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मध्यवर्ती प्रशासनिक पर्यवेक्षण : 10 संभाग एवं 50 जिले

राजस्थान में संभागीय आयुक्त प्रणाली (Divisional Commissioner System) :
इतिहास (1949-2023), सुखाड़िया व जोशी निर्णय, 3 नवीन संभाग व शक्तियाँ

राजस्थान के क्षेत्रीय प्रशासनिक ढांचे का संपूर्ण, प्रामाणिक एवं अद्यतन अध्ययन — 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक द्वारा पद का उद्भव, 1949 में 5 संभाग, अप्रैल 1962 में मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा समाप्ति, 26 जनवरी 1987 को हरिदेव जोशी द्वारा पुनर्स्थापना (अजमेर 6ठा संभाग), 2005 में भरतपुर (7वाँ संभाग), रामलुभाया समिति की सिफारिश पर 2023 में 3 नवीन संभाग (सीकर, पाली, बांसवाड़ा), सभी 10 संभागों में 50 जिलों का वितरण, संभागीय आयुक्त की राजस्व, समन्वय व पर्यवेक्षण शक्तियाँ।

कुल संभाग 10 संभाग (50 जिले)
पुनः प्रारंभ 26 जनवरी 1987 (जोशी काल)
3 नवीन संभाग (2023) सीकर, पाली, बांसवाड़ा
न्यूनतम जिलों वाला संभाग बांसवाड़ा (3 जिले)
रामलुभाया उच्च स्तरीय समिति 2023 एवं राजस्थान प्रशासनिक सुधार संदर्भ

राजस्थान में संभागीय आयुक्त प्रणाली : 10 संभाग, 50 जिले व प्रशासनिक अधिकार

1829 में पद का उद्भव, 1962 में मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा समाप्ति, 1987 में हरिदेव जोशी द्वारा पुनर्स्थापना, 2023 में 3 नवीन संभाग (सीकर, पाली, बांसवाड़ा), संभागीय आयुक्त की शक्तियाँ व विगत 15 वर्षों के RPSC प्रश्न।

1. संभागीय व्यवस्था का उद्भव (1829) एवं राजस्थान में स्थापना (1949)

भारत में संभागीय आयुक्त (Divisional Commissioner) के पद का इतिहास ब्रिटिश कालीन है। सर्वप्रथम वर्ष 1829 में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक (Lord William Bentinck) द्वारा बंगाल प्रेसीडेंसी में राजस्व प्रशासन और पुलिस निगरानी को प्रभावी बनाने हेतु आयुक्त (Commissioner of Revenue and Circuit) का पद सृजित किया गया था।

1
1949 में राजस्थान में शुरुआत (5 संभाग): 30 मार्च 1949 को वृहत् राजस्थान के निर्माण के समय राज्य को 5 संभागों में विभाजित किया गया था—जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर एवं कोटा
2
1956 में अजमेर का विलय: 1 नवम्बर 1956 को राज्य पुनर्गठन के समय अजमेर-मेरवाड़ा का राजस्थान में विलय हुआ, परंतु उस समय अजमेर को संभाग न बनाकर जयपुर संभाग में शामिल किया गया था।

2. अप्रैल 1962 : मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा संभागीय व्यवस्था की समाप्ति

अप्रैल 1962 में राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने संभागीय आयुक्त प्रणाली को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया। इसके पीछे निम्नलिखित प्रमुख प्रशासनिक तर्क दिए गए थे:

'सफेद हाथी' (White Elephant) की संज्ञा

सुखाड़िया सरकार का मानना था कि संभागीय आयुक्त का पद राज्य सरकार (सचिवालय) और जिला कलेक्टर के बीच एक अनावश्यक मध्यवर्ती कड़ी (Fifth Wheel) है, जिससे फाइलों के निस्तारण में अनावश्यक विलंब होता है तथा सरकारी खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है।

