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राजस्थान का इतिहास – जैसलमेर भाटी राजवंश

जैसलमेर का भाटी राजवंश:
'उत्तर भड़ किवाड़', ढाई साके एवं अमर गौरवगाथा

भगवान श्रीकृष्ण के यदुवंशी वंशज, राजा भूपत (भटनेर दुर्ग 295 ई.), रावल जैसल (सोनार किला 1155 ई.), विश्व प्रसिद्ध ढाई साके (अर्द्ध साका 1550 ई.), पटवों की हवेली, जैन ज्ञान भंडार तथा अमर बलिदानी सागरमल गोपा का 100% प्रामाणिक व परीक्षा-केंद्रित विस्तृत अध्ययन।

हिंदी ग्रंथ अकादमी प्रामाणिक RAS / SI / CET उपयोगी अर्द्ध साका (1550 ई.) जैसलमेर का गुंडाराज
त्वरित सारांश 👑 जैसलमेर रियासत

सोनार दुर्ग स्थापना

1155 ई.

नगर संस्थापक

रावल जैसल

कुलदेवी: स्वांगिया माता | कुलदेवता: लक्ष्मीनाथ जी

भाटी वंश (ढाई साके) : Online Test
गहन प्रामाणिक अध्ययन

जैसलमेर का भाटी राजवंश: सम्पूर्ण ऐतिहासिक विश्लेषण

यदुवंशी उत्पत्ति, सोनार किला स्थापना, ढाई साके, हवेलियों का स्थापत्य व स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा का इतिहास।

1. उत्पत्ति, 'उत्तर भड़ किवाड़' उपाधि एवं कुलदेवी-कुलदेवता

जैसलमेर के भाटी शासक स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का वंशज (चंद्रवंशी / यदुवंशी क्षत्रिय) मानते हैं। मथुरा व द्वारिका से चलकर इनके पूर्वज पंजाब होते हुए राजस्थान के मरुस्थल में स्थापित हुए।

'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' की उपाधि

भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर स्थित होने के कारण विदेशी आक्रांताओं (अरब, तुर्क, अफगान) के हमलों को सबसे पहले सीने पर झेलने के कारण भाटी राजाओं को 'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' (उत्तरी सीमा का रक्षक किवाड़) कहा जाता है।

कुलदेवी: स्वांगिया माता (आवड़ माता)

भाटी राजवंश की कुलदेवी स्वांगिया माता (सुआंगिया / आवड़ माता) हैं। इनका प्रतीक चिह्न मुड़ा हुआ भाला (स्वांग) एवं शगुन चिड़िया (सुगंध चिड़ी) है।

कुलदेवता: भाटी शासकों के कुलदेवता श्री लक्ष्मीनाथ जी हैं। मेवाड़ महाराणाओं (एकलिंगजी के दीवान) की तरह जैसलमेर के महारावल भी स्वयं को 'लक्ष्मीनाथ जी का दीवान' मानकर शासन संचालित करते थे।

2. प्रारंभिक इतिहास – राजा भूपत, तणुजी एवं रावल देवराज भाटी

प्राचीनतम दुर्ग

1. राजा भूपत भाटी (295 ई.)

घग्घर नदी तट पर पक्की ईंटों से निर्मित राजस्थान के सबसे प्राचीन भटनेर दुर्ग (वर्तमान हनुमानगढ़) का निर्माण करवाया। इनके नाम पर ही इस वंश का नाम 'भाटी वंश' पड़ा।

तणोट राजधानी

2. तणुजी भाटी (8वीं सदी)

इन्होंने 828 ई. के आसपास तणोट नगर बसाया और उसे अपनी राजधानी बनाया। यहाँ प्रसिद्ध तणोट माता मंदिर (थार की वैष्णो देवी / सैनिकों की देवी) स्थापित है।

वास्तविक संस्थापक

3. रावल देवराज भाटी

भाटी वंश के वास्तविक संस्थापक। इन्होंने परमारों को पराजित कर लोद्रवा को राजधानी बनाया और सर्वप्रथम 'रावल' की पदवी धारण की।

📌 भाटी राजवंश की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम: भटनेर ➔ तणोट ➔ लोद्रवा ➔ जैसलमेर (1155 ई.)

