राजस्थान के लोक संगीत, गीत एवं वाद्ययंत्र:
सम्पूर्ण परीक्षा नोट्स एवं ट्रिक्स
राजस्थान की माटी से उपजी मांड, मांगणियार व लंगा गायकी, विरह व उमंग के लोक गीत (कुरजां, मूमल, ढोला-मारू, हमसीढो) तथा चारों श्रेणियों के लोक वाद्ययंत्र (तत, सुषिर, अवनद्ध एवं घन) — RAS, RPSC एवं RSSB परीक्षाओं हेतु मानक पुस्तकों पर आधारित सम्पूर्ण प्रामाणिक अध्ययन।
राजस्थान कला एवं संस्कृति: विषयवार अध्ययन
सम्पूर्ण कला-संस्कृति देखेंराजस्थान के लोक संगीत, गीत एवं वाद्ययंत्र: सम्पूर्ण विश्लेषण
मांड गायकी, संगीत घराने, प्रमुख लोक गीत तथा चारों प्रकार के वाद्ययंत्रों (तत, सुषिर, अवनद्ध, घन) का बिंदुवार प्रामाणिक वर्गीकरण।
1. राजस्थान की प्रमुख लोक गायन शैलियाँ एवं संगीत घराने
🎼 (A) मांड गायकी (Mand Singing Style) जैसलमेर-बीकानेर क्षेत्र
• उत्पत्ति: जैसलमेर का प्राचीन नाम 'मांड प्रदेश' होने के कारण यह शैली मांड गायकी कहलाई। यह दरबारी एवं शास्त्रीय संगीत का अद्भुत मिश्रण है।
• राज्य गीत: "केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस" मांड राग में ही गाया जाता है।
• प्रमुख मांड गायिकाएं:
1. अल्लाह जिलाई बाई (बीकानेर): 1982 में पद्मश्री, 'बाई जी' उपनाम, केसरिया बालम को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई।
2. गवरी देवी / गवरी बाई (पाली/जोधपुर): अल्बर्ट हॉल (लंदन) में मांड गायन प्रस्तुत किया।
3. मांगी बाई आर्या (उदयपुर): 1982 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार।
4. जमीला बानो (जोधपुर), बन्नो बेगम (जयपुर)।
🪕 (B) मांगणियार गायकी (बाड़मेर-जैसलमेर)
• जाति: सिंध मुस्लिम मूल की मांगणियार जाति, जो अपने यजमानों के मांगलिक अवसरों पर गायन करती है।
• प्रमुख वाद्ययंत्र: कामायचा एवं खड़ताल।
• प्रमुख कलाकार: साकर खां मांगणियार (कामायचा के जादूगर, पद्मश्री), सदीक खां मांगणियार (खड़ताल के जादूगर), अनवर खां मांगणियार।
🎻 (C) लंगा गायकी (जोधपुर-बाड़मेर)
• जाति: पश्चिमी राजस्थान की मुस्लिम लंगा जाति (कलाल व सोढ़ा राजपूत इनके मुख्य यजमान)।
• प्रमुख वाद्ययंत्र: सारंगी (गुजराती/कमायची सारंगी) एवं मुरली/सुरनाई।
• प्रमुख गीत: निंबूड़ा, गोरबंद, कुरजां।
• प्रसिद्ध कलाकार: करीम खां लंगा, अलादीन लंगा, भूंगर खां।
🏛️ अन्य गायन शैलियाँ एवं शास्त्रीय संगीत घराने
• तालबंदी गायकी: पूर्वी राजस्थान (भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर) में प्रचलित। इसमें नगाड़ा, हारमोनियम और झांझ के साथ कवियों की पदों को तालबद्ध गाया जाता है।
• हवेली संगीत: नाथद्वारा (राजसमंद) में श्रीनाथ जी के मंदिर में भगवान की सेवा में प्रस्तुत किया जाने वाला शास्त्रीय पुष्टि-मार्गीय कीर्तन संगीत।
• जयपुर कथक घराना: प्रवर्तक - भानू जी महाराज।
• जयपुर संगीत घराना (ख्याल): प्रवर्तक - मनरंग (भूपत खां)।
