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संसदीय निगरानी तंत्र : राजस्थान विधानसभा की समितियाँ

राजस्थान विधानसभा की समितियाँ (Assembly Committees) :
वित्तीय समितियाँ, PAC, प्राक्कलन 'क' व 'ख', COPU व स्थायी समितियाँ

कार्यपालिका पर विधायिका के निरंतर वित्तीय व प्रशासनिक नियंत्रण का सर्वोच्च माध्यम — लोक लेखा समिति (PAC), प्राक्कलन समिति 'क' व 'ख' (राजस्थान का विशिष्ट द्वि-विभाजन मॉडल), राजकीय उपक्रम समिति (COPU), समितियों की सदस्य संख्या (15), आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा एकल संक्रमणीय निर्वाचन, विपक्ष के अध्यक्ष बनने की परिपाटी, नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) के साथ संबंध, कार्य सलाहकार व नियम समिति एवं 16वीं विधानसभा (2023-28) के प्रमुख समिति सभापति

वित्तीय समितियाँ कुल 4 समितियाँ
सदस्य संख्या (वित्तीय) 15 सदस्य प्रति समिति
कार्यकाल अधिकतम 1 वर्ष
मंत्री की सदस्यता पूर्णतः वर्जित (No Ministers)
राजस्थान विधानसभा कार्य संचालन नियमावली, संसदीय परंपराएँ एवं प्रामाणिक संदर्भ

राजस्थान विधानसभा की प्रमुख समितियाँ : सम्पूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन

लोक लेखा समिति (PAC), प्राक्कलन समिति 'क' व 'ख', राजकीय उपक्रम समिति (COPU), नियम व कार्य सलाहकार समितियाँ, कैग की भूमिका, गैर-दलीय कार्यशैली एवं विगत 15 वर्षों के RPSC प्रश्न।

1. विधानसभा समिति प्रणाली : आवश्यकता, औचित्य एवं संवैधानिक आधार

संसदीय लोकतंत्र में विधायिका के पास समय की अत्यधिक कमी होती है तथा शासकीय कार्य अत्यधिक जटिल, तकनीकी और विस्तृत होते हैं। पूरे सदन (200 विधायकों) के समक्ष प्रत्येक विभाग के वित्तीय व्यय, नीतिगत निर्णयों तथा विधायी प्रारूपों की सूक्ष्म समीक्षा करना संभव नहीं होता। अतः विधायिका अपने नियंत्रण को प्रभावी बनाने हेतु संसदीय समितियों (Legislative Committees) का गठन करती है। इन्हें "लघु विधायिका" (Mini Legislature) भी कहा जाता है। पूरे सदन की कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु राजस्थान विधानसभा द्वारा इन स्थायी समितियों का गठन किया जाता है।

संवैधानिक एवं वैधानिक आधार

  • संविधान के अनुच्छेद 208(1) के तहत राजस्थान विधानसभा को अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम बनाने की पूर्ण शक्ति प्राप्त है।
  • इन समितियों का गठन राजस्थान विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों (Rules of Procedure) के अंतर्गत किया जाता है।
  • समितियों को साक्ष्य मंगाने, दस्तावेज तलब करने तथा अधिकारियों को उपस्थित होने का आदेश देने का वही अधिकार प्राप्त है जो किसी दीवानी न्यायालय (Civil Court) को होता है।

समितियों की सामान्य विशेषताएँ

  • कार्यकाल: समितियों का कार्यकाल सामान्यतः 1 वर्ष (1 Year) होता है।
  • दलबिहीन कार्यशैली: बंद कमरों में बैठकें होने के कारण सदस्य राजनीतिक दल की सीमाओं से ऊपर उठकर निष्पक्ष समीक्षा करते हैं।
  • अध्यक्ष की नियुक्ति: विधानसभा अध्यक्ष द्वारा निर्वाचित/नामित सदस्यों में से अध्यक्ष की नियुक्ति की जाती है।

2. राजस्थान की चार वित्तीय समितियाँ (Four Financial Committees of Rajasthan)