3. रावल जैसल (1155 ई.) – जैसलमेर नगर व सोनार दुर्ग के संस्थापक

लोद्रवा की भौगोलिक असुरक्षा को देखते हुए ऋषि इंसुल (ईशाल) की सलाह पर रावल जैसल भाटी ने 12 जुलाई 1155 ई. (श्रावण शुक्ल द्वादशी) को त्रिकूट पहाड़ी (गोरहरा पहाड़ी) पर जैसलमेर दुर्ग (सोनार किला) की नींव रखी और जैसलमेर को नई राजधानी बनाया।

🏰 सोनार दुर्ग की प्रमुख ऐतिहासिक व स्थापत्य विशेषताएं:

  • उपनाम: स्वर्णगिरि, सोनार किला, त्रिकूटगढ़, जैसाणगढ़, 'रेगिस्तान का गुलाब', 'गलियों का दुर्ग'।
  • निर्माण तकनीक: पीले पत्थरों से निर्मित, जिसमें चूने या सीमेंट का बिल्कुल प्रयोग नहीं किया गया है; पत्थर पर पत्थर जोड़कर (Interlocking system) बनाया गया है।
  • 99 बुर्ज: यह दुर्ग 99 बुर्जों वाला राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट (आवासीय दुर्ग) है।
  • अबुल फजल का प्रसिद्ध कथन: "घोड़ा कीजै काठ का, पग कीजै पाषाण। अख्तर कीजै लोह का, तब पहुंचे जैसाण॥" (अर्थात् यहाँ केवल काष्ठ के घोड़े और पत्थर की टांगों वाला ही पहुँच सकता है)।
  • UNESCO धरोहर: 2013 में राजस्थान के 6 पहाड़ी दुर्गों के साथ इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया।

4. जैसलमेर के ऐतिहासिक ढाई साके (2½ Sakas of Jaisalmer)

जैसलमेर का इतिहास अपने ढाई साकों (2½ Sakas) के अप्रतिम शौर्य और बलिदान के लिए संपूर्ण भारत में अद्वितीय स्थान रखता है:

1. प्रथम साका (1312 – 1316 ई. / अलाउद्दीन खिलजी कालीन)

पूर्ण साका

शासक: रावल मूलराज प्रथम (व कुंवर रतन सिंह) | आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी।
कारण: खिलजी के शाही घोड़ों व खजाने को भाटियों द्वारा लूटना।
घटना: लगभग 7 वर्षों की घेराबंदी के बाद भाटी वीरों ने भीषण युद्ध करते हुए केसरिया किया तथा रानियों ने 24,000 वीरांगनाओं संग दुर्ग में अग्नि जौहर किया।

2. द्वितीय साका (1370 – 1371 ई. / फिरोजशाह तुगलक कालीन)

पूर्ण साका

शासक: रावल दूदा (दुर्जनसाल) एवं त्रिलोकसी | आक्रमणकारी: फिरोजशाह तुगलक।
घटना: दिल्ली सुल्तान की सेना से घिरने पर भाटी वीरों ने केसरिया बाना पहनकर शत्रु पर टूट पड़े और वीरगति पाई। दुर्ग में वीरांगनाओं ने पूर्ण विधि-विधान से जौहर किया।

3. तृतीय साका – 'अर्द्ध साका' (1550 ई. / आधा साका)

अर्द्ध साका (आधा साका)