• पटियाला घराना: प्रवर्तक - अलीबख्श एवं फतेह अली (कर्नल जरनैल)।
• मेवाती घराना: प्रवर्तक - उस्ताद घग्घे नजीर खां। प्रमुख गायक: पंडित जसराज जी।
• डागर घराना (ध्रुपद गायकी): प्रवर्तक - बहराम खां डागर (जयपुर नरेश रामसिंह द्वितीय के दरबारी)।
2. राजस्थान के प्रमुख लोक गीत (Major Folk Songs of Rajasthan)
| लोक गीत का नाम | गीत की प्रकृति / श्रेणी | संदर्भ, क्षेत्र एवं विशिष्ट परीक्षा तथ्य |
|---|---|---|
| कुरजां (Kurjan) | विरह गीत (संदेश गीत) | परदेस गए पति को कुरजां पक्षी के माध्यम से संदेश भिजवाने हेतु विरहिणी स्त्री द्वारा गाया जाने वाला मार्मिक गीत। |
| मूमल (Moomal) | श्रृंगारिक ऐतिहासिक गीत | जैसलमेर (लोद्रवा) की राजकुमारी मूमल के नख-शिख सौंदर्य एवं अमरकोट के राजकुमार महेंद्र के अमर प्रेम पर आधारित। |
| जोरावा (Jorawa) | प्रसिद्ध विरह गीत | जैसलमेर क्षेत्र में पति के परदेस जाने पर वियोग में गाया जाने वाला लोक गीत। (RPSC में पूछा गया) |
| सुवटिया (Suvatiya) | जनजातीय विरह गीत | मेवाड़ क्षेत्र में भील स्त्री द्वारा परदेस गए पति की याद में तोते (सूआ) को संबोधित कर गाया जाने वाला गीत। |
| हमसीढो (Hamsidho) | युगल लोक गीत | मेवाड़ के पर्वतीय प्रदेश में भील स्त्री और पुरुष द्वारा सम्मिलित रूप से (युगल) गाया जाने वाला प्रसिद्ध गीत। |
| गोरबंद (Gorband) | श्रृंगारिक लोक गीत | ऊंट के गले के आभूषण 'गोरबंद' को गूंथते समय महिलाओं द्वारा गाया जाने वाला मरुस्थलीय गीत। |
| कामण (Kaman) | मांगलिक/विवाह गीत | वर (दूल्हे) को जादू-टोने व बुरी नजर से बचाने हेतु विवाह के अवसर पर स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला गीत। |
| सीठणे (Seethane) | गाली गीत / हास्य गीत | विवाह के समय समधी/बारातियों को भोजन कराते समय स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला मधुर गाली व विनोद गीत। |
| कांगसियो (Kangasaiyo) | श्रृंगारिक गीत | कंघी (कांगसी) के संदर्भ में स्त्री के सौंदर्य और शृंगार को अभिव्यक्त करने वाला पश्चिमी राजस्थान का गीत। |
| पंछीड़ा (Panchhida) | क्रांतिकारी / किसान गीत | बिजोलिया किसान आंदोलन के समय माणिक्यलाल वर्मा द्वारा किसानों में चेतना जगाने हेतु रचित अत्यंत लोकप्रिय गीत। |
| जच्चा / होलर (Jachha) | संतान जन्म का गीत | घर में शिशु (पुत्र/पुत्री) के जन्म के अवसर पर गाया जाने वाला मांगलिक उत्सव गीत। |
| हरजस (Harjas) | भक्ति / पद गीत | सगुण भक्ति आधारित राम और कृष्ण की आराधना में अथवा वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु पर गाए जाने वाले भजन। |
3. तत वाद्य यंत्र (Chordophones – तार वाले वाद्य)
वे वाद्ययंत्र जिनमें तार (तांत/धातु के तार) खिंचे होते हैं और जिन पर उंगली, मिजराब या गज (Bow) के घर्षण से स्वर की उत्पत्ति होती है:
1. रावणहत्था (Ravanhattha)