संसद (लोकसभा) में जहाँ 3 वित्तीय समितियाँ (PAC, प्राक्कलन, COPU) होती हैं, वहीं राजस्थान विधानसभा में कुल 4 वित्तीय समितियाँ कार्यरत हैं। राजस्थान में प्राक्कलन समिति को दो स्वतंत्र समितियों ('क' तथा 'ख') में विभाजित किया गया है:

राजस्थान विधानसभा: 4 वित्तीय समितियों का प्रशासनिक ढाँचा
राजस्थान वित्तीय समितियाँ (4) 1. लोक लेखा समिति 15 सदस्य | विपक्ष अध्यक्ष 2. प्राक्कलन समिति 'क' 15 सदस्य | मितव्ययिता 3. प्राक्कलन समिति 'ख' 15 सदस्य | विभाग आवंटन 4. राजकीय उपक्रम 15 सदस्य | PSU ऑडिट
समिति का नाम कुल सदस्य चुनाव की रीति अध्यक्ष की नियुक्ति परिपाटी मुख्य कार्य एवं समीक्षा क्षेत्र
1. लोक लेखा समिति (PAC) 15 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत) विपक्ष के वरिष्ठ नेता / सदस्य को अध्यक्ष बनाया जाता है नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) के वार्षिक लेखापरीक्षण प्रतिवेदनों व विनियोग लेखों की जांच।
2. प्राक्कलन समिति 'क' 15 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत) विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त (प्रायः सत्तापक्ष) आवंटित विभागों के बजटीय अनुमानों की जांच, मितव्ययिता व प्रशासनिक सुधार की सिफारिश।
3. प्राक्कलन समिति 'ख' 15 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत) विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त (प्रायः सत्तापक्ष) शेष आवंटित विभागों के प्राक्कलनों की जांच तथा संगठनात्मक सुधार हेतु परामर्श।
4. राजकीय उपक्रम समिति (COPU) 15 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व (एकल संक्रमणीय मत) विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों (RIICO, RSRTC, RVPN आदि) के लेखों एवं CAG की कमर्शियल ऑडिट रिपोर्ट की जांच।
सर्वोच्च संवैधानिक नियम (Universal Rule): चारों वित्तीय समितियों में मंत्रिपरिषद् का कोई भी मंत्री सदस्य नहीं बन सकता। यदि कोई सदस्य मंत्री बन जाता है, तो उसकी सदस्यता स्वतः रिक्त हो जाती है।

3. लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC) : गहन विश्लेषण

लोक लेखा समिति विधानसभा की सबसे पुरानी एवं सबसे शक्तिशाली वित्तीय समिति है। भारत में इसका सर्वप्रथम गठन 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के तहत 1921 में हुआ था। राजस्थान में प्रथम विधानसभा (1952) से ही इसका गठन निरंतर होता आ रहा है।

कैग (CAG) रिपोर्ट से लोक लेखा समिति (PAC) तक की प्रक्रिया
1. CAG ऑडिट राज्य लेखों की जांच 2. राज्यपाल पटल सदन में प्रस्तुतिकरण 3. PAC गहन जांच CAG मित्र व मार्गदर्शक 4. ATR रिपोर्ट सदन को संस्तुति
PAC के प्रमुख कार्य (Functions):
  • यह जांचना कि सरकार द्वारा खर्च किया गया धन उसी प्रयोजन हेतु व्यय हुआ जिसके लिए विधानसभा ने विनियोग अधिनियम (Appropriation Act) द्वारा स्वीकृत किया था।
  • यह देखना कि कहीं स्वीकृत अनुदान से अधिक राशि (Excess Expenditure) तो खर्च नहीं की गई।
  • वित्तीय अनियमितताओं, भ्रष्टाचार एवं धन के दुरुपयोग को उजागर करना।
कैग (CAG) एवं PAC का परस्पर संबंध: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) को लोक लेखा समिति का "कान, आँख, मित्र, दार्शनिक एवं पथ-प्रदर्शक" (Friend, Philosopher & Guide) कहा जाता है। कैग की वार्षिक रिपोर्ट ही पीएसी की जांच का मुख्य आधार बनती है और कैग के अधिकारी पीएसी की बैठकों में तकनीकी सहायता प्रदान करते हैं।
अध्यक्ष पद की परिपाटी (Convention): 1967 तक सत्तापक्ष का सदस्य ही इसका अध्यक्ष बनता था। 1967 में लोकसभा स्तर पर श्री एम.आर. मसानी को अध्यक्ष बनाकर नई स्वस्थ परिपाटी प्रारंभ की गई, जिसे राजस्थान विधानसभा में भी अंगीकार किया गया। वर्तमान में विपक्ष के प्रमुख नेता को ही पीएसी का अध्यक्ष बनाया जाता है।