शासक: रावल लूणकरण भाटी (रूठी रानी उमादे के पिता) | आक्रमणकारी: कंधार का निर्वासित पठान अमीर अली (मीर अली)।
घटना का विवरण: अमीर अली ने जैसलमेर में शरण ली थी। उसने रानियों से अपनी बेगमों के मिलने के बहाने डोलियों में हथियारबंद पठान सैनिक दुर्ग के भीतर भेजकर धोखे से हमला कर दिया।
अर्द्ध साका क्यों?: अचानक हुए इस हमले में जौहर की चिता सजाने का समय नहीं मिला। रावल लूणकरण व भाटी वीरों ने वीरांगनाओं के शील की रक्षा हेतु स्वयं तलवार से उन्हें वीरगति दी और फिर दुर्ग के कपाट खोलकर शत्रु सेना पर टूट पड़े। भाटी वीरों ने अमीर अली व उसकी सेना को मारकर युद्ध में विजय प्राप्त की
चूंकि केसरिया हुआ, शत्रु मारा गया किंतु जौहर नहीं हुआ, इसलिए इसे इतिहास में 'अर्द्ध साका' (आधा साका) कहा जाता है।

5. उत्तरवर्ती शासक – नागौर दरबार (1570), ईस्ट इंडिया संधि व विलय

  • रावल हरराज (1570 ई.): अकबर द्वारा 1570 में आयोजित नागौर दरबार में उपस्थित होकर मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाले जैसलमेर के प्रथम शासक। इन्होंने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया।
  • महारावल मूलराज द्वितीय (1818 ई.): 2 जनवरी 1818 को ईस्ट इंडिया कंपनी (चार्ल्स मेटकाफ) के साथ अधीनस्थ सहायक संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • महारावल गज सिंह (1820-1846 ई.): दुर्ग में गज विलास, सर्वोत्तम विलास (शीश महल) व बादलगढ़ का निर्माण करवाया।
  • महारावल जवाहर सिंह (1914-1949 ई.): जैसलमेर के निरंकुश शासक, जिनके समय स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा पर भीषण जेल यातनाएं दी गईं।
  • महारावल गिरधर सिंह: राजस्थान एकीकरण (30 मार्च 1949 – वृहत् राजस्थान) के समय जैसलमेर के अंतिम शासक।

6. अमर स्वतंत्रता सेनानी सागरमल गोपा (1900 – 1946 ई.)

जैसलमेर रियासत में जन-जागृति एवं राजशाही निरंकुशता के विरुद्ध आवाज उठाने वाले अमर बलिदानी सागरमल गोपा का योगदान राजस्थान के स्वाधीनता आंदोलन में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

📚 प्रमुख क्रांतिकारी पुस्तकें

  • 1. जैसलमेर का गुंडाराज (महारावल के अत्याचारों का भंडाफोड़)
  • 2. रघुनाथ सिंह का मुकदमा
  • 3. आजादी के दीवाने

🔥 अमर शहादत व जांच आयोग

जेलर गुमानसिंह के अमानवीय अत्याचारों के बाद 3 अप्रैल 1946 को गोपा जी पर मिट्टी का तेल डालकर जेल में जिंदा जला दिया गया। 4 अप्रैल को उनका प्राणांत हुआ। इस हत्याकांड की जांच हेतु सरकार ने गोपाल स्वरूप पाठक समिति का गठन किया था।

7. स्थापत्य कला: विश्व प्रसिद्ध हवेलियाँ एवं जीनभद्र सूरी ज्ञान भंडार

जैसलमेर को 'हवेलियों एवं झरोखों की नगरी' कहा जाता है। यहाँ की पत्थर की बारीक नक्काशी (Jali Work) विश्व विख्यात है:

1. पटवों की हवेली

सेठ गुमानचंद बाफना द्वारा अपने 5 पुत्रों हेतु निर्मित 5 मंजिला विशाल हवेली। पत्थर के सुंदर झरोखों व बारीक जालियों हेतु प्रसिद्ध।

2. नथमल की हवेली

दीवान नथमल द्वारा निर्मित। इसके प्रमुख वास्तुकार हाथी एवं लालू नामक दो भाई थे। मुख्य द्वार पर पीले पत्थर के दो विशाल हाथी स्थापित हैं।