वैकल्पिक राजस्व व्यवस्था

संभागीय आयुक्त की राजस्व अपीलीय शक्तियों को सीधे राजस्व मंडल, अजमेर (Board of Revenue) तथा संबंधित जिला कलेक्टरों को अंतरित कर दिया गया। 1962 से 1987 तक (25 वर्षों तक) राजस्थान बिना संभागीय आयुक्तों के संचालित हुआ।

3. 26 जनवरी 1987 : हरिदेव जोशी द्वारा संभागीय व्यवस्था की पुनर्स्थापना

संभागीय आयुक्त पद समाप्त होने के बाद राज्य सरकार का जिला स्तर पर प्रभावी पर्यवेक्षण कमजोर हो गया था। जिला कलेक्टरों की संख्या बढ़ने से सचिवालय स्तर पर सीधा समन्वय कठिन हो गया था। अतः 26 जनवरी 1987 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने इस व्यवस्था को पुनः बहाल किया:

अजमेर बना छठा संभाग (1987): 26 जनवरी 1987 को संभागीय व्यवस्था की पुनर्स्थापना के साथ ही अजमेर को राजस्थान का 6ठा संभाग घोषित किया गया (जयपुर संभाग से अलग कर)।
भरतपुर बना सातवाँ संभाग (4 जून 2005): वसुंधरा राजे सरकार के समय 4 जून 2005 को भरतपुर को 7वाँ संभाग बनाया गया, जिसमें जयपुर संभाग से भरतपुर व धौलपुर तथा कोटा संभाग से सवाई माधोपुर व करौली जिले शामिल किए गए।

4. वर्ष 2023 पुनर्गठन : रामलुभाया समिति एवं 3 नवीन संभागों का गठन

राजस्थान के विस्तृत भौगोलिक क्षेत्रफल और सुदूर ग्रामीण अंचलों तक प्रशासनिक पहुंच को सुगम बनाने हेतु सेवानिवृत्त आईएएस रामलुभाया की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय समिति (Ram Lubhaya Committee) गठित की गई थी। इस समिति की अंतरिम रिपोर्ट के आधार पर राजस्थान सरकार द्वारा 3 नए संभागों के गठन की अधिसूचना (7 अगस्त 2023) जारी की गई:

नवीन संभाग 1

सीकर संभाग

कुल 4 जिले

शामिल जिले: सीकर, झुंझुनू, चूरू (बीकानेर से अलग होकर), एवं नीम का थाना। शेखावाटी का प्रशासनिक केंद्र।

नवीन संभाग 2

पाली संभाग

कुल 4 जिले

शामिल जिले: पाली, जालोर, सांचौर (नया जिला), एवं सिरोही (जोधपुर संभाग से पृथक होकर)। गोडवाड़ क्षेत्र।

नवीन संभाग 3

बांसवाड़ा संभाग

कुल 3 जिले (न्यूनतम)

शामिल जिले: बांसवाड़ा, डूंगरपुर, एवं प्रतापगढ़। राजस्थान का न्यूनतम जिलों वाला संभाग (वागड़/TSP अंचल)।

राजस्थान में संभागों की ऐतिहासिक विकास यात्रा (1949 से 2023)
1949 (शुरुआत) 5 संभाग 1962 (सुखाड़िया) प्रणाली समाप्त 1987 (जोशी) 6 संभाग (अजमेर) 2005 (राजे) 7 संभाग (भरतपुर) 2023 (रामलुभाया) 10 संभाग

5. राजस्थान के 10 संभाग एवं 50 जिलों का अद्यतन प्रशासनिक वर्गीकरण (2023)

