बीकानेर का राठौड़ वंश:
राव बीका से महाराजा गंगा सिंह तक सम्पूर्ण गौरवगाथा
राव बीका (1488 ई.) द्वारा बीकानेर की स्थापना, राव लूणकरण (कलयुग का कर्ण), महाराजा रायसिंह (राजपूताने का कर्ण व जूनागढ़ निर्माता), पृथ्वीराज राठौड़ (डिंगल का हेरोस), राव कर्णसिंह (मतीरे की राड़ 1644) तथा महाराजा गंगा सिंह (गंग नहर 1927) का 100% प्रामाणिक व परीक्षा-केंद्रित अध्ययन।
स्थापना वर्ष
1488 ई.
मूल संस्थापक
राव बीका
कुलदेवी: करणी माता (देशनोक) | कुलदेवता: लक्ष्मीनाथ जी
राजस्थान के प्रमुख राजवंश
पूरा इतिहास हब देखेंबीकानेर का राठौड़ राजवंश: सम्पूर्ण ऐतिहासिक विश्लेषण
स्थापना, प्रतापी शासक, युद्ध, जूनागढ़ दुर्ग स्थापत्य, डिंगल साहित्य एवं आधुनिक गंग नहर का प्रामाणिक विवरण।
1. बीकानेर के राठौड़ वंश की स्थापना एवं राव बीका (1465 – 1504 ई.)
बीकानेर के राठौड़ वंश के संस्थापक राव बीका, मारवाड़ (जोधपुर) के संस्थापक राव जोधा के पांचवें पुत्र थे। 1465 ई. में अपने चाचा कांधल, भाई बीदा तथा नापा सांखला के सहयोग से उन्होंने जांगल देश की ओर कूच किया।
करणी माता का आशीर्वाद व कोडमदेसर
देशनोक की अधिष्ठात्री देवी करणी माता ने राव बीका को जांगल देश में राज्य स्थापित करने का आशीर्वाद दिया। बीका ने सर्वप्रथम 1472 ई. में कोडमदेसर को अपना केंद्र बनाया और वहाँ प्रसिद्ध भेरुजी मंदिर का निर्माण करवाया।
बीकानेर नगर की स्थापना (1488 ई.)
राव बीका ने 1488 ई. (वैशाख शुक्ल तृतीया / अक्षय तृतीया / आखातीज) को 'रातीघाटी' नामक स्थान पर 'बीकाजी की टेकरी' पर दुर्ग की नींव रखी तथा बीकानेर नगर बसाया (बीका + नरा जाट के नाम पर बीकानेर)।
📌 प्रमुख ऐतिहासिक उपलब्धियां:
- राव बीका ने देशनोक में करणी माता के मूल मंदिर का निर्माण करवाया।
- जोधपुर के राव सूजा पर आक्रमण कर राव बीका ने अपने पिता जोधा की प्रसिद्ध पूज्य वस्तुएं (ढाल, तलवार, लक्ष्मीनाथ जी की मूर्ति, दलसिंगार घोड़ा व तख्त) सम्मानपूर्वक प्राप्त कीं।
- बीकानेर के राठौड़ों के कुलदेवता लक्ष्मीनाथ जी तथा कुलदेवी करणी माता एवं नागणेची माता हैं।
2. राव लूणकरण ('कलयुग का कर्ण') एवं राव जैतसी
👑 राव लूणकरण (1505 – 1526 ई.) – 'कलयुग का कर्ण'
दानी शासक- कलयुग का कर्ण: बिठू सूजा ने अपने ऐतिहासिक ग्रंथ 'राव जैतसी रो छंद' में राव लूणकरण की दानशीलता के कारण उन्हें 'कलयुग का कर्ण' कहा है।
- कर्मचंद वंशोत्कीर्तनक काव्यम्: जयसोम कृत इस संस्कृत ग्रंथ में लूणकरण की दानवीरता की तुलना कर्ण से की गई है।
- लूणकरणसर झील: बीकानेर में खारे पानी की प्रसिद्ध 'लूणकरणसर झील' तथा कस्बे की स्थापना की।
- ढोसी का युद्ध (1526 ई.): नारनौल (हरियाणा) के नवाब मीर मीरू के विरुद्ध लड़ते हुए राव लूणकरण वीरगति को प्राप्त हुए।