3. सालिम सिंह की हवेली

दीवान सालिम सिंह द्वारा निर्मित 9 मंजिला हवेली (नौखंडा महल / जहाज महल)। ऊपरी दो मंजिलें लकड़ी की बनी हैं (मोती महल व कमल महल)।

जीनभद्र सूरी ज्ञान भंडार (Jain Manuscript Vault): सोनार दुर्ग स्थित भारत का प्राचीनतम एवं सबसे समृद्ध भूमिगत हस्तलिखित ग्रंथ भंडार। इसमें ताड़पत्रों व दुर्लभ भोजपत्रों पर लिखित 11वीं-12वीं शताब्दी के ग्रंथ सुरक्षित हैं।

8. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield RPSC/RAS Facts)

📌 भाटी राजवंश रामबाण बिंदु

  • भटनेर दुर्ग: 295 ई. में राजा भूपत भाटी द्वारा निर्मित (राजस्थान का सबसे प्राचीन दुर्ग)।
  • सोनार किला स्थापना: 1155 ई. में रावल जैसल द्वारा त्रिकूट पहाड़ी पर।
  • उत्तर भड़ किवाड़: जैसलमेर के भाटी शासकों की प्रसिद्ध उपाधि।
  • कुलदेवी: स्वांगिया माता (मुड़ा हुआ भाला व सुगंध चिड़ी)।
  • कुलदेवता: श्री लक्ष्मीनाथ जी (शासक स्वयं को दीवान मानते थे)।

📌 साके व ऐतिहासिक बिंदु

  • अर्द्ध साका (1550 ई.): रावल लूणकरण के समय (केसरिया हुआ, विजय मिली, जौहर नहीं हुआ)।
  • सागरमल गोपा: 'जैसलमेर का गुंडाराज' के लेखक, 3 अप्रैल 1946 को जेल में जिंदा जलाए गए।
  • ईस्ट इंडिया संधि: 2 जनवरी 1818 को महारावल मूलराज द्वितीय द्वारा।
  • जीनभद्र सूरी ज्ञान भंडार: सोनार दुर्ग स्थित भारत का प्राचीनतम हस्तलिखित जैन ग्रंथालय।
  • गड़ीसर झील: रावल घड़सी द्वारा निर्मित, टीलों की प्रोल इसका मुख्य प्रवेश द्वार।
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सामान्य प्रश्न

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

जैसलमेर भाटी राजवंश से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं के महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

जैसलमेर नगर एवं सोनार दुर्ग (सोनारगढ़) की स्थापना 12 जुलाई 1155 ई. (श्रावण शुक्ल द्वादशी) को रावल जैसल भाटी द्वारा त्रिकूट पहाड़ी पर की गई थी।
जैसलमेर के भाटी शासक भारत की उत्तर-पश्चिमी सीमा पर विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं (अरब, तुर्क, अफगान) के आक्रमणों को सर्वप्रथम रोकने वाली ढाल थे, इसलिए इन्हें 'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' (उत्तरी सीमा का प्रहरी) कहा गया।
1550 ई. में रावल लूणकरण के समय कंधार के अमीर अली के आक्रमण पर राजपूत वीरों ने केसरिया तो किया और विजय प्राप्त की, किंतु युद्ध जीतने के कारण रानियों द्वारा जौहर नहीं हुआ। केसरिया हुआ पर जौहर नहीं, इसलिए इसे 'अर्द्ध साका' कहते हैं।
भाटी राजवंश की कुलदेवी 'स्वांगिया माता' (सुआंगिया / आवड़ माता - प्रतीक मुड़ा हुआ भाला व सुगंध चिड़ी) तथा कुलदेवता 'श्री लक्ष्मीनाथ जी' हैं।
सागरमल गोपा जैसलमेर रियासत के अमर स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी प्रमुख पुस्तकें 'जैसलमेर का गुंडाराज', 'रघुनाथ सिंह का मुकदमा' एवं 'आजादी के दीवाने' हैं। 3 अप्रैल 1946 को जेल में उन्हें जिंदा जला दिया गया था।

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