4. प्राक्कलन समिति 'क' व 'ख' (Estimates Committee A & B) : राजस्थान का विशिष्ट मॉडल

प्राक्कलन समिति को "मितव्ययिता समिति" (Continuous Economy Committee) भी कहा जाता है। इसका मुख्य कार्य बजट में शामिल सरकारी नीतियों के अनुरूप वित्तीय अपव्यय को रोकना तथा प्रशासनिक कार्यकुशलता बढ़ाने हेतु सुझाव देना है।

प्राक्कलन समिति 'क' (Estimates Committee A)

  • कुल सदस्य: 15 सदस्य (एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित)।
  • कार्यक्षेत्र: इसे सामान्यतः गृह, वित्त, कार्मिक, राजस्व, सामान्य प्रशासन तथा आधारभूत ढांचे से जुड़े विभाग आवंटित किए जाते हैं।
  • यह विभागों के संगठन, संचालन नियमों तथा बजट अनुमानों में मितव्ययिता के उपाय सुझाती है।

प्राक्कलन समिति 'ख' (Estimates Committee B)

  • कुल सदस्य: 15 सदस्य (एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित)।
  • कार्यक्षेत्र: इसे कृषि, शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, पंचायती राज तथा विकासोन्मुख विभाग आवंटित होते हैं।
  • नीति के ढांचे के भीतर रहकर कार्यकुशलता और किफायत लाने के उपायों की जांच करती है।
PAC बनाम प्राक्कलन समिति तुलना (RPSC Exam Insight): लोक लेखा समिति (PAC) सरकार द्वारा धन खर्च हो जाने के बाद (Post-Mortem / पोस्टमार्टम जांच) पड़ताल करती है, जबकि प्राक्कलन समिति बजट अनुमानों के दौरान ही मितव्ययिता के उपाय सुझाती है।

5. राजकीय उपक्रम समिति (Committee on Public Undertakings - COPU)

भारत में राजकीय उपक्रम समिति का गठन सर्वप्रथम 1964 में कृष्ण मेनन समिति (Krishna Menon Committee) की सिफारिश पर किया गया था। राजस्थान विधानसभा में इस समिति का गठन राज्य के सार्वजनिक उपक्रमों पर संसदीय निगरानी हेतु किया गया है।

संरचना एवं कार्यकाल: समिति में कुल 15 सदस्य होते हैं। इनका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व द्वारा एकल संक्रमणीय मत से होता है। कार्यकाल 1 वर्ष होता है। कोई मंत्री इसमें शामिल नहीं हो सकता।
समीक्षा के दायरे में आने वाले उपक्रम (PSUs):
  • राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं विनियोजन निगम (RIICO)।
  • राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RSRTC - रोडवेज)।
  • राजस्थान राज्य खान एवं खनिज लिमिटेड (RSMML)।
  • राजस्थान राज्य विद्युत प्रसारण, उत्पादन एवं वितरण कम्पनियाँ (DISCOMs)।
  • राजस्थान पर्यटन विकास निगम (RTDC) आदि समस्त राज्य उपक्रम।
कार्य की सीमा (Limitations): यह समिति उपक्रमों के दैनिक प्रशासनिक मामलों (Day-to-day administration) में हस्तक्षेप नहीं करती, बल्कि केवल उनके व्यावसायिक सिद्धांतों, वित्तीय प्रबंधन और समग्र निष्पादन की जांच करती है।

6. राजस्थान विधानसभा की अन्य महत्वपूर्ण स्थायी समितियाँ (Standing Committees)

कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee - BAC)

