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मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 (धारा 21-29) एवं 2019 संशोधन पर आधारित

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (SHRC Rajasthan) :
गठन 1999, 2019 संशोधन (3 वर्ष/70 वर्ष), चयन समिति व अध्यक्ष कालक्रम

राजस्थान में नागरिक स्वतंत्रता व मानव गरिमा के सर्वोच्च संरक्षक आयोग का 100% प्रामाणिक अध्ययन — 18 जनवरी 1999 की अधिसूचना, मार्च 2000 में कार्यप्रारंभ, मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (धारा 21 से 29), 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य संरचना, मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली 4-सदस्यीय चयन समिति, 2019 संशोधन अधिनियम (कार्यकाल 3 वर्ष / 70 वर्ष आयु सीमा), पदच्युति प्रक्रिया (राष्ट्रपति द्वारा), प्रथम अध्यक्ष सुश्री कांता कुमारी भटनागर से लेकर वर्तमान तक की संपूर्ण अध्यक्ष सूची एवं RAS Pre/Mains, SI व RSSB CET हेतु व्यापक नोट्स।

गठन अधिसूचना 18 जनवरी 1999
कार्य प्रारंभ तिथि मार्च 2000
संरचना (2006 बाद) 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य
कार्यकाल (2019 बाद) 3 वर्ष या 70 वर्ष आयु
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम 1993 (केन्द्रीय अधिनियम सं. 10/1994) एवं 2019 संशोधन का विस्तृत विश्लेषण

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग : संरचना, चयन समिति (धारा 22) व शक्तियाँ

18 जनवरी 1999 अधिसूचना, मार्च 2000 कार्यप्रारंभ, 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य, 3 वर्ष/70 वर्ष कार्यकाल, सिविल कोर्ट शक्तियाँ, कांता भटनागर से लेकर वर्तमान तक अध्यक्ष सूची व विगत RAS प्रश्न।

1. SHRC की विधिक पृष्ठभूमि, सांविधिक स्वरूप एवं राजस्थान में स्थापना

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (Rajasthan State Human Rights Commission - RSHRC) एक सांविधिक/विधिक निकाय (Statutory Body) है, संवैधानिक (Constitutional) नहीं। इसका गठन संसद द्वारा पारित 'मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993' (Protection of Human Rights Act, 1993) की धारा 21(1) के तहत किया गया है।

1
गठन की अधिसूचना (18 जनवरी 1999): राजस्थान सरकार के गृह विभाग द्वारा 18 जनवरी 1999 को राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन की आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई।
2
क्रियाशीलता एवं विधिवत कार्यप्रारंभ (मार्च 2000): आयोग ने विधिवत रूप से कार्य करना मार्च 2000 में प्रारंभ किया, जब राजस्थान उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश एवं मद्रास उच्च न्यायालय की पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुश्री कांता कुमारी भटनागर को आयोग की प्रथम अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
3
मुख्यालय (Headquarters): राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग का आधिकारिक मुख्यालय जयपुर (एस.एस.ओ. बिल्डिंग / खाद्य भवन) में स्थित है।

2. मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की मुख्य धाराएँ (धारा 21 से 29)

अधिनियम के अध्याय-5 (धारा 21 से 29) में राज्य मानवाधिकार आयोगों के गठन, शक्तियों और कार्यप्रणाली का संपूर्ण उपबंध है:

अधिनियम की धारा वैधानिक विषय (Statutory Subject) RPSC / RAS परीक्षा उपयोगी व्याख्या
धारा 21 राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन: राज्य सरकार द्वारा राज्य सूची (सूची-II) और समवर्ती सूची (सूची-III) के विषयों के उल्लंघन की जांच हेतु गठन। राज्य आयोग केवल राज्य सूची व समवर्ती सूची के मानवाधिकार मामलों की ही जांच कर सकता है। यदि राष्ट्रीय आयोग (NHRC) किसी मामले की जांच पहले से कर रहा हो, तो राज्य आयोग जांच नहीं कर सकता।
धारा 22 अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र (Warrant under his hand and seal) द्वारा। अति-महत्वपूर्ण: मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली 4-सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति की लिखित अनुशंसा पर राज्यपाल नियुक्ति करता है।
धारा 23 अध्यक्ष या सदस्य का त्यागपत्र एवं हटाया जाना (Removal): त्यागपत्र राज्यपाल को संबोधित, परन्तु हटाने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास। राज्यपाल केवल जांच अवधि में निलंबित कर सकता है, परन्तु कदाचार साबित होने पर हटाने का आदेश केवल 'भारत के राष्ट्रपति' दे सकते हैं।
धारा 24 पदावधि (Tenure): 2019 संशोधन अधिनियम के अनुसार 3 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु तक (पुनर्नियुक्ति के पात्र)। 2019 से पहले यह 5 वर्ष/70 वर्ष थी। 2019 संशोधन द्वारा इसे घटाकर 3 वर्ष/70 वर्ष कर दिया गया है।
धारा 25 कार्यवाहक अध्यक्ष की नियुक्ति: अध्यक्ष की मृत्यु, त्यागपत्र या अनुपस्थिति पर राज्यपाल सदस्यों में से किसी एक को कार्यवाहक अध्यक्ष प्राधिकृत कर सकता है। राज्यपाल द्वारा आयोग के सदस्यों में से ही किसी एक को नए अध्यक्ष की नियुक्ति तक कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया जाता है।
धारा 26 सेवा की शर्तें एवं वेतन-भत्ते: राज्य सरकार द्वारा निर्धारित। पद पर रहते हुए कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। वेतन-भत्ते राज्य सरकार निर्धारित करती है।
धारा 28 आयोग का वार्षिक एवं विशेष प्रतिवेदन (Annual Report): राज्य सरकार को प्रस्तुत करना। राज्य सरकार इस प्रतिवेदन को की गई कार्रवाई के ज्ञापन (Action Taken Report) सहित राज्य विधानसभा के समक्ष रखवाती है।
धारा 36(2) 1 वर्ष की समय सीमा (Limitation Period): आयोग किसी भी ऐसे मामले की जांच नहीं कर सकता, जो घटना घटित होने की तारीख से 1 वर्ष बाद लाया गया हो। RPSC में सर्वाधिक पूछा गया तथ्य: मानवाधिकार आयोग 1 वर्ष से अधिक पुराने मामलों की जांच करने का क्षेत्राधिकार नहीं रखता।

3. आयोग की संरचना, सदस्यों की योग्यता एवं 2006 व 2019 संशोधनों का प्रभाव

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की संरचना में समय के साथ महत्वपूर्ण विधायी परिवर्तन किए गए हैं:

मूल अधिनियम (1993) 1 + 4 = 5 1 अध्यक्ष + 4 सदस्य
2006 संशोधन अधिनियम 1 + 2 = 3 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य
2019 संशोधन (वर्तमान) 1 + 2 = 3 अध्यक्ष व सदस्यों की अर्हता में ढील
A. अध्यक्ष पद की योग्यता (धारा 21(2)(a)): उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (Retired Chief Justice) अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश (Retired Judge)। (ध्यान रहे: 2019 के संशोधन से पूर्व केवल सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश ही पात्र था, 2019 में सेवानिवृत्त न्यायाधीश को भी पात्र बनाया गया)।
B. सदस्य-1 की योग्यता (न्यायिक सदस्य - धारा 21(2)(b)): उच्च न्यायालय का वर्तमान अथवा सेवानिवृत्त न्यायाधीश या राज्य में कम से कम 7 वर्ष का अनुभव रखने वाला जिला न्यायाधीश (District Judge)
C. सदस्य-2 की योग्यता (विशेषज्ञ सदस्य - धारा 21(2)(c)): मानवाधिकारों के मामलों का व्यावहारिक ज्ञान अथवा अनुभव रखने वाला कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति।
D. आयोग का सचिव (धारा 21(3)): आयोग में एक सचिव (Secretary) होता है, जो राज्य सरकार के सचिव स्तर का अधिकारी होता है और आयोग का मुख्य प्रशासनिक व वित्तीय अधिकारी होता है।

4. नियुक्ति प्रक्रिया : 4-सदस्यीय उच्चस्तरीय चयन समिति (धारा 22) व कार्यकाल

अधिनियम की धारा 22 के अनुसार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक उच्चस्तरीय समिति की लिखित सिफारिश पर की जाती है। चूंकि राजस्थान में केवल एकसदनीय विधानमंडल (विधानसभा) है, अतः चयन समिति 4 सदस्यीय होती है:

