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सुलह न्याय एवं द्वार पर न्याय : अनुच्छेद 39A का क्रियान्वयन

लोक अदालतें एवं ग्राम न्यायालय (Lok Adalat & Gram Nyayalaya) :
विधिक सेवा प्राधिकरण 1987, स्थायी लोक अदालतें व बस्सी (जयपुर) 2008 Act

राजस्थान में जनसुलभ, त्वरित और निःशुल्क वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) का संपूर्ण प्रामाणिक अध्ययन — संविधान का अनुच्छेद 39A, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987, राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA), लोक अदालतों का वैधानिक स्वरूप (अधिनिर्णय की डिक्री, कोई अपील नहीं, कोर्ट फीस वापसी), स्थायी लोक अदालतें (2002 संशोधन - सार्वजनिक उपयोगी सेवाएँ), राष्ट्रीय लोक अदालत, ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008, राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय (27 नवम्बर 2010 - बस्सी, जयपुर), न्यायाधिकारी, न्यायमित्र एवं मोबाइल कोर्ट की कार्यप्रणाली।

संवैधानिक आधार अनुच्छेद 39A (निःशुल्क न्याय)
वैधानिक अधिनियम विधिक सेवा प्राधिकरण 1987
प्रथम ग्राम न्यायालय (राज.) बस्सी, जयपुर (2010)
अपील का अधिकार शून्य (कोई अपील नहीं)
भारतीय संविधान, वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) एवं विधिक सेवा संदर्भ

राजस्थान में लोक अदालतें एवं ग्राम न्यायालय : सम्पूर्ण विश्लेषणात्मक अध्ययन

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987, स्थायी लोक अदालतें (PLA), राष्ट्रीय लोक अदालत, ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008, राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय (बस्सी, जयपुर 2010), न्यायाधिकारी, न्यायमित्र एवं RPSC/RAS परीक्षाओं हेतु प्रामाणिक नोट्स।

1. संवैधानिक आधार : अनुच्छेद 39A एवं वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR)

भारतीय संविधान में 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा राज्य के नीति-निदेशक तत्वों (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद 39A (समान न्याय एवं निःशुल्क विधिक सहायता - Equal Justice and Free Legal Aid) जोड़ा गया। इसके अनुसार राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि आर्थिक या किसी अन्य अयोग्यता के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने से वंचित न रहे।

पारंपरिक न्याय बनाम लोक न्याय

पारंपरिक न्यायालयों में अत्यधिक वाद-भार (Pendency), जटिल प्रक्रिया, वकीलों की भारी फीस तथा विलंबकारी तारीखों के कारण सामान्य नागरिक को समय पर न्याय नहीं मिल पाता। लोक अदालतें वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution - ADR) की एक ऐसी सुलहकारी प्रणाली हैं जहाँ "न कोई जीतता है, न कोई हारता है", बल्कि दोनों पक्षों के मध्य आपसी समझौते से विवाद का स्थाई अंत होता है।

विधिक दर्शन एवं ऐतिहासिक पहल

भारत में आधुनिक युग में लोक अदालत की अवधारणा के जनक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती (Justice P.N. Bhagwati) माने जाते हैं। स्वतंत्र भारत में प्रथम लोक अदालत शिविर 14 मार्च 1982 को गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित किया गया था।

3. राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA, Jaipur) की संरचना

राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (Rajasthan State Legal Services Authority - RSLSA) का मुख्यालय राजस्थान उच्च न्यायालय पीठ, जयपुर में स्थित है। इसका संगठनात्मक ढाँचा इस प्रकार है:

मुख्य संरक्षक (Patron-in-Chief): राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) इसके पदेन मुख्य संरक्षक होते हैं।
कार्यकारी अध्यक्ष (Executive Chairman): राजस्थान उच्च न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश (Senior-most Judge) को राज्यपाल द्वारा मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है।
सदस्य सचिव (Member Secretary): उच्च न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service / District Judge Cadre) के एक वरिष्ठ अधिकारी को सदस्य सचिव नियुक्त किया जाता है।
निःशुल्क विधिक सहायता के पात्र व्यक्ति (धारा 12): महिलाएँ व बच्चे, SC/ST के सदस्य, औद्योगिक कामगार, हिरासत (हिरासत/जेल) में बंद व्यक्ति, दिव्यांगजन, मानव तस्करी या बेगार के शिकार, प्राकृतिक आपदा पीड़ित तथा वे व्यक्ति जिनकी वार्षिक आय राज्य सरकार द्वारा निर्धारित सीमा (वर्तमान में ₹3 लाख) से कम हो।

4. लोक अदालत : संरचना, क्षेत्राधिकार एवं निर्णय की विधिक प्रकृति

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अध्याय 6 (धारा 19 से 22) में लोक अदालतों के संगठन, अधिकारिता एवं निर्णयों के विधिक प्रभाव का विस्तृत विवरण है:

पीठ की संरचना (Composition): लोक अदालत की प्रत्येक पीठ में एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी (अध्यक्ष के रूप में) तथा एक सामाजिक कार्यकर्ता या प्रतिष्ठित अधिवक्ता (सदस्य के रूप में) शामिल होते हैं।
किन मामलों की सुनवाई हो सकती है? (Jurisdiction):
  • नियमित न्यायालयों में लंबित कोई भी दीवानी मामला, पारिवारिक विवाद, चेक बाउंस (NI Act धारा 138), भूमि अधिग्रहण मुआवजा विवाद, बैंक वसूली वाद।
  • आपराधिक मामलों में केवल शमनीय अपराध (Compoundable Offences), जिनमें कानूनन समझौता अनुमत हो।
  • पूर्व-मुकदमेबाजी मामले (Pre-litigation Cases): ऐसे विवाद जो अभी तक नियमित अदालत में दायर नहीं हुए हैं, वे भी लोक अदालत में सुलझाए जा सकते हैं।
  • अपवाद (Bar): गैर-शमनीय अपराध (Non-compoundable criminal cases) लोक अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर होते हैं।
निर्णय (Award) की विधिक प्रकृति — अति महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु:
  • लोक अदालत द्वारा पारित अधिनिर्णय (Award) को सिविल कोर्ट की डिक्री (Decree of a Civil Court) का दर्जा प्राप्त होता है।
  • इसके विरुद्ध किसी भी अपीलीय न्यायालय में कोई अपील नहीं (No Appeal) की जा सकती (धारा 21(2))। यह निर्णय अंतिम होता है।
  • कोर्ट फीस वापसी: यदि नियमित अदालत में लंबित मुकदमा लोक अदालत में सुलझ जाता है, तो अदा की गई संपूर्ण कोर्ट फीस वापस लौटा दी जाती है।

5. स्थायी लोक अदालतें (Permanent Lok Adalats - PLA) : 2002 संशोधन

सामान्य लोक अदालतें केवल समय-समय पर (आवधिक रूप से) आयोजित की जाती हैं। जन-उपयोगी सेवाओं के मामलों को स्थायी रूप से प्रतिदिन निपटाने हेतु विधिक सेवा प्राधिकरण (संशोधन) अधिनियम, 2002 द्वारा कानून में धारा 22B से 22E जोड़कर 'स्थायी लोक अदालतों' (PLA) का प्रावधान किया गया:

सार्वजनिक उपयोगी सेवाएँ (Public Utility Services)

  • सड़क, वायु या जलमार्ग द्वारा यात्री या माल परिवहन।
  • डाक, टेलीग्राफ या टेलीफोन सेवा।
  • जनता को विद्युत, प्रकाश या जल की आपूर्ति।
  • सार्वजनिक स्वच्छता व्यवस्था या अस्पताल व औषधालय सेवा।
  • बीमा सेवा (Insurance Services)।

विशिष्ट शक्तियाँ एवं आर्थिक सीमा

  • आर्थिक अधिकारिता: ₹1 करोड़ तक के सार्वजनिक सेवा विवाद।
  • गुण-दोष पर निर्णय की शक्ति: यदि दोनों पक्ष समझौते पर सहमत न हों, तो भी स्थायी लोक अदालत मामले के गुण-दोष (Merits) के आधार पर अंतिम फैसला सुना सकती है, जो दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
  • पीठासीन अधिकारी जिला न्यायाधीश स्तर का सेवारत/सेवानिवृत्त जज + 2 विशेषज्ञ सदस्य।

6. राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) एवं ई-लोक अदालत पहल

राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalats): नालसा (NALSA) के दिशा-निर्देशानुसार संपूर्ण भारत तथा राजस्थान के सभी न्यायालयों (उच्च न्यायालय से लेकर तालुका कोर्ट तक) में एक ही दिन राष्ट्रीय स्तर पर वर्ष में 4 बार (त्रैमासिक) राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया जाता है, जिसमें लाखों प्रकरणों का एक साथ निस्तारण होता है।
ई-लोक अदालत (E-Lok Adalat): कोविड-19 महामारी के दौरान राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से ई-लोक अदालतों का सफल संचालन किया, जहाँ पक्षकारों ने बिना अदालत आए घर बैठे आपसी सहमति से मुकदमों का निस्तारण कराया।

7. ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 : ग्रामीण भारत हेतु ऐतिहासिक कदम

भारत के विधि आयोग की 114वीं रिपोर्ट (1986) में ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब व वंचित ग्रामीणों के द्वार तक सस्ता और त्वरित न्याय पहुंचाने हेतु ग्राम न्यायालयों की स्थापना की सिफारिश की गई थी। इसके आधार पर संसद द्वारा ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 पारित किया गया, जो 2 अक्टूबर 2009 (गांधी जयंती) से लागू हुआ।