⚔️ राव जैतसी (1526 – 1542 ई.) – रातीघाटी व पाहेबा का युद्ध
ऐतिहासिक युद्ध- रातीघाटी का युद्ध (1534 ई.): बाबर के पुत्र कामरान ने भटनेर जीतकर बीकानेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। 26 अक्टूबर 1534 को राव जैतसी ने रात्रि में अचानक छापा मारकर कामरान की मुगल सेना को पराजित कर भगा दिया। (इस विजय का प्रामाणिक वर्णन बिठू सूजा के 'राव जैतसी रो छंद' में मिलता है)।
- खानवा का युद्ध (1527 ई.): राणा सांगा की सहायतार्थ अपने कुंवर कल्याणमल के नेतृत्व में सेना भेजी।
- पाहेबा/साहेबा का युद्ध (1541-42 ई.): जोधपुर के शासक राव मालदेव ने बीकानेर पर आक्रमण किया। इस युद्ध में राव जैतसी लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। मालदेव ने बीकानेर का प्रबंध अपने सेनापति कूम्पा को सौंपा।
3. राव कल्याणमल (1544 – 1574 ई.) – नागौर दरबार (1570)
पाहेबा युद्ध के बाद कल्याणमल ने शेरशाह सूरी की शरण ली तथा गिरी-सुमेल युद्ध (1544 ई.) में शेरशाह की सहायता की, जिसके बाद उन्हें बीकानेर पुनः प्राप्त हुआ।
4. महाराजा रायसिंह (1574 – 1612 ई.) – 'राजपूताने का कर्ण'
रायसिंह अकबर एवं जहांगीर दोनों के अत्यंत विश्वासपात्र सेनापति थे। आमेर के मानसिंह प्रथम के बाद मुगल दरबार में रायसिंह का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्थान था (मनसब: 4000/5000)।
- उपाधि: प्रसिद्ध इतिहासकार मुंशी देवीप्रसाद ने रायसिंह की अप्रतिम दानशीलता के कारण इन्हें 'राजपूताने का कर्ण' की उपाधि दी।
- जोधपुर का प्रशासक (1572-1574 ई.): अकबर ने राव चंद्रसेन के विरुद्ध जोधपुर का प्रशासन 3 वर्ष तक रायसिंह को सौंपा था।
- जूनागढ़ दुर्ग का निर्माण (1589-1594 ई.): अपने योग्य प्रधानमंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर में भव्य 'जूनागढ़ दुर्ग' (जमीन का जेवर / रातीघाटी का किला) का निर्माण करवाया।
- रायसिंह प्रशस्ति: जूनागढ़ के सूरजपोल द्वार पर जैन मुनि जयता द्वारा रचित संस्कृत प्रशस्ति उत्कीर्ण करवाई। इसी द्वार पर चित्तौड़ के तीसरे साके (1568) के अमर वीर जयमल मेड़तिया एवं फत्ता सिसोदिया की गजारूढ़ पाषाण मूर्तियां स्थापित करवाईं।
- रचित ग्रंथ: रायसिंह स्वयं विद्वान थे। इन्होंने 'रायसिंह महोत्सव', 'वैद्यक वंशावली', 'ज्योतिष रत्नमाला' एवं 'बालबोधिनी टीका' की रचना की।
- निधन: 1612 ई. में दक्षिण भारत के बुरहानपुर में इनका निधन हुआ। (प्रसिद्ध दोहा: "तू देशी रूखड़ा, म्है परदेशी लोग...")।
5. पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) – 'डिंगल का हेरोस'
कल्याणमल के कनिष्ठ पुत्र एवं अकबर के नवरत्नों में शामिल दरबारी कवि। इतालवी विद्वान डॉ. एल.पी. तेस्सीतोरी ने इन्हें 'डिंगल का हेरोस' (Pithal) कहा है।