• राजस्थान का अति-प्राचीन एवं लोकप्रिय वाद्य। आधे कटे नारियल की कटोरी पर बकरे की खाल मढ़कर बनाया जाता है।
• इसमें कुल 9 तार होते हैं। पाबूजी, रामदेवजी व डूंगजी-जवाहर जी की फड़ वाचन में भोपों द्वारा बजाया जाता है।
2. सारंगी (Sarangi)
• तत वाद्यों में सर्वश्रेष्ठ एवं सुरों की रानी। सागवान/शीशम की लकड़ी से निर्मित, जिसमें 27 तार होते हैं।
• लंगा जाति और अलवर-भरतपुर के जोगी (भरथरी व गोपीचंद कथा) सारंगी बजाते हैं।
3. कामायचा (Kamaycha)
• मांगणियार जाति का प्रमुख वाद्य (सारंगी की रानी)। रोहिड़ा की लकड़ी से बना, जिसमें 16 या 27 तार होते हैं।
• प्रसिद्ध वादक: साकर खां मांगणियार।
4. जंतर (Jantar)
• वीणा का प्रारंभिक रूप, जिसमें 2 तुम्बे और 5 या 6 तार होते हैं। इसे गले में लटकाकर खड़े होकर बजाया जाता है।
• श्री देवनारायण जी की फड़ वाचन के समय गुर्जर भोपों द्वारा प्रयुक्त।
5. भपंग (Bhapang)
• सूखे तूंबे से बना डमरूनुमा वाद्य, जिसे कांख (बगल) में दबाकर बजाया जाता है (मेवात क्षेत्र)।
• प्रसिद्ध वादक: जहूर खां मेवाती एवं उमर फारूक मेवाती (भपंग के जादूगर)।
6. अन्य तत वाद्य
• तंदूरा / चौतारा / वेणो / निशान: 4 तार (कामड़िया पंथ द्वारा तेरहताली में प्रयुक्त)।
• एकतारा: नारद जी व मीराबाई का वाद्य (एक हाथ में खड़ताल, दूजे में एकतारा)।
• दुकाको (भीलों द्वारा दीपावली पर), गुजरी, चिंकारा, सुरिन्दा, रबाब, रबाज।
4. सुषिर वाद्य यंत्र (Aerophones – फूँक से बजने वाले)
1. अलगोजा (Algoza)
• राजस्थान का राज्य वाद्ययंत्र। इसमें बांस की दो बांसुरियां एक साथ मुंह में रखकर बजाई जाती हैं (प्रत्येक में 4-4 छिद्र)।
• प्रमुख वादक: रामनाथ चौधरी (पद्मश्री - अपनी नाक से अलगोजा बजाने हेतु विश्व प्रसिद्ध)।
2. शहनाई / नफीरी
• सुषिर वाद्यों में सबसे सुरीला एवं मांगलिक वाद्य। शीशम या सागवान की लकड़ी से निर्मित, जिसमें 8 छिद्र होते हैं।
• विवाह व शुभ कार्यों पर नौबत/नगाड़े के साथ बजाया जाता है।
3. नड़ (Nad)
• कंगोर की लकड़ी से बनी लगभग 1 मीटर लंबी पोली नली, जिसमें 4 छिद्र होते हैं (जैसलमेर क्षेत्र)।
• प्रसिद्ध वादक: करणा भील (अपनी ऐतिहासिक लंबी मूंछों हेतु विश्व प्रसिद्ध)।
4. मोरचंग (Morchang)
• लोहे का बना अत्यंत छोटा वाद्य, जिसे दांतों के बीच दबाकर होंठों व उंगली के प्रहार से बजाते हैं।
• इसे 'ज्यूस हार्प' (Jew's Harp) कहा जाता है (लंगा गायकों द्वारा प्रयुक्त)।
5. पूंगी, बांकिया व भूंगल
• पूंगी / बीन: कालबेलिया सपेरों का प्रमुख वाद्य (कालबेलिया नृत्य में)।
• बांकिया: पीतल का बिगुलनुमा वाद्य (सरगड़ा जाति का खानदानी वाद्य)।
• भूंगल / रणभेरी: युद्ध के समय बजाया जाने वाला पीतल का तुरही वाद्य।
6. अन्य सुषिर वाद्य
• मशक: चमड़े की थैलीनुमा (भैरूंजी के भोपे बजाते हैं)।
• सुरनाई: शहनाई जैसी (प्रसिद्ध वादक: पेपे खां)।
• सतारा: अलगोजा, बांसुरी व शहनाई का समन्वित रूप।
• नागफणी, शंख, बरगु, सिंगी, तारपी।