स्थापना का स्तर एवं क्षेत्र

  • प्रत्येक मध्यवर्ती पंचायत (Panchayat Samiti / मध्यवर्ती स्तर) अथवा तहसीलों के समूह हेतु एक ग्राम न्यायालय।
  • राज्य सरकार संबंधित उच्च न्यायालय (High Court) के परामर्श से अधिसूचना द्वारा ग्राम न्यायालय स्थापित करती है।

दोहरा क्षेत्राधिकार (Dual Jurisdiction)

  • फौजदारी अधिकारिता: ऐसे अपराध जिनमें अधिकतम 2 वर्ष तक के कारावास का दंड हो, चोरी, संपत्ति नुकसान (प्रथम अनुसूची में विहित)।
  • दीवानी अधिकारिता: संपत्ति विवाद, पट्टा, न्यूनतम मजदूरी, मवेशी अतिक्रमण आदि (द्वितीय अनुसूची)।

8. राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय : बस्सी (जयपुर) - 27 नवम्बर 2010

ऐतिहासिक मील का पत्थर (RPSC Golden Fact)

राजस्थान में ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत पहला ग्राम न्यायालय 27 नवम्बर 2010 को बस्सी (जयपुर जिला) में स्थापित एवं उद्घाटित किया गया। यह राजस्थान में ग्राम स्तर पर सुलभ व त्वरित न्याय की दिशा में प्रथम क्रांतिकारी कदम था।

9. न्यायाधिकारी (Nyayadhikari), न्यायमित्र एवं मोबाइल कोर्ट प्रणाली

न्यायाधिकारी

ग्राम न्यायालय का पीठासीन अधिकारी। इसकी योग्यता, सेवा शर्तें तथा वेतन अधीनस्थ न्यायालय के प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के समान होती हैं। नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।

न्यायमित्र (Nyayamitra)

ग्रामीण वादकारियों की सहायता तथा न्यायालय में निष्पक्ष कानूनी मार्गदर्शन हेतु अधिनियम के तहत नियुक्त विधिक सलाहकार (Amicus Curiae / Legal Assistant)।

मोबाइल कोर्ट (सचल अदालत)

ग्राम न्यायालय एक मोबाइल कोर्ट (चल न्यायालय) के रूप में कार्य करता है। न्यायाधिकारी गांवों में जाकर मौके पर ही साक्ष्य लेकर विवादों का त्वरित निपटारा करते हैं।

साक्ष्य नियमों में सरलता: ग्राम न्यायालय भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के कठोर तकनीकी नियमों से बाध्य नहीं होता, बल्कि यह प्राकृतिक न्याय (Principles of Natural Justice) के सिद्धांतों पर कार्य करता है।

10. तुलनात्मक सारणी : लोक अदालत vs स्थायी लोक अदालत vs ग्राम न्यायालय

मापदंड / विशेषता लोक अदालत (Lok Adalat) स्थायी लोक अदालत (PLA) ग्राम न्यायालय (Gram Nyayalaya)
विधिक आधार विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 (अध्याय 6) 2002 संशोधन अधिनियम (धारा 22B-22E) ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008
कार्य की प्रकृति आवधिक शिविर (समय-समय पर) स्थायी अदालत (नियमित प्रतिदिन) स्थायी व सचल अदालत (Mobile Court)
क्षेत्राधिकार का विषय शमनीय फौजदारी, दीवानी, पारिवारिक आदि केवल सार्वजनिक उपयोगी सेवाएँ (परिवहन, बिजली आदि) 2 वर्ष तक के फौजदारी व ग्रामीण दीवानी मामले
निर्णय का आधार केवल दोनों पक्षों की आपसी सहमति पर सहमति न होने पर गुण-दोष (Merits) के आधार पर प्राकृतिक न्याय व साक्ष्य के आधार पर न्यायिक निर्णय
अपील की व्यवस्था कोई अपील नहीं (निर्णय अंतिम) कोई अपील नहीं (निर्णय अंतिम) दीवानी में जिला जज को, फौजदारी में सत्र न्यायालय को अपील (30 दिन में)

11. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

⚡ लोक अदालत रामबाण तथ्य

  • अनुच्छेद 39A: 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा समाविष्ट।
  • विधिक सेवा दिवस: प्रतिवर्ष 9 नवम्बर।
  • RSLSA मुख्य संरक्षक: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश।
  • निर्णय का दर्जा: सिविल कोर्ट की डिक्री (कोई अपील नहीं)।
  • कोर्ट फीस: लोक अदालत में निपटारे पर पूरी फीस वापस।
  • PLA आर्थिक सीमा: ₹1 करोड़ तक के जन-उपयोगी मामले।