  • पदेन सभापति: विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं।
  • सदस्य संख्या: अध्यक्ष सहित अधिकतम 15 सदस्य।
  • कार्य: सदन के समक्ष आने वाले विधायी तथा अन्य सरकारी कार्यों के लिए समय का आवंटन एवं दैनिक कार्यक्रम की रूपरेखा तय करना।

नियम समिति (Rules Committee)

  • पदेन सभापति: विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) इसके पदेन सभापति होते हैं।
  • सदस्य संख्या: अध्यक्ष सहित अधिकतम 15 सदस्य।
  • कार्य: विधानसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों की समीक्षा करना तथा आवश्यक संशोधनों व सुधारों की संस्तुति करना।

विशेषाधिकार समिति (Committee of Privileges)

  • सदस्य संख्या: अधिकतम 15 सदस्य।
  • कार्य: सदन या उसके सदस्यों के संसदीय विशेषाधिकारों के हनन (Breach of Privilege) तथा सदन की अवमानना से जुड़े मामलों की न्यायिक जांच करना तथा उपयुक्त दंड/कार्रवाई की सिफारिश करना।

अधीनस्थ विधान समिति (Subordinate Legislation)

  • सदस्य संख्या: 15 सदस्य।
  • कार्य: यह जांचना कि कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियम, उपनियम, विनियम व अध्यादेश मूल अधिनियम की प्रदत्त शक्तियों के दायरे में हैं या नहीं।

सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति

  • सदस्य संख्या: 15 सदस्य।
  • कार्य: सदन में मंत्रियों द्वारा प्रश्नों के उत्तर अथवा वाद-विवाद के दौरान दिए गए वादों, वचनों एवं आश्वासनों के क्रियान्वयन की निगरानी करना।

याचिका समिति (Committee on Petitions)

  • सदस्य संख्या: 15 सदस्य।
  • कार्य: नागरिकों द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत उन याचिकाओं पर विचार करना जो किसी विधेयक अथवा सामान्य लोक महत्व के विषय से संबंधित हों।

7. सामाजिक न्याय, अधिकारिता एवं कल्याण संबंधी समितियाँ

1. अनुसूचित जाति (SC) कल्याण समिति: राज्य में अनुसूचित जातियों के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक विकास हेतु संचालित योजनाओं, छात्रवृत्तियों तथा सेवा आरक्षण के क्रियान्वयन की समीक्षा करना। (15 सदस्य)।
2. अनुसूचित जनजाति (ST) कल्याण समिति: जनजातीय उप-योजना (TSP क्षेत्र), वन अधिकार अधिनियम तथा आदिवासियों के संवैधानिक संरक्षणों की निगरानी करना। (15 सदस्य)।
3. महिला एवं बाल कल्याण समिति: महिला सशक्तिकरण, कन्या भ्रूण हत्या रोकथाम, पोषाहार कार्यक्रम तथा महिलाओं के विरुद्ध अपराधों की रोकथाम संबंधी नीतियों का अध्ययन करना। (15 सदस्य)।
4. पर्यावरण संबंधी समिति: राज्य में वन संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, अरावली पर्वतमाला के संरक्षण व जलवायु परिवर्तन नीतियों की समीक्षा करना।

8. तदर्थ समितियाँ (Ad-hoc Committees) एवं प्रवर समितियाँ

तदर्थ समितियाँ किसी विशिष्ट प्रयोजन (Specific Purpose) हेतु अस्थायी रूप से गठित की जाती हैं तथा अपना कार्य समाप्त होने व सदन में प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के पश्चात् इनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है:

प्रवर समितियाँ (Select Committees on Bills): जब किसी अत्यंत महत्वपूर्ण या विवादास्पद विधेयक को सदन में रखा जाता है, तो उस पर धारा-दर-धारा गहन विचार करने हेतु सदन के सदस्यों की एक प्रवर समिति गठित की जाती है। यह आम जनता और विशेषज्ञों से सुझाव प्राप्त कर अपनी रिपोर्ट देती है।
जांच समितियाँ (Inquiry Committees): विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किसी विशिष्ट घटना, आचार संहिता उल्लंघन अथवा प्रशासनिक अनियमितता की जांच हेतु समय-समय पर गठित तदर्थ समितियाँ।

