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जिला व सत्र न्याय प्रशासन : संविधान भाग-6 (अनुच्छेद 233 से 237)

अधीनस्थ न्यायालय एवं फास्ट ट्रैक कोर्ट (Subordinate & Fast Track Courts) :
संवैधानिक ढाँचा, दीवानी व फौजदारी पदानुक्रम, पारिवारिक व विशेष न्यायालय

राजस्थान की जमीनी न्याय प्रणाली का संपूर्ण, प्रामाणिक एवं विस्तृत अध्ययन — अनुच्छेद 233 से 237, जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति व अर्हताएँ, जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) की दोहरी भूमिका, दीवानी (Civil) एवं फौजदारी (Criminal) न्यायालयों का संपूर्ण पदानुक्रम, उच्च न्यायालय का प्रशासनिक नियंत्रण (अनुच्छेद 235), फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (FTSC - POCSO), पारिवारिक न्यायालय अधिनियम 1984, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT), वाणिज्यिक न्यायालय तथा RJS संवर्ग चयन प्रक्रिया।

संवैधानिक प्रावधान अनुच्छेद 233-237
जिला न्यायाधीश नियुक्ति राज्यपाल (HC परामर्श)
अधीनस्थ न्यायालय नियंत्रण उच्च न्यायालय (Art. 235)
पारिवारिक न्यायालय एक्ट 1984 (सुलह केंद्रित)
भारतीय संविधान, दंड प्रक्रिया संहिता एवं राजस्थान न्यायिक सेवा संदर्भ

राजस्थान के अधीनस्थ न्यायालय एवं फास्ट ट्रैक कोर्ट : सम्पूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन

अनुच्छेद 233 से 237 की विस्तृत व्याख्या, जिला एवं सत्र न्यायाधीश की दोहरी शक्तियाँ, दीवानी व फौजदारी पदानुक्रम, फास्ट ट्रैक विशेष कोर्ट (POCSO), पारिवारिक न्यायालय 1984, MACT, RJS भर्ती व्यवस्था एवं विगत 15 वर्षों के RPSC/RAS प्रश्न।

1. संवैधानिक ढाँचा : अनुच्छेद 233 से 237 का संपूर्ण धारावाहिक विश्लेषण

भारतीय संविधान के भाग-6 के अध्याय-6 में अनुच्छेद 233 से 237 तक "अधीनस्थ न्यायालय" (Subordinate Courts) शीर्षक के अंतर्गत उपबंध दिए गए हैं। ये न्यायालय राज्य उच्च न्यायालय के प्रत्यक्ष प्रशासनिक एवं न्यायिक पर्यवेक्षण में कार्य करते हैं:

अनुच्छेद संवैधानिक विषय (Constitutional Subject) RPSC / RAS परीक्षा उपयोगी व्याख्या
अनुच्छेद 233 जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of District Judges): नियुक्ति, पदस्थापना व पदोन्नति। संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है। बार से सीधी नियुक्ति हेतु कम से कम 7 वर्ष का वकालत अनुभव अनिवार्य है।
अनुच्छेद 233A कतिपय जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और निर्णयों का विधिमान्यकरण: 20वें संविधान संशोधन (1966) द्वारा समाविष्ट किया गया, जिससे पूर्व में तकनीकी त्रुटियों के बावजूद दी गई नियुक्तियों व निर्णयों को विधिक संरक्षण मिला।
अनुच्छेद 234 न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती: (सिविल जज जूनियर डिवीजन संवर्ग - RJS). राज्यपाल द्वारा राज्य लोक सेवा आयोग (RPSC) तथा उच्च न्यायालय के परामर्श से बनाए गए नियमों के अनुसार भर्ती की जाती है।
अनुच्छेद 235 अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (Control over Subordinate Courts): जिला न्यायालयों व उनके अधीनस्थ सभी न्यायिक अधिकारियों की पदस्थापना, पदोन्नति, स्थानांतरण, अवकाश स्वीकृति एवं अनुशासनिक जांच का संपूर्ण नियंत्रण राजस्थान उच्च न्यायालय (Rajasthan High Court) में निहित है।
अनुच्छेद 236 निर्वचन (Definitions): 'जिला न्यायाधीश' एवं 'न्यायिक सेवा' की परिभाषा। 'जिला न्यायाधीश' में नगर दीवानी न्यायालय जज, अपर जिला न्यायाधीश (ADJ), संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, मुख्य काजी आदि पद सम्मिलित माने जाते हैं।
अनुच्छेद 237 कुछ वर्गों के मजिस्ट्रेटों पर इस अध्याय के उपबंधों का लागू होना: राज्यपाल अधिसूचना द्वारा कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) से न्यायिक कार्य पृथक कर न्यायिक मजिस्ट्रेटों को सौंप सकता है (अनुच्छेद 50 - कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण)।

2. जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) : दोहरी भूमिका व क्षेत्राधिकार

जिले के संपूर्ण न्यायिक प्रशासन का सर्वोच्च पद जिला एवं सत्र न्यायाधीश (District & Sessions Judge) होता है। यह एक ही न्यायिक अधिकारी होता है, जो दो अलग-अलग प्रकार के मुकदमों की सुनवाई करते समय भिन्न-भिन्न पदनाम और शक्तियों का प्रयोग करता है:

जिला न्यायाधीश के रूप में (As District Judge)

  • जब वह दीवानी (Civil) मामलों—जैसे संपत्ति विवाद, संविदा, विवाह, उत्तराधिकार आदि की सुनवाई करता है।
  • इसे असीमित मूल आर्थिक अधिकारिता (Unlimited Pecuniary Jurisdiction) प्राप्त होती है।
  • यह जिले के सभी अधीनस्थ दीवानी न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध प्रथम अपीलीय न्यायालय (First Appellate Court) है।

सत्र न्यायाधीश के रूप में (As Sessions Judge)

  • जब वह फौजदारी / आपराधिक (Criminal) मामलों—जैसे हत्या, डकैती, बलात्कार आदि की सुनवाई करता है।
  • सत्र न्यायाधीश कानूनन मृत्युदंड (फांसी) एवं आजीवन कारावास सहित कोई भी दंड दे सकता है।
  • संवैधानिक शर्त: इसके द्वारा दिए गए मृत्युदंड की पुष्टि (Confirmation) उच्च न्यायालय द्वारा होना अनिवार्य है, तभी फांसी दी जा सकती है।

3. राजस्थान में अधीनस्थ न्यायालयों का संपूर्ण संस्थागत पदानुक्रम (Complete Hierarchy)

राजस्थान में जिला स्तर पर न्यायपालिका दो समानांतर शाखाओं—दीवानी (Civil) एवं फौजदारी (Criminal) में विभाजित होकर कार्य करती है, जो शीर्ष पर जिला एवं सत्र न्यायाधीश के अधीन एकीकृत हो जाती है:

राजस्थान अधीनस्थ न्यायिक पदानुक्रम (Civil & Criminal Flowchart)
राजस्थान उच्च न्यायालय (Art. 214) जिला एवं सत्र न्यायाधीश न्यायालय (D&SJ) अपर जिला न्यायाधीश (ADJ - Civil Side) वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश (Sr. Civil Judge) सिविल न्यायाधीश (Junior Division / मुंसिफ) अपर सत्र न्यायाधीश (ASJ - Criminal Side) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM / ACJM - Max 7 Yrs) न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग (JMFC - Max 3 Yrs)

4. दीवानी न्याय प्रशासन (Civil Justice System in Rajasthan)

1. जिला न्यायाधीश न्यायालय (District Judge Court): जिले का सर्वोच्च दीवानी न्यायालय। इसे किसी भी मूल्य (असीमित आर्थिक सीमा) के दीवानी दावों की सीधी सुनवाई तथा वरिष्ठ सिविल जजों के निर्णयों के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है।
2. अपर जिला न्यायाधीश (Additional District Judge - ADJ): जिला न्यायाधीश के कार्यभार को कम करने हेतु नियुक्त किए जाते हैं। इन्हें जिला न्यायाधीश के समान ही अधिकारिता प्राप्त होती है और वे जिला न्यायाधीश द्वारा अंतरित किए गए वादों का निस्तारण करते हैं।
3. वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश (Senior Civil Judge / Civil Judge Sr. Div.): उपखंड स्तर या जिला मुख्यालय पर कार्यरत। इन्हें एक निश्चित आर्थिक सीमा से अधिक के वादों की मूल सुनवाई का अधिकार होता है।
4. सिविल न्यायाधीश (Civil Judge Jr. Div. / मुंसिफ कोर्ट): दीवानी मामलों का प्रारंभिक न्यायालय। यहाँ छोटे आर्थिक मूल्य के संपत्ति विवाद, किराया विवाद आदि की सीधी सुनवाई होती है।

5. फौजदारी / दांडिक न्याय प्रशासन (Criminal Justice Hierarchy & Penal Powers)

आपराधिक मामलों में न्यायालयों की अधिकारिता एवं सजा देने की विधिक सीमा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC / BNSS) द्वारा निर्धारित की गई है:

न्यायालय / न्यायिक अधिकारी दंड देने की अधिकतम सीमा (Penal Powers) अपराध का प्रकार व क्षेत्राधिकार
सत्र न्यायाधीश / अपर सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge / ASJ) मृत्युदंड, आजीवन कारावास अथवा विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी कारावास एवं जुर्माना। जघन्य अपराध (हत्या, डकैती आदि)। शर्त: मृत्युदंड की पुष्टि उच्च न्यायालय से अनिवार्य।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Chief Judicial Magistrate - CJM / ACJM) अधिकतम 7 वर्ष तक का कारावास तथा असीमित जुर्माना (Unlimited Fine)। गंभीर आपराधिक मामले; जिले के सभी न्यायिक मजिस्ट्रेटों के कार्य का वितरण व पर्यवेक्षण।
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग (Judicial Magistrate First Class - JMFC) अधिकतम 3 वर्ष तक का कारावास अथवा ₹10,000 तक का जुर्माना (या दोनों)। सामान्य आपराधिक मामले, चोरी, मारपीट, धोखाधड़ी आदि के प्रारंभिक अभियोग।
न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग (JM Second Class) अधिकतम 1 वर्ष तक का कारावास अथवा ₹5,000 तक का जुर्माना। छोटे आपराधिक मामले (वर्तमान में राजस्थान में अधिकांश शक्तियाँ JMFC को ही प्रदत्त हैं)।
कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate - DM, ADM, SDM, Tehsildar) जमानत बांड, पाबंदी, निरोधात्मक आदेश (धारा 107, 116, 144, 145 CrPC)। शांति व्यवस्था बनाए रखना, निवारक न्याय। (ये वास्तविक अदालत के समान सजा नहीं देते)।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS, 2023) संदर्भ अपडेट:

1 जुलाई 2024 से लागू नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS, 2023) के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग (JMFC) तथा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) की दंड अधिकारिता में तकनीकी रूप से समरूपता रखी गई है, किंतु इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, ई-समन, तथा डिजिटल डायरी संधारण को विधिक अधिमान्यता दी गई है। न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय वर्ग के पद को कई राज्यों की भांति राजस्थान में भी व्यावहारिक रूप से JMFC संवर्ग में ही समाहित किया गया है।

6. अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण (Article 235)

न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संविधान निर्माताओं ने कार्यपालिका (सरकार) को अधीनस्थ न्यायालयों के आंतरिक प्रशासनिक मामलों से पूर्णतः अलग रखा है:

प्रशासनिक नियंत्रण का दायरा: अनुच्छेद 235 के तहत जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ सभी न्यायालयों के पदों पर पदस्थापना (Posting), पदोन्नति (Promotion), अवकाश (Leave) की स्वीकृति, वार्षिक कार्य मूल्यांकन (ACR) तथा स्थानांतरण का अधिकार केवल राजस्थान उच्च न्यायालय के पास है।
अनुशासनिक क्षेत्राधिकार: यदि किसी अधीनस्थ न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार या कदाचार की शिकायत हो, तो उसकी जांच उच्च न्यायालय की विजिलेंस विंग द्वारा की जाती है और निलंबन अथवा बर्खास्तगी की सिफारिश उच्च न्यायालय ही करता है।

7. फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs) एवं फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (FTSCs - POCSO)

1. फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTCs की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)

  • 11वें वित्त आयोग (2000) की सिफारिशों के आधार पर देश भर में मुकदमों के त्वरित निस्तारण तथा विचाराधीन कैदियों (Undertrials) की संख्या घटाने हेतु वर्ष 2001 से फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन प्रारंभ हुआ।
  • इन अदालतों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों अथवा पदोन्नत न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं लेकर लंबित पुराने वादों का निपटारा किया जाता है।

2. फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालय (FTSCs - POCSO)

  • केंद्र सरकार की योजना के तहत राजस्थान के सभी जिलों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) तथा दुष्कर्म के मामलों की सुनवाई हेतु FTSCs कार्यरत हैं।
  • इन न्यायालयों का उद्देश्य पीड़िता को बाल-अनुकूल वातावरण (Child-friendly atmosphere) में न्याय दिलाना तथा मामले का विचारण निर्धारित समय-सीमा (1 वर्ष के भीतर) में पूर्ण करना है।

8. पारिवारिक न्यायालय (Family Courts Act, 1984) : राजस्थान में कार्यप्रणाली

विवाह एवं पारिवारिक विवादों को परंपरागत अदालतों के शत्रुतापूर्ण माहौल से बाहर निकालकर सौहार्दपूर्ण समाधान हेतु संसद द्वारा पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 पारित किया गया:

गठन की अनिवार्य शर्त: अधिनियम की धारा 3 के अनुसार प्रत्येक राज्य सरकार उच्च न्यायालय की सहमति से 10 लाख से अधिक आबादी वाले प्रत्येक शहर अथवा नगर में अनिवार्य रूप से पारिवारिक न्यायालय स्थापित करेगी। राजस्थान के सभी संभागीय मुख्यालयों एवं प्रमुख जिला मुख्यालयों पर पारिवारिक न्यायालय कार्यरत हैं।
विशिष्ट कार्यशैली (Salient Features):
  • सुलह एवं परामर्शदाता (Counselors): मुकदमे की सुनवाई प्रारंभ करने से पूर्व पक्षों के मध्य समझौता कराने हेतु अनिवार्य रूप से काउंसलर्स की मदद ली जाती है।
  • वकीलों के अधिकार पर सीमा: पारिवारिक न्यायालय में पक्षकार स्वयं अपना पक्ष रखते हैं; न्यायालय की अनुमति के बिना अधिवक्ता (Lawyer) के माध्यम से प्रतिनिधित्व का अधिकार सामान्यतः नहीं होता।
  • कार्यक्षेत्र: वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना, न्यायिक पृथक्करण, तलाक, विवाह शून्यता, संपत्ति विभाजन, भरण-पोषण (CrPC धारा 125) तथा बच्चों की कस्टडी।

9. अन्य विशिष्ट न्यायालय एवं अधिकरण (MACT, Commercial, SC/ST Courts)

1. मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT): मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 165 के तहत गठित। सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु अथवा गंभीर चोट के शिकार व्यक्तियों/परिजनों को बीमा कंपनियों से मुआवजा दिलाने हेतु जिला स्तर पर स्थापित।
2. वाणिज्यिक न्यायालय (Commercial Courts): वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015 के तहत राजस्थान के प्रमुख व्यापारिक शहरों (जयपुर, जोधपुर) में ₹3 लाख या उससे अधिक के वाणिज्यिक व व्यापारिक अनुबंध विवादों के समयबद्ध निस्तारण हेतु।
3. SC/ST अत्याचार निवारण विशेष न्यायालय: अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14 के तहत त्वरित विचारण हेतु विशेष सत्र न्यायालय।
4. एनडीपीएस (NDPS) एवं एसीबी (ACB) विशेष न्यायालय: मादक पदार्थ तस्करी (NDPS Act 1985) तथा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम (Prevention of Corruption Act 1988) के तहत लोक सेवकों के विरुद्ध दर्ज मामलों की सुनवाई हेतु विशिष्ट न्यायालय।
सुलह एवं वैकल्पिक न्याय: मुकदमों के त्वरित व निःशुल्क समाधान हेतु अधीनस्थ न्यायालयों के साथ ही राज्य में लोक अदालतें एवं ग्राम न्यायालय (2008 Act) भी प्रभावी रूप से कार्यरत हैं।

10. न्यायिक सेवा संवर्ग एवं चयन प्रणाली (RJS & Higher Judicial Service)

1. राजस्थान न्यायिक सेवा (RJS - Civil Judge Jr. Div.)

अनुच्छेद 234 के तहत उच्च न्यायालय द्वारा प्रतियोगी परीक्षा (प्रारंभिक, मुख्य परीक्षा एवं साक्षात्कार) आयोजित कर चयनित विधि स्नातकों (Law Graduates) को नियुक्त किया जाता है। इनकी प्रथम पदस्थापना सिविल जज व न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के रूप में होती है।

2. राजस्थान उच्चतर न्यायिक सेवा (RHJS - District Judge Cadre)

अनुच्छेद 233 के तहत जिला न्यायाधीश संवर्ग में 75% पद वरिष्ठ सिविल न्यायाधीशों की पदोन्नति द्वारा तथा 25% पद कम से कम 7 वर्ष के वकालत अनुभव वाले अधिवक्ताओं से सीधी भर्ती द्वारा भरे जाते हैं।

11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

⚡ संवैधानिक व नियुक्ति तथ्य

  • जिला न्यायाधीश नियुक्ति: राज्यपाल द्वारा (अनुच्छेद 233).
  • अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण: केवल उच्च न्यायालय में निहित (अनुच्छेद 235).
  • सीधी भर्ती हेतु वकालत अनुभव: न्यूनतम 7 वर्ष (Art. 233(2)).
  • मृत्युदंड की पुष्टि: सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए मृत्युदंड की पुष्टि हाईकोर्ट द्वारा अनिवार्य.
  • CJM की अधिकतम सजा सीमा: 7 वर्ष कारावास व असीमित जुर्माना.