1
मुख्यमंत्री (Chief Minister) समिति के अध्यक्ष
2
राज्य का गृह मंत्री (Home Minister) समिति के सदस्य
3
विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) समिति के सदस्य
4
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP) समिति के सदस्य
विशेष ध्यान दें (द्विसदनीय राज्यों हेतु): यदि राज्य में विधान परिषद (Legislative Council) भी अस्तित्व में हो, तो उस परिषद का सभापति (Chairman) तथा परिषद में विपक्ष का नेता भी चयन समिति के सदस्य होते हैं (अर्थात तब कुल 6 सदस्य होते हैं)। परन्तु राजस्थान में विधान परिषद नहीं है, इसलिए राजस्थान में समिति सदैव 4 सदस्यीय ही होती है।
चयन समिति तुलना (RPSC का पसंदीदा प्रश्न): मानवाधिकार आयोग (SHRC) की चयन समिति में 4 सदस्य होते हैं, जबकि राज्य मुख्य सूचना आयोग (RTI) की चयन समिति में केवल 3 सदस्य (CM, LoP व कैबिनेट मंत्री) होते हैं। इसी प्रकार लोकायुक्त की नियुक्ति में हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व नेता प्रतिपक्ष से परामर्श लिया जाता है।
कार्यकाल (Tenure - धारा 24 में 2019 संशोधन): अध्यक्ष एवं सदस्य पदभार ग्रहण करने की तिथि से 3 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक पद धारण करते हैं। वे पुनर्नियुक्ति (Re-appointment) के भी पात्र होते हैं (परन्तु 70 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा के अधीन)।

5. त्यागपत्र, निलंबन एवं राष्ट्रपति द्वारा पदच्युति (धारा 23 की प्रक्रिया)

राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष या सदस्य की निष्कासन प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार है, जैसे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या लोक सेवा आयोग (RPSC) के सदस्यों की होती है। नियुक्ति राज्यपाल करता है, त्यागपत्र भी राज्यपाल को दिया जाता है, परंतु हटाने की शक्ति केवल भारत के राष्ट्रपति के पास है:

धारा 23 : SHRC अध्यक्ष/सदस्य को हटाने की 4-चरणीय विधिक प्रक्रिया
1. कदाचार का आरोप राष्ट्रपति के समक्ष संदर्भ 2. राज्यपाल द्वारा निलंबन जांच लंबित रहने तक (धारा 23) 3. SC की न्यायिक जांच उच्चतम न्यायालय जांच रिपोर्ट 4. राष्ट्रपति आदेश अंतिम पदच्युति
A. साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर: राष्ट्रपति मामले को उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) को जांच हेतु भेजते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट जांच में आरोपों को सही पाता है, तो उसकी सिफारिश पर राष्ट्रपति उन्हें पद से हटा देते हैं।
B. बिना उच्चतम न्यायालय जांच के हटाने के आधार: राष्ट्रपति सीधे आदेश देकर हटा सकते हैं यदि सदस्य: 1. दिवालिया घोषित हो गया हो, 2. सवेतन नियोजन में लगा हो, 3. मानसिक या शारीरिक रूप से अक्षम हो, 4. किसी अपराध में कारावास की सजा पा चुका हो।
सेवानिवृत्ति उपरांत प्रतिबंध (धारा 24(3)): अध्यक्ष अथवा सदस्य अपने पद से हटने के बाद भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन (नौकरी) के पात्र नहीं होते (हालांकि सदस्य NHRC के सदस्य या SHRC के अध्यक्ष बन सकते हैं)।

6. SHRC के कार्य, सिविल कोर्ट शक्तियाँ (धारा 12 व 13) एवं विधिक सीमाएँ

1. दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ (धारा 13): जांच करते समय आयोग को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC 1908) के अधीन निम्नलिखित सिविल कोर्ट की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं:
  • गवाहों को समन जारी करना एवं हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना।
  • किसी भी दस्तावेज को प्रस्तुत करने की मांग करना।
  • शपथ पत्रों (Affidavits) पर साक्ष्य ग्रहण करना।
  • किसी भी न्यायालय या कार्यालय से सार्वजनिक अभिलेख (Public Records) मांगना।
2. प्रमुख कार्य (Functions of SHRC):
  • मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों की स्वप्रेरणा (Suo-Motu) से या पीड़ित की याचिका पर जांच करना।
  • जेलों एवं बंदीगृहों का निरीक्षण करना और कैदियों की जीवन दशाओं में सुधार हेतु सिफारिशें देना।
  • मानवाधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना एवं जन-जागरूकता फैलाना।
  • मानवाधिकार संरक्षण हेतु लागू संवैधानिक व विधिक रक्षोपायों की समीक्षा करना।
3. आयोग की सीमाएँ एवं कमजोरियाँ (परीक्षा उपयोगी):
  • केवल सलाहकारी निकाय (Advisory Body): आयोग की सिफारिशें सरकार पर बाध्यकारी नहीं होती हैं। आयोग स्वयं किसी को दंड (Punishment) नहीं दे सकता और न ही सीधे मुआवजा जारी कर सकता है (यह केवल मुआवजे की सिफारिश करता है)।
  • 1 वर्ष की समय सीमा (धारा 36(2)): आयोग घटना घटित होने के 1 वर्ष के बाद प्रस्तुत किसी भी मामले की जांच नहीं कर सकता।
  • सशस्त्र बल (Armed Forces): राज्य मानवाधिकार आयोग को सैन्य बलों/सशस्त्र बलों द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की जांच का अधिकार नहीं है (यह केवल NHRC के पास सीमित रूप में है)।
  • समानांतर जांच पर रोक: यदि किसी मामले की जांच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) या किसी अन्य विधिक आयोग द्वारा पहले से की जा रही हो, तो राज्य आयोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