1. वेलि क्रिसन रुकमणी री: गागरोन दुर्ग में रहते हुए डिंगल भाषा में रचित अमर रचना। समकालीन प्रसिद्ध कवि दुरसा आढ़ा ने इस ग्रंथ को '5वाँ वेद एवं 19वाँ पुराण' कहा है।
2. अन्य प्रमुख ग्रंथ: 'गंगा लहरी', 'दसम भागवत रा दूहा', 'ठाकुरजी रा दूहा', 'कल्ला रायमलोत री कुंडलिया'।
3. पाथल और पीथल: कन्हैयालाल सेठिया कृत प्रसिद्ध काव्य जिसमें 'पाथल' महाराणा प्रताप एवं 'पीथल' पृथ्वीराज राठौड़ हैं।
6. राव कर्णसिंह ('जांगलधर बादशाह') एवं महाराजा अनूप सिंह (कला स्वर्णकाल)
👑 राव कर्णसिंह (1631 – 1669 ई.) – 'जांगलधर बादशाह'
मतीरे की राड़- उपाधि: समकालीन राजपूत शासकों ने इन्हें 'जांगलधर बादशाह' की उपाधि से विभूषित किया।
- मतीरे की राड़ (1644 ई.): बीकानेर के गांव सीलवा तथा नागौर के गांव जाखणिया की सीमा पर उगी मतीरे की बेल के फल पर अधिकार को लेकर बीकानेर के राव कर्णसिंह एवं नागौर के अमर सिंह राठौड़ के मध्य 1644 ई. में ऐतिहासिक युद्ध हुआ (बीकानेर विजयी रहा)।
- साहित्यिक योगदान: स्वयं कर्णसिंह ने 'साहित्य कल्पद्रुम' ग्रंथ रचा। इनके दरबारी विद्वान गंगाधर मैथिल ने 'कर्णभूषण' व 'काव्य डाकिनी' की रचना की।
🎨 महाराजा अनूप सिंह (1669 – 1698 ई.) – विद्यानुरागी व कला संरक्षक
कला स्वर्णकाल- उपाधि: औरंगजेब ने दक्षिण अभियानों में वीरता हेतु इन्हें 'माही मरातिब' की उपाधि प्रदान की।
- चित्रकला का स्वर्णकाल: अनूप सिंह का काल बीकानेर चित्रकला शैली (उस्ता कला व मथेरण कला) का स्वर्ण काल कहलाता है।
- अनूप संस्कृत पुस्तकालय: दक्षिण भारत से भारी संख्या में दुर्लभ संस्कृत पांडुलिपियों व हिंदू मूर्तियों को नष्ट होने से बचाकर जूनागढ़ में संरक्षित किया। (यहाँ '33 करोड़ देवी-देवताओं का मंदिर' बनवाया)।
- रचित ग्रंथ: 'अनूप विवेक', 'काम प्रबोध', 'श्राद्ध प्रयोग चिंतामणि', 'अनूपोदय'।
- दरबारी संगीतकार: प्रसिद्ध संगीतकार भावभट्ट (ग्रंथ: 'संगीत अनूपांकुश', 'अनूप विलास', 'अनूप संगीत रत्नाकर')।
महाराजा सूरत सिंह (1787-1828 ई.): 1805 ई. में मंगलवार के दिन भटनेर दुर्ग जीतकर उसका नाम 'हनुमानगढ़' रखा। 9 मार्च 1818 को अंग्रेजों से सहायक संधि की।
महाराजा सरदार सिंह (1851-1872 ई.): 1857 की क्रांति के दौरान अपनी सेना लेकर राज्य से बाहर (पंजाब के बाडलू तक) अंग्रेजों की सहायतार्थ जाने वाले राजस्थान के एकमात्र शासक। अंग्रेजों ने इन्हें टिब्बी परगने के 41 गांव उपहार में दिए।
7. महाराजा गंगा सिंह (1887 – 1943 ई.) – आधुनिक भारत के भगीरथ
महाराजा गंगा सिंह बीकानेर के सर्वाधिक दूरदर्शी व आधुनिक निर्माता शासक थे। इन्हें राजस्थान व आधुनिक भारत का 'भगीरथ' कहा जाता है।
गंग नहर का निर्माण (1927 ई.)