9. समिति अध्यक्षों की नियुक्ति एवं स्थापित संसदीय परिपाटियाँ

1. अध्यक्ष की नियुक्ति शक्ति: विधानसभा के नियमों के अनुसार सभी समितियों के सभापतियों (Chairmen) की नियुक्ति विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) द्वारा की जाती है। यदि विधानसभा उपाध्यक्ष किसी समिति का सदस्य चुना जाता है, तो वह स्वतः उस समिति का सभापति बन जाता है।
2. सभापति की अनुपस्थिति में व्यवस्था: यदि सभापति किसी बैठक से अनुपस्थित रहता है, तो समिति के सदस्यों में से ही किसी एक सदस्य को उस बैठक की अध्यक्षता हेतु चुना जाता है।
3. कोरम (गणपूर्ति): समिति की बैठकों के लिए कोरम प्रायः कुल सदस्य संख्या का 1/3 भाग (अर्थात 15 सदस्यों में से कम से कम 5 सदस्य) निर्धारित होता है।

10. 16वीं राजस्थान विधानसभा (2023-2028) की समितियाँ : नवीनतम अद्यतन

16वीं विधानसभा के अध्यक्ष श्री वासुदेव देवनानी द्वारा विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों के तहत विभिन्न वित्तीय एवं स्थायी समितियों का गठन किया गया है:

समिति का नाम कुल सदस्य 16वीं विधानसभा विशिष्ट तथ्य प्रकृति
लोक लेखा समिति (PAC) 15 सदस्य विपक्ष के वरिष्ठ नेता को सभापति बनाए जाने की परंपरा अनुसार गठित। वित्तीय समिति
प्राक्कलन समिति 'क' 15 सदस्य गृह, वित्त, राजस्व व कार्मिक विभागों के व्यय की जांच। वित्तीय समिति
प्राक्कलन समिति 'ख' 15 सदस्य कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण विकास विभागों के प्राक्कलनों की जांच। वित्तीय समिति
राजकीय उपक्रम समिति (COPU) 15 सदस्य रीको, रोडवेज, विद्युत निगमों के वित्तीय लेखों की जांच। वित्तीय समिति
कार्य सलाहकार समिति (BAC) 15 सदस्य श्री वासुदेव देवनानी (विधानसभा अध्यक्ष) पदेन सभापति। सदन समिति
नियम समिति (Rules Committee) 15 सदस्य श्री वासुदेव देवनानी (विधानसभा अध्यक्ष) पदेन सभापति। स्थायी समिति

11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

⚡ वित्तीय समिति तथ्य

  • वित्तीय समितियों की संख्या: राजस्थान में 4 (संसद में 3)।
  • सदस्य संख्या: प्रत्येक वित्तीय समिति में 15 सदस्य होते हैं।
  • कार्यकाल: अधिकतम 1 वर्ष (प्रतिवर्ष नवगठन)।
  • चुनाव विधि: एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
  • मंत्री की सदस्यता: पूर्णतः प्रतिबंधित।

⚡ विशेष परिपाटियाँ

  • PAC अध्यक्ष परंपरा: प्रमुख विपक्षी दल का सदस्य बनता है।
  • विधानसभा अध्यक्ष पदेन सभापति: कार्य सलाहकार समिति एवं नियम समिति के।
  • कैग का संबंध: लोक लेखा समिति (PAC) के मित्र व दार्शनिक के रूप में।
  • मितव्ययिता समिति: प्राक्कलन समिति ('क' व 'ख') को कहा जाता है।
  • उपाध्यक्ष समिति सदस्य होने पर: स्वतः उस समिति का सभापति बनता है।

12. विगत RPSC परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Year Questions)

प्रश्न 1: राजस्थान विधानसभा की वित्तीय समितियों के संदर्भ में कौन-सा कथन सही नहीं है? [RAS Pre 2021]

(A) समितियों का कार्यकाल एक वर्ष का होता है।
(B) प्रत्येक समिति में 15 सदस्य होते हैं।
(C) कोई भी मंत्री समिति का सदस्य नहीं बन सकता।
(D) राजस्थान में प्राक्कलन समिति केवल एक ही है।
उत्तर: (D) — राजस्थान में प्राक्कलन समिति को दो समितियों ('क' व 'ख') में विभाजित किया गया है।