संभाग का नाम जिलों की संख्या संभाग में शामिल जिले (50 जिलों का सटीक आवंटन) विशिष्ट प्रशासनिक एवं परीक्षा तथ्य
1. जयपुर संभाग 7 जिले जयपुर, जयपुर ग्रामीण, दूदू, कोटपूतली-बहरोड़, दौसा, खैरथल-तिजारा, अलवर सर्वाधिक जनसंख्या वाला संभाग; राजस्थान का सबसे छोटा जिला दूदू इसी संभाग में है।
2. अजमेर संभाग 7 जिले अजमेर, ब्यावर, केकड़ी, टोंक, नागौर, डीडवाना-कुचामन, शाहपुरा राजस्थान का केंद्रीय संभाग (मध्यवर्ती संभाग); सर्वाधिक संभागों की सीमाओं को छूने वाला।
3. जोधपुर संभाग 6 जिले जोधपुर, जोधपुर ग्रामीण, फलौदी, जैसलमेर, बाड़मेर, बालोतरा सर्वाधिक क्षेत्रफल वाला संभाग; अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती संभाग; शुष्क मरुस्थलीय संभाग।
4. भरतपुर संभाग 6 जिले भरतपुर, धौलपुर, करौली, डीग, सवाई माधोपुर, गंगापुर सिटी पूर्वी राजस्थान संभाग; 4 जून 2005 को 7वां संभाग बना था।
5. उदयपुर संभाग 5 जिले उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद, भीलवाड़ा, सलूंबर अरावली वन एवं खनिज संपदा संपन्न मेवाड़ संभाग।
6. बीकानेर संभाग 4 जिले बीकानेर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, अनूपगढ़ नहरी सिंचित उत्तरी संभाग; अंतरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित।
7. कोटा संभाग 4 जिले कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ संभागीय पुनर्गठन 2023 में पूर्णतः अपरिवर्तित संभाग; सर्वाधिक नदियों व आर्द्रता वाला हाड़ौती संभाग।
8. सीकर संभाग (नवीन) 4 जिले सीकर, झुंझुनू, चूरू, नीम का थाना नवीन संभाग; शेखावाटी अंचल का स्वतंत्र संभाग (चूरू बीकानेर से, अन्य जयपुर से अलग)।
9. पाली संभाग (नवीन) 4 जिले पाली, जालोर, सांचौर, सिरोही नवीन संभाग; गोडवाड़ अंचल (जोधपुर संभाग से पृथक होकर निर्मित)।
10. बांसवाड़ा संभाग (नवीन) 3 जिले बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ नवीन संभाग; राजस्थान का न्यूनतम जिलों (मात्र 3 जिले) वाला संभाग; पूर्णतः वागड़/TSP संभाग (उदयपुर से अलग)।

6. प्रशासनिक सेतु मॉडल : राज्य सचिवालय एवं जिला कलेक्टर के मध्य संपर्क

संभागीय आयुक्त की पद-स्थिति राज्य प्रशासन में एक दोहरे सेतु (Administrative Bridge) के समान होती है। यह मुख्य सचिवराज्य सचिवालय तथा फील्ड जिला प्रशासन के मध्य संचार, पर्यवेक्षण और समन्वय का कार्य करता है:

संभागीय आयुक्त : शीर्ष शासन व फील्ड प्रशासन के मध्य सेतु
राज्य सचिवालय मुख्य सचिव / शासन स्तर संभागीय आयुक्त (सेतु / पर्यवक्षक) वरिष्ठ IAS अधिकारी जिला प्रशासन जिला कलेक्टर / SP