1899 के 'छप्पनिया अकाल' से व्यथित होकर सतलुज नदी (हुसैनीवाला, पंजाब) से पानी लाने हेतु विश्व की प्रथम पक्की नहर गंग नहर का निर्माण करवाया। मुख्य अभियंता: कंवर सेन। उद्घाटन 26 अक्टूबर 1927 को लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक योगदान
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के बाद पेरिस शांति सम्मेलन में वर्साय की संधि (1919) पर हस्ताक्षर करने वाले एकमात्र भारतीय राजकुमार। लंदन में तीनों गोलमेज सम्मेलनों (1930, 1931, 1932) में भाग लिया।
🎖️ अन्य ऐतिहासिक उपलब्धियां:
- गंगा रिसाला: ऊंटों की प्रसिद्ध सैन्य टुकड़ी, जिसने 1900 ई. में चीन के बॉक्सर विद्रोह एवं प्रथम विश्व युद्ध में अद्वितीय पराक्रम दिखाया।
- नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes): 1921 में गठित नरेंद्र मंडल के प्रथम चांसलर (कुलाधिपति) बने (1921-1926 तक)।
- मंदिरों का जीर्णोद्धार: रामदेवरा (रामदेव जी मंदिर), देशनोक (करणी माता) एवं गोगामेड़ी (हनुमानगढ़) के मंदिरों का वर्तमान पक्का स्वरूप निर्मित करवाया।
- प्रजा प्रतिनिधि सभा (1913 ई.): रियासत में वैधानिक सुधार हेतु राजस्थान में सर्वप्रथम प्रतिनिधि सभा का गठन किया।
- महाराजा सार्दुल सिंह (अंतिम शासक): भारत संघ के विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्थान के प्रथम शासक (7 अगस्त 1947)।
8. बीकानेर के प्रमुख साहित्यिक ग्रंथ एवं रचयिता
| ग्रंथ का नाम | रचयिता | संबंधित शासक / ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|
| राव जैतसी रो छंद | बिठू सूजा | कामरान पराजय, राव जैतसी व लूणकरण ('कलयुग का कर्ण') |
| कर्मचंद वंशोत्कीर्तनक काव्यम् | जयसोम | रायसिंह का इतिहास एवं मंत्री कर्मचंद की वंशावली |
| वेलि क्रिसन रुकमणी री | पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) | डिंगल महाकाव्य ('5वाँ वेद, 19वाँ पुराण' – दुरसा आढ़ा) |
| रायसिंह महोत्सव | महाराजा रायसिंह | ज्योतिष व आयुर्वेद ग्रंथ |
| साहित्य कल्पद्रुम / कर्णभूषण | राव कर्णसिंह / गंगाधर मैथिल | सांस्कृतिक व काव्य शास्त्रीय ग्रंथ |
| अनूप विवेक / काम प्रबोध | महाराजा अनूप सिंह | शास्त्र व धर्म ग्रंथ |
| अनूप संगीत रत्नाकर | भावभट्ट | शास्त्रीय संगीत का प्रामाणिक ग्रंथ |
9. परीक्षा-उपयोगी रामबाण तथ्य (High-Yield RPSC/RAS Facts)
📌 बीकानेर इतिहास रामबाण बिंदु
- बीकानेर स्थापना: 1488 ई. (आखातीज) – राव बीका द्वारा।
- कलयुग का कर्ण: राव लूणकरण (बिठू सूजा द्वारा)।
- राजपूताने का कर्ण: महाराजा रायसिंह (मुंशी देवीप्रसाद द्वारा)।
- जूनागढ़ दुर्ग: रायसिंह द्वारा कर्मचंद की देखरेख में निर्मित (1589-94 ई.)।
- मतीरे की राड़: 1644 ई. (कर्णसिंह vs अमर सिंह राठौड़)।
- जांगलधर बादशाह: राव कर्णसिंह की उपाधि।
📌 आधुनिक इतिहास बिंदु
- गंग नहर: 1927 ई. में महाराजा गंगा सिंह द्वारा निर्मित।
- वर्साय की संधि (1919): हस्ताक्षर करने वाले एकमात्र भारतीय गंगा सिंह थे।
- 1857 क्रांति: महाराजा सरदार सिंह अपनी सेना लेकर राज्य से बाहर (बाडलू) गए।
- विलय-पत्र पर हस्ताक्षर: महाराजा सार्दुल सिंह ने 7 अगस्त 1947 को सर्वप्रथम हस्ताक्षर किए।
- हनुमानगढ़ नामकरण: 1805 ई. में महाराजा सूरत सिंह द्वारा भटनेर जीतने पर।
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