अनुच्छेद 164(1) व्यक्तिगत उत्तरदायित्व में अंतर।
  • 3 मंत्रिपरिषद vs मंत्रिमंडल: दोनों के आकार, शक्तियों एवं संवैधानिक स्थिति की तुलना।
  • 4 संसदीय सचिव स्थिति: नियुक्ति, शपथ (मुख्यमंत्री द्वारा) व सुखाड़िया सरकार (1967) का इतिहास।

12 से 30 सीमा

91वां संशोधन 2003

अनुच्छेद 164(2)

सामूहिक उत्तरदायित्व

3 मंत्री श्रेणियाँ

कैबिनेट, राज्य व उप

संसदीय सचिव

1967 से ऐतिहासिक प्रथा

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थान मंत्रिपरिषद से संबंधित परीक्षोपयोगी प्रश्न एवं प्रामाणिक उत्तर।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(1A) के अनुसार राजस्थान विधानसभा की कुल सदस्य संख्या (200) का अधिकतम 15% यानी मुख्यमंत्री सहित अधिकतम 30 मंत्री हो सकते हैं। वहीं किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की न्यूनतम संख्या 12 होना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है।
मंत्रिपरिषद एक वृहत् संवैधानिक निकाय है (अनुच्छेद 163 व 164), जिसमें तीन श्रेणियों के मंत्री (कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री व उप-मंत्री) शामिल होते हैं। जबकि मंत्रिमंडल (कैबिनेट) मंत्रिपरिषद का एक आंतरिक व शक्तिशाली लघु भाग होता है जिसमें केवल कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ मंत्री शामिल होते हैं। संविधान में मूलतः मंत्रिमंडल शब्द नहीं था, इसे 44वें संशोधन 1978 द्वारा अनुच्छेद 352 में औपचारिक रूप से शामिल किया गया।
अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से 'राज्य विधानसभा' (Legislative Assembly) के प्रति उत्तरदायी होती है। वहीं अनुच्छेद 164(1) के अनुसार प्रत्येक मंत्री व्यक्तिगत रूप से 'राज्यपाल' के प्रति उत्तरदायी होता है (प्रसादपर्यंत पद धारण करता है)।
संसदीय सचिव का पद कोई संवैधानिक पद नहीं है। राजस्थान में इसकी शुरुआत 1967 में चतुर्थ विधानसभा के समय मोहनलाल सुखाड़िया सरकार द्वारा की गई थी। संसदीय सचिवों की नियुक्ति और शपथ 'मुख्यमंत्री' द्वारा कराई जाती है (राज्यपाल द्वारा नहीं)।
हाँ, अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य बने मंत्री या मुख्यमंत्री नियुक्त हो सकता है, लेकिन उसे पदभार ग्रहण करने की तिथि से 6 माह के भीतर राज्य विधानसभा का सदस्य निर्वाचित होना अनिवार्य होता है, अन्यथा 6 माह पूर्ण होते ही उसका मंत्री पद समाप्त हो जाता है।
अनुच्छेद 166(3) एवं राजस्थान कार्य संचालन नियमों (Rules of Business) के अंतर्गत विभागों का आधिकारिक आवंटन राज्यपाल द्वारा 'मुख्यमंत्री की सलाह व अनुशंसा' पर किया जाता है। व्यावहारिक रूप से यह पूर्णतः मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।

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विस्तृत हिंदी व्याख्या: हर प्रश्न का संविधान के अनुच्छेदों सहित संपूर्ण विश्लेषण और Instant Scorecard
अनलिमिटेड एटेम्प्ट्स: अपनी ऑल राजस्थान रैंक सुधारने के लिए असीमित बार टेस्ट दें
⭐⭐⭐⭐⭐ 480+ अभ्यर्थियों ने इस सप्ताह राजव्यवस्था टेस्ट सीरीज़ जॉइन की!