प्रश्न 2: राजस्थान विधानसभा में कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee) का पदेन अध्यक्ष कौन होता है? [College Lecturer 2021]

उत्तर: राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker)।

प्रश्न 3: नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) के लेखापरीक्षण प्रतिवेदनों की जांच विधानसभा की कौन-सी समिति करती है? [School Lecturer 2022]

उत्तर: लोक लेखा समिति (Public Accounts Committee - PAC)।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

संसदीय समितियां

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) तथा लोक लेखा समिति (PAC) के मध्य अंतर्संबंधों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर संकेत: कैग को PAC का 'मित्र, दार्शनिक एवं पथ-प्रदर्शक' कहा जाता है। कैग राज्य के विनियोग व वित्त लेखों की जांच कर अपनी रिपोर्ट राज्यपाल के माध्यम से सदन में रखवाता है। PAC इस तकनीकी रिपोर्ट की विस्तृत जांच करती है तथा कैग अधिकारी बैठक में उपस्थित रहकर वित्तीय जटिलताओं को समझाने में समिति की सहायता करते हैं।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): राजस्थान विधानसभा में लोक लेखा समिति (PAC) का सभापति विपक्ष से बनाए जाने की परिपाटी कब से प्रारंभ हुई?

उत्तर संकेत: वर्ष 1967 से स्थापित स्वस्थ संसदीय परिपाटी के अनुसार PAC का अध्यक्ष विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के सदस्य को ही नियुक्त किया जाता है ताकि वित्तीय निष्पक्षता बनी रहे।
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राजस्थान विधानसभा की समितियाँ (Committees) सम्पूर्ण नोट्स PDF

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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

राजस्थान विधानसभा की समितियों, वित्तीय नियंत्रण व अध्यक्ष परंपरा से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर।

राजस्थान विधानसभा में कुल 4 वित्तीय समितियाँ हैं: 1. लोक लेखा समिति (PAC), 2. प्राक्कलन समिति 'क', 3. प्राक्कलन समिति 'ख', तथा 4. राजकीय उपक्रम समिति (COPU)। प्रत्येक वित्तीय समिति में कुल 15 सदस्य होते हैं।
राज्य सरकार के विस्तृत बजट, अनेक विभागों के अनुदान मांगों एवं प्रशासनिक व्यय की गहन व सूक्ष्म जांच सुनिश्चित करने के लिए राजस्थान विधानसभा में प्राक्कलन समिति को 'क' तथा 'ख' दो स्वतंत्र समितियों में विभाजित किया गया है। दोनों में 15-15 सदस्य होते हैं और दोनों को अलग-अलग प्रशासनिक विभाग आवंटित किए जाते हैं।
लोक लेखा समिति के अध्यक्ष की नियुक्ति राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker) द्वारा समिति के 15 निर्वाचित सदस्यों में से की जाती है। 1967 से स्थापित स्वस्थ संसदीय परंपरा के अनुसार, लोक लेखा समिति का अध्यक्ष अनिवार्य रूप से प्रमुख विपक्षी दल के किसी वरिष्ठ सदस्य (अथवा नेता प्रतिपक्ष) को ही बनाया जाता है।
नहीं, राजस्थान विधानसभा के प्रक्रिया नियमों के तहत कोई भी मंत्री किसी भी वित्तीय समिति (PAC, प्राक्कलन समिति 'क', 'ख' अथवा राजकीय उपक्रम समिति) का सदस्य नहीं चुना जा सकता। यदि कोई समिति सदस्य बाद में मंत्री बन जाता है, तो मंत्री पद ग्रहण करने की तिथि से उसकी समिति सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है।
राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker) स्वयं कार्य सलाहकार समिति तथा नियम समिति के पदेन सभापति (Ex-Officio Chairman) होते हैं।
वित्तीय समितियों के सदस्यों का निर्वाचन विधानसभा सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा किया जाता है। इन सभी वित्तीय समितियों का कार्यकाल अधिकतम 1 वर्ष का होता है।

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