7. संभागीय आयुक्त की शक्तियाँ, अधिकार एवं कार्य

1. सर्वोच्च राजस्व अपीलीय अधिकारी (Revenue Appellate Authority): राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम, 1956 एवं राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 के तहत संभागीय आयुक्त संभाग का प्रमुख राजस्व न्यायालय है। यह जिला कलेक्टर, उपखंड अधिकारी (SDM) एवं तहसीलदारों के राजस्व निर्णयों के विरुद्ध प्रथम व द्वितीय अपील की सुनवाई करता है।
2. कानून व शांति व्यवस्था का समन्वय (Law & Order): संभागीय पुलिस महानिरीक्षक (IGP) के साथ मिलकर संभाग में अपराध नियंत्रण, साम्प्रदायिक सौहार्द व शांति बनाए रखने का पर्यवेक्षण करता है। बड़े दंगों या आपात स्थिति में मजिस्ट्रेट शक्तियों का उपयोग।
3. प्रशासनिक निरीक्षण एवं नियंत्रण (Supervision & Inspection): संभाग के सभी कलेक्ट्रेटों, उपखंड कार्यालयों, तहसीलों, जेलों तथा नगरपालिकाओं का वार्षिक प्रशासनिक निरीक्षण करना तथा कार्य कुशलता की समीक्षा रिपोर्ट सरकार को भेजना।
4. स्थानीय स्वशासन पर नियंत्रण (Panchayati Raj & Municipalities): राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 तथा नगरपालिका अधिनियम, 2009 के तहत स्थानीय निकायों के निर्वाचित पदाधिकारियों के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव की बैठकों का संचालन, जांच एवं निलंबन संबंधी वैधानिक शक्तियाँ।
5. विकास कार्यक्रमों व आपदा प्रबंधन का समन्वय: संभाग स्तर पर 20-सूत्रीय कार्यक्रम, फ्लैगशिप योजनाओं की पाक्षिक/मासिक समीक्षा करना। सूखा, बाढ़, महामारी या ओलावृष्टि के समय राहत कार्यों का सर्वोच्च संभागीय समन्वयक।

8. प्रशासनिक सुधार समितियों की दृष्टि में संभागीय व्यवस्था

हरीशचंद्र माथुर समिति (1963): संभागीय व्यवस्था को समाप्त किए जाने के तत्काल बाद 1963 में माथुर समिति ने माना कि जिला कलेक्टरों पर सीधा नियंत्रण रखने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर एक वरिष्ठ अनुभवी अधिकारी की उपस्थिति आवश्यक है।
गिरधारी लाल व्यास समिति (1973): पंचायती राज के संदर्भ में गिरधारी लाल व्यास समिति ने भी ग्रामीण विकास व प्रशासन के बेहतर समन्वय हेतु संभागीय स्तर के पर्यवेक्षण की आवश्यकता रेखांकित की थी।
रामलुभाया उच्च स्तरीय समिति (2022-2023): समिति ने स्पष्ट किया कि 50 जिलों के विशाल प्रशासनिक विस्तार में विकेंद्रीकृत निगरानी हेतु 10 संभागों का गठन अपरिहार्य है, जिससे आम नागरिक को संभाग स्तर पर ही समस्याओं का समाधान मिल सके।

9. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield Quick Revision Points)

⚡ ऐतिहासिक व राजनीतिक तथ्य

  • भारत में पद सृजन: 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक द्वारा.
  • 1949 में संभाग: 5 संभाग (जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, उदयपुर, कोटा).
  • 1962 में समाप्ति: मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा.
  • 1987 में पुनः प्रारंभ: हरिदेव जोशी द्वारा (26 जनवरी 1987).
  • छठा संभाग (1987): अजमेर संभाग.
  • सातवाँ संभाग (2005): भरतपुर संभाग (4 जून 2005).

⚡ 10 संभाग एवं भौगोलिक तथ्य

  • 3 नवीन संभाग (2023): सीकर, पाली, बांसवाड़ा.
  • पुनर्गठन समिति: रामलुभाया समिति.
  • न्यूनतम जिलों वाला संभाग: बांसवाड़ा संभाग (3 जिले).
  • सर्वाधिक जिलों वाले संभाग: जयपुर व अजमेर संभाग (7-7 जिले).
  • अपरिवर्तित संभाग (2023): कोटा संभाग (4 जिले यथावत).
  • मध्यवर्ती केंद्रीय संभाग: अजमेर संभाग.

10. विगत RPSC परीक्षाओं में पूछे गए प्रश्न (Past Year Questions)

प्रश्न 1: राजस्थान में संभागीय व्यवस्था को किस वर्ष समाप्त किया गया और किस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में पुनः प्रारंभ किया गया? [RAS Pre 2013 / 2018]

उत्तर: वर्ष 1962 में समाप्त (मोहनलाल सुखाड़िया) तथा 1987 में पुनः प्रारंभ (हरिदेव जोशी)।

प्रश्न 2: वर्ष 2023 में गठित तीन नवीन संभाग कौन-से हैं? [Current / RSSB 2024]