⚡ ग्राम न्यायालय रामबाण तथ्य

  • अधिनियम लागू: 2 अक्टूबर 2009 (गांधी जयंती)।
  • राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय: 27 नवम्बर 2010 (बस्सी, जयपुर)।
  • पीठासीन अधिकारी: न्यायाधिकारी (JMFC समकक्ष)।
  • विधिक सहायक: न्यायमित्र।
  • फौजदारी सीमा: अधिकतम 2 वर्ष के कारावास वाले अपराध।
  • प्रकृति: सचल अदालत (Mobile Court)।

12. विगत RPSC परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Year Questions)

प्रश्न 1: राजस्थान में ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत प्रथम ग्राम न्यायालय की स्थापना कहाँ की गई थी? [RAS Pre 2013 / 2nd Grade 2017]

उत्तर: बस्सी (जयपुर)। (इसकी स्थापना 27 नवम्बर 2010 को की गई थी)।

प्रश्न 2: लोक अदालत के संबंध में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है? [College Lecturer 2019 / RAS Pre 2021]

(A) लोक अदालत के अधिनिर्णय को सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है।
(B) लोक अदालत के निर्णय के विरुद्ध केवल उच्च न्यायालय में अपील हो सकती है।
(C) लोक अदालत में शमनीय आपराधिक मामलों का निस्तारण हो सकता है।
(D) प्रकरण निस्तारित होने पर कोर्ट फीस वापस कर दी जाती है।
उत्तर: (B) — लोक अदालत के निर्णय के विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई अपील (No Appeal) नहीं होती।

प्रश्न 3: राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) के मुख्य संरक्षक (Patron-in-Chief) कौन होते हैं? [Sub Inspector 2021]

उत्तर: राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of Rajasthan High Court)।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

सुलह न्याय तंत्र

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): लोक अदालतें भारतीय न्याय व्यवस्था में मुकदमों के बोझ को कम करने में किस प्रकार गेम-चेंजर साबित हुई हैं?

उत्तर संकेत: 1. दोनों पक्षों की पारस्परिक सहमति से निर्णय अतः कोई अपील नहीं और मुकदमेबाजी का स्थायी अंत, 2. कोर्ट फीस की पूर्ण वापसी, 3. राष्ट्रीय व ई-लोक अदालतों के माध्यम से एक ही दिन में लाखों मामलों का त्वरित निपटारा, 4. 'न किसी की जीत, न किसी की हार' के सिद्धांत से सामाजिक सौहार्द की रक्षा।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 के अंतर्गत स्थापित 'ग्राम न्यायालय' की दो मुख्य विशेषताएं बताइए।

उत्तर संकेत: 1. यह सचल न्यायालय (Mobile Court) के रूप में कार्य करता है, 2. पीठासीन अधिकारी न्यायाधिकारी (प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट स्तर) होता है तथा प्राकृतिक न्याय सिद्धांतों पर काम करता है।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

लोक अदालत, स्थायी लोक अदालत व ग्राम न्यायालय से संबंधित परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर।

राजस्थान का प्रथम ग्राम न्यायालय ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 के तहत 27 नवम्बर 2010 को बस्सी (जयपुर जिला) में स्थापित और विधिवत क्रियाशील किया गया था।
नहीं, विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 21 के अनुसार लोक अदालत द्वारा दिया गया अधिनिर्णय (Award) दोनों पक्षों की पारस्परिक सहमति पर आधारित सिविल कोर्ट की डिक्री माना जाता है। इसके विरुद्ध किसी भी न्यायालय में कोई सामान्य अपील (No Appeal) नहीं होती। यह निर्णय अंतिम और दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है।
स्थायी लोक अदालतों का गठन विधिक सेवा प्राधिकरण संशोधन अधिनियम, 2002 के तहत सार्वजनिक उपयोगी सेवाओं (Public Utility Services) जैसे परिवहन, डाक, टेलीफोन, विद्युत आपूर्ति, जल आपूर्ति, अस्पताल सेवा तथा बीमा से संबंधित ₹1 करोड़ तक के विवादों के पूर्व-मुकदमेबाजी (Pre-litigation) स्तर पर निपटारे हेतु किया गया है।
ग्राम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को न्यायाधिकारी (Nyayadhikari) कहा जाता है। न्यायाधिकारी की योग्यता, वेतन एवं शक्तियाँ प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) के समान होती हैं। इसकी नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय (High Court) के परामर्श से की जाती है।
हाँ, यदि नियमित न्यायालय में लंबित कोई मुकदमा लोक अदालत में दोनों पक्षों की सहमति से सुलझ जाता है, तो न्यायालय फीस अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार वादकारी द्वारा अदा की गई संपूर्ण कोर्ट फीस वापस (Refund) कर दी जाती है।

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