7. स्वतंत्र अन्वेषण विंग (धारा 14) एवं मानवाधिकार न्यायालय (धारा 30 व 31)

आयोग की अपनी अन्वेषण विंग (Investigation Wing): अधिनियम की धारा 14 के तहत आयोग को अपनी जांच हेतु एक स्वतंत्र पुलिस अन्वेषण विंग दी गई है, जिसका प्रमुख पुलिस महानिरीक्षक (IGP) / अतिरिक्त महानिदेशक (ADGP) स्तर का आईपीएस अधिकारी होता है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के किसी भी जांच अधिकारी की सेवाएँ ली जा सकती हैं।
मानवाधिकार न्यायालय (Human Rights Courts - धारा 30): मानवाधिकारों के त्वरित विचारण हेतु राज्य सरकार, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति से प्रत्येक जिले में एक सत्र न्यायालय (Sessions Court) को मानवाधिकार न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकती है।
विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor - धारा 31): मानवाधिकार न्यायालयों में वादों के संचालन हेतु राज्य सरकार किसी ऐसे अधिवक्ता को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करती है, जिसने कम से कम 7 वर्ष तक वकालत की हो।

8. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्षों की सम्पूर्ण ऐतिहासिक सूची

क्र.सं. अध्यक्ष का नाम कार्यकाल (अवधि) विशिष्ट ऐतिहासिक एवं परीक्षा तथ्य
1 जस्टिस सुश्री कांता कुमारी भटनागर मार्च 2000 से अगस्त 2000 प्रथम अध्यक्ष। मद्रास उच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश। सबसे न्यूनतम नियमित कार्यकाल (लगभग 5 माह)।
- श्री आलमशाह खान 2000 से 2001 आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष (Acting Chairman)।
2 जस्टिस सैयद सगीर अहमद (S. Saghir Ahmad) जनवरी 2001 से अगस्त 2004 उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के पूर्व न्यायाधीश। जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी रहे।
3 जस्टिस नगेन्द्र कुमार जैन (एन.के. जैन) जुलाई 2005 से जुलाई 2010 मद्रास व हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे। पूरे 5 वर्ष का पूर्ण कार्यकाल पूर्ण किया।
- जस्टिस एच.आर. कुड़ी 2011 से 2016 दीर्घ अवधि तक आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष रहे।
4 जस्टिस प्रकाश टाटिया जुलाई 2016 से नवंबर 2019 झारखंड उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश। 2019 में त्यागपत्र दिया।
- जस्टिस महेश चंद्र शर्मा नवंबर 2019 से जनवरी 2021 आयोग के सदस्य व कार्यवाहक अध्यक्ष।
5 जस्टिस गोपाल कृष्ण व्यास (जी.के. व्यास) 25 जनवरी 2021 से 24 जनवरी 2024 राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश। 2019 संशोधन के तहत 3 वर्ष का पूर्ण कार्यकाल पूर्ण किया।
वर्तमान जस्टिस रामचंद्र सिंह झाला (कार्यवाहक) / अद्यतन स्थिति जनवरी 2024 से वर्तमान अद्यतन प्रशासनिक स्थिति। न्यायिक सदस्य के रूप में कार्यवाहक अध्यक्ष का कार्यभार।

9. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

⚡ गठन व संरचना तथ्य

  • अधिसूचना: 18 जनवरी 1999 (गृह विभाग).
  • कार्य प्रारंभ: मार्च 2000.
  • मुख्यालय: जयपुर.
  • स्वरूप: सांविधिक/विधिक (Statutory) निकाय.
  • वर्तमान संरचना: 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य (कुल 3).
  • प्रथम अध्यक्ष: जस्टिस कांता कुमारी भटनागर.