उत्तर: सीकर, पाली एवं बांसवाड़ा। (रामलुभाया उच्च स्तरीय समिति की सिफारिश पर)।

प्रश्न 3: राजस्थान का 7वाँ संभाग 'भरतपुर' किस तिथि को और किन संभागों के पुनर्गठन से बना था? [2nd Grade 2016 / Patwar 2021]

उत्तर: 4 जून 2005 को। (जयपुर संभाग से भरतपुर व धौलपुर तथा कोटा संभाग से सवाई माधोपुर व करौली को मिलाकर)।

RAS मुख्य परीक्षा (Mains Paper-3) मॉडल अभ्यास प्रश्नोत्तर

क्षेत्रीय प्रशासन

प्रश्न 1 (50 शब्द | 5 अंक): 1962 में समाप्त की गई संभागीय आयुक्त प्रणाली को 1987 में पुनः प्रारंभ करने के पीछे क्या प्रशासनिक औचित्य था?

उत्तर संकेत: 1962 में इसे अनावश्यक व्यय व देरी मानकर समाप्त किया गया। परंतु जिलों व कलेक्टरों की संख्या बढ़ने से राज्य सरकार (सचिवालय) द्वारा फील्ड प्रशासन का सीधा नियंत्रण कमजोर हो गया। अंतर-विभागीय समन्वय, क्षेत्रीय कानून-व्यवस्था (IGP के साथ) व राजस्व अपीलों के क्षेत्रीय निस्तारण हेतु 1987 में इसे पुनः अपरिहार्य माना गया।

प्रश्न 2 (20 शब्द | 2 अंक): राजस्थान के वर्ष 2023 में गठित तीन नए संभागों तथा न्यूनतम जिलों वाले संभाग का नाम लिखिए।

उत्तर संकेत: 3 नए संभाग: सीकर, पाली और बांसवाड़ा। न्यूनतम जिलों वाला संभाग: बांसवाड़ा संभाग (केवल 3 जिले—बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़)।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

10 संभागों, संभागीय आयुक्त प्रणाली, सुखाड़िया व जोशी निर्णयों से जुड़े परीक्षोपयोगी प्रश्नोत्तर।

राजस्थान में संभागीय व्यवस्था को अप्रैल 1962 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया द्वारा समाप्त कर दिया गया था। इसके 25 वर्ष बाद 26 जनवरी 1987 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी द्वारा इसे पुनः प्रारंभ किया गया तथा अजमेर को छठा संभाग बनाया गया।
वर्ष 2023 में रामलुभाया उच्च स्तरीय समिति (Ram Lubhaya Committee) की सिफारिश पर 3 नवीन संभाग बनाए गए: 1. सीकर संभाग, 2. पाली संभाग, तथा 3. बांसवाड़ा संभाग। इसके साथ ही राजस्थान में संभागों की कुल संख्या 7 से बढ़कर 10 हो गई।
राजस्थान का न्यूनतम जिलों वाला संभाग बांसवाड़ा संभाग है। इसमें केवल 3 जिले शामिल हैं—बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़। यह राजस्थान का एकमात्र संभाग है जिसके सभी जिले पूर्णतः अनुसूचित क्षेत्र (वागड़ / TSP अंचल) में आते हैं।
संभागीय आयुक्त राज्य सचिवालय (शासन) तथा जिला प्रशासन (जिला कलेक्टर) के मध्य मुख्य प्रशासनिक सेतु (Bridge) के रूप में कार्य करता है। यह संभाग का सर्वोच्च राजस्व अपीलीय अधिकारी होता है, कानून व्यवस्था का महानिरीक्षक पुलिस (IGP) के साथ समन्वय करता है, तथा संभाग के सभी कलेक्ट्रेट व विकास विभागों का प्रशासनिक निरीक्षण करता है।
भारत में संभागीय आयुक्त पद का सृजन सर्वप्रथम वर्ष 1829 में तत्कालीन गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक (Lord William Bentinck) द्वारा बंगाल प्रेसीडेंसी में राजस्व और पुलिस कार्यों के पर्यवेक्षण हेतु किया गया था।

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