5. अवनद्ध वाद्य यंत्र (Membranophones – ताल / चमड़े से मढ़े)
1. मृदंग / पखावज (Mridang)
• सुपारी की आकृति का दोमुंहा वाद्य (एक तरफ बकरी व दूसरी तरफ भैंस की खाल)।
• प्रसिद्ध वादक: पंडित पुरुषोत्तम दास (नाथद्वारा, पद्मश्री सम्मानित)।
2. मांदल (Mandal)
• मोलेला (राजसमंद) की पकी लाल मिट्टी से निर्मित लोक वाद्य।
• गरासिया व भील जनजाति द्वारा 'गवरी नृत्य' में थाली के साथ बजाया जाता है।
3. नगाड़ा / नौबत (Nagara)
• मंदिरों व महलों के मुख्य द्वार पर बजाया जाने वाला भारी धातु व भैंसे की खाल का वाद्य।
• नगाड़े का जादूगर: रामकिशन सोलंकी (पुष्कर, अजमेर)।
4. चंग व डफ (Chang & Daph)
• शेखावाटी क्षेत्र में होली पर्व पर पुरुषों द्वारा 'धमाल' गीतों के साथ बजाया जाने वाला गोल घेरेदार वाद्य।
5. माठ (Math)
• मिट्टी के दो बड़े बर्तनों (मटकों) के मुंह पर खाल मढ़कर बनाया गया वाद्य।
• पाबूजी के पवाड़े गाते समय थोरी/नायक जाति द्वारा बजाया जाता है।
6. अन्य अवनद्ध वाद्य
• ढोल (जालौर का ढोल नृत्य - थाकना शैली)।
• डेरू (गोगाजी के भोपे बजाते हैं), ढाक (गुर्जर भोपे), ताशा (ताजिए में), खंजरी, दमामा / टामक।
6. घन वाद्य यंत्र (Idiophones – धातु से निर्मित / चोट मारकर)
कांसा, पीतल, तांबा अथवा लोहे जैसी ठोस धातुओं से बने वाद्य, जिन्हें आपस में टकराने या चोट मारने से मधुर झंकार उत्पन्न होती है:
1. मंजीरा (Manjira)
• कांसा व पीतल मिश्रित गोल कटोरीनुमा वाद्य।
• कामड़िया पंथ की महिलाओं द्वारा तेरहताली नृत्य में 13 मंजीरे बांधकर बजाए जाते हैं (9 दाएं पैर में, 2 कोहनी पर, 2 हाथों में)।
2. खड़ताल (Khartal)
• शीशम की लकड़ी की चार आयताकार पट्टियां (दो-दो दोनों हाथों में)।
• खड़ताल का जादूगर: सदीक खां मांगणियार।
3. झांझ (Jhanjh)
• मंजीरे का बड़ा रूप, जिसे शेखावाटी के 'कच्छी घोड़ी नृत्य' के समय दोनों हाथों से टकराकर तीव्र गति से बजाया जाता है।
4. रमझोल (Ramjhol)
• चमड़े की चौड़ी पट्टी पर बहुत सारे घुंघरू सिले होते हैं, जिसे पैर में बांधकर गैर नृत्य में बजाया जाता है।
5. भरनी (Bharni)
• मिट्टी के मटके के ऊपर कांसे की थाली रखकर दोनों हाथों में डंडियों से बजाया जाने वाला वाद्य (सांप के काटने पर झाड़-फूंक में)।
6. अन्य घन वाद्य
• थाली, चिमटा (नाथ जोगी बजाते हैं), टोकरियो, घंटा / घड़ियाल, लेजिम (गरासिया जनजाति), कागराच, घुंघरू।
7. प्रमुख लोक कलाकार, वादक एवं प्रसिद्ध उपाधियाँ
| कलाकार का नाम | संबंधित वाद्ययंत्र / विधा | उपाधि / विशिष्ट उपलब्धि (RPSC Hot Topic) |
|---|---|---|
| साकर खां मांगणियार | कामायचा (Kamaycha) | कामायचा के जादूगर (2012 में पद्मश्री से सम्मानित)। |
| सदीक खां मांगणियार | खड़ताल (Khartal) | खड़ताल का जादूगर (लोक कला अनुसंधान परिषद द्वारा सम्मानित)। |
| जहूर खां मेवाती | भपंग (Bhapang) | भपंग का जादूगर (मेवात क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई)। |