⚡ नियुक्ति, कार्यकाल व शक्तियाँ

  • चयन समिति: 4 सदस्यीय (CM, गृहमंत्री, स्पीकर, LoP).
  • नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा (वारंट सहित).
  • कार्यकाल (2019 बाद): 3 वर्ष या 70 वर्ष की आयु.
  • हटाने की शक्ति: केवल भारत के राष्ट्रपति में (धारा 23).
  • न्यायालयी शक्ति: सिविल न्यायालय (CPC 1908).
  • समय सीमा: 1 वर्ष से अधिक पुराने मामलों पर रोक.

10. विगत RPSC परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Year Solved Questions)

प्रश्न 1: राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश पर राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस समिति के अध्यक्ष कौन होते हैं? [RAS Pre 2018 / 2021]

उत्तर: मुख्यमंत्री (Chief Minister)। समिति में मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), गृह मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं।

प्रश्न 2: मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल कितना कर दिया गया है? [Sub Inspector 2021 / EO-RO 2023]

उत्तर: 3 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो)। (2019 से पहले यह 5 वर्ष या 70 वर्ष थी)।

प्रश्न 3: राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग किसी भी ऐसे मामले की जांच नहीं कर सकता जो घटना घटित होने की तारीख से कितनी अवधि के बाद लाया गया हो? [College Lecturer 2021]

उत्तर: 1 वर्ष (One Year) की समाप्ति के पश्चात् (अधिनियम की धारा 36(2))।

प्रश्न 4: राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की प्रथम महिला अध्यक्ष कौन थीं? [Patwar 2021 / RSSB CET]

उत्तर: न्यायमूर्ति सुश्री कांता कुमारी भटनागर (मार्च 2000)।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

मानवाधिकार आयोग

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): "राज्य मानवाधिकार आयोग एक दंतविहीन बाघ (Toothless Tiger) है।" इस कथन की समालोचना कीजिए।

उत्तर संकेत: आलोचना क्यों: आयोग केवल सलाहकारी (Advisory) है, दोषी को सीधे दंड देने या मुआवजा बांटने की शक्ति नहीं, 1 वर्ष से पुराने मामलों की जांच पर रोक (धारा 36)। पक्ष में तर्क: नैतिक व विधिक दबाव, जेल सुधार, मानवाधिकार चेतना और पुलिस अभिरक्षा में मौतों पर सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करना।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की चयन समिति में कौन-कौन शामिल होते हैं?

उत्तर संकेत: 4 सदस्य: 1. मुख्यमंत्री (अध्यक्ष), 2. गृह मंत्री, 3. विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर), 4. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (धारा 22)।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग, चयन समिति, 2019 संशोधन व शक्तियों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन की आधिकारिक अधिसूचना 18 जनवरी 1999 को मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 21(1) के तहत जारी की गई थी। आयोग ने विधिवत रूप से कार्य करना मार्च 2000 में प्रथम अध्यक्ष जस्टिस कांता कुमारी भटनागर की नियुक्ति के साथ प्रारंभ किया।
अधिनियम की धारा 22 के अनुसार, राज्यपाल द्वारा इनकी नियुक्ति एक 4-सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसके सदस्य हैं: 1. मुख्यमंत्री (समिति के अध्यक्ष), 2. राज्य का गृह मंत्री, 3. विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर), तथा 4. विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (LoP)। (राजस्थान एकसदनीय है, अतः यहाँ केवल 4 सदस्य होते हैं)।
मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार, अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल पदभार ग्रहण करने से 3 वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु प्राप्त करने तक (जो भी पहले हो) निर्धारित किया गया है। साथ ही, वे 3 वर्ष की पुनर्नियुक्ति के भी पात्र होते हैं।
2019 के संशोधन से पूर्व अध्यक्ष केवल किसी उच्च न्यायालय का 'सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश' (Retired Chief Justice) ही हो सकता था। परन्तु 2019 के संशोधन के बाद उच्च न्यायालय का 'सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश' अथवा 'कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश' (Retired Judge) भी अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकता है।
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की प्रथम अध्यक्ष मद्रास उच्च न्यायालय की सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश सुश्री कांता कुमारी भटनागर (न्यायमूर्ति कांता भटनागर) थीं, जिन्होंने मार्च 2000 में पदभार संभाला था।
अधिनियम की धारा 23 के अनुसार, राज्यपाल केवल नियुक्ति करता है और जांच के दौरान निलंबित कर सकता है, परन्तु पद से हटाने की अंतिम शक्ति केवल 'भारत के राष्ट्रपति' के पास है। राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) द्वारा की गई जांच रिपोर्ट में साबित कदाचार या अक्षमता पाए जाने पर ही पदच्युत करते हैं।

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