⚡ विशेष अदालतें तथ्य

  • पारिवारिक न्यायालय अधिनियम: वर्ष 1984 में पारित.
  • पारिवारिक कोर्ट गठन आबादी सीमा: 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहर.
  • फास्ट ट्रैक कोर्ट सिफारिश: 11वें वित्त आयोग द्वारा (2000).
  • FTSC प्राथमिक कार्य: POCSO एवं महिला उत्पीड़न मामलों का त्वरित निस्तारण.
  • JMFC सजा सीमा: 3 वर्ष कारावास व ₹10,000 जुर्माना.

12. विगत RPSC परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Year Questions)

प्रश्न 1: संविधान के किस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्य के उच्च न्यायालय को अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण की शक्ति प्रदान की गई है? [RAS Pre 2021]

उत्तर: अनुच्छेद 235। (इसके तहत पदस्थापना, पदोन्नति, अवकाश व अनुशासनिक नियंत्रण उच्च न्यायालय में निहित है)।

प्रश्न 2: जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए किसी व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में कम से कम कितने वर्षों का अनुभव होना चाहिए? [College Lecturer 2016 / 2nd Grade 2018]

उत्तर: कम से कम 7 वर्ष (अनुच्छेद 233(2))।

प्रश्न 3: पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 के अंतर्गत पारिवारिक न्यायालय किन विषयों से संबंधित वादों की सुनवाई करते हैं? [Sub Inspector 2021]

उत्तर: वैवाहिक विवाद, तलाक, दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना, भरण-पोषण तथा अवयस्क बालकों के संरक्षण व अभिरक्षा संबंधी मामले।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

अधीनस्थ न्यायपालिका

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): पारिवारिक न्यायालय अधिनियम 1984 की प्रमुख विशेषताओं एवं इसकी सुलहकारी कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालिए।

उत्तर संकेत: 10 लाख+ आबादी वाले शहरों में गठन। मुख्य उद्देश्य: पारिवारिक व वैवाहिक विवादों को कानूनी कठोरता के बजाय सुलह व परामर्श (Counselling) से निपटाना। वकीलों के माध्यम से पैरवी का सामान्य अधिकार नहीं (पक्षकार स्वयं उपस्थित होते हैं), प्रक्रियात्मक साक्ष्य नियमों की शिथिलता व सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) द्वारा दिए गए मृत्युदंड के निष्पादन हेतु क्या संवैधानिक बाध्यता है?

उत्तर संकेत: सत्र न्यायाधीश द्वारा दिए गए मृत्युदंड (फांसी) का क्रियान्वयन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि संबंधित उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा उसकी पुष्टि न कर दी जाए।
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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

अधीनस्थ न्यायालयों, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, फास्ट ट्रैक व पारिवारिक न्यायालयों से जुड़े प्रश्नोत्तर।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 233(1) के अनुसार जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना एवं पदोन्नति संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा उस राज्य के उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।
जिला स्तर का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी एक ही व्यक्ति होता है। जब वह दीवानी (Civil) मामलों की सुनवाई करता है तो उसे जिला न्यायाधीश (District Judge) कहा जाता है, और जब वह आपराधिक/फौजदारी (Criminal) मामलों की सुनवाई करता है तो उसे सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge) कहा जाता है।
हाँ, सत्र न्यायाधीश कानूनन मृत्युदंड तथा आजीवन कारावास सहित कोई भी दंडादेश दे सकता है। परंतु उसके द्वारा दिए गए मृत्युदंड का क्रियान्वयन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि उच्च न्यायालय (High Court) द्वारा उसकी पुष्टि (Confirmation) न कर दी जाए।
संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत राज्य के सभी अधीनस्थ न्यायालयों एवं न्यायिक सेवा के अधिकारियों पर पदस्थापना, पदोन्नति, स्थानांतरण, अवकाश स्वीकृति एवं अनुशासनिक नियंत्रण की संपूर्ण शक्ति उच्च न्यायालय (High Court) में निहित है।
पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 3 के तहत 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों व जिला मुख्यालयों पर पारिवारिक न्यायालय स्थापित किए गए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य विवाह, तलाक, भरण-पोषण तथा बच्चों की कस्टडी के मामलों को सुलह-समझौते (Conciliation) द्वारा निपटाना है।
फास्ट ट्रैक विशेष न्यायालयों (FTSCs) की स्थापना मुख्य रूप से दुष्कर्म (Rape) तथा POCSO Act, 2012 के तहत दर्ज बाल-लैंगिक अपराधों के समयबद्ध और त्वरित विचारण हेतु केंद्र-प्रायोजित योजना के रूप में की गई है।

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