| पंडित पुरुषोत्तम दास | पखावज / मृदंग | पखावज के अद्वितीय सम्राट (नाथद्वारा, पद्मश्री प्राप्त)। |
| रामकिशन सोलंकी | नगाड़ा (Nagara) | नगाड़े का जादूगर (पुष्कर, अजमेर)। |
| रामनाथ चौधरी | अलगोजा (Algoza) | नाक से अलगोजा बजाने वाले विश्व प्रसिद्ध पद्मश्री वादक (पदमपुरा, जयपुर)। |
| करणा भील | नड़ (Nad) | ऐतिहासिक लंबी मूंछों व नड़ वादन के अंतरराष्ट्रीय कलाकार (जैसलमेर)। |
| पेपे खां | सुरनाई (Surnai) | सुरनाई के अंतरराष्ट्रीय स्तर के सिद्धहस्त वादक। |
| अल्लाह जिलाई बाई | मांड गायकी | राजस्थान की 'मरुकोकिला' (1982 पद्मश्री, 2003 में डाक टिकट)। |
8. वाद्ययंत्र याद रखने के आसान स्मरण सूत्र (Short Tricks)
🎯 ट्रिक 1: प्रमुख तत वाद्य (तार वाले)
"जरा भाई का सुर एक तंदूरे में गाओ"
ज = जंतर | रा = रावणहत्था | भा = भपंग | ई = इकतारा | का = कामायचा | सुर = सुरिन्दा/सारंगी | एक = एकतारा | तंदूरे = तंदूरा/चौतारा | गाओ = गुजरी।
🎯 ट्रिक 2: प्रमुख सुषिर वाद्य (फूँक वाले)
"अलगू बांके नड़ पर मोर पूंगी बजावे"
अलगू = अलगोजा | बांके = बांकिया | नड़ = नड़ | मोर = मोरचंग | पूंगी = पूंगी/बीन | बजावे = बरगु/भूंगल/शहनाई।
🎯 ट्रिक 3: प्रमुख घन वाद्य (धातु निर्मित)
"झांझ खड़ताली मंजीरे से रमझोल बजा"
झांझ | खड़ताल | मंजीरा | रमझोल | थाली | चिमटा | भरनी।
9. विगत परीक्षाओं में पूछे गए अति-महत्वपूर्ण तथ्य (One-Liners)
📌 लोक संगीत एवं गीत परीक्षा तथ्य
- 'केसरिया बालम': मांड गायकी में गाया जाने वाला राजस्थान का राज्य गीत।
- कुरजां व जोरावा: पश्चिमी राजस्थान (जैसलमेर) के सर्वाधिक प्रसिद्ध विरह गीत।
- हमसीढो: मेवाड़ के भील स्त्री-पुरुषों द्वारा सम्मिलित गाया जाने वाला युगल गीत।
- कामण गीत: वर को जादू-टोने से बचाने हेतु विवाह में गाया जाता है।
- सीठणे: विवाह में समधियों को भोजन के समय गाए जाने वाले हास्य-गाली गीत।
- पंछीड़ा गीत: बिजोलिया किसान आंदोलन में माणिक्यलाल वर्मा द्वारा रचित।
- अल्लाह जिलाई बाई: बीकानेर की प्रसिद्ध मांड गायिका ('मरुकोकिला')।
📌 वाद्ययंत्र परीक्षा तथ्य
- अलगोजा: राजस्थान का राज्य वाद्ययंत्र (सुषिर श्रेणी - 2 बांसुरियां)।
- रावणहत्था: पाबूजी व रामदेवजी की फड़ में प्रयुक्त तत वाद्य (9 तार)।
- जंतर: देवनारायण जी की फड़ वाचन में गुर्जर भोपों द्वारा प्रयुक्त तत वाद्य।
- मोरचंग: 'ज्यूस हार्प' कहा जाने वाला सबसे छोटा सुषिर वाद्य।
- मांदल: मोलेला (राजसमंद) की मिट्टी से बना अवनद्ध वाद्य (गवरी नृत्य में)।
- साकर खां: कामायचा के जादूगर | सदीक खां: खड़ताल के जादूगर।
- जहूर खां मेवाती: मेवात के प्रसिद्ध भपंग वादक।
अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)
लोक संगीत एवं वाद्ययंत्रों से जुड़े प्रमुख संशय निवारण।
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